नेता बदले लेकिन रिश्तों पर आंच नहीं

भारत के बढ़ते आर्थिक और सामरिक कद की वजह से विश्व के बड़े राष्ट्रों में लगातार हो रहे सत्ता परिवर्तन और भारत मित्र सत्ताधीशों की विदाई के बावजूद भारत पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि कई देशों में वर्तमान शासनाध्यक्षों ने भारत के साथ सम्बंधों को मजबूत करने की दिशा में ज्यादा तत्परता दिखाई है।

चाहे इजराइल हो या अमेरिका, जापान हो या आस्ट्रेलिया, जर्मनी हो या फ्रांस, दुनिया के इन सभी ताकतवर देशों में हाल के सालों में सत्ता परिवर्तन हुए हैं। इन देशों में विपक्षी दलों की सरकारें गठित होने के बाद भारत के साथ रिश्तों का स्तर कैसा रहेगा इसे लेकर अटकलें लगती रही हैं। लेकिन रोचक बात यह है कि इन देशों के नये नेताओं ने भारत के साथ रिश्तों पर किसी तरह की आंच नहीं आने दी है। इन सभी देशों के साथ भारत के गहरे सामरिक रिश्ते विकसित हो चुके हैं। भारत के साथ सामरिक साझेदारी का रिश्ता विकसित करने में इन देशों के नेताओं की अग्रणी भूमिका रही है। चाहे वह जापान के शिंजो आबे हों, इजराइल के बेंजामिन नेतान्याहू या फिर अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प, इन सभी नेताओं के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ निजी स्तर पर भी सौहार्द्रपूर्ण व गर्मजोशी से भरे रिश्ते विकसित हुए जिसका असर भारत के साथ सामरिक साझेदारी के रिश्तों को और गहराई दिए जाने के तौर पर हमने देखा है। इन सभी देशों के नये नेताओं ने भारत के साथ रिश्तों को न केवल आगे बढ़ाया है बल्कि उनमें नए आयाम जोड़े हैं। इससे पता चलता है कि दुनिया के सभी ताकतवर देशों की घरेलू राजनीति का भारत के साथ रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ता है। साफ है कि सभी देशों में भारत के साथ रिश्तों को लेकर राजनीतिक आम राय विकसित हो चुकी है। भारत के साथ रिश्तों का स्तर कैसा हो इसे लेकर सभी देशों में कोई विवाद नहीं देखा जा रहा है। यह भारत की एक उभरती हुई सैनिक और आर्थिक शक्ति की अहमियत बताती है।

यही वजह है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अपनी विदेश नीति पर चलते रहने के लिये स्वतंत्र रहता है। भारत यदि रूस के साथ सामरिक साझेदारी का रिश्ता रखता है तो दूसरी ओर अमेरिका है जो रूस का धुर विरोधी है और रूस के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लगाकर उसे पूरी दुनिया में अलग-थलग करने की नीति पर चलता है। निश्चय ही अमेरिका की चाहत रहती है कि भारत भी रूस के साथ अपने रिश्तों को सीमित कर दे लेकिन भारत ने अमेरिका की इन अपेक्षाओं को अनदेखा किया है।

जापान के सबसे लम्बे वक्त, करीब आठ सालों (2012 से 2020)  तक प्रधानमंत्री रहे शिंजो आबे ने भारत के साथ रिश्तों की अहमियत पहचानी और भारत की परमाणु नीति की वजह से भारत से दूरी बनाए रखने की पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की नीतियों को पलटा। हालांकि भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने का सिलसिला इस सदी के शुरू से ही चलने लगा था जब जापान ने भारत के साथ विशेष सामरिक साझेदारी का रिश्ता स्थापित किया। लेकिन शिंजो आबे के कार्यकाल में शुरू से ही जापान की विदेश नीति में भारत के साथ रिश्तों को नया आयाम देने पर जोर दिया गया। शिंजो आबे ने पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और फिर 2014 के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रिश्तों में गर्माहट पैदा की। उन्होंने भारत को लेकर जापान की विदेश नीति में मिठास पैदा करने में व्यक्तिगत रुचि ली और न केवल द्विपक्षीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के हितों का संवर्द्धन किया। ऐसे भारत प्रेमी जापानी नेता के 2020 में प्रधानमंत्री का पद छोड़ने का फैसला लेने के बाद भारतीय राजनयिक हलकों में शंका जाहिर की जाने लगी कि क्या जापान भारत के साथ रिश्तों का स्तर बनाए रखेगा। लेकिन जापान के बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी भारत के साथ रिश्तों में गर्माहट बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शिंजो आबे की सात जुलाई की हत्या के बाद भारत से उनसे ऱिश्तों को विशेष तौर पर याद किया गया।

इसी तरह जब आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मारीसन को सत्ता छोड़नी पड़ी और विपक्षी नेता एंथोनी अल्बनीज ने सत्ता सम्भाली तब भी राजनयिक हलकों में कहा जाने लगा कि अल्बनीज के चीन से अच्छे रिश्ते रहे हैं इसलिए आस्ट्रेलिया अब न केवल चार देशों के संगठन क्वाड से अपने हाथ खींचेगा बल्कि भारत के साथ भी रिश्तों को और गहरा होने से रोकेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री अल्बनीज ने स्पष्ट तौर पर ऐलान कर दिया कि पूर्व मारीसन सरकार की चीन नीति में कोई बदलाव नहीं होगा। उन्होंने भारत के साथ रिश्ते गहरे करने के लिये मुक्त व्यापार का समझौता भी सम्पन्न करवा दिया।

साफ है कि सभी देशों में भारत के साथ सामरिक रिश्तों को गहराई देने के मसले पर बहुदलीय आम राय रही है। एक आर्थिक और सैनिक ताकत के तौर पर उभर चुके भारत को कोई भी शक्तिशाली देश नजरअंदाज नहीं कर सकता। अमेरिका में भी भारत के साथ रिश्तों को लेकर इसी तरह की आमराय देखी जा सकती है। रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रोटोकाल तोड़कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान अगवानी की। डोनाल्ड ट्रम्प के शासन काल में दोनों देशों के रिश्तों ने नई ऊंचाईयां हासिल की लेकिन जब डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन ने सत्ता सम्भाली तब उन्होंने भी भारत के साथ रिश्तों को गति दी। अमेरिका की पहल पर ही भारत को चार देशों के गुट क्वाड में अहम भूमिका दी गई। इसके अलावा पश्चिम एशिया में भी इसी तरह का चार देशों इजराइल, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और भारत का नया क्वाड गठित किया गया जिसे आई-2यू-2 का नाम दिया गया। इस पश्चिम एशियाई क्वाड में शामिल हो कर भारत ने पश्चिम एशिया में अपने लिए अहम स्थान बना लिया है।

हमने पहले कोरोना महामारी और फिर यूक्रेन-रूस युद्ध के मद्देनजर दुनिया के राजनीतिक समीकरणों में भारी फेरबदल देखा है। चीन की आर्थिक व सामरिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिये हिंद-प्रशांत से लेकर पश्चिम एशिया तक में जिस तरह चौगुटे में भारत को शामिल किया गया है वह भारत की तेजी से बढ़ती साख और अहमियत को ही दर्शाती है। हिंद-प्रशांत इलाके के देशों के बीच सहयोग की आधारशिला भारत के बिना नहीं रखी जा सकती। यही वजह है कि सभी देशों की विदेश नीति में भारत को केंद्रीय स्थान में रखा जाता है और इन देशों में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत के साथ रिश्तों पर कोई आंच नहीं आती है।

 

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