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***डॉ. इंद्रदेव सिंह***

            उत्तर प्रदेश भारत वर्ष का क्षेत्रफल एवं जनसंख्या दृष्टि से एक             विशाल राज्य है। इसके पूर्वी छोर पर स्थित पांच मण्डल के सत्रह जिले पूर्वांचल के अंतर्गत आते हैं। यद्यपि अभी तक कोई प्रशासकीय एवं विधिक विभाजन नहीं हुआ है। फिर भी भौगोलिक, भाषायी एवं सामाजिक रचना को देखते हुए निश्चय ही यह एक विशिष्ट क्षेत्र है।

 १. सिद्धार्थनगर, २.महराजगंज, ३.कुशीनगर, ४.बस्ती, ५.सन्त कबीर नगर, ६.गोरखपुर, ७.देवरिया, ८.आजमगढ, ९.मऊ, १०.बलिया, ११.जौनपुर, १२.गाजीपुर, १३.सन्त रविदासनगर, १४.वाराणसी, १५.चन्दौली, १६.मिर्जापुर, १७.सोनभद्र-जिले मिलकर पूर्वांचल क्षेत्र निर्धारित करते हैं। इसके उत्तर में नेपाल, पूर्व में बिहार प्रान्त, पूर्व दक्षिण में झारखंड प्रान्त, दक्षिण में मध्यप्रदेश प्रान्त,दक्षिण पश्चिम में प्रस्तावित बुन्देलखंड, पश्चिम में प्रस्तावित अवध प्रदेश स्थित हैं। नवम्बर २०११ में प्रस्तावित पूर्वांचल प्रान्त में बहराइच, श्रावस्ती, गोण्डा, बलरामपुर, फैजाबाद, आम्बेडकर नगर, सुल्तानपुर, प्रतापगढ, इलाहबाद, कौशाम्बी तथा फतेहपुर ये ग्यारह जिले प्रस्तावित अवघ प्रदेश से काटकर पूर्वांचल में मिलाने का प्रस्ताव आया, जिसका घोर विरोध हुआ। ये जिले अवधी भाषी हैं और इन्हीं में अवधी का इतिहास एवं संस्कृति रची-बसी हैं।

            पूर्वांचल मूलत: भोजपुरी भाषी क्षेत्र है। जो १७ जिले इसके अन्तर्गत रखे गए हैं उनमें भोजपुरी के ही विभिन्न रूप बोले जाते हैं। सिद्धार्थनगर, बस्ती और जौनपुर के पश्चिमी हिस्सों में अवधी का वर्चस्व अवश्य हैं। शेष सभी जिलों में भोजपुरी बोली जाती है। घुर पुर्वी जिलों महाराजगंज, कुशीनगर, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ, मऊ, बलिया और गाजीपुर तो पूर्णत: बिहारी भोजपुरी भाषायी क्षेत्र हैं। सन्त रविदासनगर, वाराणसी, चन्दौली, मिर्जापुर, सोनभद्र की बोली अलग है। इनमें अवधी और भोजपुरी मिश्रित बनारसी भोजपुरी बोली बोली जाती है।

            हिमालय की तलहटी एवं गंगा-यमुना के बीच बसे होने के कारण यह क्षेत्र अति उपजाऊ है। गंगा, राप्ती, यमुना, घाघरा तथा गोमती अपनी सहायक नदियों -शारदा, रामगंगा, सरयू, हिडंन, चम्बल, बेतवा, तमसा, टेढी, बिसुही, कुआनो, केन, ढेला आदि का जल एकत्र करती हुई पूर्वांचल में विकराल रूप धारण करते हुई प्रतिवर्ष भीषण बाढ का कहर ढाती हैं। इसका परिणाम होता है कि नदियों के किनारे बसे गांव प्रतिवर्ष उजड़ते-बसते हैं। मिर्जापुर, चन्दौली और सोनभद्र जिले विन्ध्याचल पहाड़ के उत्तरी तट पर बसे हैं। यहां की भूमि पथरीली तथा भूजल बहुत नीचे हैं। यहां भीषण गर्मी और भीषण ठण्ड पड़ती है।

            सोननदी सोनभद्र से होकर गुजरती है। पूर्वांचल की मिट्टी मटियार, दोमट, रेतीली है और इनके मिश्रण से अनेक उप प्रकार की मिट्टियां बनती हैं। कहीं-कहीं हलके ऊसर का पुट भी है। पानी का तल ऊपर होने के कारण तथा मिट्टी उपजाऊ होने के कारण यहां उच्चकोटि की खेती एवं बागवानी होती है। गेहूं, धान, मक्का, अरहर, जौ, चना, मटर, ज्वार, बाजरा, सरसों, तिल, गन्ना, मूंगफली, शकरकंद की उत्तम खेती होती है। विभिन्न प्रकार के फल-आम, अमरुद, कटहल, नींबू, शरीफा, केला, आंवला, लीची, बेर, पपीता आदि प्रचुर मात्रा में उगाए जाते हैं। आलू, बैंगन,गोभी, टमाटर, लौकी सेंग, कद्दू, लोविया, मूली, गाजर, पालक, मेथी, सोया, शलजम, चुकन्दर आदि सब्जियां इतनी मात्रा में होती हैं कि बाहर के प्रान्तों में भी भेजी जाती हैं। वाराणसी लंगडा आम और रामनगर (वाराणसी) का बैंगन तथा जौनपुर की मूली विश्व प्रसिद्ध है। बनारसी पान का ठाट अप्रतिम है। क्षेत्र में तालाबों तथा नदियों का बाहूल्य होने के कारण सिंघाडा और मछलियों का अच्छा उत्पादन होता है। बड़े-बड़े तालों में कमलगट्टा तथा कमल ककड़ी (भसिण्डा) खूब पैदा होता है। जंगलों का इस क्षेत्र में बाहूल्य हैैं। जंगल की अंधाधुंध कटाई तथा नगरीकरण के बढ़ते चरण ने वन्य प्राणियों का प्राकृतिक आवास बाधित कर दिया है। मशीनी खेती ने गांव से पशुओं को अनुपयोगी बना दिया है। अत: वन्य एवं पालतू दोनों प्रकार के पशु खेती के शत्रु बन गए हैं। बढ़ती जनसंख्या तथा खेती में मशीनों के प्रयोग ने ग्रामीणजनों को बेरोजगार बना दिया है। गांव की आबादी रोजगार और शिक्षा प्राप्त करने बड़े शहरों तथा अन्य प्रान्तों में पलायन कर रही है।

            स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में विद्यालय, सडकें, अस्पताल, रेल, बिजली, पानी आदि की तरफ सरकारों के द्वारा ध्यान दिया गया है। परंतु इस क्षेत्र में कुछ ऐसी सामाजिक बुराइयों ने जडें जमा रखी हैं कि यहां समुचित विकास नहीं हो पा रहा है। जातीयता इस क्षेत्र का सबसे बडा रोग है। उस पर तुर्रा यह कि इसी आधार पर कई राजनीतिक दलों ने विकास के रास्ते में भयानक दलदल तैयार कर दिया है। स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सुरक्षा सरकार के हाथ से निकल चुका है। व्यक्तिगत अस्पताल, विद्यालय एवं विभिन्न प्रकार के माफिया समाज का जमकर शोषण कर रहे हैं। घूसखोरी ने तो सरकारी तंत्र की जड़ तक पैठ बना ली है। राजनैतिक नेताओं की करनी कथनी में कोई मेल नहीं रह गया हैं। बाहुबल, धनबल और तिकड़म जुगाड़ से माफियाओं के झुण्ड राजनितीक पदों पर कब्जा जमाकर बैठे हैं। वहीं से वे प्रजातन्त्र की जड काट रहे हैं। सडक, भवन आदि के ठेके यही लोग हडपकर मानक से बहुत नीचे घटिया किस्म के सडक एवं भवन निर्माण कराते हैं।

             बाल-विवाह, दहेज आदि सामाजिक कुरीतियों के चलते सुखद दाम्पत्य जीवन बाधित हो रहा है। आज भी ऐसे अनेक गांव हैं, जहां नदियों पर पुल की अपेक्षा है। जर्जर विद्यालय, टूटी सडकें, खाली अस्पताल (सरकारी) आए दिन चोरी, डकैती और कत्ल के समाचार शासन- प्रशासन की पोल खोले रहते हैं।  

            समाज विभिन्न धर्मों और जातियों में बंटा है। तदनुसार तीज-त्योहार मनाएं जाते हैं। होली, दिवाली, दशहरा, छठ, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गुरूनानक जयंती, गुरूगोविन्द सिंह प्रकाशोत्सव, महावीर जयन्ती, झूलेलाल जयंती, ईद, मुहर्रम, बारावफात, शब-ए-बारात, बकरी ईद यहां के मुख्य पर्व हैं। शादी विवाह में खूब धन खर्च किया जाता है। वाराणसी भारत की धार्मिक राजधानी है। यहां पर गंगा उत्तराभिमुख बहती है। नगर के शताधिक घाटों से सटकर बहती हुई सदानीरा पतित पावन गंगा की दशाश्वमेघ घाट पर होनेवाली गंगा आरती दर्शनीय होती है। आये दिन आयोजित कवि सम्मेलन, मुशायरा, संगीत सम्मेलन बनारस को सतत जीवित रखते हैं।  संगीत में गायन, वादन, नृत्य में अपना अलग घराना है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, सम्पूर्णानन्द वाराणसी संस्कृति विश्वविद्यालय सहित दर्जनों संस्थान तथा विभिन्न सम्प्रदायों के मठ एवं संस्कृत तथा अरबी विद्यालय काशी को विद्या का केन्द्र बनाते हैं। बनारस की मस्ती विश्व प्रसिध्द है। होली के अवसर पर होने वाले कवि सम्मेलन तथा रामनगर की रामलीला जिसने नहीं देखी-सुनी उसने कुछ भी नहीं देखा सुना।     

            जौनपुर शेरशाह सूरी की राजधानी थी। शिक्षा का केन्द्र पूर्वांचल विश्वविद्यालय यहीं स्थित है। गोरखपुर विश्व विद्यालय, हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर हास्पिटल एण्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट गोरखपुर, इण्डियन इन्स्टीटयूट ऑफ शुगरकेन रिसर्च-गोरखपुर, इण्डियन इन्स्टीटयूट ऑफ कारपेट टेकनॉलोजी-भदोही, इण्डियन अरेबिक कालेज- वाराणसी, सिध्दार्थ विश्वविघालय-सिध्दार्थ नगर, सेण्ट्रल इन्स्टीटयूट आफ हायर तिब्बतन स्टडीज-वाराणसी, इण्डियन इन्स्टीटयूट आफ हैण्डलूम टेक्नॉलॉजी-वाराणसी आदि अनेक उच्च शिक्षा केन्द्र शिक्षा के क्षेत्र में पूर्वांचल को अग्रणी बनाते हैं।  

            वाराणसी, सारनाथ, कपिलवस्तु, कुशीनगर, गोरखपुर, जौनपुर, मदोही, सीतामाता समाहित स्थल, सोनभद्र फासिल पार्क- सोनभद्र, सिध्दार्थ नगर, आदि पूर्वांचल के पर्यटन स्थल हैं। जहां प्रतिवर्ष पर्यटक आते हैं। पूर्वांचल रेल, सड़क तथा नदियों के मार्गों से देश-विदेश से जुड़ा है। वाराणसी इण्टरनेशनल एयरपोर्ट, गोरखपुर एयरपोर्ट, कुशीनगर एयरपोर्ट, श्रावस्ती एयरपोर्ट पूर्वांचल के हवाई अड्डे हैं।  

            राष्ट्रीय महामार्ग क्रमांक-२, राष्ट्रीय महामार्ग-१९, राष्ट्रीय महामार्ग-२३३ बी, राष्ट्रीय महामार्ग-२८, राष्ट्रीय महामार्ग-२९, राष्ट्रीय महामार्ग ५६, राष्ट्रीय महामार्ग-९७ तथा स्वर्णचतुर्भुज पूर्वांचल से होकर गुजरते हैं।   

            वाराणसी में थलसेना तथा गोरखपुर में नभसेना और थलसेना के बेस हैं। वाराणसी, गोरखपुर क्रमश: उत्तर और पूर्वोत्तर रेलवे के मंडल हैं। इसके अतिरित सुरक्षा हेतु कई स्थलों पर पुलिस एवं पी.ए.सी. के प्रशिक्षण केन्द्र हैं। वाराणसी और गोरखपुर के पहलवान देश-विदेश में अपनी धाक रखते हैं। मिर्जापुर की कजरी सुनकर, वह भी वाराणसी की गिरिजा देवी के कण्ठ से, किस विरहिणी की विरहाग्नि नहीं भड़क उठेगी। बनारस का ईश्वरगंगी मुहल्ला तो संगीताचार्यों का गढ़ है। तबला, सरोद, सितार, सारंगी, बांसुरी, नाल, खोल, मृदंग, पखावज, वायलिन के अनमोल रत्न, बनारस ने दिये हैं। कत्थक नृत्य का बनारसी घराना ही है। शास्त्रीय गायन की हर विधा तथा लोकगीत सुनना हो तो बनारस आइये। बनारस के दशाश्वमेघ घाट पर हर वर्ष ध्रुपद मेला लगता है, जिसमें देशभर के नामी गिरामी ध्रुपद गायक इसमें भाग लेते हैं।  

            सन्त कबीर नगर, गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर की खादी और हैण्डलूम, सन्त रविदास नगर-भदोही की कालीन तथा बनारस की बनारसी साडियों के बिना विश्व वस्त्र व्यापार अधूरा रहेगा। पूर्वांचल को बुध्द, कबीर, शंकराचार्य, रामानन्दाचार्य, बल्लभाचार्य, गोरक्षनाथ, समेत अगणित सन्त महात्माओं ने अपनी पुनीत वाणी से पवित्र किया है। आज संसार इनके मार्ग दर्शन में आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त कर रहा है। प्रात: स्मरणीय महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी का तपोरूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ज्ञान का प्रकाश पुंज बनकर लाखों ज्ञान पिपासुओं को तृप्त कर रहा है।    

            अन्त में विविधता में एकता का एक ही जगह पर दर्शन करना हो तो उसके लिये बस आ जाइये पूर्वांचल में। यहीं पर आपको नदी, घाटी, पहाड़, षड्ऋतु, विश्व के हर देश के लोग, विश्व की सभी संस्कृतियां बोली, भाषा, भोजन के प्रकार रहन-सहन, अच्छे-बुरे सभी एक से एक यहां मिलेंगे; एक साथ एक ही नगर में। ज्ञान-विज्ञान, आध्यात्म, भौतिकता सब कुछ है यहां पर।

  मो. : ९४१५७३७७५९

 

 

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