चित्त की एकाग्रता का विज्ञान

 

मन का स्वभाव है कि वह किसी बात पर अधिक समय स्थिर नहीं रहता और उचटकर बार-बार इधर-उधर उड़ता है । आप किसी बात को. सोचना चाहते हैं, किंतु मन उस पर नहीं जमता । ऐसी दशा में उस चिंतनीय विषय का कोई ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकेगा । इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने पर उत्तम मस्तिष्क वाले भी उतना काम नहीं कर सकते जितना कि साधारण मस्तिष्क के, किंतु स्थिर चित्त वाले कर सकते हैं । कोई मनुष्य कितना ही चतुर क्यों न हो, यदि उसके मन को उचटने की आदत है और इच्छित विषय में एकाग्र नहीं होता, तो उसकी चतुरता किसी काम न आवेगी और उसके निर्णय अपूर्ण एवं असंतोषजनक होंगे ।

“चित्त” की एकाग्रता का संबंध “रुचि” से है । रूखे और अरुचिकर विषयों में मन नहीं लगता और वहाँ से बार-बार उचटता है । इसलिए जिस विषय पर मन लगता है, उसे रुचिकर बनाना चाहिए । विद्यार्थियों को ज्यामेट्री और गणित के विषय रूखे जान पड़ते हैं, किंतु जिन विषयों में सरलता होती है उन्हें खूब दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं । यहाँ यह न सोचना चाहिए कि अमुक विषय सरस है और अमुक नीरस। संसार में कोई भी बात नीरस नहीं है ।

केवल मन को उनके अनुकूल बनाने की योग्यता में अंतर है । एक राज कर्मचारी के लिए खाट बुनने का काम कुछ भी दिलचस्पी का नहीं है, किंतु जिन्हें इसमें रुचि होती है, वे चारपाई बुनने में बड़ी खूबसूरत फूल-पत्तियाँ निकालकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । “दु:ख”, पीड़ित होना और “मृत्यु”, साधारणतः ये बड़े नीरस और अरुचि के विषय हैं, पर कितने ही लोगों को इसमें आनंद आता है । तपस्वी लोग भूखे, प्यासे निर्जन स्थानों पर रहते हैं ।शीत, धूप के कष्ट सहते हैं , यह सब उनकी “रुचि” के अनुकूल होता है, इसलिए उस दशा में भी प्रसन्नता ही रहती है ।

धर्मनिष्ठ लोग यथा हरिश्चंद्र, शिबि, दधीचि, मोरध्वज, हकीकतराय, बंदा बैरागी आदि की तरह प्राणांतक कष्ट सहते हैं । देशभक्त लोग फाँसी के फंदों को हँसते हुए चूमते हैं । उन्हें यह दशा वैसी दु:खदायी प्रतीत नहीं होती, जैसी हमें प्रतीत होती है । सैनिक रणक्षेत्र में मजबूत मृत्यु के साथ खेलता है, शरीर पर घाव सहता है, पर उस काम में भी दिलचस्पी होती है । तात्पर्य यह है कि कोई भी कार्य और विषय ऐसा नहीं है, जो नीरस कहा जाए और सब लोगों को वह अरुचिकर हो ।

भेद केवल इतना ही है कि एक ने जिस बात में दिलचस्पी पैदा कर ली है वह उसमें बहुत प्रसन्नता के साथ लगा रहता है और मन को एकाग्र रखता है । दूसरे मनुष्य को यदि उसमें रुचि नहीं है, तो वही उसके मन उचटने का कारण है।

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