क्या हिन्दू मिट जायेंगे?

इस्लाम के प्रवर्त्तक मुहम्मद साहब अत्यंत प्रतिभावान व्यक्ति थे। स्वघोषित पैगम्बर के अतिरिक्त उनमें एक साथ सम्राट, सेनापति, सैनिक, राजनीतिज्ञ, चतुर, कूटनीतिज्ञ, प्रखर प्रवक्ता, धर्मोपदेशक, व्यापारी, न्यायधीश, दृढ़ निश्चयी एवं अति कर्मठता के गुण थे। उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा बढ़कर उन्माद का रूप ले चुकी थी।

उनकी दूरदृष्टि व बुद्धि की विलक्षणता का ही कमाल है कि आज 1400 वर्ष बाद भी वही लोग उनका झंडा उठाए रखने को विवश हैं, जिनके पूर्वजों का असीम यातना पूर्वक अंत किया गया।

उसी विलक्षणता का परिणाम है कि आजतक, अपने देश को हीन समझकर, अपनी संस्कृति से घृणा कर, अपनी जान और संपत्ति को दांव पर लगाकर और दरिद्रता झेल कर, दुनिया के करोड़ों मुसलमान अरब की महानता को स्वीकार कर नतमस्तक हैं।

इसी मजहबी उन्माद के अंतर्गत महमूद गजनवी ने 17 बार भारत को लूटा। लाखों लोगों का कत्ल किया, लाखों औरतों को गुलाम बनाकर गजनी के बाजार में बेचा।

उसके बाद मोहम्मद गौरी तैमूर ऐवक, बलवन, खिलजी आदि से होते हुए औरंगजेब और टीपू तक यही नरसंहार की विनाश लीला चलती रही।

आधुनिक युग में कुख्यात मोपला नरसंहार हुआ, जिसमे 5,000 हिंदू कत्ल कर दिए गए। अनगिनत महिलाओं का बलात्कार और अपहरण हुआ। 20,000 हिंदुओं का बलात धर्म परिवर्तन हुआ।

आजादी की लड़ाई और देश के विभाजन के समय मजहबी मानसिकता के कारण अनगिनत लोगों का कत्ल, अपार संपत्ति की लूट, औरतों का बलात्कार और अपहरण तथा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन का नंगा नाच हुआ। चर्चिल के अनुसार सिर्फ माउंटबेटन के समय 20 लाख लोग मारे गए थे।

सदियों से चले आ रहे इसी अत्याचार की उपज आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत के 95% मुसलमान हैं, जो अपने पूर्वजों पर ढाए गए अकथनीय यातनाओं को विस्मृत कर इस्लाम का दास बन चुके हैं।

भारत के 1991 व 2001 के जनसंख्या आंकड़े बताते है कि मुसलमानों की वृद्धि दर गैर-मुसलमानों की वृद्धि दर से लगभग दुगुनी है। “भारत में 2060 तक हिन्दू अल्पमत में हो जायेंगे।” (ए.पी.जोशी, रिलीजियस डैमोग्राफी आफ इंडिया) “जनसंख्या वृद्धि के द्वारा 2060 तक भारत में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से अधिक हो जायेगी और वे वोट के बल पर बन्दूक की एक गोली चलाये बिना ही यहां की सरकार पर कब्जा कर लेंगे और शरीयत लागू कर देगें।” (अनवर शेख, इस्लाम एण्ड टेररिज्म, पृष्ठ 181)

आतंक के वातावरण में मुसलमान बनने और उसकी शिक्षा, संस्कार और परंपरा के चलते रहने के कारण, गैर-मुसलमानों के साथ हत्या, लूट, व्यभिचार को अनैतिक, नींच और घिनौना कर्म की जगह महजबी फर्ज समझते हैं।

अतः धर्मनिरपेक्षतावादियों से यह अपेक्षा है कि वे मुसलमान समुदाय से कहें कि वे यह फतवा जारी करें कि कुरान, हदीस, सीरत-अन-नबी आदि जिन संयुक्त रूप में शरीयत कहते हैं, में गैर-मुसलमानों के प्रति शत्रुता का जो हुक्म है, उसे निरस्त किया जाता है कि जिहाद में किसी गैर-मुस्लिम का कत्ल या लूट या औरतों का अपहरण जैसा नींच कर्म वर्जित कर दिया गया है।

(सच्चिदानंद चतुर्वेदी, क्या हिन्दू मिट जायेंगे?, प्रकाशक – धर्म प्रकाशन, महामनापुरी (निकट विवेकानंद मठ), वाराणसी।)

 

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