समरथ को नहिं दोष गुसाईं

भारत का दुर्भाग्य रहा है कि आजादी के करीब 50 सालों तक हमने सिर्फ पाकिस्तान पर ही अधिक ध्यान दिया जबकि चीन को हमने भाई मानकर ‘हिन्दी-चीनी, भाई- भाई’ का नारा दिया। सेना की रिपोर्ट कहती है कि आने वाले समय में हमें चीन से अधिक खतरा है इसलिए हमें चीन को लेकर अधिक सजग रहने की जरुरत है और अगर हम चीन को टक्कर देंगे, तो पाकिस्तान अपने आप ही खत्म हो जाएगा।

इस वर्ष हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। स्वतंत्रता के पश्चात शुरु के करीब 40 सालों तक भारत की संरक्षण व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं थी, जितनी देश को इसकी जरुरत थी। इस कारण 1947 में पाकिस्तान, 1962 में चीन, 1965 में फिर से पाकिस्तान और अंत में कारगिल युद्ध हुआ। चीन से हार के बाद भारत ने अपनी जमीन भी गवां दी। इन सभी युद्धों के बाद भी तत्कालीन सरकारों ने कुछ नहीं सीखा और एक विचारधारा बना ली कि ऐसा ही चलता रहेगा। एक लम्बे समय के बाद 2014 से देश की सत्ता में परिवर्तन दिखा जिसका असर देश के सभी क्षेत्रों में भी दिख रहा है। मोदी सरकार में गृह नीति, विदेश नीति और युद्ध नीति में बड़ा परिवर्तन हुआ है और सभी के बीच एक समन्वय भी देखने को मिल रहा है।

देश की सुरक्षा की बात करें तो खतरा बाहर के साथ साथ अंदर से भी होता है। इस बात का इतिहास भी गवाह रहा है कि देश के आंतरिक दुश्मनों की वजह से देश गुलामी की जंजीरों में बहुत लम्बे समय तक जकड़ा रहा। देश की गृह नीति की वजह से आतंरिक दुश्मनों पर लगाम लगी है और अब यह संदेश जा रहा है कि भारत एक संगठित, सक्षम, कुशल और सुरक्षित देश की श्रेणी में आता है। देश की सुरक्षा में सिर्फ शस्त्र ही पूरा काम नहीं करते हैं बल्कि उनके इस्तेमाल की जानकारी भी बहुत आवश्यक है।

जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधान मंत्री थे, तब उन्होंने परमाणु परिक्षण किया था और भारत को परमाणु हथियार वाले देशों की लिस्ट में पहुंचा दिया था। दूसरा बड़ा परिवर्तन ऊरी का सर्जिकल स्ट्राइक था, जिसका संदेश पाकिस्तान के साथ साथ पूरी दुनिया के लिए था कि अगर हमें किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाया तो हम घर में घुसकर मारेंगे। पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट में जो हमला हुआ उससे यह भी संदेश पाकिस्तान को गया था कि हम इस्लामाबाद या फिर रावलपिंडी तक घुसकर मार सकते हैं। भारत द्वारा किये गये सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से शत्रु देश सहित विश्व के बाकी देशों का दृष्टिकोण बदला है और वह अब भारत को एक शक्तिशाली देश के रुप में देखते हैं। भारत की सेना 2014 के बाद से मजबूत हुई है। अब वह पूरे विश्व में तीसरे नंबर पर आती है। फिर भी हम अमेरिका, चीन और रुस की तरह कभी पहले हमला नहीं करते हैं लेकिन अगर कोई भारत की तरफ आंख उठाकर देखता है तो फिर हम छोड़ते भी नहीं हैं।

सुरक्षा नीति-विदेश नीति

सेना के लिए हथियार के साथ-साथ उनकी सक्षमता और मानसिकता भी बहुत जरुरी है। बिना सही मानसिकता के भी युद्ध नहीं जीता जा सकता है इसलिए विदेश नीति के साथ-साथ सुरक्षा नीति में समन्वय होना आवश्यक होता है। जब हम आत्मनिर्भर या स्वावलंबी भारत की बात करते हैं तो उसका सीधा अर्थ होता है कि हम किसी भी काम के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर ना हों, अगर युद्ध के दौरान आप किसी से शस्त्र मांगेंगे तो वह कभी भी समय पर नहीं मिलेगा, जब तक वह आप के पास आयेगा तब तक युद्ध समाप्त हो चुका होगा। एक कहावत है, ”अगर आप युद्ध को रोकना चाहते हैं तो आप हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहें यदि आप युद्ध के लिए तैयार नहीं है तो युद्ध आप पर थोप दिया जायेगा”। चीन और पाकिस्तान के हमले हम पर थोपे गये थे। थोपे गये युद्ध को जीतना मुश्किल होता है, क्योंकि आप उसके लिए तैयार नहीं होते हैं और जब तक राष्ट्र का झंडा दुश्मन की जमीन में ना खड़ा हो उसे जीत नहीं कहा जाता है।

किसी दुश्मन देश की जमीन को हड़पना और उसे कब्जे में रखना एक बड़ी चुनौती होती है अगर हमने पाकिस्तान का कोई हिस्सा जीत लिया तो फिर वहां के लोग कहां जाएंगे? अगर उनके रहने की कहीं और व्यवस्था नहीं हुई तो उनका पालन पोषण भी हमें ही करना होगा। हम किसी व्यक्ति को जीत सकते है लेकिन उसकी मानसिकता को जीतना बड़ा मुश्किल होता है। वह आपके देश में रहकर भी आप के विरुद्ध ही काम करेंगे। इसलिए युद्ध नीति में एक बड़ा परिवर्तन हो रहा है कि युद्ध में विजय होने के बाद जमीनों पर कब्जा ना करें बल्कि दुश्मन देश की युद्ध क्षमता को बर्बाद कर दें। शत्रु के हवाई जहाज, लड़ाकू विमान, शस्त्र कारखाना, हथियार कारखाना, बम सब कुछ नष्ट कर दिया जाए, जिससे उसे फिर से खड़ा होने के लिए कम से कम 50 वर्ष का समय लगे। लेकिन यह सब करने के लिए हमें ऐसे हथियारों की जरुरत होगी जो उनकी सीमा में गये बिना ही सैकड़ों किमी दूर से ही हमला कर सकें।

भारत में अब इस तरह के ब्रह्मोस मिसाइल और ड्रोन तैयार किए जा रहे हैं जो पांच हजार किमी तक हमला कर सकते हैं। दुश्मन दिल्ली से हजारों किमी दूर है। परंतु अब हमें वहां जाने की जरुरत नहीं होगी अब हम दिल्ली से ही हमला कर सकते हैं।

देश की नई विदेश नीति के तहत अब विदेश मंत्रालय के कर्मचारी जो दूसरे देशों में काम करते हैं, उन पर यह भी दायित्व होता है कि वह देश को विकसित करने के लिए देश के सामान की बिक्री को बढ़ाएं; वह चाहे हथियार, दवा, टेक्नॉलिजी या एजुकेशन कुछ भी हो। हाल ही में फिलिपींस से हथियार का जो सौदा हुआ उसमें फिलिपींस में भारतीय राजदूत पी शंभू कुमारन का अहम योगदान रहा है। अगर देश इसी कदम पर आगे बढ़ता रहा तो जल्द ही विश्व पटल पर एक नया भारत नजर आयेगा।

ढ़ांचागत सुविधाएं

भारत चीन सीमा पर हम बड़ी तैयारी के साथ काम कर रहे हैं। सीमा पर तेजी से सड़कों का विस्तार हो रहा है, जिससे हम तीन दिन वाले रास्ते को अब एक ही दिन में पूरा कर लेते हैं। जिस क्षेत्र के लिए 7 दिनों का सफर तय करना पड़ता था, उसे मात्र आधे घंटे में हेलिकॉप्टर के जरिए पूरा किया जा रहा है। विश्व का सबसे ऊंचा एयरपोर्ट लद्दाख में बना है। पहाड़ी इलाकों में रास्तों के निर्माण से ना सिर्फ सेना को फायदा मिल रहा है बल्कि स्थानीय रहवासियों के लिए भी यह रोजगार के अवसर पैदा कर रहा है। सड़कों के निर्माण से हमारी युद्ध क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है और हम दुश्मन पर अधिक प्रभावशाली होते हैं। चीन भी बहुत तेजी से सीमा पर गांवों को बसा रहा है। उससे चीन को दो फायदे होंगे; पहला दुश्मन कभी गांवों को बर्बाद नहीं करता है क्योंकि वह मानवाधिकार कानून के विरुद्ध होता है और दूसरा जिस गांव में ग्रामीण होंगे वहां सैनिक भी आराम से रह सकते हैं, जिससे दुश्मन देश उसका विरोध भी नहीं कर सकेंगे। चीन की यह नीति अत्यधिक प्रभावशाली है और अब भारत को भी उसी के आधार पर आगे बढ़ना होगा। भारतीय सीमा पर गांव को बसाना होगा और उसे एक छावनी के रुप में विकसित करना होगा जिससे हमारी सीमा शक्ति मजबूत होगी।

आत्मनिर्भर भारत

युद्ध सामग्री की खरीद पर होने वाले विवाद को रोकने और आत्मनिर्भर भारत को आगे बढ़ाने के लिए अधिकतर सामग्री को देश में ही तैयार किया जा रहा है। दरअसल अगर हम किसी और देश से विमान खरीदते हैं तो उसकी गोपनीयता नहीं होती है और उसकी जानकारी बाकी देशों तक पहुंच जाती है, जबकि अगर हम खुद से इसे तैयार करते हैं तो उसकी जानकारी दूसरे देशों तक नहीं जाती है और युद्ध के समय में दुश्मन इसका फायदा नहीं उठा पाता है।

स्वा. सावरकर कहते थे, “जो समुद्र पर शासन करेगा वह विश्व पर शासन करेगा।” लेकिन हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि समुद्र पर शासन करने के लिए हमें अंतरिक्ष पर भी पकड़ बनानी होगी, क्योंकि जो कुछ भी समुद्र की सतह पर दौड़ेगा उसका कंट्रोल अंतरिक्ष में होगा।

भारत का दुर्भाग्य भी रहा है कि आजादी के करीब 50 सालों तक हमने सिर्फ पाकिस्तान पर भी अधिक ध्यान दिया जबकि चीन को हमने भाई मानकर ’हिन्दी-चीनी, भाई- भाई’ का नारा दिया लेकिन बाद में इसी नारे ने हमें मरवा दिया। सेना की रिपोर्ट कहती है कि आने वाले समय में हमें चीन से अधिक खतरा है इसलिए हमें चीन को लेकर अधिक सजग रहने की जरुरत है और अगर हम चीन को टक्कर देंगे तो पाकिस्तान अपने आप ही खत्म हो जाएगा। इसलिए हमें चीन पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की जरुरत है। पाकिस्तान की शक्ति का पॉवर हाउस चीन है और पाकिस्तान चीन के ही इशारों पर चलता है इसलिए चीन को दबाना ज्यादा जरुरी है अगर हमारा प्रयास ऐसे ही चलता रहा तो हम आने वाले 10-15 सालों में चीन को दबाने में कामयाब हो जायेंगे।

कुछ लोग कहते है कि भारत कभी चीन का मुकाबला नहीं कर सकता। मैं ऐसे लोगों को कहना चाहूंगा कि अब हम ऐसे ही रोते, मार खाते नहीं रहेंगे। अब हम भी खड़े होंगे और अपनी ताकत दिखाएंगे। फिर यही कहावत चरितार्थ होगी कि ’समरथ को नहीं दोष गोसाई’ और भारत कहीं से भी दोषी नहीं होगा।

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