अनशनव्रती महात्मा रामचंद्र वीर 

1966 में दिल्ली में गोरक्षार्थ 166 दिन का अनशन करने वाले महात्मा रामचंद्र वीर का जन्म आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, वि.संवत 1966 (1909 ई.) में महाभारतकालीन विराट नगर (राजस्थान) में हुआ था। इनके पूर्वज स्वामी गोपालदास बाणगंगा के तट पर स्थित ग्राम मैड़ के निवासी थे। 

उन्होंने औरंगजेब द्वारा दिल्ली में हिन्दुओं पर थोपे गये श्मशान कर के विरोध में उसके दरबार में ही आत्मघात किया था। उनके पास समर्थ स्वामी रामदास द्वारा प्रदत्त पादुकाएं थीं, जिनकी प्रतिदिन पूजा होती थी। इन्हीं की 11 वीं पीढ़ी में रामचंद्र का जन्म हुआ। इनके पिता श्री भूरामल्ल तथा माता वृद्धिदेवी थीं।

बालपन से ही उनके मन में मूक पशुओं के प्रति अतिशय करुणा विद्यमान थी। जब कोई पशुबलि को शास्त्र सम्मत बताता, तो वे रो उठते थे। आगे चलकर उन्होंने गोवंश की रक्षा और पशुबलि उन्मूलन को ही अपना ध्येय बना लिया।

इस प्रयास में जिन महानुभावों का स्नेह उन्हें मिला, उनमें स्वामी श्रद्धानंद, मालवीय जी, वीर सावरकर, भाई परमानंद, गांधी जी, डा. हेडगेवार, नेहरू जी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, श्री गोलवलकर, प्रफुल्ल चंद्र राय, रामानंद चट्टोपाध्याय, बालकृष्ण शिवराम मुंजे, करपात्री जी, गाडगे बाबा, विनोबा भावे, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, जयदयाल गोयन्दका, हनुमान प्रसाद पोद्दार आदि प्रमुख हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने तो उनकी प्रशस्ति में एक कविता भी लिखी थी। वीर जी ने कोलकाता व लाहौर के कांग्रेस अधिवेशनों में भी भाग लिया था। 1932 में अजमेर में दिये गये उग्र भाषण के लिए वे छह माह जेल में भी रहे।

प्रखर वक्ता, कवि व लेखक श्री वीर जी ने गोहत्या के विरोध में 18 वर्ष की अवस्था में अन्न व नमक त्याग का संकल्प लिया और उसे आजीवन निभाया। उन्होंने अपने प्रयासों से 1100 मंदिरों को पशुबलि के कलंक से मुक्त कराया। इसके लिए उन्होंने 28 बार जेलयात्रा की तथा 100 से अधिक अनशन किये। इनमें तीन दिन से लेकर 166 दिन तक के अनशन शामिल हैं। वे एक शंख तथा मोटा डंडा साथ रखते थे और सभा में शंखध्वनि करते रहते थे।

महात्मा वीर जी ने हिन्दू समाज को पाखंडपूर्ण कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने के लिए पशुबलि निरोध समिति तथा आदर्श हिन्दू संघ की स्थापना की। उनका पूरा परिवार गोरक्षा को समर्पित है। 1966 के आंदोलन में उनके साथ उनके एकमात्र पुत्र आचार्य धर्मेन्द्र ने भी तिहाड़ जेल में अनशन किया। उनकी पुत्रवधू प्रतिभा देवी ने भी दो पुत्रियों तथा एक वर्षीय पुत्र प्रणवेन्द्र के साथ सत्याग्रह कर कारावास भोगा था।

वीर जी ने अपने जन्मस्थान के निकट भीमगिरि पर्वत के पंचखंड शिखर पर हनुमान जी की 100 मन वजनी प्रतिमा स्थापित की। यहां हनुमान जी के साथ ही महाबली भीम की भी पूजा होती है। समर्थ स्वामी रामदास की पादुकाएं भी यहां विराजित हैं। महात्मा वीर जी ने जीवन के अंतिम 28 वर्ष इसी स्थान पर व्यतीत किये।

उन्होंने देश व धर्म के लिए बलिदान देने वाले वीरों का विस्तृत इतिहास लिखा तथा अपनी जीवनी ‘विकट यात्रा’, हमारी गोमाता, श्री वीर रामायण (महाकाव्य), वज्रांग वंदना, हमारा स्वास्थ्य, विनाश का मार्ग आदि पुस्तकों की रचना की। इसके लिए उन्हें कई संस्थाओं ने सम्मानित किया।

हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्थान के लिए समर्पित वीर जी भारत को पुनः अखंड देखना चाहते थे। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री द्वारा ‘जीवित हुतात्मा’ की उपाधि से विभूषित वीर जी का 24 अप्रैल, 2009 को जन्मशती वर्ष में देहांत हुआ। उनकी अंतिम यात्रा में दूर-दूर से आये 50,000 नर-नारियों ने भाग लेकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। शवयात्रा में रामधुन तथा वीर जी की जय के साथ ही ‘हिन्दू प्रचंड हो, भारत अखंड हो’ तथा ‘गोमाता की जय’ जैसे नारे लग रहे थे।

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