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***डॉ. गिरीश  ग़ौरव***

 

भारत की पहचान दुनिया में विश्वगुरु की रही है। इस अलंकरण से भारतमाता को विभूषित कराने में बिहार का सर्वोत्तम स्थान रहा है। इतिहासकारों के अनुसार भी बिहार में ही सर्वप्रथम लोकतंत्र, भारतीय राष्ट्र का अभ्युदय, लोककल्याणकारी राज्य, अहिंसा एवं सत्याग्रह की शुरुआत हुई। नारी सशक्तीकरण हो या फिर सामाजिक परिवर्तन या धार्मिक परिर्वतन, सभी का केन्द्र बिहार ही रहा है। यहां गौतम बुद्ध, महावीर, स्वामी सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, आदि ने समय-समय पर देश का मार्गदर्शन दिया है। इस बिहार की भूमि ने कौटिल्य जैसे राजनीतिक चिंतक, जीवक, चरक जैसे चिकित्सक, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, बाणभट्ट जैसे विद्वान एवं गार्गी, भारती आदि विदुषी नारियों को जन्म दिया है। वहीं दूसरी ओर जरासंध, बिम्बिसार, अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, अशोक, समुद्रगुप्त आदि जैसे वीरों की भूमि रही है। इसके बावजूद समृद्ध धरोहरों की परम्परा वाली भूमि विकास के दौड़ में पिछड़ रही है। कभी नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी जैसे विख्यात विश्वविद्यालय वाला राज्य आज शिक्षा के क्षेत्र में भी पिछड़ा हुआ है।
         बिहार को पवित्र गंगा की धारा दो भौगोलिक क्षेत्रों में अलग करती है- उत्तर एवं दक्षिण बिहार। वैशाली गणराज्य, विदेहराज्य, मल्लराष्ट्र और लिच्छवी गणराज्य उत्तर बिहार में वहीं दक्षिण बिहार में कुरु, अंग और मगध का प्रभुत्व था। बिहार के नाम का उल्लेख प्राचीन काल में कहीं भी दिखाई नही पड़ता। भौगोलिक रूप से ऊपर के क्षेत्रों को मिलाकर वर्तमान बिहार प्रांत का निर्माण हुआ। बौद्ध विहारों की अधिकता होने के कारण मुस्लिम आक्रमणकारियोंे ने इन क्षेत्रों का नाम ‘विहार’ रखा, जो आगे चलकर बिहार नाम से प्रचलित हो गया।
        दो हजार वर्षों तक प्राचीन मगध का इतिहास संपूर्ण भारत का इतिहास रहा। बिहार पूरे भारत का हृदय हुआ करता था। यह उक्ति आज भी प्रासंगिक है। संस्कृति और प्राचीन भारतीय इतिहास की अनमोल धरोहर आज भी बिहार अपने में समाहित किये हुये है। बिम्बिसार ने पूरे बिहार को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया तो उसे मजबूती अजातशत्रु ने प्रदान की। महापद्मनन्द के काल में मगध का लोहा सभी मानते थे तथा इसकी राजधानी पाटलीपुत्र भारत का प्रमुख नगर माना जाता था, इसी काल में मगध के राजा और प्रजा का अनुकरण करने में लोग अपने को गारैवान्वित महसूस करते थे। वीरता एवं पराक्रम में मगध का दबदबा था तो अध्यात्म ज्ञान में मिथिला का लोहा माना जाता था।
      दुनिया को जीतने की इच्छा से निकले सिकन्दर की सेना मगध का नाम ही सुनकर सीमा प्रदेश से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। चन्द्रगुप्त ने अपने गुरु चाणक्य के मार्गदर्शन में साम्राज्य स्थापित किया तो अशोक ने धर्मराज्य स्थापित किया। लिच्छवी गणराज्य विश्व के प्रथम गणतंत्र में स्थापित राज्य था।
       सामाजिक, आध्यात्मिक तथा बौद्धिक क्षेत्र में बिहार ने जो अपना कीर्ति स्तम्भ निर्धारित किया, दुनिया सदा उसके प्रति नतमस्तक होगी। आध्यात्मिक क्षेत्र में मिथिला का सर्वोच्च स्थान था। संस्कृत का एकमात्र केन्द्र मिथिला हुआ करता था। न्यायदर्शन का यह विश्वविख्यात विद्यापीठ हुआ करता था।
      जगतज्जनी जानकी जैसी देवी मिथिला की मिट्टी से निकली। वह मिथिला के राजा जनक की पुत्री नहीं थी; धरती पुत्री थीं, जाति व्यवस्था से ऊपर सम्पूर्ण मिथिला की बेटी। मिथिला की धरती को राजा विदेही माधव, महर्षि गौतम, रहुगण ने सदानीरा को पार कर यज्ञ अग्नि से दलदले और जंगली प्रदेश को ठोस एवं निवास योग्य बनाया, धरती पुत्री माता सीता का जन्म मिथिला के अकाल को दूऱ करने के लिये हुआ। राजा जनक का दरबार ब्रह्मचर्य के लिये जाना जाता था, शुक्रदेव जी जहां के द्वारपाल थे, कसाई के क्रोध से जहां पथभ्रष्ट तपस्वी को कर्म और त्याग का बोध कराया जाथा था। जहां राम के चरण स्पर्श से पत्थर स्त्री रूप में प्रकट हो गया, जहां सेवक बनकर भगवान शंकर भक्त की सेवा किया करते थे, मां गंगा ने बेटे की पुकार सुनकर अपना मार्ग बदलकर अंत समय में उसे अपनी गोद में अंगीकार कर लिया, यह वही बिहार की भूमि है।
      बिहार की धरती ने आदि- अनादि काल से सामाजिक-समरसता के निर्माण हेतु अनेकों महापुरुषों को अपनी धरती पर अवतरित कर सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिशीलता में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।
        कपिल, कणाद, गौतम, कश्यप, विभाण्डक, ऋष्यश्रृंग, शतानन्द, जनक याज्ञवल्क्य, जैमिनी, कौटिल्य, वराहमिहिर, कालिदास, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, विद्यावाचस्पति, उदयनाचार्य, मदन उपाध्याय, गंगेश उपाध्याय, उमापति, ज्योतिरीश्वर ठाकुर, आचार्य मिश्र, शंकर मिश्र, वाचस्पति मिश्र, विद्यापति जैसे उच्च श्रेणी के चिंतक हुये, जिनकी चिंतन प्रणाली से समाज में ज्ञान एवं बौद्धिकता की परपंरा विकसित हुई तो दूसरी तरफ कुंअर सिंह, स्वामी सहजानंद सरस्वती, सर गणेशदत्त, जय प्रकाश नारायण, रामधारी सिंह दिनकर, नागार्जुन, फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, नोरिक सल्हेस, दीनाभद्री, रायरण पाल और चुहड़मल सरीखे वीरों से मिथिला के तानी-भरनी का निर्माण हुआ जो सामाजिक समरसता के निर्माण का आधार बना।
विचारों का टकराव परिपक्व संस्कृति के निर्माण का द्योतक है। मिथिला की बौद्धिक क्षमता का र्हास मुस्लिम आक्रमणकारियों के द्वारा भी संभव नहीं हो सका।
       

 बिहार का प्राचीन एवं मध्य काल काफी गौरवपूर्ण रहा, किन्तु आज उस गौरवपूर्ण इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो हमारा बिहार अपने अतीत को देखकर यह महसूस करता है कि जब हम इतने समृद्ध हरेक क्षेत्र में हुआ करते थे तो वर्तमान में हमारी दशा इतनी क्यों बदल गयी, वर्तमान में हमारे पास ऐसे ऋषि का उदय क्यों नहीं हो पा रहा है? हमारे अन्दर ऐसी कौन सी कमजोरी आ गई, जिसमें हम अपने अतीत को चाह कर भी नहीं दुहरा पा रहे हैं। इसके अलावा ऐसे अनेकों प्रश्न हैं। बिहार खुद ही प्रश्न करता है और उत्तर ढूंढ़ने की कोशिश करता है। अनेकों दूरगामी उद्देश्यों वाले परिवर्तनकारी आंदोलनों के अगुआ रहा बिहार स्वयं जड़ और कहीं प्रतिगामी भूमिका का निर्वाह करता चला आया है? क्या बिहारी समाज अतीत मेें ही जीने वाला समाज बन गया है? क्या वर्तमान बिहार सामाजिक-आर्थिक एवं वैश्विक बौद्धिक विकास की चुनौती स्वीकार करने को तैयार नहीं है? क्या हिंसा, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को बिहार ने संस्कृति के स्तर पर समायोजित कर लिया है? क्या लांछन और उपहास का पात्र बने रहना बिहार की नियति हो गई है? यानि कि इसका कुछ नहीं किया जा सकता है? क्या बिहार के पास देश और दुनिया को देने के लिये कुछ भी शेष नहीं है? वास्तव में बिहार कुछ गहरे, सिरे से खुद को बदल रहा है। यदि हां तो, इसकी दिशा क्या है, इसका फलितार्थ इसे आगे ले जाने वाला है या इसे और पीछे धकेलने वाला? क्या देश और दुनिया के सामने बिहार अब भी एक संभावनाओं के रूप में बचा है?
       स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पैदा होता है कि ऐसी कौन-सी व्यवस्था लाई जायें जिससे बिहार अपने पुराने (प्राचीन) गौरव को पुन: स्थापित कर सके।
       हम विकास की जब बात करते हैं तो केवल बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना, बड़ी-बड़ी योजनाओें की चर्चा करते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि इस देश एवं प्रांत का गौरवपूर्ण अतीत बड़े-बड़े उद्योगों एवं बड़ी-बड़ी योजनाओं के द्वारा नहीं रहा, बल्कि समाज के द्वारा, समाज की निचली इकाई के कारण हुआ करता था। प्रत्येक क्षेत्रों का अपना-अपना प्रबंधन था और सभी अपनी जरूरत के आधार पर स्थानीय स्तर पर अपनी योजनाओं को निर्धारित करते थे। उन योजनाओं के निर्माण में आम लोगों की भागीदारी हुआ करती थी, एवं उनके क्रियान्वयन में किसी को कमीशन या रिश्वत नहीं दी जाती थी।
     वर्तमान समय में शिक्षा में गुणात्मक परिवर्तन की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। आज की शिक्षा व्यवस्था में लोगों के पास ज्ञान तो आ रहा है, परन्तु मूल्य का घोर अभाव है। शिक्षा से अगर मूल्य समाप्त हो जाय तो शिक्षा की वैसी ही स्थिति होगी जैसी एक सुंदर शरीर से आत्मा निकलने पर शरीर की होती है। वर्तमान समय में स्थापित अनेकों शोध संस्थाओं के समाज वैज्ञानिकों ने बिहार के विकास के संदर्भ में अपने शोध कार्य को पूरा कर जो रिपोर्ट दी, उसमें स्पष्ट कहा गया है कि बिहार की कई जातियों में ऐसे-ऐसे परंपरागत कौशल हैं, जिनको विकसित करने में कितनी पेशेवर संस्थाओं का निर्माण करना होगा। उनके कौशल का उपयोग कर उनको विकसित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ बिहार की एक अति पिछडी जाति है ‘मुसहर’, ये सैकड़ों वर्ष से चूहा पकड़ने, घास काटने, मछली मारने जैसे काम करते आये हैं। दूसरी एक जाति है ‘नट’ इनका मुख्य पेशा शिकार करना है। ये अपना शिकार तीरंदाजी एवं भाले से करते हैं। इन दो जातियों के अलावा सैकड़ों ऐसी जातियां हैं जिनकी कद-काठी बहुत मजबूत हैं। इन लोगों की कुशलता को विकसित करने का अगर प्रयास हो और इन्हें इनकी कुशलता के आधार पर खेलों में विकसित जाय तो यही लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक पदक जीतकर ला सकते हैं। लेकिन हम उन्हें सामान्य पाठ्यक्रम में ही लगाते हैं। परिणामस्वरूप वे स्कूल में ही ‘ड्रॉप आउट’ हो जाते हैं। हम यहां यह बिल्कुल नहीं कर रहे हैं कि उन्हें सामान्य पाठ्यक्रम में नहीं लाना चाहिए। हमारा तात्पर्य है कि जिसमें जो प्रतिभा स्वाभाविक रूप से हो उन्हें चिह्निेत कर उनके योग्य कार्यों में लगाया जाया ताकि कम समय में एवं कम लागत में उनका भी विकास हो और राज्य एवं देश का भी नाम हो। बिहार के मुसहर एक खास किस्म की घास उगाते हैं जिससे गुड़िया, खिलौने, चटाई की रस्सी बनाई जाती है। इन कुशलताओं को उद्योग विभाग के कार्यक्रमों से जोड़कर यदि इसकी मार्केटिंग की जाए तो इससे उनका सामाजिक विकास भी होगा और आर्थिक विकास भी।
        वर्तमान युग को आर्थिक युगकहा जा रहा है। इस युग में सबसे ज्यादा महत्त्व अर्थ को ही दिया जा रहा है। आज के युग में उसी व्यक्ति, परिवार, समाज, प्रांत, राष्ट्र को विकसित माना जाता है जो आर्थिक रूप से सम्पन्न हो, यही वर्तमान समय में विकास का मापदण्ड है। ऐसे समय में बिहार को मूल्यों पर अपने पांव जमाकर कौशल और क्षमता को और अधिक विकसित करना होगा, और अपने कौशल से ही अपनी पहचान को बनाये रखना होगा।
आने वाला समय निश्चित रूप से बिहार का समय होगा, वह बिहार बुद्ध का होगा। नदियों से व्यापार की प्राचीनतम व्यवस्था पटना से हुगली तक की गई थी। यहीं का मारूफगंज (सीतापट्टी) प्राचीनतम व्यापारिक स्थल रहा है। खगोलविद् आर्यभट्ट बिहार की राजधानी के निकट दानापुर से ही खगोलीय अध्ययन किया करते थे। वर्तमान में अमेरिकी अंतरिक्ष संस्थान नासा के पांच शीर्ष स्तर के वैज्ञानिक बिहार के ही हैं।
       बिहार का अर्थशास्त्र कृषि पर आधारित रहा है, जब यहां के मजदूर दूसरे राज्यों में सर्वोत्तम कर सकते हैं तो बिहार में क्यों नहीं? बिहार के युवा पूरी दुनिया के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। वर्तमान समय में उच्च शिक्षा के केन्द्र विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षा की स्थिति निराशाजनक है वहीं निजी संचालकों द्वारा संचालित अनेकों संस्थाओं में छात्रों की बाढ़ रहती है। ये दृश्य बिहार के छोटे-छोटे कस्बों एवं गांवों में भी देखे जा सकते हैं, जो यह दर्शाता है कि शासन की शिक्षा के प्रति काफी नकारात्मक सोच है, लेकिन बिहार का समाज शिक्षा को ग्रहण करने के प्रति अत्यधिक जागरूक है और आने वाले समय में समाज की इसी जागरूकता से बिहार का सम्पूर्ण विकास होगा और बिहार पुन: गौरवशाली अतीत को प्राप्त कर दुनिया में फिर से मां भारती को विश्वगुरु की मान्यता दिलवाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेगा।

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