गुरु तेग बहादुर: शांति और बलिदान के दूत

नौवें गुरु तेग बहादुर ने समूची मानव जाति को संदेश दिया कि उसी व्यक्ति का जीवन श्रेष्ठ है जो मानव मात्र की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे एवं उसके लिए आत्म बलिदान देने से भी पीछे न रहे। परंतु अत्याचारी के सामने कभी झुके नहीं।

धरम हेत साका जिन किया।

सीस दिया पर सिरड ना दिया॥

गुरु तेग बहादुर का जन्म वैशाख वदी 5, विक्रम संवत 1678 को हुआ था, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 1 अप्रैल 1621 है। वह गुरु हरगोबिंद के पांचवें पुत्र थे, जो उनकी दूसरी पत्नी बीबी नानकी से पैदा हुए थे। उनका जन्म पवित्र शहर अमृतसर में ‘गुरु का महल’ के नाम से जाने वाले घर में हुआ था। बचपन में उनका नाम त्याग मल रखा गया।

त्याग मल को एक गुरु के पुत्र और सिख सिद्धांतों और शिक्षाओं के अनुसार शिक्षा दी गई थी। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में 1632 में माता गुजर से शादी कर ली। माता गुजर को माता गुजरी भी कहा जाता है और बाद में जब उन्होंने अमृत लिया यानी कि खालसा बनने की दीक्षा ली तब वे माता गुजर कौर कहलाईं, उनका पहला पुत्र विवाह के 34 साल बाद पैदा हुआ था जिसका नाम गोविंद रखा गया था। वह पौष सुदी सप्तमी संवत 1723 को पैदा हुआ था, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 दिसम्बर 1666 है। तब तक, त्याग मल को सिखों के नौवें गुरु के रूप में अभिषिक्त किया जा चुका था और उन्हें गुरु तेग बहादुर कहा जाता था।

अपनी पहली पत्नी बीबी दामोदरी से गुरु हरगोबिंद के सबसे बड़े पुत्र भाई गुरदित्त का 15 मार्च 1938 को 24 वर्ष की छोटी उम्र में निधन हो गया। गुरु के दो अन्य पुत्रों, अटल राय और अनी राय की भी शीघ्र ही मृत्यु हो गई। तब गुरु हरगोबिंद ने अपने पोते भाई गुरदित्त के पुत्र हर राय को सिखों के अगले गुरु के रूप में तैयार करना शुरू किया।

कहा जाता है कि बीबी नानकी, उनकी पत्नी और तेग बहादुर की मां, द्वारा उनके फैसले के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि ‘एक दिन उनका बेटा भी गुरु होगा और एक असाधारण बेटा होगा-दोनों न्याय के लिए अपनी लड़ाई के लिए जाने जायेंगे।’ तेग बहादुर 1664 में सिखों के नौवें गुरु के रूप में अभिषिक्त होने तक बीस साल तक बकाला में रहे। वे एकांतवासी थे व निरंतर अपनी साधना में लीन रहते थे, हालांकि उनके पारिवारिक जिम्मेदारियों में भी शामिल होने का ऐतिहासिक प्रमाण है।

गुरु गद्दी यानी कि गुरु की पदवी इस बीच गुरु हर राय से बाल गुरु, गुरु हर कृष्ण के पास चली गयी थी। सिखों के नौवें गुरु के रूप में तेग बहादुर के अभिषेक के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। आठवें गुरु हर कृष्ण चेचक के संक्रमण के कारण मृत्यु शैया पर थे, नौवें गुरु (उत्तराधिकारी) के नाम की घोषणा करते हुए 30 मार्च 1664 को उन्होंने केवल दो शब्द कहे – बाबा बकाला, जिसका अर्थ था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला में मिलेगा। खबर सुनते ही कई ढोंगियों ने बकाला में डेरा जमा लिया।

अगले गुरु के रूप में तेग बहादुर की पहचान एक धनी व्यापारी और गुरु घर के भक्त माखन शाह लबाना द्वारा की गई थी। कहानी कुछ ऐसी है कि एक बार लबाना का जहाज गहरे समुद्र में तूफान में फंस गया था, जान खतरे में पड़ गयी थी। उस समय उन्होंने वादा किया था कि अगर उनकी जान बच जाती है तो वह 500 सोने के सिक्के गुरु के घर जाकर दान करेंगे। तट पर सुरक्षित पहुंचने पर, लबाना ने अपना वादा पूरा करने के लिए ‘बाबा बकाला’ की ओर प्रस्थान किया, जहां उन्हें नौवें गुरु की पदवी के लिए कई दावेदार मिले। उसने असली उत्तराधिकारी की पहचान करने के लिए दो सोने के सिक्के देकर उनमें से प्रत्येक का परीक्षण किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और इस तरह यह साबित कर दिया कि वे ढोंगी थे। वह अंत में तेग बहादुर के पास गया और दो सोने के सिक्के पेश किए, जिस पर गुरु मुस्कुराए, अपना आशीर्वाद दिया और उन्हें बताया कि उन्होंने 500 सोने के सिक्कों का वादा किया था। इस पर लबाना समझ गया कि उसे सच्चा गुरु मिल गया है और उसने सभी लोगों को बताया। तब बुजुर्गों को आभास हुआ कि उनका अगला गुरु कौन था।

अब पंजाब में जो स्वयं गुरु बनने की इच्छा रखते थे, उनके द्वारा गुरु तेग बहादुर का विरोध किया गया इसलिए गुरु ने इस क्षेत्र को छोड़ना बेहतर समझा ताकि चीजों को व्यवस्थित किया जा सके। अपने दौरे में गुरु ने देश के कई क्षेत्रों का दौरा किया और गुरु नानक देव के संदेश का प्रचार किया। सिखी के संदेश के प्रचार के अलावा, उन्होंने बहुत ही गरीब परिस्थितियों में रहने वालों के जीवन को बेहतर बनाने का भी बीड़ा उठाया। उनके प्रयास सफल हुए जब आम जनता में सिख धर्म के प्रति आत्मविश्वास और उत्साह पैदा होने लगा। इस प्रकार गुरु नानक का मिशन पूरा करने में वे सफल रहे। जब वे दिल्ली होते हुए पूर्व की ओर बढ़ रहे थे तब उनके उपदेशों ने मुगलों के कान खड़े कर दिये और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी रिहाई राजा जय सिंह के पुत्र राजा राम सिंह द्वारा करवायी गई थी। राजा जय सिंह उस समय दक्कन में सम्राट औरंगजेब के साथ थे।

गुरु आगरा, इलाहाबाद, बनारस और गया से गुजरे। उस समय तक उनकी पत्नी, माता गुजर गर्भवती थीं और उनके लिए आगे की यात्रा तकलीफदेह थी। इसलिये अक्टूबर 1666 में गुरु तेग बहादुर उत्तर-पूर्व और ढाका (अब बांग्लादेश में) की ओर बढ़े लेकिन अपने परिवार को पटना में पीछे छोड़ गए। ढाका में ही उन्हें पौष, बिक्रम संवत 1723 के महीने के 23वें दिन पटना में अपने बेटे गोविंद के जन्म का समाचार मिला। यह दिन अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 दिसम्बर 1666 है।

तीन साल तक गुरु पटना में रहे। यह वह समय था जब बादशाह औरंगजेब हिंदुओं और सिखों सहित अन्य समुदायों के प्रति तेजी से असहिष्णु होने लगा था। मंदिरों को अपवित्र किया गया और जबरन धर्मांतरण का सहारा लिया गया। कुख्यात धार्मिक कर- जजिया, फिर से लगाया गया। गुरु तेग बहादुर ने औरंगजेब द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के बारे में सुना और धार्मिक संकट के इस समय में अपने समुदाय के साथ रहने के लिए पंजाब वापस जाने का फैसला किया। तदनुसार उनके नेतृत्व में काफिला वापस आनंदपुर साहिब के लिए रवाना हुआ। रास्ते में, जुलाई 1670 में गुरु को आगरा में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन जल्द ही रिहा कर दिया गया। इस समय तक गुरु तेग बहादुर के अनुयायियों की संख्या बढ़ चुकी थी।

औरंगजेब ने पूरे भारत के इस्लामीकरण करने की अपनी महत्वाकांक्षा के अनुसरण में विशेष रूप से काशी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और कश्मीर जैसे पवित्र शहरों से हिंदू पंडितों और ब्राह्मणों को लक्षित करने की रणनीति बनायी। कश्मीर का गवर्नर इफ्तिखार खान सम्राट की इच्छा को लागू करने में विशेष रुचि रखता था। सो अपनी दुष्वृत्ति के चलते उसने वहां रहने वाले (पंडित समुदाय) कश्मीरी पंडितों का जीना दुश्वार कर दिया था व सभी को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करने लगा। जहां बल काम नहीं आया, वहां उसने तरह-तरह के प्रलोभन दिए। पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में हताश कश्मीरी पंडितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मई 1675 में आनंदपुर साहिब में गुरु तेग बहादुर से सम्पर्क किया और उन्हें बचाने के लिए अनुरोध किया। पंडित कृपा राम का परिवार उनके परदादा भाई ब्रह्म दास, जो गुरु नानक के एक समर्पित शिष्य थे, के दिनों से सिख समुदाय से जुड़ा हुआ था।

गुरु तेग बहादुर ने सिख समुदाय के साथ उचित परामर्श के बाद नई दिल्ली में कश्मीरी पंडितों के मामले को शांतिपूर्वक पेश करने का फैसला किया। पंडितों ने तदनुसार अपने राज्यपाल को सूचित किया कि यदि गुरु तेग बहादुर इस्लाम में परिवर्तित हो जाते हैं तो वे सभी भी ऐसा करेंगे। यह संदेश औरंगजेब तक पहुंचाया गया था, जो पहले से ही गुरु से चिढ़ा बैठा था। उसने गुरु द्वारा कश्मीर के पंडितों के समर्थन को अपने अधिकार पर सीधे हमले के रूप में देखा। उसने तुरंत गुरु को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

गुरु के खिलाफ सार्वजनिक अशांति पैदा करने और आनंदपुर साहिब और उसके आसपास कर लगाने का मामला तैयार किया गया था और तदनुसार उन्हें दिल्ली बुलाया गया था। हालांकि, उनके पास सम्मन पहुंचने से पहले गुरु ने पहले ही अपने बेटे गोविंद का नाम सिखों के दसवें गुरु के रूप में रख दिया था और अपने करीबी सहयोगियों के साथ दिल्ली चले गए। यह जून 1675 की बात है। उनके साथ जाने वालों में भाई दयाल दास, भाई सती दास, भाई मति दास, भाई जैता और कुछ अन्य शामिल थे।

पार्टी के दिल्ली पहुंचने से बहुत पहले गुरु को डराने-धमकाने के प्रयास शुरू हो गए थे। रोपड़ के बस्सी पठाना में उन्हें मिर्जा नूर मोहम्मद खान द्वारा हिरासत में लिया गया और प्रताड़ित किया गया। गुरु को एक लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया गया था और उनके साथियों को पिंजरे के बाहर जंजीरों से बांध दिया गया था। उनके अनुयायी उनकी स्थिति से बहुत उत्तेजित थे लेकिन गुरु ने पहले ही सभी सिखों को निर्देश दिया था कि वे शांत रहें, कोई प्रतिरोध न करें, इसलिए कोई कुछ नहीं कर पाया।

चार महीने तक सरहिंद में हिरासत में रखने के बावजूद भी मुगल गुरु को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य नहीं कर पाए, उनका यह प्रयास असफल रहा। मुगल सिखों और उनके गुरु द्वारा दिखाए गए धैर्य से चकित थे। उन्होंने अपनी हार स्वीकार ली और नवम्बर 1675 में उन्हें दिल्ली भेज दिया गया।

दिल्ली पहुंचने पर, गुरु को चांदनी चौक की कोतवाली (पुलिस स्टेशन) में लाया गया और फिर से प्रताड़ित किया गया। उन्हें तीन विकल्प दिए गए थे:

एक- चमत्कार दिखाओ;

दो -इस्लाम को गले लगाओ;

तीन-मरने के लिए तैयार हो जाओ.

गुरु ने तीसरा विकल्प चुना। उन्हें कई प्रलोभन दिए गए पर उन्होंने सभी को ठुकरा दिया था।

कोतवाल और चांदनी चौक के काजी ने तब गुरु के साथियों की नृशंस हत्या को अंजाम देने का फैसला किया, ताकि उन्हें आतंकित करके अधीनता में लाया जा सके। जिस तरह से निष्पादन को अंजाम दिया गया वह मुगल मानकों के हिसाब से भी विशेष रूप से क्रूर था।

पहले भाई जैता को अपमानित करने के लिए आंगन में झाड़ू लगाने के लिए कहा गया। फिर भाई मति दास को आगे बुलाकर इस्लाम कबूल करने को कहा। उन्होंने इनकार कर दिया तो मौत की सजा सुनाई गई। उन्होंने अपने गुरु के सामने सिर झुकाया, उनका आशीर्वाद मांगा और खुद को शहादत के लिए पेश किया। उन्हें एक खम्भे से बांध दिया गया और सिर से नीचे की ओर आरे से धीरे-धीरे दो भागों में काट दिया गया। गुरु अविचलित रहे और अपने पिंजरे में बैठकर भगवान से शांति की प्रार्थना करते रहे।

इसके बाद भाई दयाल दास और भाई सती दास को भी इस्लाम अपनाने का विकल्प दिया गया। उन्होंने इनकार कर दिया और उनकी शहादत के लिए गुरु का आशीर्वाद मांगा। गुरु ने उनके और उनके परिवार के प्रति आजीवन समर्पण के लिए उनकी प्रशंसा की और उन्हें भगवान की इच्छा को अपनाने के लिए कहा। भाई दयाल दास को खौलते हुए तेल की एक बड़ी कड़ाही में फेंक दिया गया और भाई सती दास को रुई में लपेटे हुए खम्भे से बांध कर जिंदा जला दिया गया। इन चौंकाने वाली घटनाओं को गुरु ने शांतिपूर्ण तरीके से देखा और आत्मसात किया। गुरु को हार ना मानता देख मुगल आगबबूला हो उठे और उन्हें फांसी देने का फैसला किया।

ऐसा कहा जाता है कि 11 नवम्बर 1675 को सुबह-सुबह काजी ने गुरु को एक बार और इस्लाम में परिवर्तित होने या चमत्कार करने के लिए कहने के बाद मौत की सजा सुनाई। जलाल-उद-दीन जल्लाद नामक जल्लाद ने अपनी तलवार घुमाई और गुरु का सिर काट दिया गया।

उनके शरीर को एक शिष्य लखी शाह वंजारा, जो पेशे से एक कुम्हार था, ने निकाला था। वह अपनी गाड़ी से गुरु के अवशेषों को अपनी झोपड़ी में ले गया और झोपड़ी को जलाकर उसका अंतिम संस्कार किया; यह जगह गुरुद्वारा रकाब गंज द्वारा चिह्नित है। गुरु के सिर को भाई जैता (रंगरेटा उप-जाति का एक सिख) द्वारा पुनः प्राप्त किया गया था और आनंदपुर साहिब ले जाया गया था जहां नौ वर्षीय गुरु गोविंद सिंह ने दाह संस्कार किया था। जेलर ख्वाजा अब्दुल्ला, एक धर्मपरायण व्यक्ति थे। उन्होंने गुरु की यथासम्भव मदद करने की कोशिश की थी। इस नृशंस घटना के पश्चात उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और आनंदपुर साहिब में रहने चले गये।

गुरु गोविंद सिंह ने दशम ग्रंथ में अपने पिता की शहादत के बारे में नीचे लिखा है-

तिलक जनेऊ राखा परब टका; किन बड़े कुल में शक

सदन होत इति जिनि करि; सीस दिया पर सी न उचेरी

धरम हेत साका जिन किया ; सीस दिया पर सिरड ना दिया

नाटक चेतक किए कुकजा; प्रभ लोगन के अवत लाजा

गुरु तेग बहादुर की शहादत से सिख समुदाय और अन्य समुदायों को भी जबरदस्त झटका लगा। मानव जाति के साथ हो रहे अन्याय के विरोध में अपने प्राणों की आहुति देकर उन्होंने सच्चाई और ईश्वर भक्ति पर आधारित मानवता की एक चिरस्थायी मिसाल कायम की। उन्हीं से सिखों ने कमजोरों और वंचितों के लिए खड़े होना सीखा॥

                                                                                                                                                                                             जयबंस सिंह 

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