किसके सर सजेगा उत्तराखंड का ताज!

उत्तराखंड में मतदान के समय भाजपा से नाराज कई लोगों ने तो अंतिम समय पर अपने और परिवार के मन को बदलने का कारण यहां तेजी से बदल रहे डेमोग्राफिक अनुपात को भी बताया है। यह फैक्टर कितना काम किया यह परिणाम ही बताएंगे। फिलहाल जो अध्ययन इस विषय पर हुई है उसके आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 सालों में उत्तराखंड के बाद यदि कहीं सबसे अधिक मुस्लिम आबादी बाहर से आकर बसी है तो वह उत्तराखंड ही है।

उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव के लिए 14 फरवरी को हुए मतदान के बाद समीकरण और अधिक उलझे नजर आ रहे हैं। सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों ही अपनी सरकार बनने का दावा भले ही ठोक रहे हों लेकिन दोनों ही खेमों में आत्मविश्वास की कमी साफ झलक रही है। सत्तारूढ़ बीजेपी के खेमे में तो खुल कर आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है। वहीं कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पार्टी की जीत पर मुख्यमंत्री पद के लिए चौसर बिछाना शुरू कर दिया है।

इन सबके बीच उत्तराखंड के सामने खड़े तमाम संवेदनशील मुद्दे गौण हो गए हैं। जिन पर किसी भी पार्टी ने खुल कर बोलने का साहस नहीं किया। हालांकि विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले ही हरीश रावत ने पंजाब की तर्ज पर उत्तराखंड में दलित मुख्य मंत्री का दांव खेला था। यदि कांग्रेस हाईकमान इस पर विचार करता है तो बाजपुर से चुनाव लड़ने वाले यशपाल आर्य का दावा बनता है जो बीजेपी से फिर कांग्रेस में लौटे हैं। कई बार मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष भी रहे हैं। ऐसा कर कांग्रेस दूसरे राज्यों में पार्टी छोड़ कर गए लोगों के लिए वापसी का रास्ता साफ कर सकती है।

अभी तक मिले आंकड़ों के अनुसार इस बार राज्य में 65. 37 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। किसी भी दल की कोई लहर पूरे चुनाव में देखने को नहीं मिली। तमाम बड़े से बड़े दिग्गज नेता अपने ही चुनाव क्षेत्र में फंसे हुए नजर आए। मतदाता भी इस बार बहुत खामोश नजर आया। मानों कह रहा हो 10 मार्च को ही हमारा फैसला पता चलेगा। यह हाल उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के पर्वतीय, तराई और मैदानी इलाकों में साफ दिखा। पूरे राज्य के विभिन्न हिस्सों से मिली जानकारी के अनुसार शराब पिलाने, मुर्गा खिलाने में इस बार तमाम उम्मीदवारों ने 15 लाख से 50 लाख रुपए के बीच खर्च कर डाले। अल्मोड़ा से ही पत्रकार और राजनीति से जुड़े रमेश जोशी बताते हैं कि इस बार बड़े से बड़े शराबी मतदान के तीन दिन पहले ही इतने पस्त हो गए थे कि हाथ जोड़ कर और शराब पीने से इंकार करते नजर आ रहे थे। इसके अतिरिक्त प्रेशर कुकर बांटने, कहीं कहीं रुपया बांटने का खेल भी हुआ, जिसे पकड़ा नहीं जा सका। इसी के साथ बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों में विद्रोही उम्मीदवारों के साथ भितरघातियों ने भी जो भूमिका निभाई है वह परिणामों पर बड़ा असर डालेगी। असमंजस का एक बड़ा कारण यह भी है।

मतदान के बाद कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का यह बयान कि सत्ता में आने पर या तो मुख्य मंत्री बनेंगे नहीं तो घर बैठ जाएंगे, कांग्रेस की जीत के प्रति उनके आत्मविश्वास की झलक दिखला रहा है। हरीश रावत तो यह भी दावा कर रहे हैं कि रुझानों के मुताबिक बहुमत से अधिक बढ़ कर 45 से 48 सीट कांग्रेस की झोली में आ रही हैं। वे लाल कुआं विधानसभा सीट से खुद को और हरिद्वार ग्रामीण सीट से अपनी बेटी अनुपमा रावत को जीता बता रहे हैं। लेकिन वह  2017 में दो सीटों पर हार जाने के डर से उत्पन्न सावधानी बरतते हुए यह भी कह देते हैं कि उनके प्रतिद्वंदी डॉ. मोहन सिंह बिष्ट और बेटी की सीट पर मंत्री यतीश्वरानंद से कड़ा मुकाबला रहा। साफ है यह हरीश रावत की पार्टी हाईकमान को दबाव में लेने की सियासत भी है। क्योंकि कांग्रेस की जीत होने पर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह भी मुख्य मंत्री पद के सशक्त दावेदार हैं।

इस बार के चुनाव परिणामों को आम आदमी पार्टी के साथ ही, निर्दलीय और उत्तराखंड क्रांति दल की भूमिका भी बहुत प्रभावित करने वाली है। कुछ सीटों पर इनके उमीदवार जीत भी जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। बहुजन समाज पार्टी भी एक सीट ला सकती है। लगता है कि बीजेपी ने भी इन सब परिस्थितियों का आकलन कर रखा है। इसलिए किसी को भी बहुमत नहीं मिलने की स्थिति के लिए पहले से ही पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को सक्रिय कर दिया गया है। निशंक को बागी उम्मीदवारों को समझाने के नाम पर आगे किया गया था। कुछ को उन्होंने मना भी लिया था। निशंक को इस तरह की परिस्थिति आने पर अच्छा मैनेजर माना जाता है।

उत्तराखंड में मतदान के समय बीजेपी से नाराज कई लोगों ने तो अंतिम समय पर अपने और परिवार के मन को बदलने का कारण यहां तेजी से बदल रहे डेमोग्राफिक अनुपात को भी बताया है। इस फैक्टर ने कितना काम किया यह परिणाम ही बताएंगे। फिलहाल जो स्टडी इस विषय पर हुई है उसके आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 सालों में उत्तराखंड के बाद यदि कहीं सबसे अधिक मुस्लिम आबादी बाहर से आकर बसी है तो वह उत्तराखंड ही है। उत्तराखंड में लंबे समय से विधानसभा क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ऐसी आबादी बसाई जा रही है जो चुनावों को प्रभावित कर सके। देहरादून, नैनीताल, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिले खास तौर पर इसके उदाहरण बन चुके हैं। असम भी सीमावर्ती राज्य है और उत्तराखंड भी। असम में तो बीजेपी इसे लेकर बहुत आक्रामक रही है। आरएसएस ने भी खुल कर विरोध दर्ज किया है। उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार होने के बाद भी पार्टी और आरएसएस सब कुछ जानते देखते हुए भी क्यों चुप्पी साधे बैठे रहे, यह बड़ा सवाल है? फिलहाल यह बीजेपी की विचारधारा से जुड़े मतदाताओं के क्रोध और चिंता का कारण भी बना हुआ है। स्थानीय मीडिया भी इस पर चर्चा करने से हमेशा कतराता रहा है।

कांग्रेस की तर्ज पर ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मतदान पूरा होने के बाद फिर से उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार बनने और हर पांच साल में सत्तारूढ़ दल के सत्ता से बाहर होने के मिथक को तोड़ने का दावा किया है। वे 60 सीट के आंकड़ों पर टिके हुए हैं जो फिलहाल संभव नहीं दिखता।

कुल मिला कर 70 विधानसभा सीटों वाले उत्तराखंड में इस बार मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच बहुत ही कड़ा है। कहीं हालात 2012 जैसे न हो जाएं। जब एक सीट के कारण बीजेपी सत्ता से दूर हो गई थी और कांग्रेस दूसरे दलों की मदद से सरकार बना ले गई थी। इस बार वैसी ही कहानी बीजेपी न दोहरा दे, निर्दलीय व दूसरे दलों के विधायकों की मदद से। यदि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही सत्ता के लिए बहुमत की 36 सीटों से थोड़ा दूर रह जाते हैं तो परिस्थितियां कुछ भी करा सकती हैं। उत्तराखंड के राजनीतिक समीकरण तो कुछ ऐसा ही संकेत दे रहे हैं।  इसलिए बड़े से बड़ा सियासी भविष्यवाणी करने वाला उत्तराखंड के परिणामों के लिए कुछ भी खुल कर बोलने को तैयार नहीं है।

उत्तराखंड में मतदान के बाद परिणाम को लेकर असमंजस की स्थिति में पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों से हुई चर्चा के बाद मोदी फैक्टर भी उभर कर सामने आया है। पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों में उन्हें मिलने वाली राशि को ’मोदी का पैसा’ कहा जाता है। ऐसी ही स्थिति मुफ्त अनाज को लेकर भी है। महिलाओं में भी मोदी के प्रति खास लगाव नजर आता है। इतना ही नहीं उत्तराखंड के पूर्व सैनिक भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति खास लगाव और समर्पण रखते हैं। यह सारी बातें विभिन्न तबकों के लोगों से बातचीत के बाद सामने आई है। हालांकि ऐसे लोगों का यह आरोप भी है कि बीजेपी कार्यकर्ता जमीनी हकीकत से दूर जा रहे हैं तो नेता कांग्रेस के पुराने कल्चर को अपनाकर झोली भरने में जुट रहे हैं। उत्तराखंड में मोदी फैक्टर ही बीजेपी को 40 सीटों तक पहुंचा पाएगा। जिसमें पर्वतीय क्षेत्रों की भूमिका अहम योगदान देगी।

आपकी प्रतिक्रिया...