पंजाब में आतंकवाद बदनामी सिखों की पर शरारत किसकी?

कई सारे लेखकों ने अपनी किताबों में उल्लेख किया है कि खालिस्तान को लेकर पहली मीटिंग कांगे्रसी नेताओं की सरपरस्ती में हुई लेकिन इसका पूरा लांछन सिखों पर थोप दिया जाता है। इससे बाहर निकलकर देश के अन्य भागों तक सही जानकारी पहुंचना आवश्यक है।

देश में एक समय ऐसा था जब सिख समाज को सामाजिक सुरक्षा की गारंटी था। बस या रेल में कोई सिख सवार हो जाता तो बाकी यात्री निश्चिंत और निर्भय हो सफर करते थे। इतना विश्वास था सिख समाज पर परंतु आज पंजाबी समाज की इसी पहचान पर संकट दिखाई दे रहा है। केवल इतना ही नहीं विदेशों में कई जगहों पर तो पंजाबी व्यक्ति को संदेह की नजरों से देखा जाने लगा है और इसी कारण विदेशी धरती पर इन पर हमले बढ़े हैं। निःसंदेह पंजाब में लगभग डेढ़ दशक तक चला खालिस्तानी आतंकवाद का दौर यहां लोगों की जान-माल के साथ-साथ छवि के लिए घातक सिद्ध हुआ है। आतंकवाद के इस कालखंड ने पंजाबी समाज को बदनाम कर दिया है परंतु सवाल पैदा होता है कि आखिर इसके पीछे किसकी शरारत रही होगी? आतंकवाद के जन्म से मात्र तीस साल पहले 1947 में भारत के लिए जान से प्यारी अपनी धरती, जमीन-जायदाद, दुकान-मकान, खेत-खलिहान, जमे-जमाए कारोबार छोड़कर आने वाले पंजाबियों की छवि बिगाड़ने का जिम्मेदार आखिर कौन है? पंजाब में आतंकवाद के पीछे शरारत किसकी है?

इसकी एतिहासिक पृष्ठभूमि में तर्क दिया जाता है वरिष्ठ अकाली नेता मास्टर तारा सिंह की ‘आजाद पंजाब’ योजना का, जो उन्होंने क्रिफ्स मिशन के समक्ष रखी। इससे पहले कांग्रेस के 31 दिसम्बर, 1929 के लाहौर अधिवेशन की भी बात कही जाती है जिसमें मास्टर तारा सिंह ने ‘आजाद पंजाब’ की मांग रखी। देखने में आया है कि पिछले कई दशकों से इसी ‘आजाद पंजाब योजना’ के आधार पर देश में झूठा विमर्श (नैरेटिव) स्थापित किया गया कि जैसे मुस्लिम लीग ने मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में अलग देश पाकिस्तान की मांग रखी उसी तर्ज पर अकाली नेताओं ने अलग सिख राष्ट्र की मांग पेश की, जिसे आज खालिस्तान बताया जा रहा है।

असल में तथ्य बताते हैं कि मास्टर तारा सिंह ने आजाद पंजाब के लिए ‘आजाद’ शब्द का प्रयोग पंजाब के पुनर्निर्धारण के लिए किया। ‘आजाद पंजाब योजना’ ने पंजाब से मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों को अलग करने का आह्वान किया ताकि एक नया प्रांत बनाया जाए जिसमें सिख जनसंख्या अधिकतम हो। इस योजना में किसी भी तरह से पंजाब को सम्प्रभुता देने की परिकल्पना नहीं  थी। यह देश विभाजन (पाकिस्तान) की योजना का प्रतिकार था।

आजाद पंजाब उस प्रांत को दिया गया नाम था जिसकी परिकल्पना स्टैफोर्ड क्रिप्स को सिख सर्वदलीय समिति के ज्ञापन में की गई थी। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद मार्च 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स नया भारतीय संघ बनाने के उद्देश्य से संवैधानिक प्रस्तावों के साथ भारत पहुंचे। मुस्लिम लीग ने मार्च 1940 में लाहौर में अपने वार्षिक सम्मेलन में घोषणा की कि ब्रिटिश भारत के मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं और मांग की कि एक सम्प्रभु मुस्लिम देश उन क्षेत्रों में गठित किया जाना चाहिए जिनमें मुसलमान बहुसंख्यक हों। पाकिस्तान निर्माण की आशंका ने सिख नेताओं को बहुत परेशान किया, क्योंकि मुस्लिम-हिंदू आधार पर पंजाब के विभाजन से सिख आबादी दो भागों में विभाजित होनी थी। इसीलिए अकालियों ने देश विभाजन की निन्दा की। मास्टर तारा सिंह और ज्ञानी करतार सिंह ने यहां तक घोषणा की कि, ‘उनकी लाशों पर ही पाकिस्तान बन सकता है।’ केन्द्रीय अकाली दल के बाबा खड़ग सिंह ने घोषणा की कि, ‘जब तक एक भी सिख रहेगा तब तक पंजाब में पाकिस्तान नहीं बन सकता।’ कृपाल सिंह मजीठिया ने भी पाकिस्तान का विरोध किया।

मास्टर तारा सिंह ने कहा कि सिख एक कौम हैं, फिर भी एक स्वतंत्र और सम्प्रभु सिख राज्य की मांग करने वाले प्रस्ताव को एक असम्भव मांग के रूप में खारिज कर दिया गया। अकाली नेता उज्जल सिंह और ज्ञानी करतार सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि , ‘आजाद पंजाब’ योजना केवल पाकिस्तान विभाजन का प्रतिक्रम मात्र थी। ‘आजाद पंजाब योजना’ में किसी भी तरह से पंजाब को सम्प्रभुता प्रदान करने की परिकल्पना नहीं की। आजाद शब्द का प्रयोग यह इंगित करने के लिए किया गया था कि पंजाब के क्षेत्रों को इस तरह से पुनर्निर्धारित किया जाना चाहिए ताकि नए प्रांत को आबादी के किसी भी साम्प्रदायिक वर्ग के वर्चस्व से मुक्त किया जा सके।

अकाली दल ने अपने ‘आजाद पंजाब योजना’ के प्रस्ताव के विवरण को समझाते हुए एक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसमें कहा गया कि आजाद पंजाब के सीमांकन से एक प्रांत का निर्माण होगा जिसमें मुस्लिम आबादी केवल 40 प्रतिशत होगी, हिन्दू आबादी 40 प्रतिशत होगी और सिख 20 प्रतिशत होने के कारण दोनों समुदायों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने का काम करेंगे। इसके अलावा, समय के साथ सिख रियासतों को नए प्रांत में मिला दिया जाएगा और इस तरह सिख आबादी को 24 प्रतिशत और इससे भी अधिक तक बढ़ा दिया जाएगा।

रोचक बात है कि बहुत से सिख नेताओं ने आजाद पंजाब योजना का भी विरोध किया किया। उनका मानना था कि इससे देश में अलगाव पैदा होगा। रावलपिंडी डिवीजन के सिखों ने इस योजना को आत्मघाती करार दिया। इसीलिए आजाद पंजाब विरोधी सम्मेलनों का आयोजन रावलपिंडी में विभिन्न स्थानों पर किया गया जिसमें कांग्रेसी नेता बाबा खड़ग सिंह और संत सिंह सबसे आगे थे। रावलपिंडी जिले से शिरोमणि अकाली दल के सात सदस्यों को आजाद पंजाब योजना का विरोध करने के कारण पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

1943 में कई सम्मेलनों में बाबा खड़ग सिंह ने आजाद पंजाब की मांग की आलोचना की। उन्होंने महसूस किया कि पाकिस्तान और आजाद पंजाब के बीच कोई अंतर नहीं और दोनों योजनाओं में देश का विभाजन व भारतीय एकता और अखंडता का विनाश छिपा है। इस पर सफाई देते हुए अकाली दल ने 1943 में एक प्रस्ताव पारित किया। अकालियों ने घोषणा की कि वे मुख्य रूप से अखंड भारत के साथ खड़े हैं और आजाद पंजाब चाहते हैं, अगर पाकिस्तान बनना है तो। किसी भी सिख नेता ने कभी भी एक सम्प्रभु सिख राज्य की मांग नहीं की। आजाद पंजाब की मांग केवल जिन्ना की धर्म के आधार पर पाकिस्तान की मांग का प्रतिकार करने के लिए थी।

आजाद पंजाब योजना ने एक नया राज्य बनाने के लिए पंजाब से मुस्लिम बहुसंख्यक जिलों को अलग करने का प्रस्ताव रखा जिसमें किसी एक समुदाय का बहुमत नहीं था। यह योजना सिख प्रभाव को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार के अधिकार के तहत यमुना और चिनाब नदियों के बीच एक नया प्रांत बनने का इरादा रखती थी। सिख हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के प्रभुत्व से बचना चाहते थे और वे राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी चाहते थे।

इतिहास साक्षी है कि बाद मेें पंजाबी सूबे के नाम पर देश की स्वतंत्रता के बाद पंजाब का विभाजन हुआ। इससे हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया और पंजाब के हिंदी भाषी पहाड़ी जिलों को हिमाचल प्रदेश के साथ जोड़ दिया गया। इसके बाद आज का पंजाब सिख बाहुल्य प्रांत बना हुआ है। देश की राजनीतिक, व्यापारिक, प्रशासनिक, सामाजिक, सामरिक सहित हर तरह की व्यवस्था के संचालन में पंजाब का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दुर्भाग्य की बात है कि जिस अकाली नेता मास्टर तारा सिंह व अन्यों पर अलगाव का ठीकरा फोड़ा जा रहा है वे नितांत देशभक्त पंथक नेता थे जिनके मन में अखंड व अविभक्त भारत की अवधारणा कूट-कूट कर भरी थी। विश्व हिंदू परिषद् की स्थापना 1964 में हुई और इसके संस्थापकों में स्वामी चिन्मयानंद, एसएस आपटे के साथ-साथ मास्टर तारा सिंह भी शामिल थे और पहली बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी भी उपस्थित थे। ऐसे सच्चे नेता मास्टर तारा सिंह द्वारा किए गए कार्यों को अगर खालिस्तान के मूल के रूप में देखा जाए तो यह उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा।

‘बांटो और राज करो’ नीति का फल है खालिस्तान

बीबीसी लंदन के पत्रकार मार्क टुल्ली व सतीश जैकब अपनी पुस्तक ‘अमृतसर – मिसेज गांधी लास्ट बैटल’ के पृष्ठ 60 पर दावा करते हैं कि, ‘इस काम के लिए पंजाब में दल खालसा के नाम से कट्टरवादी संगठन का गठन किया गया। इसकी पहली बैठक चंडीगढ़ के अरोमा होटल में हुई जिसका 600 रुपये का भुगतान ज्ञानी जैल सिंह द्वारा किया गया।’ पत्रकार कुलदीप नैयर की पुस्तक ‘बियांड द लाइन्स – एन ऑटोबायोग्राफी’ के अनुसार, ‘इस संगठन के उद्घाटन समारोह में सिख धर्म की अवधारणा और उसके स्वतंत्र अस्तित्व को जीवित रखने का संकल्प लिया गया। संगठन का राजनीतिक उद्देश्य खालसा का बोलबाला बताया गया।’

एक अन्य पत्रकार जीएस चावला अपनी पुस्तक ‘ब्लडशेड इन पंजाब – अनटोल्ड सागा ऑफ डिसीट एंड सैबोटेज’ में लिखते हैं कि, ‘दल खालसा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने पहले चंडीगढ़ में एक पूर्व कांग्रेसी सांसद के यहां स्टेनोग्राफर की नौकरी की थी। 6 अगस्त, 1978 को चंडीगढ़ के सेक्टर 35 में स्थित गुरुद्वारा श्री अकालगढ़ में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में यह घोषणा की गई कि दल खालसा की स्थापना का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र सिख साम्राज्य (खालिस्तान का नाम नहीं लिया) की स्थापना सुनिश्चित करना है। अगले दिन पंजाब के कई समाचार पत्रों में यह खबर छपी, प्रेस कांफ्रेंस का खर्चा भी पंजाब के कांग्रेसी नेताओं ने उठाया।’

अपनी पुस्तक में मार्क टुल्ली कहते हैं कि, एक कट्टरपंथी व आक्रामक नेता की छवि बनने के बावजूद 1979 के हुए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (अमृतसर) के चुनावों में भिण्डरांवाले द्वारा समर्थित 140 उम्मीदवारों में से केवल 4 ही जीत पाए और दल खालसा समर्थित कोई प्रत्याशी नहीं जीता। इससे साफ है कि न तो उस समय गरम दलीय हथियारबंद नेतृत्व, न ही उदारवादी अकाली नेताओं और न ही आम सिख समाज में खालिस्तान को लेकर कोई आग्रह रहा है। असल में खालिस्तान ‘बांटो और राज करो’ की विषाक्त राजनीति का कड़वा फल है जो आज पंजाबी समाज में कैंसर की भांति पंजे गड़ाने को लालायित है। सभी जानते हैं कि इसको शह मिल रही है पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई सहित अनेक तरह की विदेशी एजेंसियों से। 1972 में भारतीय सेना के हाथों मिली करारी पराजय और बंगलादेश के रूप में विभाजन के जख्म आज भी पाकिस्तान के सीने में हरे हैं, वह खालिस्तान रूपी उस मलहम से अपने घावों का उपचार करना चाहता है जो हमारे ही देश के नेताओं ने तैयार की है। आज अमृतपाल सिंह, गुरपतवंत सिंह पन्नू जैसे लोगों को इन्हीं विदेशी षड्यंत्रकारी शक्तियों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सिख समाज के प्रतिनिधि के रूप में। खालिस्तान के नाम पर उठने वाली हर आवाज को सख्ती से दबाने की जरूरत है, क्योंकि इसका न तो कोई वैचारिक आधार है, न ही यह मुद्दा किसी की भावना से जुड़ा है और न ही इसका कोई जनाधार है।

                                                                                                                                                                                                  राकेश सैन 

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