चीन-ताइवान विवाद उभरता संकट

चीन का ताइवान पर दबाव बनाना एशिया में एक नए युद्ध की चेतावनी की तरह है। अमेरिका का ताइवान को सपोर्ट ढकोसला मात्र रह जाता है, यदि वह ‘वन चाइना पालिसी’ को भी बरकरार रखे रहता है। वैसे ताइवान ने यूक्रेन की हालत देखी है इसलिए वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहता पर यह लड़ाई उसके अस्तित्व की है, उसके राजनेताओं को यह भी भलीभांति पता है।

विगत कई महीनों से पूरा विश्व रूस तथा यूक्रेन के मध्य चल रहे युद्ध से उपजे संकटों से परेशान है। जहां एक ओर वैश्विक स्तर पर भयंकर ईंधन, खाद्यान्न, ऊर्जा और मानवीय संकट उत्पन्न हुए हैं, एक दूसरी समस्या ने भी पूरे विश्व को चिंता में डाल दिया है। वर्षों से चल रहे चीन तथा ताइवान के मध्य संकट को रूस-यूक्रेन युद्ध ने नयी दिशा में मोड़ दिया है, जहां एशिया में युद्ध का एक नया मंच तैयार होता नजर आ रहा है। हाल ही में अमेरिका की हाउस स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा ने दोनों देशों के मध्य वर्षों से चली आ रही समस्या में ईंधन का काम किया है। जहां एक ओर चीन नैंसी पेलोसी की इस यात्रा से बौखलाया हुआ नजर आ रहा है, ताइवान अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के साये में सशक्त नजर आ रहा है। किन्तु यहां कई महत्त्वपूर्ण बिंदु समझना आवश्यक है।

सर्वप्रथम तो यह जानना जरूरी है कि द्वितीय विश्वयुद्ध तक ताइवान पर जापान का स्वामित्व था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1943 की काइरो घोषणा तथा 1945 की पोट्सडैम घोषणा के पश्चात ताइवान पर चीन ने अपना कब्जा जमा लिया किन्तु 1949 में हुए गृहयुद्ध के बाद माओत्से तुंग ने कम्युनिस्ट चीन (पीपल’स रिपब्लिक ऑफ चाइना) की घोषणा की तो वहीं च्यांग काई शेक के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों ने ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। तबसे चीन अपनी ’वन चाइना पालिसी’ के तहत ताइवान पर अपना कब्जा जमाता आया है तो वहीं दूसरी तरफ ताइवान ने अपनी संप्रभु शक्तियों का उपयोग करने के लिए अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की सहायता ले रखी है। यहां रोचक बिंदु ये है कि अमेरिका ताइवान की बीते कई सालों से सहायता करता आया है किंतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह ’वन चाइना पालिसी’ का ही समर्थन करता है और उसने ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में आज तक मान्यता नहीं दी है।

यह बात तो रोचक है ही कि जनतांत्रिक देशों का अपरोक्ष समर्थन प्राप्त होने पर भी ताइवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मात्र 12 से 13 देशों ने एक स्वतंत्र देश के रूप में पहचाना है। शायद यही कारण है कि चीन बार-बार वैश्विक स्तर पर ताइवान पर अपना स्वामित्व जताने से नहीं चूकता। रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद चीन के हौसले बुलंद हुए, हालांकि वह ये अच्छे से जानता है कि वह रूस की तरह महाशक्ति नहीं है न ही उसकी अर्थव्यवस्था रूस की तरह प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है। चीन एक बाजार पर टिकी अर्थव्यवस्था है और रूस की तरह लम्बे समय तक युद्धक्षेत्र में टिके रहने के उसके सामर्थ्य पर प्रश्न चिह्न लगे हुए हैं। फिर भी, चीन हमेशा से एक आक्रामक देश रहा है और रूस से अपनी मित्रता के चलते उसे कहीं न कहीं इस बात का भी भरोसा है कि ताइवान के मामले में उसे रूस का समर्थन प्राप्त है। वहीं ताइवान के पीछे खड़े अमेरिका को देखते हुए चीन और आक्रामक हो जाता है। आज हिंद प्रशांत क्षेत्र में विस्फोटक स्थिति बनी हुई है। जहां एक ओर ड्रैगन कभी ताइवान की सामुद्रिक तो कभी हवाई सीमाओं में घुसपैठ कर रहा है तो दूसरी ओर अमेरिका ये सुनिश्चित कर रहा है कि चीन न तो ताइवान पर, न ही हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपना कब्जा जमा सके।

ताइवान की भू-रणनीतिक स्थिति के चलते अमेरिका चीन को ताइवान पर काबिज नहीं होने देना चाहता। वहीं ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत जैसे देशों के लिए भी चीन के ये आक्रामक तेवर चिंता बढ़ाने वाले हैं। चीन भारत की सीमाओं पर भी बार-बार अतिक्रमण करता है और युद्ध के हालात उत्पन्न करता है। जहां एक ओर वैश्विक स्तर पर महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयास चल रहे हैं, चीन की हरकतें न सिर्फ इन प्रयासों को प्रभावित करती हैं, ये आपसी विश्वास के लिए भी घातक हैं।

यद्यपि आज पूरा विश्व यूक्रेन-रूस के बीच चल रहे युद्ध से त्रस्त है और अच्छे से जानता है कि युद्ध कहीं भी हो, उसके दुष्परिणाम सभी को झेलने पड़ते हैं, इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि चीन कभी भी ताइवान के बहाने एशिया में युद्ध का एक नया अध्याय शुरू कर सकता है।

वर्तमान परिस्थितियों में यदि शक्तिशाली देश वाकई ताइवान की स्वतंत्र अस्मिता बनाये रखना चाहते हैं तो सबसे पहले ताइवान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने में उन्हें आगे आना चाहिए। अमेरिका को भी ताइवान को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए कि वह चीन की ’वन चाइना पालिसी’ को मानता है या ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में। दोनों ही बातें एक साथ नहीं चल सकतीं।

वैश्विक सुरक्षा और शांति की दृष्टि से चीन और ताइवान के बीच गहराता  संकट बहुत महत्वपूर्ण है। इस संकट की वजह से कई देशों ने अपनी सुरक्षा नीतियों में ऐतिहासिक बदलाव किए हैं। उदाहरण स्वरूप, जापान ने हाल ही में जारी किये अपने सुरक्षा श्वेत पत्र के माध्यम से ताइवान का उल्लेख करते हुए अपने सुरक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि का ऐलान किया है। आगामी समय में इस संकट की वजह से कई और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। ताइवान को आगे मिलने वाली वैश्विक सहायता और खुल कर समर्थन पर बहुत कुछ निर्धारित होगा। ताइवान यूक्रेन की बर्बादी और वर्तमान स्थिति भी देख रहा है। पर अब लड़ाई उसके अस्तित्व की है और इसीलिये आगे क्या होगा यह चीन के तेवर तय करेंगे।

 

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