क्या रुकावट है उनके भारत रत्न में?

क्या किसी को पता है कि स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर का जन्म दिन २८ मई को था और किसी को पता नहीं चला! जिस संघ और भाजपा संगठन को अब तक सावरकर को भारत रत्न दे कर इस सम्मान की गरिमा को बढ़ा देना चाहिए था, आज वह संगठन इस बात से भयभीत है कि भारत रत्न अवॉर्ड दिया तो विपक्षी पीछे पड़ जाएंगे! लाहौल वला कूवत! धिक्कार है ऐसी सोच पर! कोई कुछ भी कहे, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में विनायक सावरकर का योगदान गाँधीजी से अधिक नहीं तो कम भी नहीं था क्योंकि जो यातनाएं उन्हों ने निजि रूप से झेली थीं, गाँधीजी ने नहीं झेलीं!

भारत के स्वंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका के लिए एक वर्ग उन्हें वीर सावरकर कहता है तो देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो ब्रिटिश सरकार को लिखी चिट्ठी का हवाला देकर उन्हें डरपोक और रणछोड़ की संज्ञा देता है। पक्ष-विपक्ष की इस खींचतान के बीच तरह-तरह के परस्पर विरोधी दावे किए जाते हैं। ऐसे में अतीत की महान शख्सियतों की नजर से भी सावरकर को परखने की प्रक्रिया चलती रहती है। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक महान विभूतियों ने सावरकर को किस रूप में पहचाना, अलग-अलग पक्ष उनके विचारों का हवाला सावरकर पर अपनी दावेदारी के वक्त दिया करते हैं। जिन विचारों को उदाहरण बनाकर बार-बार पेश किया जाता है और जिन्हें सावरकर की शख्सियत साबित करने का सबूत बताया जाता है, उनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का एक प्रसिद्ध भाषण भी शामिल है। अटल ने सावरकर पर आयोजित एक कार्यक्रम में सावरकर होने के कई मायने बताए। वीर सावरकर की जयंती पर वाजपेयी के उस भाषण का प्रमुख अंश यहां पेश कर रहा हूँ। मुंबई स्थित सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान में सालों पहले दिया गया अटल बिहारी वाजपेयी का विख्यात भाषण।

“सावरकर जी एक व्यक्ति नहीं हैं, एक विचार हैं। एक चिनगारी नहीं हैं, एक अंगार हैं। सीमित नहीं हैं, एक विस्तार हैं। मन, वचन और कर्म में जैसा तादात्म्य (मेल-जोल), जैसी एकरूपता सावरकर जी ने अपने जीवन में प्रकट की, वो अनूठी है, अलौकिक है। उनका व्यक्तित्व, उनका कृतित्व, उनका वक्तृत्व और उनका कवित्व सावरकर जी के जीवन को ऐसा आयाम प्रदान करते हैं कि विश्व के इतिहास में हमेशा याद किए जाएंगे। जब-जब कोई पराधीनता के खिलाफ संघर्ष करेगा, अन्याय के विरुद्ध लड़ाई के मैदान में कूदेगा, जब-जब जीवन के बलिदान की बेला आएगी, जब-जब सर्वस्व का समर्पण करके मात्रिभूमि का खोयी हुई स्वाधीनता को प्राप्त करने का क्षण उपस्थित होगा, स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले संसार भर के लोग जब महापुरुषों का स्मरण करेंगे और स्मरण करने के बाद बलि की वेदी पर अपने जीवन का उत्सर्ग करने के लिए आगे बढ़ेंगे तो वीर सावरकर विश्व के उन महापुरुषों की मालिका में एक चमकते हुए दैदीप्यमान रत्न की तरह शोभायमान होंगे।

सावरकर जी ने गैरीबाल्डी से, मैजिनी से प्रेरणा प्राप्त की लेकिन वो स्वयं में एक प्रेरक शक्ति बन गए। बाल्यावस्था से स्वातंत्र्य लक्ष्मी की उपासना, 11 वर्ष की उम्र में सवाई माधो सिंह के बारे में भाट (वंशावली) का लिखना और फिर चापेकर राणवे के संबंध में भाट का लिखना और उसी समय संकल्प करना- मैं देश की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करूंगा। सावरकर जी पूर्व जन्म को नहीं मानते थे लेकिन 11 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता का संकल्प पैदा होना, अगर इसमें पूर्वजन्म का संस्कार हो तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा, मेरे लिए कोई चमत्कार नहीं होगा।

आप कह सकते हैं कि मैं बुद्धिवादी नहीं हूं, लेकिन जब अलौकिक प्रतिभा के दर्शन होते हैं- व्यक्ति समान हैं, लेकिन व्यक्ति की क्षमताएं अलग हैं। हमारे देश में स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वालों की एक लंबी परंपरा उत्पन्न हुई। क्रांतिकारियों से भरा हुआ इस देश का इतिहास- महाराष्ट्र से, बंगाल से, पंजाब से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की समाप्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष करना होगा, बिना हथियार उठाए आजादी नहीं मिलेगी। कवि गोविंद के शब्दों में बिना युद्ध के स्वतंत्रता किसको मिली है- इस पर जिनका विश्वास था, उन्होंने बलिदान की पराकाष्ठा कर दी।”

 जब अटल बताने लगे सावरकर के मायने

“सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तप, सावरकर माने तत्व, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तारुण्य, सावरकर माने तीर, सावरकर माने तलवार, सावरकार माने तिलमिलाहट… सागरा प्राण तड़मड़ला, तड़मड़ाती हुई आत्मा, सावरकर माने तितीक्षा, सावरकर माने तीखापन, सावरकर माने तिखट। कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व! कविता और क्रांति! कविता और भ्रांति तो साथ-साथ चल सकती है, लेकिन कविता और क्रांति का साथ चलना बहुत मुश्किल है। कविता माने कल्पना, शब्दों के संसार का सृजन, ऊंची उड़ान। कभी-कभी ऊंची उड़ान में धरातल से पांव उठ जाएं, वास्तविकता से नाता टूट जाए तो कवि को इसकी शिकायत नहीं होगी। उसके आलोचक भी इस बात के लिए टीका नहीं करेंगे। मगर सावरकर जी का कवि ऊंची से ऊंची उड़ान भरता था, मगर उन्होंने यथार्थ की धरती से कभी नाता नहीं तोड़ा। सावरकर जी में ऊंचाई भी थी और गहराई भी थी।”

“मैंने अंडमान द्वीप की सेल्युलर जेल की वो कोठरी देखी है जिसमें सावरकर जी को अपने जीवन का बहुत महत्वपूर्ण अंश तिल-तिल जलकर मिटाना पड़ा था। सावरकर जी की अतिरिक्त सुरक्षा का प्रबंध था- कालकोठरी के बाहर एक कोठरी। और कैदियों से तो दालान में जाकर मिला जा सकता था, सावरकर जी की कोठरी के आगे भी एक कोठरी बनाकर सींखचें खड़ी कर दी गईं। सागर का किनारा पता नहीं सावरकर और सागर का क्या संबंध था। गोदावरी ने भी सावरकर जी को प्रभावित किया। वो जिस तरह से जहाज से सागर में कूद पड़े, स्वतंत्रता के लिए छलांग लगा दी, उत्ताल सागर की तरंगें, अनंत सागर, अपार जलराशि, कहां किनारा है, कौन सा ठिकाना मिलेगा, इसका भरोसा नहीं मगर अंतःकरण में एक संकल्प- मैं पराधीनता स्वीकार नहीं करूंगा।”

“ऐसा संकल्प, ऐसा पराक्रम, ऐसा पौरुष सागर से दो-दो हाथ करने का फैसला और फिर उन्हें सागर के किनारे कालेपानी की सजा। मैंने वो कोल्हू भी देखा है जिसमें कैदियों को जोतकर तेल निकालना पड़ता था। सावकर जी ने अपनी जीवनी में इन सारे प्रसंगों का उल्लेख किया है, मगर वो सागर के किनारे जेल में बंद सावरकर चांद से बातें करते थे, चांद को उलाहना देते थे, उपालंब देते थे, संदेश देते थे। उस समय की उनकी अनेक कविताएं ऐसी हैं जो विश्व के इतिहास में, विश्व के साहित्य में अपना स्थान रखती हैं। उन कविताओं में उद्वेग भी है, आवेग भी है, संवेग भी है। वो शब्दों के शिल्पी थे। मगर भावनाएं उदात्त। लक्ष्य को उन्होंने कभी तिरोहित नहीं होने दिया।

सावरकर जी से मेरा पहला परिचय कवि के नाते हुआ। उनके क्रांतिकारी स्वरूप से तो सभी लोग थे। कविता में मेरी थोड़ी सी रुचि, संघ के साथ मेरा संपर्क, सावरकर जी की कविताओं का गायन मेरे लिए मराठी समझना मुश्किल था, लेकिन मैंने थोड़ी-थोड़ी सीखने की कोशिश की। मैंने सावरकर जी की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद करने का प्रयत्न किया और मैं चमत्कृत हो गया- कोई क्रांतिकारी होते हुए इतना अच्छा कवि कैसे हो सकता है! कोई कल्पना के आकाश में उड़ते हुए क्रांति की आग को कैसे धधका सकता है, सुलगा सकता है! मगर कल्पना की सृष्टि और यथार्थ की दृष्टि, दोनों का सावरकर ने समन्वय कर लिया।

सावरकर के जीवन की समग्रता ऐसे अनूठे गुणों से भरी हुई है। प्रखर राष्ट्रवाद, समझौता न करने वाला राष्ट्रवाद, जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समपर्ण कर देने वाला राष्ट्र प्रेम, मगर उसके साथ मूलगामी समाज सुधारक की भूमिका बैठी। कवि के बाद अगर सावरकर का कोई स्वरूप मुझे सबसे ज्यादा आकृष्ट करता है तो वो समाज सुधारक का रूप है। रत्नागिरि की नजरबंदी में, उस समय की उनकी कविताएं देखिए- बाल विधवा की पीड़ा। एक तो विधवा, उस पर बाल विधवा! पुनर्विवाह पर प्रतिबंध। ऐसी अभागी स्त्री कहां जाए? उस समय सावरकर बड़े-बड़े प्रश्नों में उलझे थे। मगर स्वतंत्रता से बढ़कर और कौन सा प्रश्न हो सकता है? मगर सावरकर द्रष्टा भी थे, समाज के शिल्पकार भी थे, विकृतियों से लड़ने वाले योद्धा भी थे, कुरीतियों का निर्मूलन करने वाले कटिबद्ध समाज सुधारक भी थे।”

 “जीवित होते तो शाहबानो की व्यथा बताते सावरकर

आज अगर सावरकर जीवित होते तो सावरकर की धीर-गंभीर वाणी में शाहबानो की व्यथा प्रकट होती, मुखर होती। 70 साल की नारी, पति द्वारा परित्यक्ता, बच्चों की मां कहां जाए, किसका दरवाजा खटखटाए? अगर सावरकर जी शाहबानो के लिए बोलते तो उन पर कोई आक्षेप भी नहीं लगा सकता था क्योंकि के लिए नारी-नारी में अंतर नहीं था, उनके लिए संप्रदाय-संप्रदाय में भेद नहीं था। उनके अंतःकरण की पीड़ा, वेदना का पारावार, कुरीतियों से लड़ने की उनकी मनःस्थिति ये किसी एक वर्ग या एक संप्रदाय तक सीमित नहीं थी। इस अभागे देश में आज भी अस्पृश्यों के लिए कुछ मंदिरों के द्वार बंद हैं। गांधी जी ने तो हरिजन-उद्धार की बात बाद में कही, सावरकर जी ने पहले कही।”

 आशा है, आने वाले दो वर्षों में भारत के सत्ताधारी संगठन को सद्बुद्धि प्राप्त होगी और स्वतंत्रये वीर, वीर सावरकर को उनके परम अधिकार, भारत रत्न से वंचित नहीं रखा जाएगा!

 –  फ़िरोज़ बख़्त अहमद

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