लोग ‘हैप्पी न्यू ईयर‘ बोल कर आधुनिक हो रहे हैं

ईसा के नव वर्ष 2023 का स्वागत और विदा हुए 2022 को नमस्कार। आज पहली जनवरी है। ‘हैप्पी न्यू ईयर‘ की शुभकामनाएं तैर रही हैं। आगे मकरसंक्रांति है। हर बरस आती है। इसका आधार दिक्काल है। इसी महीने अंग्रेजी कैलेंडर का नव वर्ष आता है। ‘हैप्पी‘ बोलने में ठसक है। अंग्रेजियत है। ‘न्यू ईयर‘ आधुनिक है। लेकिन उधार की आधुनिकता स्वाभाविक नहीं होती। लेकिन भाई लोग ‘हैप्पी न्यू ईयर‘ बोल कर आधुनिक हो रहे हैं। कुछ बरस से गाँव देहात के निश्छल लोग भी ‘हैप्पी न्यू ईयर‘ बोल रहे हैं। भारतीय काल गणना का नव वर्ष – संवत्सर चैत्र माह में आता है। तब हवांए मधुगंधा होती है। गीत गाते चलती हैं। लेकिन ‘न्यू ईयर‘ हर साल कोहरे में आता है। हम भारत के लोग उत्सव प्रिय राष्ट्र हैं। इसलिए अंग्रेजी नववर्ष का एक उत्सव और जोड़ लेने में कोई कठिनाई नहीं है। नववर्ष का ‘नव‘ बड़ा रोचक है। यह नव प्रायः 9 का अर्थ देता है। जैसे ज्योतिष में नवग्रह शब्द चलता है। नवग्रह का नव नए का अर्थ नहीं देता। यह संख्यावाची है। नवमी एक माह में 2 बार आती है। यह तिथि है। लैटिन का नवंबर भी 9वां है। लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर में 11वां माह है। लैटिन का सेप्ट अंग्रेजी का सितम्बर है। अंग्रेजी का सितम्बर सातवां है। इसी तरह ओक्ट – अक्टूबर आठवां है। लेकिन अंग्रेजी कैलेंडर में अक्टूबर 10वां और सितम्बर नवां है। नवयुवक का अर्थ भी नया है। नव या नए के मोहपाश में नवना या झुकना अच्छा नहीं।

तुलसी दास ने झुकने के लिए नवनि शब्द का सुंदर प्रयोग किया है। अंग्रेजी नववर्ष में हैप्पी बोलना विदेशी सभ्यता के सामने क्या नवनि ही नहीं है? मन प्रश्न करता है कि नववर्ष को हम सब जनवरी से ही क्यों प्रारम्भ करें? जनवरी में नवीनता का कोई आधार या रूपायन नहीं दिखाई पड़ता। हम कृषि प्रधान देश रहे हैं। कृषि नवान्न देती है। हम पुलकित होते हैं। लेकिन जनवरी में ऐसा नहीं होता। जनवरी में वन उपवन नवांकुर से भरे पूरे नहीं होते। जनवरी में लोक आनंदित नहीं होता। न नवछन्द उगते हैं और न नवगीत। जनवरी में कुछ भी नया नहीं होता। न रूप नया। न रस नया। न गंध नई। न स्पर्श नया। जनवरी में नदियां भी उल्लासपूर्ण नहीं होती। जनवरी भी कड़ाके की सर्दी के कारण खांसते हाँफते हुए प्रकट होती है। जनवरी के स्वागत का मन नहीं करता। इसका न कोई प्रतीक है और न कोई प्रतिमान।

काल गणना से तिथि, दिवस, मास, वर्ष और युग बनते हैं। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। वैदिक साहित्य के अनुसार वर्ष में 720 अहोरात्र होते हैं। अहोरात्र दिन रात के जोड़े हैं। परिक्रमा सीधी रेखा में नहीं चलती। यह वृत्ताकार होती है। वृत्ताकार गति में प्रथम और अंत नहीं होता। तो नया साल कहाँ से आया। नए साल की गिनती कहाँ से शुरू हुई और क्यों हुई? जनवरी से ही नए साल की गणना क्यों होती है? प्रगतिशील विद्वान हमारा मार्गदर्शन करें। यहाँ 6 ऋतुवें हैं। बसंत ऋतुराज हैं। तब पूरी प्रकृति मदन गंध आकुल व्याकुल होती है। नया साल बसंत से क्यों नहीं शुरू होता? फाल्गुन में होली के गीत, नाचती ऋतुवें क्या नए साल के लिए पर्याप्त नहीं हैं? चैत्र में ठाठ मारता संवत्सर आता है। यही भारत का नववर्ष है और सृष्टि सृजन की मंगल मुहूर्त भी।

यूरोपीय विद्वानों ने पता नहीं क्यों 10 महीने का कैलेंडर बनाया था? उस कैलेंडर में सितम्बर सातवां महीना था। आठवां अक्टूबर था। नौवां नवम्बर था और दिसंबर दसवां। विवाद हुआ तो जनवरी फरवरी शुरू में जोड़ दी गई और सातवें से लेकर दसवें महीने तक की गिनती उलटी पुलटी हो गई। अंग्रेजी कैलेंडर की काल गणना में झोल है। विदेशी सभ्यता का प्रभाव गहरा होता जा रहा है। हम अंग्रेजी नववर्ष में हैप्पी होते हैं। बसंत में हमारे मन में आनंदरस नहीं उफनाता। नई पीढ़ी का एक वर्ग वैलेंटाइन को प्रेम का संत मानता है। भारत और ईसाईयत की संत परंपरा में मौलिक अंतर है। भारत में देव उपासना और ज्ञान प्राप्ति के लिए घर छोड़ कर आश्रमों में रहने वाले महानुभाव संत कहलाते हैं। ईसाईयत में संत होने की शर्तें हैं। चर्च किसी के संत होने का प्रमाणपत्र जारी करता है। तब कोई संत होता है। चर्च की संत सूची में वैलेंटाइन का नाम नहीं है। लेकिन यहाँ नई पीढ़ी का एक वर्ग वैलेंटाइन मनाता है। कथित प्रेम की अभिव्यक्ति में शील अश्लील के भेद मिट जाते हैं। भारत को भारतीयता की लय और छंद में उत्सवधर्मा होना चाहिए। आधुनिकता निरपेक्ष नहीं होती। यह परंपरा का विस्तार होती है। आज जिसे आधुनिकता कहते हैं वह सौ पचास वर्ष बाद परंपरा बन जाएगी।

अस्तित्व प्रतिपल नया है। हम सब प्रतिपल नए हैं। भूत और वर्तमान की कोई समय विभाजक रेखा नहीं है। वर्तमान प्रतिपल भूत हो रहा है। प्रतीक्षारत भविष्य और वर्तमान की आत्मीयता प्रतिपल नई उमंग देती है। यहाँ सब कुछ नया ही नया है। बीज फूट कर पौध बन रहे हैं। नई पत्तियां, कोपलें उग रही हैं। कली अभी खिली है। पुष्प नए हैं। मेघ नए हैं। बादल नए हैं। प्रकृति का हर एक रूप नया है। ऊषा नई है। सूर्य अरुण तरुण हैं। लेकिन इस नए का अलग अस्तित्व नहीं है। वह परंपरा का विस्तार है। भारतीय परंपरा में इसीलिए अस्तित्व को चिरंतन और सनातन कहा गया है। यह सदा से है। सदा रहता है। रूप रूप प्रतिरूप होकर पुनर्नवा होता रहता है। काल का जन्म हुआ है। ऋग्वैदिक ऋषियों के अनुसार एक समय ऐसा भी था जब समय नहीं था। प्रलय में गति नहीं होती इसलिए प्रलय में काल नहीं होता। दिन और रात भी नहीं होते। ऋग्वेद में सृष्टि सृजन के पूर्व का सुंदर वर्णन है। तब न रात्रि थी न दिन। न मृत्यु न अमृत्व। सब तरफ गहन अंधकार और जल ही जल। काल के जन्म के बाद भारतीय ऋषियों ने काल गणना शुरू की। यह आसान नहीं थी।

इसके पहले कालबोध की आवश्यकता थी। ऋषियों में कालबोध था। दिन, रात, मास व वर्ष काल के अंग हैं। ऋग्वेद में काल प्रवाह के प्रथम बिंदु को संवत्सर कहा गया है। भारत का मन संवत्सर में लहकता है। अंग्रेजी नववर्ष भी यहाँ चलता है। पूर्वजों ने सभी दिशाओं से प्राप्त ज्ञान को राष्ट्रानुकूल बना कर सांस्कृतिक जीवन की रूपरेखा गढ़ी थी। विदा होते वर्ष 2022 में हमने मुलायम सिंह यादव, लता मंगेशकर, राजू श्रीवास्तव, स्वरूपानंद सरस्वती, साइरस मिस्त्री, राकेश झुनझुनवाला, शिव कुमार शर्मा, राहुल बजाज, बप्पी लाहिड़ी, बिरजू महाराज आदि अपने क्षेत्रों की महान विभूतियों को खोया भी है। इसी अवधि में भारत को पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति मिलीं। नए उपराष्ट्रपति मिले। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त सहित कई संवैधानिक प्रमुखों की नियुक्तियां हुईं। कोरोना, वैश्विक आर्थिक मंदी व युद्धरत तनाव के बीच भारत विकास की नई ऊंचाइयां छू रहा है। विनिर्माण, परिवहन, उद्योग, निर्यात आदि क्षेत्रों में नए कीर्तिमान गढ़े जा रहे हैं। वैश्विक आर्थिक भविष्यवेत्ताओं द्वारा भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान नववर्ष के लिए शुभ संकेत है।

– हृदयनारायण दीक्षित

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