दशगुरु और शहादत का सिलसिला अतुलनीय

सिख गुरुओं ने स्वयं शहादत देकर आम जन को सत्य एवं संस्कृति के लिए शहीद होने की प्रेरणा दी। आत्म बलिदान की यह अनोखी परम्परा भारतीय संस्कृति की अमूल्य देन और धरोहर है।

गुरु अर्जुन देव की शहादत अतुलनीय है। इतनी हमारे शब्दों में ताकत कहां, हमारी लेखनी में इतना सामर्थ्य कहां कि हम ऐसी रूहानी शक्तियों को शब्दों में बांध सकें। सिर्फ अपने मन के भाव उनके चरणों में अर्पित कर सकते हैं।

मानवता के सच्चे सेवक, धर्म के रक्षक, शांत और गम्भीर स्वभाव के स्वामी गुरु अर्जुन देव अपने युग के सर्वमान्य लोकनायक थे जो दिन-रात संगत की सेवा में लगे रहते थे। उनके मन में सभी धर्मों के प्रति अथाह सम्मान था। श्री गुरु अर्जुन देव के बाद गुरु हरगोबिंद साहिब ने शांति के साथ-साथ हथियारबंद सेना तैयार करनी बेहतर समझी तथा मीरी-पीरी का संकल्प देते हुए श्री अकाल तख्त साहिब की रचना की।

गुरु अर्जुन देव ने सम्पादन भाई गुरदास की सहायता से श्री गुरु ग्रंथ साहिब का सम्पादन किया और रागों के आधार पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित बाणियों का जो वर्गीकरण किया है, उसकी मिसाल मध्यकालीन धार्मिक ग्रंथों में दुर्लभ है। सिख धर्म में सबसे पहली शहीदी पांचवें सिख गुरु अर्जुन देव की हुई। शांति के पुंज, शहीदों के सरताज, अर्जुन देव को मुगल बादशाह जहांगीर ने अकारण ही शहीद कर दिया। अकेला शहीद ही नहीं किया, बल्कि गुरु जी को ऐसी यातनाएं दीं कि सुनकर रूह कांप जाती है। ये यातनाएं अमानवीय थीं। विश्व को ‘सरबत दा भला’ का संदेश देने वाले तथा विश्व में शांति लाने की पहल करने वाले किसी गुरु को यातनाएं देकर शहीद कर देना मुगल साम्राज्य के पतन का भी कारण बना।

श्री गुरु अर्जुन देव का प्रकाश श्री गुरु रामदास जी के गृह में माता भानी जी की कोख से वैशाख बदी 7 सम्वत 1620 यानी  15 अप्रैल 1563 ई. को गोइंदवाल साहिब में हुआ। आप जी का पालन-पोषण गुरु अमरदास जी जैसे गुरु तथा बाबा बुड्ढा जी जैसे महापुरुषों की देख-रेख में हुआ। आप जी बचपन से ही बहुत शांत स्वभाव तथा पूजा भक्ति करने वाले थे। आपके बाल्यकाल में ही गुरु अमरदास जी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक बहुत बाणी की रचना करेगा। गुरु जी ने कहा था ‘दोहता बाणी का बोहेथा’।

गुरु गद्दी सम्भालने के बाद गुरु अर्जुन देव ने लोक भलाई तथा धर्म प्रचार के कामों में तेजी ला दी। आपने गुरु रामदास जी द्वारा शुरू किए गए साझे निर्माण कार्यों को प्राथमिकता दी। नगर अमृतसर में आपने संतोखसर तथा अमृत सरोवरों का काम पूरा करवाकर अमृत सरोवर के बीच हरिमंदिर साहिब जी का निर्माण कराया, जिसका शिलान्यास मुसलमान फकीर साईं मियां मीर जी से करवा कर धर्मनिरपेक्षता का सबूत दिया और अमृतसर शहर आस्था का केंद्र बन गया। आप जी ने नए नगर तरनतारन साहिब, करतारपुर साहिब, छेहर्टा साहिब, श्री हरगोबिंदपुरा आदि बसाए। तरनतारन साहिब में एक विशाल सरोवर का निर्माण कराया जिसके एक तरफ तो गुरुद्वारा साहिब और दूसरी तरफ कुष्ठ रोगियों के लिए एक दवाखाना बनवाया। यह दवाखाना आज तक सुचारु रूप से चल रहा है। सामाजिक कार्य के रूप में गांव-गांव में कुंओं का निर्माण कराया। सुखमणि साहिब की भी रचना की जिसका हर गुरसिख प्रतिदिन पाठ करता है।

गुरु जी ने सदैव ही अपने सिखों को परमात्मा पर हर समय भरोसा रखने तथा सर्व सांझीवालता का संदेश दिया। एक बार सुलही खान, जो मुगल राजा था, गुरु जी पर चढ़ाई करने आ गया। जब संगत को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने गुरु जी को कहा कि कोई पत्र लिखकर सुलही खान को भेजा जाए, जिसमें उसे हमला न करने की सलाह दी गई हो। कुछ लोगों का कहना था कि एक प्रतिनिधिमंडल भेजा जाए, जो उसे सिख धर्म के बारे में बता सके तथा हमला न करने के सम्बंध में राजी कर सके जबकि कुछ अन्य लोगों का कहना था कि सुलही खान का मुकाबला करने के लिए हमें कोई न कोई उपाय करना चाहिए। गुरु अर्जुन देव ने उन्हें समझाते हुए कहा कि उन्हें परमेश्वर पर पूर्ण विश्वास है। इस सम्बंध में आप जी का उच्चारण किया हुआ एक शब्द भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज है।

अकबर की सम्वत 1662 में हुई मौत के बाद उसका पुत्र जहांगीर बादशाह बना तो गुरु जी के भाई पृथ्वी चंद ने उससे नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दीं। जहांगीर गुरु जी की बढ़ती लोकप्रियता को पसंद नहीं करता था। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई कि गुरु अर्जुन देव ने उसके भाई खुसरो की मदद क्यों की। जहांगीर ने अपनी जीवनी ‘तुजके जहांगीरी’ में स्वयं भी लिखा है कि वह गुरु अर्जुन देव की बढ़ रही लोकप्रियता से आहत था, इसलिए उसने गुरु जी को शहीद करने का फैसला कर लिया।

गुरु अर्जुन देव को लाहौर में 30 मई 1606 ई. को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा व सियास्त’ कानून के तहत लोहे की गर्म तवी पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। ‘यासा व सियास्त’ के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद कर दिया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब गुरु जी का शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह से जल गया तो आप जी को ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया, जहां गुरु जी का पावन शरीर आलोप हो गया। जहां आप ज्योति ज्योत समाए उसी स्थान पर लाहौर में रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब (जो अब पाकिस्तान में है) का निर्माण किया गया है।

गुरु अर्जुन देव ने लोगों को विनम्र रहने का संदेश दिया। आप विनम्रता के पुंज थे। कभी भी आपने किसी को भी दुर्वचन नहीं बोले। गुरु अर्जुन देव का संगत को एक और बड़ा संदेश था कि परमेश्वर की रजा में राजी रहना। जब आपको जहांगीर के आदेश पर आग के समान तप रही तवी पर बिठा दिया, उस समय भी आप परमेश्वर का शुक्राना कर रहे थे:

तेरा कीया मीठा लागै॥ हरि नामु पदार्थ नानक मांगै॥

इतना सब कुछ सिर्फ एक रूहानी शक्तियां ही कर सकती हैं जो समय समय पर धरा पर आती हैं और युगों युगों तक कभी न भूलने वाले संदेश दे जाती हैं। ऐसी शहादतों को अपने हृदय की गहराइयों से अश्रु भरी आंखों से नमन करती हूं।

           डॉ पूनम मानिक 

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