कश्मीर में परिवर्तन की बयार

कश्मीर से धारा 370 हटे हुए 2 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं और परिवर्तन साफ-साफ देखा जा सकता है। आतंकवाद में कमी, शिक्षा में विस्तार, प्रशासनिक व्यवस्था का सुदृढ़ होना, कानूनों का पालन इत्यादि जैसे कई सकारात्मक परिवर्तन वहां दिखाई दे रहे हैं।

भारतीय गणराज्य की राजनीतिक प्रक्रिया में 5 अगस्त 2019 एक स्वर्णिम तिथि के रूप मे दर्ज हो गयी है। इस दिन वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा सभी को आश्चर्यचकित करते हुए धारा 370 व 35 ए को बहुत दृढ़ता से संसदीय प्रक्रिया के द्वारा निरस्त कर दिया गया है। जिसके सन्दर्भ में सम्पूर्ण राष्ट्र से तात्कालिक रूप से तीन प्रकार की प्रतिक्रियाएं आनी प्रारम्भ हो गई। जिसमें सबसे प्रथम राष्ट्रवादी विचारधारा वाले बुद्धिजीवी वर्ग व आम नागरिकों द्वारा भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार के इस साहसिक निर्णय की प्रशंसा करने के साथ ही इसके समर्थन में प्रत्यक्ष रूप से सहयोग प्रदान किया गया। द्वितीय, ऐसे राजनीतिक विरोधी भी सामने आए जिन्होंने केंद्र सरकार के इस निर्णय को संविधान विरोधी निर्णय के रूप में देखते हुए भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया तथा इस निर्णय का पूरी शक्ति के साथ विरोध किया।

तृतीय, एक बड़ा वर्ग ऐसे बुद्धिजीवियों व आम नागरिकों का भी था जो गत सात दशकों से राष्ट्रविरोधी शक्तियों द्वारा फैलाए गए अकादमिक एवं बौद्धिक भ्रांतियों से भ्रमित था। उनका यह मानना था कि संवैधानिक एवं राजनीतिक बाध्यताओं के कारण धारा 370 को निरस्त करना सम्भव नहीं है। भारत विरोधी पड़ोसी राष्ट्रों चीन तथा पाकिस्तान के द्वारा भारत सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चलायी जाने वाली मुहिम तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अलग थलग पड जाने की आशंका प्रकट की गई। परन्तु केंद्र सरकार द्वारा धारा 370 को निरस्त करने के निर्णय के सकारात्मक परिणाम अगले कुछ ही महीनों में दृष्टिगोचर होने लगे। मोदी सरकार की कश्मीर को लेकर अपनायी गयी साहसिक, दृढ़ एवं मुक्त हृदय युक्त नीतियों ने कश्मीरी जनमानस को ना केवल भारत से जोड़ने का कार्य किया अपितु उन राजनीतिक विरोधियों को, जो मोदी की कश्मीर नीति को राजनीतिक जुआ कहते थे, को भी निःशब्द कर दिया।

धारा 370 के बाद आतंकवाद, शान्ति एवं मानवाधिकार

मानवाधिकारों की परिकल्पना तभी की जा सकती है, जबकि मानव जीवन सुरक्षित हो और मानव जीवन की सुरक्षा के लिए कानून का शासन एवं कानून की सर्वोच्चता सबसे प्रथम है। आतंकवाद कानून की सर्वोच्चता एवं कानून के शासन का विरोधाभास है क्योंकि आतंकवाद की व्यवस्था में हिंसा और दमन के शासन के चलते नागरिकों के लिए आवश्यक सबस

सर्वोत्तम जीवन का अधिकार ही असुरक्षित हो जाता है। ऐसी स्थिति में शेष मानवाधिकारों की कल्पना करना असंभव है। धारा 370 के पश्चात कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए कठोर निर्णय लिए गए। जिसमें घाटी में बड़े स्तर पर सशस्त्र सुरक्षा बल तैनात करने के साथ-साथ पाकिस्तान से आतंकी घुसपैठ की घटनाओं को रोकने के लिए सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार दिए गए। आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों को नियंत्रित करने के लिए विशेष कानूनी प्रावधान भी किये गए। जिसके परिणामस्वरूप घाटी में आतंकवादी गतिविधियों एवं हिंसा में भारी कमी आयी। गृहमंत्रालय द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार धारा 370 के बाद वर्ष 2021 में आतंकवादी हिंसात्मक घटनाओं में 61 प्रतिशत कमी आयी है जबकि आतंकवादियों द्वारा किये जाने वाले अपहरण के मामलों में 80 प्रतिशत कमी आयी है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तानी क्षेत्र से आतंकवादी घुसपैठ के मामलों में 33 प्रतिशत कमी आयी है। आतंकवादियों द्वारा सुरक्षा बलों तथा आम नागरिकों से हथियार छीनने के मामले शून्य हैं। वर्ष 2021 में सुरक्षा बलों द्वारा कुल 180 आतंकवादियों को मारा गया है। जिसमें 148 स्थानीय तथा 32 विदेशी आतंकवादी थे।

लोकतंत्र एवं चुनाव

चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला है। जम्मू-कश्मीर में चुनावों में होने वाली अनियमितता प्रारंभ से ही एक बड़ी चुनौती रही है। समय-समय पर केंद्र एवं राज्य में सत्तारूढ़ दलों एवं आतंकवादियों द्वारा चुनावों को प्रभावित करने का क्रम चलता रहा। सर्वप्रथम भारतीय जनता पार्टी की वाजपेयी सरकार ने कश्मीर में सुदृढ़ लोकतंत्र की स्थापना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए वर्ष 2002 में राज्य में निष्पक्ष विधानसभा चुनाव कराने का प्रयास किया। परन्तु स्थानीय स्तर पर चुनाव प्रबन्धन का उत्तरदायित्व राज्य सरकार के अधीन होने तथा धारा 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को प्रदत्त विशेष शक्तियों के प्राप्त होने के कारण ग्रामीण एवं जिला स्तर पर लागू नहीं किया जा सका। वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व की सरकार से समर्थन वापस लेने के पश्चात निष्पक्ष पंचायत चुनाव कराने का प्रयास किया गया।

जिसके विरोध में जम्मू एवं कश्मीर के मुख्य राजनीतिक दलों (नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी आदि) ने इसका बहिष्कार किया। परन्तु केंद्र सरकार द्वारा स्थानीय ग्राम एवं जिला पंचायत स्तर पर लोकतंत्र को स्थिरता प्रदान करने के लिए जम्मू-कश्मीर के पंचायती राज कानून, 1996 को अक्टूबर 2018 में संशोधन करने के पश्चात ग्राम पंचायतों के चुनाव सम्पन्न कराए गए। 20 वर्षों के पश्चात सम्पन्न कराए गए यह ग्राम पंचायत चुनाव कश्मीरी जनमानस तथा कश्मीर में शांति व विकास के लिए अति महत्वपूर्ण थे। परंतु क्षेत्रीय राजनीतिक दलों एवं आतंकवादी संगठनों के लिए कश्मीर में ग्राम पंचायत स्तर पर लोकतंत्र की स्थापना एक बहुत बड़े खतरे के समान थी। इसलिए इस प्रयास को विफल करने के लिए आतंकवादियों के द्वारा निर्वाचित सरपंचों एवं ग्राम पंचायत सदस्यों को त्यागपत्र देने के लिए विवश किया गया।

परन्तु धारा 370 के निरस्त होते ही आतंकी हिंसा में आने वाली कमी ने जम्मू-कश्मीर के लोगों का लोकतंत्र में विश्वास बहाल करना आरम्भ कर दिया। जिसके चलते केंद्र सरकार ने दिसम्बर 2020 में जिला विकास परिषद के चुनाव कराने का निर्णय लिया। वर्ष 2018 में पंचायत चुनाव का विरोध करने वाले तथा धारा 370 की पुनः बहाली की मांग करने वाले स्थानीय दलों को यह आभास हो चुका था कि यदि उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी रखनी है तो अब उन्हें इन स्थानीय चुनावों में हिस्सा लेना होगा। यदि अब वह दल धारा 370 की पुनर्बहाली के नाम पर इन चुनावों का बहिष्कार करते हैं तो वह इतिहास बनकर रह जाएंगे। जम्मू-कश्मीर के सात मुख्य राजनीतिक दलों के द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए यह चुनाव मिलकर लड़ने का निर्णय लिया गया।

इन राजनीतिक दलों के द्वारा बनाया गया यह गुपकार गठबंधन पूर्ण रूप से अनैतिक था, क्योंकि यह राजनीतिक दल अपने जन्म से ही एक दूसरे के विरोधी रहे हैं। परन्तु उनके द्वारा बनाया गया यह गठबंधन स्थानीय चुनाव में भाजपा को हराने के लिए किया गया प्रबल प्रयास था जिसका कोई निश्चित भविष्य नहीं था। जम्मू-कश्मीर के जनमानस ने इन क्षेत्रीय दलों की मंशा को समझते हुए चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया तथा भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में राज्य में भी सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आयी। धारा 370 के पश्चात पंचायत तथा जिला परिषद चुनाव लोकतंत्र की सुदृढ़ता का एक स्वर्णिम उदाहरण है।

शिक्षा

कश्मीर में आतंकवाद के कारण शिक्षा व्यवस्था पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव पडे। प्रथम तो कश्मीर का सबसे शिक्षित वर्ग आतंकवादी हिंसा के कारण कश्मीर छोड़ने को विवश हुआ जिस कारण कश्मीर में अच्छे शिक्षकों की कमी हो गई। दूसरा, आतंकवादियों द्वारा शिक्षा के स्थानों तथा शिक्षकों को भी हिंसा का शिकार बनाया गया, जिस कारण कश्मीर में शिक्षा के क्षेत्र में संख्यात्मक तथा गुणात्मक दोनों ही रूप में गिरावट आई। धारा 370 के निरस्त होने के पश्चात जम्मू-कश्मीर प्रशासन तथा केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में शिक्षा के उत्थान के लिए प्रबल प्रयास किये जा रहे हैं। धारा 370 के निरस्त होने के पश्चात कश्मीर के आदिवासी समुदायों के लिए 40 करोड़ रुपए की लागत से स्मार्ट स्कूल योजना आरम्भ की गयी जिसके अंतर्गत 200 विद्यालयों का आधुनिकीकरण होना है, इनमें से 100 विद्यालयों का आधुनिकीकरण कार्य मार्च 2022 तक किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर के चार जिलों राजौरी, अनंतनाग, कुलगाम एवं बांदीपोरा में छः एकलव्य मॉडल केंद्रीय सरकारी आवासीय विद्यालयों की स्थापना का प्रस्ताव है। 3500 नए विद्यालय खोलने का लक्ष्य है, जिनमें से 2000 किंडरगार्टन विद्यालय खोले गए हैं। बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए छः नए कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालयों का शुभारंभ किया गया है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार के द्वारा 21000 आदिवासी छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने की योजना भी क्रियान्वित की गयी है। कश्मीरी जनमानस से भी शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र सरकार के इन अभूतपूर्व प्रयासों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हो रही है।

औद्योगीकरण एवं आर्थिक विकास

कश्मीर को धरती का स्वर्ग तो कहा ही जाता है साथ ही कश्मीर अनेकों महत्वपूर्ण खनिजों एवं औषधियों का भण्डार भी है। परन्तु आतंकी हिंसा एवं तोड़फोड़ की घटनाओं के कारण कश्मीर की अर्थव्यवस्था को बहुत हानि पहुंची है। कश्मीर की अर्थव्यवस्था को पुनः सुदृढ करने के लिए और आर्थिक विकास को गति प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार तथा जम्मू-कश्मीर प्रशासन के द्वारा बहुत सारी दूरगामी नीतियां क्रियान्वित की गई हैं। जम्मू-कश्मीर में औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्येक प्रकार से सहायता प्रदान करने के लिए अनेक योजनाएं संचालित की गई हैं। इनमें पूंजी निवेश पर अनुदान, उत्पाद एवं सेवा शुल्क पर अनुदान, कार्यशील पूंजी पर ब्याज सबवेंशन प्रदान करने की योजना बनाई गई है। इसके क्रियान्वयन से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय औद्योगिक निवेशकों द्वारा धारा 370 के निरस्त होने के बाद 51000 करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव सरकार को प्राप्त हुए हैं। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर के औद्योगिक विकास के लिए फरवरी 2021 में 28400 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश की घोषणा की गई है। जिसके अनुसार वर्ष 2037 तक यह पूर्ण धनराशि जम्मू-कश्मीर में निवेश कर दी जायेगी।

धारा 370 के निरस्त होने के बाद कश्मीर में 890 नए कानून लागू किए गए हैं। इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य कश्मीर में लोकतान्त्रिक स्थिरता लाने के साथ ही आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करना भी है। इन कानूनों का क्रियान्वयन धारा 370 के निरस्त होने के पश्चात ही सम्भव हो पाया है। इन कानूनों के लागू होने से कश्मीर के उन दमित, शोषित, पिछड़े एवं विस्थापित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है जो धारा 370 के कारण विकास की मुख्यधारा से तो दूर थे ही परन्तु मूलभूत अधिकारों से भी वंचित थे। धारा 370 के निरस्त होने के पश्चात कश्मीर में निवास करने वाले अल्पसंख्यक वर्ग तथा महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार तथा जम्मू-कश्मीर प्रशासन के द्वारा सकारात्मक प्रयास निरन्तर क्रम में किये जा रहे हैं। इसके अतिरिक्त दलितों के अधिकारों व उनके उत्थान के लिए भी अभूतपूर्व प्रयास प्रारम्भ हुए हैं। पश्चिमी कश्मीर से आये विस्थापितों तथा पंजाब से आये हुए अनुसूचित जाति के सफाई कर्मचारियों और गोरखों को समान नागरिक अधिकार प्रदान किया जाना भी धारा 370 के निरस्त होने के पश्चात कश्मीर के स्वर्णिम भविष्य के निर्माण की दिशा में सराहनीय कदम है।

– डॉ. मलकित सिंह 

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