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भारतीय राजनीति में चुनाव पूर्व की कालावधि हमेशा ही अस्वस्थता निर्माण करनेवाली रही है और इस अस्वस्थता में जाति आधारित संघर्ष का उपयोग करना अपने देश की राजनीति का कटु सत्य है। फिलहाल भारत में दलित समाज के रोष का आधार लेकर जातिगत राजनीति की जा रही है। क्या इसका फायदा राजनीतिज्ञों से अधिक देश की विघटनकारी शक्तियों को नहीं होगा? यह गंभीर प्रश्न हम सब के मन में अस्वस्थता निर्माण कर रहा है। दलितों के आंदोलन में मुसलमान, क्रिश्चन और नक्सलवादी घुस गए हैं। यह भयानक चित्र हम सभी के सामने आ रहा है। दलितों के आक्रोश का मुख्य उद्देश्य दलित समाज को आत्मसम्मान दिलवाना तथा डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के मूल्यों का जतन करना है।

दलित आंदोलन में मुस्लिम, क्रिश्चन और नक्सलवादियों का समावेश होने के कारण असली लड़ाई और कुछ दिखाई देती है। मुस्लिम, क्रिश्चन और नक्सलवादियों के संघर्ष के कारण ही अलग हैं। मुस्लिम और क्रिश्चन लोगों को अपने धर्म का प्रसार करना है। हिंदू समाज का विघटन करना है। अपना उद्देश्य साधकर उन्हें हिंदू समाज को कमजोर बनाना है। यही उनका मुख्य लक्ष्य है। अत: दलित सम्मान का विषय तथा मुसलमान व क्रिश्चन का उद्देश्य, दोनों का कोई मेल नहीं बैठता। फिर संघर्ष कहां है? चुनाव में अगर कुछ सीटें जीतनी हैं तो उसके लिए एक दूसरे के वोट मिलने आवश्यक हैं। सभी को दलित, मुस्लिम और अल्पसंख्यकों के वोट प्राप्त करने होते हैं। इस प्रकार के ‘राजनैतिक जुगाड़’ के लिए सांठगांठ के समीकरण होते हैं। हालांकि इस प्रकार की सांठगांठ का परिणाम दोनों ओर होता है। इसे राजनीति में ‘रिवर्स पोलराइजेशन’ कहते हैं। दलित वर्ग में सत्ता प्राप्ती हेतु प्रबल इच्छा दिखाई देती है। वह आज की नहीं है। दलितों को पूर्ण सत्ता के परिधि में पहुंचना है। मायावती जैसे नेता सीमित मात्रा में सत्ता संघर्ष कर रहे हैं। पूर्ण सत्ता पर न पहुंचने का गुस्सा उनमें समय-समय पर पनप रहा है।

इसमें वामपंथियों का विषय अवश्य गंभीर है। वह विषय है नक्सलवाद का। दुर्भाग्य से दलितों में कुछ ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के संवैधानिक मार्ग से चल रहे संघर्ष की मर्यादा है। इस शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष से दलितों को न्याय मिलना कठिन है। अत: आंबेडकरवाद और मार्क्सवाद का मेल करना चाहिए तथा हिंसक मार्ग से आंदोलन करना चाहिए। यह विचार दलित वर्ग के एक नेतृत्व में प्रबल होता दिखाई दे रहा है। 2 जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हुए दंगे क्या इसी का प्रयोग मात्र थे? उसके बाद 2 अप्रैल को देश के एक दर्जन राज्यों में दलितों का जो हिंसाचारी उन्माद भड़का, क्या वह भी इसी प्रयोग का एक हिस्सा था? क्या वास्तव में दलित आंदोलक अपने सम्मान के संघर्ष में इस हिंसक आंदोलन में उतरे थे? और अगर उतरे थे तो क्या उन्हें इस बात का संज्ञान था कि अपने सम्मान के लिए लड़ रहे दलितों का राष्ट्रविरोधी शक्तियां उपयोग कर रही हैं।

दलितों का संघर्ष समाज के भीतर अपना सम्मान प्राप्त करने के लिए है; लेकिन वामपंथियों का मार्ग तो भारतीय संविधान को ही नष्ट करनेवाला हैं। यह राष्ट्रविरोधी हिंसा का ही एक मार्ग है। वामपंथी अगर इस मार्ग से जाते हैं तो देश में अराजकता निर्माण होगी। हिंसा हमेशा हिंसा को ही जन्म देती है। अत: भारत के जानकार दलित यह जान ही गए होंगे कि इस प्रकार के हिंसक तथा अराजकता को निमंत्रण देने वाले मार्ग से जाने का कोई अर्थ नहीं है।

कम्युनिस्ट तथा मुस्लिमों के साथ मिलकर हिंसक कदम उठाना दलितों तथा राष्ट्र दोनों के लिए हितकारी नहीं है। उनके एजेंडे बिल्कुल अलग हैं। मुस्लिमों का मुख्य एजेंडा सारे भारत का इस्लामीकरण करना है। जब मुसलमानों की संख्या बढ़ती है तो सभी मानवीय मूल्यों को खतरा उत्पन्न हो जाता है। शायद दुनिया का एक भी ऐसा मुस्लिम देश नहीं होगा जो शांतिपूर्ण तरीके से जी रहा हो।   जब डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को हम पढ़ते हैं, समझने की कोशिश करते हैं तो उनके विचार यह सूचित करते हैं कि मुसलमान दलितों के मित्र कभी भी नहीं हो सकते; क्योंकि उनकी विचारधारा बिल्कुल अलग है। उसी प्रकार वामपंथ से दूर रहने की सलाह उनके विचारों से व्यक्त होती है। वामपंथ दावानल है और दलितों को उससे दूर ही रहना चाहिए। बाबासाहब के प्रत्येक विचारो का पालन करनेवाले दलित समाज को उनका यह विचार हमेशा ध्यान में रखना चाहिए तथा सतत इनका चिंतन व स्मरण करना चाहिए। यही दलितों तथा सम्पूर्ण राष्ट्र के हित में होगा।

दलित सम्मान और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के तत्वों का जतन करने की लड़ाई में मुसलमानों और वामपंथियों का कोई उपयोग नहीं होगा। क्योंकि, बाबासाहब ने व्यक्ति की स्वतंत्रता, स्त्री-पुरुष समानता, बंधुभाव आदि को महत्वपूर्ण माना था। इस्लाम इनमें से कोई भी तत्व नहीं मानता। अगर बाबासाहब के तत्वों का विचार किया जाए तो दलितों के साथ मुसलमानों और वामपंथियों की मित्रता नैसर्गिक हो ही नहीं सकती; वह कृत्रिम ही रहेगी क्योंकि इस्लामी और वामपंथी तत्वज्ञान हिंसा पर भरोसा रखता है, समता पर नहीं। उनका मार्ग हिंसा का है और दलितों का मार्ग गौतम बुद्ध का।

वर्तमान में भारत में आर्थिक और तकनीकी विकास प्रक्रिया तेज गति से आगे बढ़ रही है। परंतु सामाजिक विकास और सामाजिक एकता की भावना थमी हुई दिख रही है। सामाजिक स्तर पर अभी भी हमारा समाज पिछड़ा हुआ है। इसका अनुभव हमें देश में निर्माण होनेवाले सामाजिक विद्वेषपूर्ण वातावरण से होता रहता है। इन सभी के कारण राष्ट्रविरोधी गतिविधियां जोर पकड़ रही हैं। इस सामाजिक विषमता को समाप्त करने के लिए लोकतांत्रिक पद्धति से सारी शक्तियों को एकजुट कर आंदोलन करना चाहिए। ऐसे अभियान के समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि अपना सामाजिक सम्मान और मूल्यों का जतन करनेवाला आंदोलन कहीं राष्ट्रविरोधी शक्तियों के हाथ में न चला जाए। दलित बंधुओं को यह भी सोचना होगा कि कहीं अनजाने में वे राष्ट्रविरोधी शक्तियों की शतरंज का प्यादा तो नहीं बन रहे हैं?

 

 

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