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***डॉ.ध्रुव कुमार *** 
    

 जैन धर्म भारत के प्रमुख धर्मों में से एक है, जो श्रमण परम्परा का वाहक है। इसकी जड़ प्रागैतिहासिक युग तक चली गयी है। वस्तुत: जैन संस्कृति वैदिक संस्कृति से निकलकर एक स्वतंत्र धारा के रूप में पल्लवित-पुष्पित हुई। इसमें वैदिक प्रवृत्तिमूलक परम्परा के साथ निवृत्तिमूलक अवधारणा को जोड़कर जिस समन्वित संस्कृति को आकार मिला वही श्रमण संस्कृति है। जैन संस्कृति के निर्माताओं ने देश के विभिन्न जनपदों में घूम-घूमकर जीवन और जगत के शाश्वत संदेशों को एवं कल्याण के आयामों को प्रचारित-प्रसारित किया। प्राचीन काल में अयोध्या, मथुरा, कौशाम्बी, श्रावस्ती, वाराणसी, अहिच्छत्रा, राजगृह, मिथिला, चम्पा, पाटलीपुत्र, विदिशा, उज्जैन, श्रवणवेलगोला आदि जैन संस्कृति के केन्द्र बनकर उभरे।
     जैन धर्म का बिहार से पुराकालिक गहन संबंध है। २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर को जन्म देने का अनन्य दुर्लभ गौरव बिहार को ही है। इसके अलावा छह अन्य तीर्थंकरों की जन्मस्थली, बराबर और नागार्जुनी गुफाएं, दर्जनों जैन मुनियों, श्रावकों और धर्म सभा स्थल के रूप में विहार, जैन धर्म, कला एवं संस्कृति का उद्गम स्थल रहा है।
      जैन धर्म चौबीस तीर्थंकरों की परम्परा में विश्वास करता है। जैन धर्म के प्रथम आदि तीर्थंकर ऋषभनाथ का जन्म स्थान कोशल जनपद था और अंतिम तीर्थंकर महावीर का जन्म स्थान वैशाली। बिहार की धरती पर महावीर के अलावा जिन छह तीर्थंकरों ने जन्म लिया उनमें नौवें तीर्थंकर पुष्पदंत या सुविधि अंग (मुंगेर) के काकंदी गांव, दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ मगध के भद्दिलपुर गांव में, बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य चम्पा भागलपुर, उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ मिथिला (दरभंगा), बीसवें तीर्थंकर सुव्रतनाथ राजगृह (राजगीर) और २१ वेंे तीर्थंकर नमिनाथ का जन्म मिथिला के राजपरिवार में हुआ था।
      बिहार को न केवल जैन तीर्थंकरों को जन्म देने का श्रेय है बल्कि अनेक जैनाचार्यों और जैन विद्वानों को भी जन्म देने और उनकी ख्याति को बढ़ाने का गौरव प्राप्त है। भगवान महावीर के धर्म परिषद के व्याख्याता तथा उनके प्रवचनों के संकलनकर्ता प्रधान शिष्य गौतम गणधर की जन्मस्थली बिहार की है। जैन हरिवंश पुराण के दूसरे अध्याय के ६१-६२ वें श्लोकों से यह ज्ञात होता है कि ‘केवल ज्ञान’ की प्राप्ति के बाद भी ६६ दिनों तक धर्म परिषद् में महावीर का उपदेश नहीं हो सका, क्योंकि विशिष्ट व्याख्याता गौतम गणधर उन दिनोें अनुपस्थित थे। इससे पता चलता है कि भगवान महावीर की दृष्टि में उनके प्रधान शिष्य गौतम गणधर का स्थान अति विशिष्ट था। बिना इनके भगवान महावीर का प्रवचन कार्य बंद रहता था। निर्युक्ति भाष्यकार आचार्य भदबाहु, सुधर्मा स्वामी, जम्बु स्वामी, तत्वार्थ सूत्र के रचयिता आचार्य उमा स्वाति (उमा स्वामी) नन्दि मित्रा और गोवर्धन का रिश्ता बिहार की पावन भूमि से था। माना जाता है कि जैन वाङमय का बहुलांश बिहार में ही निर्मित हुआ था। उसे दक्षिण भारत निवासी जैनाचार्यों ने बिहार यात्रा के दौरान लिखा। जैन साहित्य में बिहार के अनेक गांव, वन, पर्वत, नदी आदि का वर्णन बड़ी सजीवता से किया गया है।
     गया जिले में बेलागंज रेलवे स्टेशन से १६ किलोमीटर पूर्व में स्थित बराबर एवं नागार्जुनी पहाड़ियों में कुल सात गुफाएं अत्यंत ही कठोर ग्रेनाइट पत्थर को काट-काटकर बनायी गयी हैं। इसे मौर्य सम्राट अशोक और उसके पौत्र दशरथ ने अपार राजकीय मुद्रा व्यय कर जैन साधकों के लिए बनवाया। मानव निर्मित ये गुफाएं जैन धर्म के लिए ही नहीं वरन् समस्त भारत के लिए अपने आप में अनूठा एवं गुफा वास्तुकला में सर्वप्रथम प्रयोग है। इस पाषाण स्थापत्य और शिल्प कला के उन्नत उदाहरण को देख दर्शक आज भी दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो जाते हैं। प्राचीन काल में पूरे भारत में लगभग बारह सौ गुफाएं निर्मित की गई थीं। इनमें लगभग दो सौ गुफाएं जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। सम्राट अशोक ने अपनी निगरानी में बराबर पर्वत पर चार गुफाओं-कनंकोपर, सुदामा, लोमश ऋषि और विश्वझोपड़ी को कठोर काले ग्रेनाइट पत्थर में खुदवाया। सुदामा गुफा इन गुफाओं में सबसे पुरानी है। इसके प्रवेश द्वार के पूर्वी दीवार पर मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख उत्कीर्ण है, जिससे पता चलता है कि यह गुफा अशोक के राज्यकाल के १२ वें वर्ष में आजीविक साधुओं के लिए निर्मित कराई गयी थी। बराबर पहाड़ से सटे नागार्जुनी पर्वत पर तीन गुफाएं गोपिका, वहिजक और वडलहिक हैं, जिसका निर्माण अशोक के पौत्र दशरथ ने कराया था। ये गुफाएं भारतीय संस्कृति और जैन कला के अद्भुत उदाहरण हैं।
     वैशाली का कुंडग्राम २४ वें तीर्थंकर भगवान महावीर का च्यवन, जन्म एवं दीक्षा कल्याणक क्षेत्र हैं। यहां बिहार सरकार ने १९५२ ई. में प्राकृत जैन एवं अहिंसा शोध संस्थान की स्थापना कर इसे एक शिक्षा तीर्थ के रूप में ख्याति दी है। जैन परम्परा के अनुसार महावीर के समय (५६१-४९० ई. पू.) कुंडग्राम तीन भागों में विभक्त था। क्षत्रिय कुंडग्राम, ब्राह्मण कुंडग्राम और वाणिज्य ग्राम। तीनों आसपास थे। राजधानी नगर वैशाली (राजा विशाल का गढ़) और वाणिज्य ग्राम के बीच गंडकी बहती थी और क्षत्रिय कुंड और ब्राह्मण कुंड के बीच बहुशाल चैत्य की ख्याति थी। हर वर्ष महावीर जयंती के अवसर पर यहां वैशाली महोत्सव मनाया जाता है। यह सिलसिला १९४५ में शुरू हुआ, जो आज भी बरकरार है। यह स्थल पटना से ५४ किलोमीटर उत्तर में अवस्थित है।
      भगवान महावीर का निर्वाण स्थल होने के कारण पावापुरी जैन परम्परा का एक पवित्र स्थल है। कल्पसूत्र के अनुसार ७२ वर्ष की अवस्था में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को पावापुरी में ही उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। निर्वाणोपरांत मल्ल, लिच्छवि, कोशल, काशी आदि १८ गणराजाओं ने एकत्र होकर निर्वाण पूजन किया और दीपमाला प्रज्वलित की। पटना-रांची राजमार्ग पर पटना से लगभग ९२ किलोमीटर दूर नालंदा जिला अन्तर्गत गिरियक से चार किलोमीटर उत्तर में अवस्थित यह स्थल श्वेत संगमरमर से निर्मित स्मृति बोधक महावीर जिनालय के लिए विश्व प्रसिद्ध है। आयताकार पुष्करिणी के बीचोबीच निर्मित होने के कारण इसे जलमंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में महावीर के चरण चिह्न की पूजा होती है। मंदिर तक पहुंचने के लिए एक सुंदर पुल बना है। पुष्करिणी में वर्ष भर कमल पुष्प खिले रहते हैं।
      जैन परम्परा के अनुसार बिहार प्रदेश की पावन धरा पर तीर्थंकरों ने कुल छियालीस कल्याणक मनाये जो किसी अन्य प्रदेश की तुलना मेें सर्वाधिक है। हालांकि झारखंड बंटवारे के बाद २० तीर्थंकरों का निर्वाण स्थल सम्मेद शिखर (पारसनाथ) भौगोलिक रूप से बिहार से अलग हो गया, लेकिन शेष कल्याणक (तीर्थ) स्थलों में लघुआड़ (जमुई), मंदार पर्वत (बांका) चम्पा (भागलपुर), कुण्डलपुर (नालंदा) कांकदी (जमुई), राजगृह, पाटलीपुत्र, मिथिला, वैशाली आदि प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जहां वर्ष भर देश और विदेेशों से जैन धर्मावलम्बी आते रहते हैं। राजगीर स्थित विरायतन, पटना गुलजारबाग स्थित कमलदह व सुदर्शन स्वामी मंदिर चौसा (बक्सर) आरा (भोजपुर) भी जैनियों के पवित्र तीर्थ स्थल हैं। सिर्फ आरा शहर और इसके आसपास ४५ जैन मंदिर हैं। पटना से लगभग ५० किलोमीटर पर अवस्थित आरा का जैन सिद्धांत भवन जैन संस्कृति का जाग्रत केन्द्र है, यहां हजारों जैन पांडुलिपियां और पुरावशेष संकलित हैं।
    

  बिहार को इसलिए भी अत्यधिक गौरव है कि यह भूमि भगवान महावीर की जन्मभूमि, तपोभूमि, कर्मभूमि और निर्वाण भूमि भी है। बिहार के राजकुलों से भगवा महावीर का कौटुम्बिक संबंध भी था। शायद यही कारण था कि उनके समय में और उनके बाद भी यहां जैन धर्म का समीचीन प्रचार-प्रसार हुआ और अनेक राजा-महाराजा तथा राजकुल जैन धर्मानुयायी हो गये।
भारतीय इतिहास में जैन धर्म की वैज्ञानिक और व्यावहारिक विशेषता से प्रभावित और उसमें दीक्षित बिहारी राजाओं की लम्बी परम्परा मिलती है। इनमें वैशाली के राजा चेटक और कुण्डपुर नरेश सिद्धार्थ के अलावा राजा श्रेणिक (६०१-५५२ ई. पू.), राजा अजातशत्रु (५५२-५१८ ई. पू.), राजा नंद या नन्दिवर्द्धन (३०५ ई. पू.), मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त (३२० ई. पू.), अशोक सम्राट (२७७ ई. पू.), सम्राट सम्प्रति (२२० ई. पू.) आदि प्रमुख हैं। प्रसिद्ध मगध राज बिम्बिसार जैन साहित्य में श्रेणिक के नाम से याद किये जाते हैं। कहा जाता है कि वह पहला बौद्ध धर्मानुयायी था और राजा चेटक की सबसे छोटी पुत्री चेलना उसकी महारानी थी। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के भी जैन होने के कई प्रमाण मिलते हैं। उसके शासनकाल में मगध में १२ वर्ष का भयंकर दुर्भिक्ष (अकाल) हुआ था। उस समय वह अपने पुत्र बिंदुसार को राज्यभार सौंपकर अपने धर्मगुरु जैनाचार्य भद्रबाहु के साथ दक्षिण प्रवासी हो गये और तपो विहार के करते हुए १२ वर्षों के बाद चन्द्रगिरि पर्वत पर मृत्युंजय बने। अतिप्राचीन जैन ग्रंथ ‘त्रिलोय पण्णति’; त्रिलोक प्रज्ञाप्ति के अनुसार चन्द्रगुप्त ने जिन दीक्षा धारण की। जैन ग्रंथों के अनुसार सम्राट अशोक जैन था। माना जाता है कि अशोक जैन धर्म का अनन्य उपासक एवं प्रबल प्रचारक था और बाद में बौद्ध हो गया था। अशो के कुछ लेखों से उसके जैन सिद्धांत के समर्थक होने का संकेत मिलता है। ‘देवानांप्रिय’ जैन ग्रंथों में ही राजा की उपाधि के रूप में वर्णित है। अशोक के पौत्र तथा कुणाल के पुत्र ‘सम्प्रति’ को जैनाचार्य सुहस्ती ने उज्जयिनी में जैन दीक्षा दी थी, उसने जैन धर्म के लिए वही कार्य किया जो अशोक ने बौद्ध धर्म के लिए किया।
     प्राचीन भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य के अनुसार बिहार में भगवान महावीर से शुरू होकर चार सौ वर्षों तक जैन धर्मी राजाओं तथा राजन्यों द्वारा जैन धर्म की न केवल प्रशासनिक एवं राजनयिक दृष्टि से अपितु सामाजिक और आध्यात्मिक भावना से महती उपासना की गयी। जैन धर्म की बिहार की इस अद्भुत देन की ऐतिहासिक भूमिका सदा अविस्मरणीय बनी रहेगी।
     जैन धर्म की तरह बौद्ध धर्म का इतिहास आज भी बिहार की धरोहर है। हालांकि भगवान बुद्ध के पूर्व, उनके समय में और उनके बाद भी अनेक सदियों तक बिहार नाम का कोई भू-भाग या प्रदेश नहीं था। आज जिस भू-भाग को बिहार कहा जाता है, उस समय वह कई राज्यों में बंटा हुआ था। उन राज्यों में मगध का राजतंत्र और वैशाली का गणतंत्र शामिल था। इनके अतिरिक्त अंग, भर्ग, अंगुत्तराय, कंजंगल, सुह्य का पश्चिमी दक्षिणी भाग, पुण्ड्र का पश्चिमी भाग, सीमांत, अल्लकाप, पिप्पली कानन और मिथिला नामक क्षेत्र भी प्रसिद्ध थे। भगवान बुद्ध के समय में केवल भर्ग और सीमांत के कुछ भागों को जोड़कर बाकी सभी प्रदेश मगध और वैशाली के अधीन हो चुके थे। यानी वैशाली और मगध दोनों राज्य सर्वशक्ति सम्पन्न थे। आधुनिक पटना और गया जिले का क्षेत्र उस समय ‘मगध’ कहलाता था और भगवान बुद्ध के पहले इसका नाम ‘कीकट’ था। वर्तमान शाहाबाद जिला, बुद्ध से पहले पूर्ण स्वतंत्र था और इसका नाम ‘करुष’ था, इसका संबंध विंध्याचल के दक्षिण क्षेत्रों से था, बाद में यह क्षेत्र काशी राज के अधीन हो गया किंतु जब कोसल राज ने काशी पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया, तब शाहाबाद कोसल में आ गया। भभुआ औ सासाराम का दक्षिणी-पश्चिमी पहाड़ी भाग बुद्ध के समय भर्ग देश कहलाता था। बुद्ध के कुछ दिन पहले मगध के राजा ‘बिम्बिसार’ का विवाह कोसल देश के राजा महाकोसल की कन्या से हुआ और महाकोसल ने काशी और उसके आस-पास के भागों को उन्हें दहेज में दे दिया। इस तरह शाहाबाद का भू-भाग मगध राज्य में आ गया। आधुनिक मुंगेर और भागलपुर जिले अंग कहलाते थे और भागलपुर को चम्पा कहा जाता था। गंगा के उत्तरी किनारे का भाग मुंगेर जिले से सहरसा तक का भू-भाग ‘अंगुत्तराय’ था। आज का संथाल परगना उस समय ‘कंजंगल’ था। सुह्य प्रदेश के अन्तर्गत बांकुडा ‘पाकुड़’, मेदिनीपुर और मानभूम का कुछ हिस्सा तथा हजारीबाग का पूर्वी भाग आदि था। आज का पूर्णिया और दिनाजपुर उस समय पुण्ड्र देश के नाम से अभिहित होते थे। छोटा नागपुर के जंगली और दक्षिणी प्रदेश स्वतंत्र थे जो सीमांत देश कहलाते थे। गंगा के उत्तर भाग में वैशाली गणतंत्र था, यह वज्जिसंघ के नाम से प्रसिद्ध था। वज्जिसंघ वर्तमान मुजफ्फरपुर, वैशाली और सारण जिले में फैला था। अल्लकप्य सारण जिले के दक्षिणी भाग में, गंगा में उत्तरी किनारे और मही नदी के पश्चिमी तथा सरयु नदी के पूर्वी भाग का नाम था। वर्तमान चम्पारण का एक भाग पिप्पली कानन कहलाता था। उस समय दरभंगा जिले का उत्तरी भाग और नेपाल के तराई भाग का नाम मिथिला था। भगवान बुद्ध के काल में अल्लकप्य, पिप्पली-कानन और मिथिला वैशाली गणतंत्र के अधीन थे। मिथिला के अंतिम राजा सुमित्रा के समय वज्जिसंघ ने जीतकर इसे अपने अधीन कर लिया था। कमोबेश यह भू-भाग लम्बे समय तक बिहार प्रदेश का हिस्सा रहे। हालांकि छोटा नागपुर, संथाल परगना, मेदिनीपुर, मानभूम और पांकुड अब बिहार में नहीं हैं। लेकिन बुद्ध काल मेंे यह इलाके मगध और वैशाली के अधीन थे। ‘बिहार’ नाम बिहारशरीफ नगर के नाम पर मुस्लिम शासकों ने दिया। बिहारशरीफ नगर को पहले उदन्तपुरी या ओदन्तपुरी के नाम से जाना जाता था, यहां बौद्धों और जैनियोें के अनेक मठ और चैत्य थे। उन मठों का नाम विहार था जिनकी अधिकता के कारण मुसलमान शासकों ने ‘उदन्तपुरी’ का नाम बिहारशरीफ रख दिया। इसी बिहारशरीफ के नाम के कारण सम्पूर्ण मगध का नाम बिहार रखा गया। अफगान शासकों समय गंगा के दक्षिणी क्षेत्र का नाम बिहार प्रदेश था। आधुनिक बिहार प्रदेश की सीमा का बिहार नाम शेरशाह के शासनकाल में हुआ जब उसने पाटलिपुत्र को पुन: राजधानी बनाया। तब तक पाटलीपुत्र पटना के नाम से जाना जाने लगा था।
      आज दुनिया में बौद्ध धर्म का जो विस्तार है उसका श्रेय इसी पटना यानी पाटलीपुत्र को ही है। भगवान बुद्ध अपने जीवन काल में अपने धर्म का प्रसार मगध, अंग, काशी, कोशल और वत्स से आगे नहीं कर सके। वस्तुत: बौद्ध धर्म के दुनिया में प्रचार की योजना सम्राट अशोक के काल में पाटलीपुत्र में आयोजित तृतीय संगीति ‘सम्मेलन’ में बनी। इस सम्मेलन के पश्चात् सम्राट अशोक के गुरु मोद्गलिपुत्र तिस्य ने शासन की सहायता से बौद्ध प्रचारक दूसरे देशों में भेजे। भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था जब इस धरती से धर्म के प्रचार के लिए दूत विदेश गये। प्रचारक यूनान, मिश्र, सीरिया, मध्य एशिया, श्रीलंका, ‘सिंहल द्वीप’ सुवर्ण द्वीप आदि देशों में गये। श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को भेजा। राजकुमार महेन्द्र ने ही लंका के सम्राट देवानान्प्रिय तिष्य को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।
        बिहार भगवान बुद्ध की कर्मभूमि रही। उनका जन्म भले ही कपिलवस्तु में हुआ लेकिन राजपाट त्यागने और संन्यासी बनने के बाद ज्ञान की खोज में घूमते-घूमते बोधगया में लम्बी तपस्या के बाद ३५ वर्ष की आयु में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। और तब सारनाथ ‘बनारस के समीप, यू. पी.’ में उन्होंने सर्वप्रथम उन्हीं अपने पांच शिष्यों को उपदेश दिया, जो उनका साथ छोड़कर चले गये थे। अपने धर्म के प्रचार के ४५-४६ वर्षों के दौरान वे बार-बार पाटलीपुत्र, अंग, राजगृह, वैशाली आते रहे। पाटलीेपुत्र के बारे में एक बार उन्होंने कहा था, ‘इस नगर को अग्नि, जल (बाढ़) और आपसी कलह से हमेशा खतरा बना रहेगा।’
     

 गया से १३ किलोमीटर दूर बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर विश्व के इतिहास में अद्वितीय स्मारक है। यह राज्य की पहली विश्व धरोहर है, जिसके समक्ष नमन करने दुनियाभर के बौद्ध धर्मावलम्बी लाखों की संख्या में यहां आते हैं। बोधगया से प्राप्त महानाम शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण ५८७-५७८ ई. पूर्व में हुआ था। सम्राट अशोक ने सबसे पहले भगवान बुद्ध के चरणकमलों से पवित्र इस बोधिस्थल को ऐतिहासिक स्मारक के रूप में परिणत कराया। माना जाता है कि अशोक ने इसे एक स्तूप के रूप में निर्मित कराया, जिसे कुषाण काल में मंदिर का रूप दिया गया। बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान १२०५ ई. में यह मंदिर नष्ट हो गया। आक्रमण के कारण जीर्ण-शीर्ण होकर यह मंदिर मिट्टी में दब गया। ब्रिटिश काल में पुरातत्वविद् कनिंघम ने इसे खोजा और इसका जीर्णोद्धार कराया। इसी मंदिर के परिसर में ठीक पीछे वह बोधिवृक्ष है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। महाबोधि मंदिर से लगभग ७ किलोमीटर पूर्व दिशा में निरंजना तथा मोहना नदी के संगम पर डुंगेश्वरी नामक छोटा सा पर्वत है। इसी पर्वत की एक कंदरा में बुद्ध ने वर्षों कठिन तपस्या की थी। इसे ‘प्राक् बोधि’ भी कहते हैं। ‘प्राक् बोधि’ एवं यहां अवस्थित गुफा का उल्लेख चीनी यात्री हेनसांग ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में किया है।
       पाटलीेपुत्र से पूर्व मगध की राजधनी राजगृह के चप्पे-चप्पे में बौद्ध धर्म की उपस्थिति का आभास आज भी होता है। यहीं वैभार पर्वत पर स्थित सप्तपर्णि गुफा में बौद्धों की प्रथम संगीति हुई थी। राजगीर में वैभार के अतिरिक्त विपुलाचल, रत्नागिरि, उदयगिरि और सोनगिरि पहाड़ियां हैं, जो इस नगर को चारों ओर से घेरे हैं। चीनी यात्री फाहियान के अनुसार सम्राट अजातशत्रु ने इन पर्वतमालाओं से बाहर अपनी राजधानी का निर्माण कराया था। नगर के चारों ओर ३२ बड़े और ६४ छोटे द्वार थे। सम्राट अशोक ने भी यहां स्तूप और स्तंभ बनवाये। रत्नगिरि पर्वत, जिसे गृद्ध कूट पर्वत भी कहा जाता है, के शिखर पर जापान बौद्ध संघ द्वारा १९६९ में ‘विश्व शांति स्तूप’ का निर्माण कराया गया है। इसकी ऊंचाई १२५ फीट है और व्यास १०३ फीट है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं। यहां स्थित वेणुवन के उत्तर में कारंदा कुंड है, जहां भगवान बुद्ध स्नान किया करते थे। प्राचीन काल में नगर की सुरक्षा के लिए निर्मित ‘प्राचीर’ के ४० से ४८ किलोमीटर तक फैले भग्नावशेष आज भी देखे जा सकते हैं, जो भारी पत्थरों से बना है। यहां मौजूद जीवक आम्रवन भी भगवान बुद्ध की स्मृति से जुड़ा है। इस वन को राजा बिम्बिसार ने भगवान बुद्ध को भिक्षुओं के निवास के लिए भेंट स्वरूप दिया था और इसमें विहार बनवाये।
     राजगृह के समीप अवस्थित है नालंदा विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय की स्थापना सम्राट अशोक ने ‘बौद्ध-बिहार’ के रुप में करवाई थी। लम्बे समय तक यहां बौद्ध विषयों का अध्ययन-अध्यापन जारी रहा। बाद में यह एक विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। इसके विकास में गुप्त शासक कुमार गुप्त, तथागत् गुप्त, नरसिंह गुप्त और बालादित्य ने महत्वपूर्ण योगदान किया। ११ वीं शताब्दी तक यह ज्ञान के केन्द्र के रूप में विश्वविख्यात रहा। चीनी यात्री हेनसांग, फाहियान और इत्सिंग ने भी यहां अध्ययन किया। इन चीनी यात्रियों ने इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तार से उल्लेख किया है। बौद्ध शिक्षा का एक और बड़ा केन्द्र भागलपुर स्थित विक्रतशिला विश्वविद्यालय था, जो आठवीं शताब्दी में पाल शासकों के समय विश्वविख्यात हुआ। यहां मुख्य रूप से व्याकरण, न्याय, तत्वज्ञान, तंत्रयान, मंत्रयान, कर्मकांड, महायान, सांख्य-योग की शिक्षा दी जाती थी।
      राजधानी पटना से लगभग १६० किलोमीटर दूर पूर्वी चम्पारण ‘मोतिहारी’ के केसरिया में स्थित है- विश्व का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप। केसरिया स्तूप विश्व के उत्खनित स्तूपोंे में सबसे विशालतम है। इसकी ऊंचाई १०४ फीट हैं।
     सही मायने में बिहार की धरती भगवान बुद्ध और महावीर की धरती है, जिसका गौरवशाली इतिहास आज भी दुनिया भर के लोगों को यहां खींच लाता है।

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