अनुसूचित जातियों को मिला अधिकार

जम्मू-कश्मीर में 20 सालों के संघर्ष और भगत अमरनाथ की आमरण अनशन के दौरान मृत्यु के बाद अनुसूचित जाति को मात्र 8 प्रतिशत आरक्षण मिल पाया था जबकि देशभर में उन्हें संविधान लागू होते ही 15 प्रतिशत आरक्षण मिल गया था। 2019 में आर्टिकल 370 समाप्त किए जाने के बाद, अब वे भी देश के बाकी लोगों की तरह केंद्र सरकार द्वारा लागू योजनाओं के हकदार हो गए हैं।

स्वतंत्रता के बाद भारत लगभग 560 रियासतों में विभाजित था जिसमें जम्मू-कश्मीर भी एक महत्वपूर्ण रियासत थी। अपनी खूबसूरत वादियों तथा स्वर्णिम इतिहास के लिए जम्मू- कश्मीर विश्वविख्यात है। भारत की आजादी के बाद जम्मू- कश्मीर का भारत में विलय होना एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसमें जम्मू-कश्मीर के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भविष्य को सुनिश्चित किया गया। 26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान अंगीकृत  किया गया। विलय पत्र की शर्तों के अनुसार अनुच्छेद 370 में यह उल्लेख किया गया कि देश की संसद को जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में रक्षा, विदेशी मामलों और संचार को छोड़कर किसी भी विषय पर कानून बनाने का अधिकार नहीं होगा। इन सभी शर्तों के साथ जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने की अनुमति दे दी गई। अक्टूबर 1951 में जम्मू-कश्मीर के संविधान सभा के लिए सदस्यों के चुनाव कराए गए। इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अलावा प्रजा परिषद नामक एक राजनीतिक संगठन ने भी भाग लिया लेकिन प्रजा परिषद के बहुत सारे उम्मीदवारों का नामांकन रद्द कर दिया गया। प्रजा परिषद के उम्मीदवारों का नामांकन रद्द होने के कारण नेशनल कॉन्फ्रेंस के लगभग 75 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए लेकिन संविधान सभा में किसी भी दलित प्रतिनिधि को शामिल नहीं किया गया। ऐसा नहीं कि आरक्षण का मुद्दा जम्मू-कश्मीर में आजादी के बाद से उठाया गया। यह मुद्दा 1927 से लेकर 1935 के बीच में अनेकों बार जम्मू-कश्मीर के दलितों द्वारा महाराजा हरि सिंह के संज्ञान में लाया गया था और महाराजा हरि सिंह ने इन मुद्दों पर तत्काल प्रभाव से काम भी किया था। जैसे जम्मू-कश्मीर में दलितों को कुओं से पानी पीने का अधिकार दिलाया गया, तथा उनके लिए मंदिर के दरवाजे खोले गए, विद्यालयों में उनके बच्चों को प्रवेश दिया जाने लगा इत्यादि।

जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जातियों द्वारा अपने अधिकारों की मांग संगठनात्मक रूप से 1930 से ही शुरू हो गई थी जिसका प्रतिनिधित्व मेघ मण्डल नाम के एक संगठन द्वारा किया जा रहा था। इनका मुख्य उद्देश्य जम्मू-कश्मीर के दलितों को उनके अधिकार तथा सामाजिक स्तर पर उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाना था। इस संगठन के प्रतिनिधि के रूप में भगत अमरनाथ, बाबू मिलखीराम, बाबू परमानंद, भगत छज्जूराम, महाशा नाहर सिंह इत्यादि बड़े दलित नेता शामिल थे। सन् 1955 से 1957 के बीच जम्मू-कश्मीर के अनुसूचित जाति के लोगों ने बड़े स्तर पर अपने अधिकारों की मांग के लिए भूख हड़ताल की लेकिन जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक उथल-पुथल के कारण उनकी मांगों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। 1957 में जब जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हुआ तो राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए किसी प्रकार की आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई थी। इस कारण सरकार के प्रति विरोध और तेज हो गया। आंदोलन की गम्भीरता को देखते हुए तत्कालीन जम्मू-कश्मीर की सरकार ने आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। कई सालों तक उनके इस आश्वासन के कारण वहां के अनुसूचित जाति के लोगों का विश्वास सरकार पर बना रहा, लेकिन 20 मई 1970 को भगत अमरनाथ जम्मू के कर्ण पार्क में जम्मू-कश्मीर के अनुसूचित जाति के लोगों के अधिकारों की मांग के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए तथा 1 जून 1970 को जम्मू-कश्मीर के अनुसूचित जाति के लोगों के अधिकारों की मांग तथा सामाजिक न्याय के लिए शहीद हो गए, जिसके बाद तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने एस. आर. ओ. फार्म 1972 के माध्यम से जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जाति के लिए सरकारी नौकरियों में 8 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण मिलते-मिलते आजादी के बाद से लगभग 20 साल लग गए। जबकि 1950 में संविधान लागू होने के साथ ही सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई थी।

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होने के बाद भी जहां अन्य राज्यों में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, वहीं अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में अनुसूचित जातियों के लिए सिर्फ 8 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। साथ ही वहां की महिलाओं को जम्मू-कश्मीर से बाहर के पुरुषों से शादी करने पर उनकी नागरिकता को समाप्त करने जैसे  प्रावधान अनुच्छेद 370 की ही देन थी।

अगस्त 2019 में केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया, जिससे वहां पर रह रही अनुसूचित जातियों के साथ-साथ आजादी के बाद पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को भी सामाजिक न्याय के साथ अधिकार मिलने की एक आशा दिखाई देने लगी। लगभग सात दशक से अपने अधिकारों से वंचित लोगों के लिए केंद्र सरकार का ये अब तक का सबसे खूबसूरत तोहफा कहा जा सकता है, जिससे जम्मू-कश्मीर में रह रहे अनुसूचित जातियों के लोगों को अन्य राज्यों की तरह आरक्षण तथा अन्य प्रकार की सुविधाओं का लाभ होगा और वे अपने सर्वांगीण विकास की दिशा निर्धारित कर सकेंगे।

पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार द्वारा लागू की गई योजनाओं में कुछ महत्वपूर्ण योजनाएं हैं, जिसका लाभ जम्मू-कश्मीर में रह रहे अनुसूचित जाति के साथ साथ पाकिस्तान से आए शरणार्थियों तथा वहां की आम जनता को बड़े पैमाने पर हुआ है।

  1. एस. सी छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना

  2. प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण

  3. डॉ. अंबेडकर पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति ईबीसी के लिए

  4. डी.एन.टी. के लिए डॉ अंबेडकर प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति

  5. पी. एम. जे. ए. वाई योजना

  6. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना

  7. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना

  8. महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए राष्ट्रीय मिशन

  9. एन.एफ.बी.एस – राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना

  10. यूथ स्टार्टअप लोन स्कीम

इस प्रकार की 100 से ज्यादा योजनाएं केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में लागू की गई है जिसका लाभ जम्मू-कश्मीर के अनुसूचित जाति के साथ-साथ अन्य नागरिक भी ले सकते हैं।

दशकों से अपने अधिकार से वंचित लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की योजनाओं का शुभारम्भ किया गया है जिससे कि दशकों से अपने अधिकारों से वंचित समाज अपने सम्पूर्ण विकास की दिशा में आगे बढ़ सके तथा सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक स्तर पर अपने प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकें जिससे कि समाज में समानता तथा भाईचारे की मिसाल को प्रस्तुत किया जा सके।

                                                                                                                                                                                          विशाल कुमार 

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