नाद योग शब्द ब्रह्मा की साधना

आज के दौर में भागमभाग, अफरातफरी भरी अस्त व्यस्त जीवनचर्या के कारण बदतर होती सेहत को लेकर हर व्यक्ति चिंतित है। इसका कारण है ,ऋषियों एवं मनीषियों की वैज्ञानिक शोध संपदा को विस्मृत करते जाना।जीवन में युक्ताहारविहार,संयम -नियम( समत्वं योग उच्यते)भूलते जाने से असंतुलन बढ़ रहा है। हिंदुस्तान की सनातन योग विद्या दूसरे देश अपनाने लगे हैं योग इहलौकिक जीवन और पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से आवश्यक है ।जीवन शैली में शामिल करना हमारा परम कर्तव्य है।”जुगति से जोगी हजार साल जीवे” तो हमको कम से कम उसका दशमाशं तो अपना जीवन काल  निर्धारित करना ही चाहिए।

 यह अद्भुत संयोग है कि  भारत केप्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी 

की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव अनुसार पहली बार विश्व स्तर पर योग दिवस आयोजन 21 जून 2015 को 192 देशों के द्वारा एक साथ किया गया था। 21 जून को ही विश्व संगीत दिवस भी है ।नाद योग शब्द ब्रह्म की साधना है ।भगवान शिव को योग के जनक गुरु या आदियोगी कहा जाता है उनके साथ ही भगवान श्री कृष्ण को भी योगेश्वर माना जाता है ।महर्षि पाणिनि अष्टाध्यायी में लिखते हैं-

‘नृत्यावसाने नटराजराजो  ननाद ढक्कांं नवपंचवारम्।उद्धर्तुकामःसनकादिकसिद्धान एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।।’

नृत्य की समाप्ति के अवसर पर भगवान शिव ने अपने डमरू को विशेष नाद में 14 बार, 14 प्रकार की आवाज में बजाया उससे जो सूत्र बजते हुए निकले उन्हें “शिव सूत्र” या “माहेश्वर सूत्र” के नाम से जाना जाता है ।यह सूत्र संस्कृत व्याकरण के आधार हैं जो आदि योगी का संगीत-नृत्य है। श्री कृष्ण को योगेश्वर कहा गया है( गीता में कर्म योग,भक्ति योग एवं ज्ञानयोग का उपदेश)

 “यत्र योगेश्वर कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

 तत्रश्रीर्विजय भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।

श्रीमद्भगवतगीता के चौथे अध्याय के पहले श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने कहा – मैंने इस अमर योग विद्या का उपदेश सूर्यदेव विवस्वान को दिया और विवस्वान ने मनुष्यों के पिता मनु को उपदेश दिया और मनु ने इसका उपदेश इक्ष्वाकु को दिया। वर्तमान मनु की आयु 30 करोड़ 53लाख वर्ष अनुमानित की जाती है जिसमें से 12 करोड 4लाख वर्ष व्यतीत हो चुके हैं यह मानते हुए कि मनु के जन्म के पूर्व भगवान ने अपनी शिष्य सूर्यदेव विवस्वान को गीता सुनाई ,मोटा अनुमान यह है कि गीता कम से कम 12 करोड़ 4लाख वर्ष पहले कही गई और मानव समाज में यह 20लाख वर्षों से विद्यमान रही। इसे भगवान ने लगभग

5 हजार वर्ष पूर्व अर्जुन से पुनः कहा। वैदिक काल मैं भी इसका प्रमाण मिलता है हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त योग मुद्राओं से ज्ञात होता है कि योग का चलन पाँच हजार वर्ष पहले भी रहा है।

  योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय ।

 सिद्ध्य सिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

 (श्रीमद्भभगवद्गीता,अध्याय-2,श्लोक 48)

हे अर्जुन! जय अथवा पराजय की समस्त आसक्ति त्याग कर समभाव से अपना कर्म करो ।ऐसी  समता  योग कहलाती है।आशक्ति रहित होकर कर्म करते रहना ही निष्काम कर्मयोग है।कर्मण्येवाधिकारस्ते……।

 बुद्धि युक्तो जहातीह उभे सुकृत दुष्कृते ।

तस्मद्योगाय युजस्व योगःकर्मशु कौशलम् ।।2/50।।

समत्व बुद्धि युक्त पुरुष जहां (इस जीवन में )पुण्य और पाप दोनों कर्मों को त्याग देता है इसलिए तुम योग से युक्त हो जाओ ।कर्मों में कुशलता योग है।

अमरकोश ,सांख्यदर्शन,महर्षियाज्ञवल्क्य,व्यास,पाणिनी ,मैत्रेयोपनिषद, योगशिखोपनिषद्, लिंग पुराण ,अग्नि पुराण, स्कंद पुराण और हठयोग प्रदीपिका संस्कृत हिन्दी कोश में योग की परिभाषाएं विस्तार से देखने को मिल जाएगी। महर्षि पतंजलि को योग का प्रवर्तक माना जाता है उनके द्वारा लिखित योग दर्शन में तीन भागों में अष्टांग योग का वर्णन दिया गया है समाधि पाद ,साधन पाद और विभूति पाद। योग दर्शन ,समाधि पाद के दूसरे सूत्र में कहा गया है “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” इसके बाद का सूत्र  “तदाद्रष्टु स्वरूपे अवस्थानम्” चित्त की वृत्तियों ( प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति)का निरोध( सर्वथा रुक जाना )योग है ।उस समय दृष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती है अर्थात वह केवल्य अवस्था को प्राप्त हो जाता है। पतंजलि योग दर्शन में पाँच यम(अहिंसा ,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)तथा पांच (नियम शौच, संतोष ,तप, स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति )इसके पश्चात आसन( स्थिर सुखमासनम )प्राणायाम (सांसो को नियंत्रित करने की क्रिया )प्रत्याहार (बाहर की चीजों से मन को हटाना )धारणा (एक ही लक्ष्य पर ध्यान लगाना  )ध्यान (ध्यान जिस पर केंद्रित है उसका चिंतन ) समाधि (चेतन्य में विलय) इस प्रकार योग के आठ चरण बताए गए हैं।

योग के संबंध में जनसामान्य में यह भ्रांति है कि केवल आसन या प्राणायाम कर लिया तो योग हो गया।

वस्तुतः योग संस्कृत की युज् धातु से बना है इसका अर्थ है,  मिलना,जोड़ना । व्यक्ति की चेतना का ब्रह्मांड की चेतना से जोड़ना, आत्मा का परमात्मा से मिलन ,मन और शरीर का सामंजस्य ,मनुष्य का प्रकृति के साथ जुड़ना आदि।योग परिपूर्ण सामंजस्य की अवस्था का द्योतक है ।  अंतिम परिणाम मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, मोक्ष या परम पद के रूप में देखा जाता है। योग को मन और शरीर के बीच सामंजस्य स्थापित करने या स्वस्थ जीवन यापन की कला एवं विज्ञान कहा जा सकता है।

 उभाभ्यामेवपक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणा गतिम् ।

 तथा ज्ञान कर्माभ्यां  जायते परमंपदम्।।(योग वशिष्ठ )

अर्थात जिस प्रकार से पक्षी आकाश में दोनों गंतव्य(परमपद) तक पहुंचा जा सकता है।

अष्टांग योग के अतिरिक्त कुंडलिनी योग( षटचक्र भेदन) हठयोग, मंत्रयोग, लय योग जैन एवं बौद्ध मतों की योगिक पद्धतियां हिंदुस्तान में प्रचलित रही हैं। शरीर की विषाक्तता को समाप्त कर शुद्ध अंतःकरण से स्थितप्रज्ञ होना योग साधना का फलितार्थ है।योगिक क्रियाओं में कुंजल, नौली ,खेचरी,बज्रोली,षट्कर्म शंख प्रक्षालन, नेति ,धोती ,बस्ति, कपालभाति ,त्राटक , बंद मुद्राएंआदि शामिल हैं। योगिक क्रियाओं का अभ्यास किसी गुरु के मार्गदर्शन में ही किया जाना उचित है।देखा देखी साधे योग, छीजें काया बाढ़ै रोग।

                                                                                                                                                                          शिवकुमार शर्मा

 

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