युद्ध का क्या होगा परिणाम?

रूस-यूक्रेन युद्ध का लम्बा खिंचना पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इसका असर न केवल कच्चे तेल और खाद्य पदार्थों के दाम पर पड़ेगा बल्कि एक बार फिर विश्व द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वाली अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है। विगत कुछ दिनों से राष्ट्रपति पुतिन के साथ परमाणु बटन का दिखना गम्भीर संकेत है। इसलिए भारत समेत सभी शक्तिशाली राष्ट्रों को आगे बढ़कर इसे रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।

अब रूसी सेना के हमलों के केंद्र में यूक्रेन का पूर्वी भाग है। यहां के डोनेस्क, लुहांस्क, खार्कीव तथा मारियुपोल इलाकों में रूस की सेना पूरी शक्ति के साथ हमले करने में लगी हुई है। दूसरी ओर यूक्रेन की सेना प्रतिरक्षात्मक नीति के तहत रूस की सेना को जवाब देने में जुटी हुई है। किन्तु रूस की तुलना में यूक्रेन के पास हथियारों की कमी मुकाबले में आड़े आ रही है। यही कारण है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की नाटो देशों सहित अमेरिका से लगातार हथियारों की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही रूस से युद्ध रोककर युद्ध विराम हेतु वार्ता की अपील भी कर रहे हैं। रूस के  विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा है कि यूक्रेन के साथ चल रही वार्ता की प्रगति की गति वह नहीं है, जैसा कि रूस चाहता है। यही कारण है कि रूस की यूक्रेन में इस अभियान को विराम देने की फिलहाल कोई योजना नहीं है। रूस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि 162 सैन्य अधिकारियों सहित यूक्रेन के 1026 सैनिकों ने मारियुपोल में हथियार डाल दिए हैं तथा मारियुपोल बन्दरगाह पर रूस ने अपना कब्जा कर लिया है जो यूक्रेन का एक प्रमुख बन्दरगाह है। जबकि यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने इसकी पुष्टि नहीं की।

मारियुपोल के मेयर बोइचेंको के अनुसार एक लाख से अधिक लोग शहर में घिरे हुए हैं, जो बाहर निकलने के इन्तजार में हैं। इनके बयान के अनुसार रूसी हमले के इस अभियान में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या 22 हजार को पार कर चुकी है। अब प्रश्न यह उठने लगा है कि आखिर रूस-यूक्रेन युद्ध और अभी कितना लम्बा खिंचेगा? लगभग 50 दिन पूरे हो गए हैं। कहीं अमेरिका ने यूरोप को इस युद्ध में फंसा तो नहीं दिया है? क्या युद्ध को शीघ्र समाप्त करने के लिए रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन परमाणु हमला कर सकते हैं?

यूक्रेन की 36वीं मरीन ब्रिगेड ने रूस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। रूस का दावा है कि डोनेस्क के बागियों के साथ रूसी सेना ने  मारियुपोल की जो घेराबन्दी की थी, उसमें रूस की रणनीति पूरी तरह से सफल रही है।

वास्तविक स्थिति यह है कि यूक्रेन में एक नहीं बल्कि दोहरे संकट के बादल छाए हुए हैं- पहला रासायनिक हमले का आरोप यूक्रेन पहले ही लगा चुका है तथा दूसरा पुतिन की परमाणु हमले की धमकी तेज होने लगी है। विगत एक सप्ताह में पुतिन दो बार सार्वजनिक तौर अपने चर्चित परमाणु ब्रीफकेस के साथ पर दिखाई दिए। हाल ही में बेलारूस के एक कार्यक्रम के समय पुतिन के साथ उनका परमाणु बटन भी दिखाई दिया। यह गंभीर चिंता का विषय है कि कहीं पुतिन ने सचमुच में यूक्रेन पर अब आर-पार की लड़ाई का मन तो नहीं बना लिया है। इस युद्ध में जहां यूक्रेन के अनेक शहर तबाह हो गए हैं, वहीं सबसे अधिक विनाशक प्रभाव राजधानी कीव के आस-पास नज़र आता है। रूसी सेना का अगला निशाना मारियुपोल के बाद नीप्रो शहर बनने की संभावना है, क्योंकि एक बड़ी संख्या में लोग शहर छोड़कर बाहर जा रहे हैं। अभी भी दोनों देशों के बीच संघर्ष का अंत नज़र नहीं आ रहा है।

हाल ही में यूक्रेन की गुप्तचर सेना ने रूस समर्थक नेता विक्टर मेदवेदचुक को गिरफ्तार किया है। युद्ध शुरू होने के पूर्व ही मेदवेदचुक को उनके घर में ही नजरबंद किया गया था, किन्तु वह नजरबंदी के दौरान फरार हो गए थे। रूस समर्थक नेता मेदवेदचुक को रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बेहद करीबी माना जाता है। रूस के सुदूरपूर्व में राष्ट्रपति पुतिन ने अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र का दौरा किया और एक बयान में कहा कि यूक्रेन में रूस अपने सैन्य अभ्यास में महान लक्ष्य को प्राप्त करेगा। उनके देश को अलग-थलग नहीं किया जा सकता और विदेशी शक्तियां इसमें कामयाब नहीं होगी। वैश्विक गुट की सदस्यता के कारण फिनलैंड और रूस की सीमा पर भी तनाव बढ़ने की आशंका है क्योंकि रूस ने फिनलैंड तथा स्वीडन को नाटो में शामिल होने पर चेतावनी दे दी है। यद्यपि फिनलैंड व स्वीडन सैन्य रूप से गुटनिरपेक्ष हैं, किन्तु यूक्रेन के हमले के बाद नाटो में शामिल होने के लिए वहां की जनता का दबाव बना है।

युद्ध कहीं भी हो, उसका प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है। रूस-यूक्रेन युद्ध को पचास दिन से अधिक समय होने जा रहा है। इस युद्ध से यूक्रेन की आबादी के बड़े हिस्से को विस्थापन का शिकार होना पड़ा है। दुनिया तेल व गैस के बढ़ते दामों के फलस्वरूप महंगी परिवहन लागत के संकट में फंस गई है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य सम्बंधी मामलों के प्रमुख डेविल बेसली ने आगाह किया है कि इस युद्ध ने एक बड़ा संकट उत्पन्न कर दिया है और वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव व परिणाम ‘द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से हमने जो कुछ भी देखा है’ उससे कहीं अधिक प्रभावी होगा, क्योंकि दुनिया के लिए व्यापक स्तर पर गेहूं का उत्पादन करने वाले यूक्रेन के किसान अब रूस की सेना से मुकाबला कर रहे हैं। युद्ध के कारण दुनिया को व्यापक स्तर पर खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने वाले यूक्रेन के लोग खुद ही भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हो गए हैं। 2020 में मिस्र सामान्य तौर पर 85 प्रतिशत और लेबनान 81 प्रतिशत अनाज यूक्रेन से प्राप्त कर रहा था। यूक्रेन और रूस दुनिया का 30 प्रतिशत गेहूं, 20 प्रतिशत मक्का (मकई) तथा 75 से 80 प्रतिशत सूरजमुखी के तेल का उत्पादन करते हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम अपनी सेवाओं के लिए 50 प्रतिशत अनाज यूक्रेन से खरीदता है।

निःसन्देह इस युद्ध के प्रतिकूल प्रभाव के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े खाद्य संकट का खतरा बहुत बढ़ गया है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप विश्व भर में भोजन, ईंधन और परिवहन की लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी के मासिक खर्च में 7.1 करोड़ डॉलर की वृद्धि होगी। फलस्वरूप एक वर्ष में कुल 85 करोड़ डॉलर का व्यय बढ़ेगा। इसका सीधा अर्थ है कि लगभग 40 लाख लोगों तक खाद्य सामग्री की आपूर्ति नहीं हो सकेगी। उल्लेखनीय है कि इस समय विश्व खाद्य कार्यक्रम यूक्रेन के अंदर लगभग 10 लाख लोगों को भोजन की पूर्ति कर रहा है। इस संख्या के लगभग 6 गुना अर्थात 60 लाख तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इस युद्ध के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) की वृद्धि दर 1.3 प्रतिशत घट सकती है। युद्ध के विविध रूप जैसे- समुद्री युद्ध, सूचना युद्ध, मनोवैज्ञानिक युद्ध, आर्थिक युद्ध, शीत युद्ध, गुरिल्ला युद्ध, विषम युद्ध, परोक्ष युद्ध, प्रकाश युद्ध, कूट  युद्ध, तूष्णी युद्ध आदि इसमें परम्परागत व अपरम्परागत युद्ध शामिल हैं। हमेशा ध्यान रखना होगा कि युद्ध से युद्ध का अन्त नहीं होता, इसका समाधान वार्ता से ही सम्भव होता है। मानवता वापस न लौटने के बिन्दु के अत्यंत निकट आ गई है। अब समय आ गया है कि इसका समाधान करने के लिए निजी स्वार्थों का पूरी तरह परित्याग करें। मानव सभ्यता तथा इस सृष्टि की सुरक्षा हेतु संकल्प लेना होगा, क्योंकि इसका कोई अन्य विकल्प नहीं है। वास्तव में इस युद्ध के निवारण के लिए एक सुस्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं सटीक संयमित सोच की आवश्यकता है। यदि हम विश्व शान्ति व विश्व कल्याण चाहते हैं, तो संघर्ष का सामूहिक बहिष्कार करना होगा। शान्ति को स्थापित करने का एक सशक्त साधन ज्ञान है तथा सन्तोष होना शान्ति की पूर्व आस्था का प्रतीक है।

अतः अब हम सभी को मानव अस्तित्व की सुरक्षा के लिए सजग, सतर्क व संयमित रहने की जरूरत है। मौत के विरुद्ध मोर्चेबंदी करने में अब देर की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है। जैसा कि लिओभ ट्रोटस्की का कहना है – ‘आप भले ही युद्ध में दिलचस्पी नहीं रखते हों, लेकिन युद्ध की आप में दिलचस्पी है।’ यदि अब इस युद्ध को नहीं रोका गया, तो मानवता अपने भाग्य पर कराह उठेगी। हम मानवीय जीवन की सुरक्षा केवल चिंतन व चेतना से नहीं रोक पाएंगे, बल्कि इसके लिए आज से और अभी से सामूहिक प्रभावी कदम उठाने की फौरी आवश्यकता है। हमें समझना होगा कि युद्ध का स्वरूप सीमित अथवा स्थानीय नहीं होता, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव सभी को अपनी चपेट में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से लेता है।

          डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्र

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