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अरब और मध्य एशिया से आए सैयदों और तुर्कों/ मंगोलों/ मुगलों ने कश्मीरियों पर राज किया है। महबूबा, उनके साथी और हुर्रियत कांफ्रेंस के लोग सैयद हैं। सैयद सक्रिय और हिंसक अल्पमत हैं। आम कश्मीरी- चाहे हिंदू हो या मुसलमान- बहुमत में हैं; शांति के पक्ष में हैं किंतु मौन हैं। मोदी सरकार आम कश्मीरियों के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। इसके अच्छे परिणाम अवश्य सामने आएंगे।

देश की नई सांविधानिक व्यवस्था में जम्मू-कश्मीर रियासत की भागीदारी अंग्रेजों के चले जाने के लगभग दो महीने बाद 26 अक्टूबर 1947 को हुई। वह भी तब जब रियासत पर कबायलियों के रूप में पाकिस्तानी सेना ने आक्रमण कर दिया और उसके काफ़ी हिस्से पर कब्जा कर लिया। महाराजा ने तब अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए। बाद में इतिहास में यही प्रचारित किया गया कि महाराजा हरि सिंह भारत में शामिल होने के इच्छुक ही नहीं थे और जम्मू-कश्मीर को आजाद देश बनाना चाहते थे।

इसे भारतीय इतिहास की त्रासदी ही कहा जाएगा कि महाराजा ने भी कभी जनता के सामने अपना पक्ष रखने की कोशिश नहीं की। कर्ण सिंह के अपने शब्दों में ही, उन्होंने गरिमापूर्ण मौन धारण कर लिया। उनका एक वक्तव्य सरकार को असहज कर देता। सरकार तो शायद असहज न होती लेकिन हरि सिंह को लेकर दोषारोपण कर रहे लोगों के चेहरे से शायद नक़ाब उतर जाते। शेख अब्दुल्ला ने भी बाद में अपनी आत्मकथा आतिश-ए-चिनार के माध्यम से महाराजा पर और ज्यादा दोषारोपण किया।

इसमें अब कोई शक नहीं कि ब्रिटेन की सरकार हर हालत में जम्मू-कश्मीर रियासत पाकिस्तान को देना चाहती थी। लेकिन उनके दुर्भाग्य से भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के माध्यम से वह केवल ब्रिटिश भारत का विभाजन कर सकती थी, भारतीय रियासतों का नहीं। महाराजा हरि सिंह पर पाकिस्तान में शामिल होने के लिए दबाव डालने के लिए लार्ड माऊंटबेटन 15 अगस्त से दो मास पहले श्रीनगर भी गए थे। महाराजा पाकिस्तान में शामिल होने लिए तैयार नहीं थे और अंतिम दिन तो उन्होंने दबाव से बचने के लिए माऊंटबेटन से मिलने से ही इनकार कर दिया था।

महाराजा कहीं रियासत में भारत की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था स्वीकार न कर लें, इसको रोकने के लिए ब्रिटेन ने पंद्रह अगस्त तक भारत और पाक की सीमा ही घोषित नहीं की और अस्थायी तौर पर गुरदासपुर जिला पाकिस्तान की सीमा में घोषित कर दिया। इस तकनीक के बहाने महाराजा पर पाकिस्तान में शामिल होने के लिए परोक्ष दबाव ही डाला जा रहा था, पर वे इस दबाव में नहीं आए। लेकिन सीमा आयोग की रपट को लार्ड माऊंटबेटन बहुत देर तक तो दबा नहीं सकते थे। जब सीमा आयोग की रपट आई तो शकरगढ़ तहसील को छोड़कर सारा गुरदासपुर ज़िला भारत में था। इस प्रकार जम्मू-कश्मीर रियासत सड़क मार्ग से पूर्वी पंजाब से जुड़ गई। हरि सिंह एक ओर से निश्चिंत हो गए।

इस पृष्ठभूमि में इस प्रश्न पर विचार करना आसान होगा कि महाराजा ने रियासत की सांविधानिक व्यवस्था को देश की नई संघीय सांविधानिक व्यवस्था में समाहित करने में इतनी देर क्यों की? इस मसले पर नेहरू और शेख अब्दुल्ला की भूमिका सामने आती है। ब्रिटिशकाल में रियासतों में कांग्रेस ने अपनी शाखाएं नहीं खोली थीं। इसका एक कारण यह था कि इन रियासतों में शासक भारतीय थे, और कांग्रेस का संघर्ष विदेशी अंग्रेज़ शासकों के ख़िलाफ़ था न कि भारतीय शासकों के ख़िलाफ़। इसके विपरीत मुस्लिम लीग की शाखाएं, मुस्लिम बहुल रियासतों यथा हैदराबाद, भोपाल और जूनागढ़ को छोड़कर शेष जहां तक संभव था, प्राय: प्रत्येक रियासत में थीं। क्योंकि मुस्लिम लीग की लड़ाई विदेशी अंग्रेज़ शासकों के साथ नहीं थी बल्कि उसकी लड़ाई का उद्देश्य भारत में समाप्त हो चुके विदेशी मुग़ल साम्राज्य को पुनः स्थापित करना था। इसलिए रियासतों के हिन्दू राजा उनके निशाने पर थे।

वैसे तो अब्दुल्ला चाहते तो मुस्लिम लीग ही बना सकते थे लेकिन मुस्लिम नेतृत्व को लेकर अब्दुल्ला और जिन्ना में जिस कदर टकराव पैदा हो गया था उसमें यह संभव ही नहीं था। जिन्ना अपने आप को पूरे दक्षिण एशिया के मुस्लमानों का नेता मानने लगे थे। उनकी नज़र में शेख अब्दुल्ला की हैसियत स्थानीय नेता से ज्यादा नहीं थी। ब्रिटिश सरकार भी जिन्ना के पक्ष में ही थी। उधर अब्दुल्ला नेतृत्व में दोयम दर्जा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। लेकिन शेख अब्दुल्ला को डोगरों के खिलाफ़ अपनी इस लड़ाई में किसी न किसी की सहायता तो चाहिए ही थी। जिन्ना के कट्टर विरोधी जवाहर लाल नेहरू से ज्यादा उपयोगी भला इस मामले में और कौन हो सकता था? लेकिन उसके लिए ज़रूरी था कि अब्दुल्ला पंथ निरपेक्ष और समाजवादी प्रगतिवादी शक्ल में नज़र आते।

इस मौके पर साम्यवादी तत्वों की अब्दुल्ला के साथ संवाद रचना महत्वपूर्ण है। साम्यवादी नहीं चाहते थे कि रियासत का भारत में विलय हो। रियासत की सीमा रूस और तिब्बत के साथ लगती है और साम्यवादी पार्टी चीन के साथ मिल कर ही उन दिनों भारत में सशस्त्र क्रांति के सपने देख रही थी। उनकी दृष्टि में इस क्रांति की शुरूआत कश्मीर से ही हो सकती थी। इसके लिए ज़रूरी था या तो कश्मीर आजाद रहता या फिर शेख अब्दुल्ला के कब्जे में, क्योंकि शेख़ अब्दुल्ला का रास्ता भी अंततः आज़ादी की ओर ही खुलता था। तभी साम्यवादियों का क्रांति का सपना पूरा हो सकता था। वैसे भी साम्यवादी पूरे हिन्दोस्तान को िविभन्न राष्ट्रीयताओं का जमावड़ा ही मानते थे और उनका मानना था कि अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों को देश से अलग होने का भी अधिकार है। इसी सोच के चलते वे कश्मीर की आजादी के सबसे बड़े पक्षधर थे। शेख अब्दुल्ला और साम्यवादियों ने इस प्रकार एक दूसरे का प्रयोग अपने-अपने हित के लिए करना शुरू किया। शेख अब्दुल्ला को तो इसका तुरंत लाभ हुया। नेहरू की दृष्टि में अब्दुल्ला समाजवादी बन गए जबकि श्रीनगर की मस्जिद में वे हिन्दुओं के खिलाफ़ पहले की तरह ही जहर उगलते रहे। इस प्रकार जम्मू- कश्मीर में नेहरू, महाराजा हरि सिंह के ख़िलाफ़ शेख़ अब्दुल्ला के जोड़ीदार बने। भारत विभाजन के समय, जम्मू-कश्मीर की सत्ता हथियाने में शेख़ अब्दुल्ला को अपने इस जोड़ीदार से बहुत फायदा हुआ।

भारत विभाजन से कुछ महीने पहले ही कश्मीर की सीमा पर खड़े होकर नेहरू ने कश्मीर के प्रधानमंत्री को संदेश दिया था, तुम्हारा राजा कुछ दिन बाद मेरे पैरों पड़कर गिड़गिड़ाएगा। शायद महाराजा हरि सिंह का कसूर केवल इतना था कि 1931 में ही उन्होंने लंदन में हुई गोल मेज कान्फ्रेंस में ब्रिटेन की सरकार को कह दिया था कि, हम सब भारतीय हैं और भारतीय होने के नाते अपनी जन्मभूमि भारत, जिसने हमें जन्म दिया है और पाला पोसा है, उसके सम्मान के लिए शेष भारतीयों के साथ हैं। उस वक्त वे अपनी रियासत के राजा होने के साथ-साथ एक आम गौरवशाली हिन्दुस्तानी के दिल की आवाज की अभिव्यक्ति भी कर रहे थे।

हरि सिंह ने तो उसी वक्त अप्रत्यक्ष रूप से बता दिया था कि भारत की सीमाएं जम्मू-कश्मीर तक फैली हुई हैं। लेकिन पंडित नेहरू 1947 में भी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। वे अड़े हुए थे कि जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा तभी माना जाएगा जब महाराजा हरि सिंह सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंप देंगे। ऐसा और किसी भी रियासत में नहीं हुआ था। शेख इतनी बड़ी रियासत में, केवल कश्मीर घाटी में सक्रिय थे। वहां भी कश्मीरी भाषा बोलने वाले लोगों में से केवल सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते थे। बिना किसी चुनाव या लोकतांत्रिक पद्धति से शेख को सत्ता सौंप देने का अर्थ, रियासत में एक नई तानाशाही स्थापित करना ही था। नेहरू तो अधिमिलन की बात हरि सिंह की सरकार से करने के लिए ही तैयार नहीं थे। अधिमिलन पर निर्णय लेने के लिए वे केवल शेख को सक्षम मानते थे, जबकि वैधानिक व लोकतांत्रिक दोनों दृष्टियों से यह गलत था। महाराजा इस शर्त को मानने के लिए किसी भी तरह तैयार नहीं थे।

नेहरू का दुराग्रह इस सीमा तक बढ़ा कि उन्होंने अब्दुल्ला की खातिर कश्मीर को भी दांव पर लगा दिया। उस वक़्त रियासती मंत्रालय के सचिव वी.पी.मेनन के अनुसार, हमारे पास उस समय कश्मीर की ओर ध्यान देने का समय ही नहीं था। दिल्ली के पास महाराजा से बात करने का समय ही नहीं था और नेहरू, शेख के सिवा किसी से बात करने को तैयार नहीं थे। शायद इसी अनिर्णय के कारण अफ़वाहें फैलना शुरू हुईं कि महाराजा तो जम्मू-कश्मीर को आज़ाद देश बनाना चाहते हैं।

कहना न होगा कि सरकारी इतिहासकारों ने इन अफ़वाहों को हाथोंहाथ लिया और इसे ही इतिहास घोषित करने में अपना तमाम कौशल लगा दिया। इतना ही नहीं जब पाकिस्तान ने रियासत पर हमला कर दिया और उसका काफ़ी भूभाग क़ब्ज़े में कर लिया तब भी पंडित नेहरू रियासत का अधिमिलन भारत में स्वीकारने के लिऐ तैयार नहीं हुए। उनकी शर्त राष्ट्रीय संकट की इस घड़ी में भी वही थी कि पहले सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौंप दो तभी जम्मू-कश्मीर का भारत से अधिमिलन स्वीकारा जाएगा और सेना भेजी जाएगी। यही कारण था कि महाराजा को अधिमिलन पत्र के साथ अलग से यह भी लिख कर देना पड़ा कि अब्दुल्ला को रियासत का आपातकालीन प्रशासक बनाया जा रहा है। एक बार हाथ में सत्ता आ जाने के बाद उसने क्या-क्या नाच नचाये, यह इतिहास सभी जानते हैं। अब्दुल्ला ने नेहरू के साथ मिल कर महाराजा हरि सिंह को रियासत से ही निष्कासित करवा दिया और मुंबई में गुमनामी के अंधेरे में ही उनकी मृत्यु हुई।

महाराजा हरि सिंह एक साथ तीन-तीन मोर्चों पर अकेले लड़ रहे थे। पहला मोर्चा भारत के गवर्नर जनरल और ब्रिटिश सरकार का था जो उन पर हर तरह से दबाव ही नहीं बल्कि धमका भी रहा था कि रियासत को पाकिस्तान में शामिल करो। दूसरा मोर्चा मुस्लिम कांफ्रेस और पाकिस्तान सरकार का था जो रियासत को पाकिस्तान में शामिल करवाने के लिए महाराजा को बराबर धमका रही थी और जिन्ना 26 अक्टूबर 1947 को ईद श्रीनगर में मनाने की तैयारियों में जुटे हुए थे। तीसरा मोर्चा जवाहर लाल नेहरू और उनके साथियों का था जो रियासत के भारत में अधिमिलन को तब तक रोके हुए थे, जब तक महाराजा शेख के पक्ष में गद्दी छोड़ नहीं देते। नेहरू ने तो यहां तक कहा कि यदि पाकिस्तान श्रीनगर पर भी क़ब्ज़ा कर लेता है तो भी बाद में हम उसको छुड़ा लेंगे, लेकिन जब तक महाराजा शेख की ताजपोशी नहीं कर देते तब तक रियासत का भारत से अधिमिलन नहीं हो सकता।

इसे त्रासदी ही कहा जाएगा, जब महाराजा अकेले इन तीन- तीन मोर्चों पर लड़ रहे थे तो उनका अपना परिवार भी उनके साथ नहीं था। महाराजा हरि सिंह ने माऊंटबेटन के प्रयासों को असफल करते हुए रियासत को भारत में मिलाने के लिए जो संघर्ष किया उसे इतिहास में से मिटाने का प्रयास हो रहा है। लेकिन जम्मू-कश्मीर के संघीय सांविधानिक व्यवस्था का अंग हो जाने से राज्य के इतिहास का एक अध्याय पूरा हुआ।

नेहरू ने लार्ड माऊंटबेटन के जाल में फंस कर दो काम किए जिसके परिणाम आज तक देश भुगत रहा है। पहला, उन्होंने दहाड़ना शुरू कर दिया कि जम्मू-कश्मीर के लोगों की संघीय सांविधानिक व्यवस्था में शामिल होने के विषय में राय ली जाएगी और दूसरा वे सुरक्षा परिषद में यह विवाद लेकर गए कि भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को लेकर विवाद है और सुरक्षा परिषद मध्यस्थता करे। जबकि जम्मू-कश्मीर को लेकर दोनों देशों में कोई विवाद नहीं था।

विभाजन के उपरांत जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र का प्रयोग,  राज्य के तीनों संभागों (शेष दो संभागों गिलगित और बाल्तीस्तान पर पाकिस्तान ने क़ब्ज़ा कर लिया था और नेहरू ने उसे मुक्त करवाना इसलिए जरूरी नहीं समझा क्योंकि वहां के लोग शेख़ की पार्टी से ताल्लुक़ नहीं रखते थे और न ही उसे अपना नेता मानते थे) के लोगों और महाराजा हरि सिंह को साथ लेकर संयुक्त रूप में संवाद के साथ करना चाहिए था। इसमें शेख़ अब्दुल्ला भी एक पात्र होते।

लेकिन नेहरू ने बाक़ी सभी को दरकिनार  कर कश्मीर घाटी के शेख़ अब्दुल्ला के सहारे ही जम्मू-कश्मीर में संवाद रचना की। इससे जम्मू संभाग, लद्दाख संभाग और कश्मीर घाटी के भी वे लोग जो शेख़ अब्दुल्ला की नैशनल कान्फ्रेंस का हिस्सा नहीं थे अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगे। इससे भी बढ़ कर नेहरू कश्मीर संभाग में मुसलमानों को बहुसंख्यक देख कर एक बार फिर तुष्टीकरण के माध्यम से उन्हें प्रसन्न करने के रास्ते पर चल निकले थे।

ध्यान रहे एक बार पहले भी बाबासाहब आंबेडकर ने कांग्रेस को इसी मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते से बचने की सलाह दी थी, क्योंकि इसके परिणाम अशुभ ही निकलते हैं। संवाद हीनता से उपजा यह प्रयोग शेख़ अब्दुल्ला के भीतर केवल तानाशाही प्रवृत्तियां ही नहीं बल्कि स्वतंत्र होने तक की इच्छाएं जगाने लगा था। लेकिन प्रयोग के इस मोड़ तक आते-आते सरदार पटेल की मृत्यु हो चुकी थी, नहीं तो शायद वे ही इसमें कुछ दख़लंदाज़ी करते और प्रयोग को सही दिशा में ले जाकर इसे डूबने से बचा लेते। अधिमिलन के उपरांत, राज्य की राजनीति में यदि महाराजा हरि सिंह को भी नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने लिए नई भूमिका चुन लेने का विकल्प या अवसर दिया होता तो यक़ीनन आज उपस्थित हो रही समस्याओं से बचा जा सकता था।

सन् 1300 में कश्मीर घाटी में पहले सैयद बुलबुल शाह के आने से लेकर वरास्ता सैयद अली हमदानी, सैयद मुफ़्ती मोहम्मद तक की शेष कहानी अरब और मध्य एशिया से आए सैयदों और तुर्कों/मंगोलों/मुगलों द्वारा कश्मीरियों को अपने नियंत्रण में रखने की कथा है। दरअसल सैयद अरब अपने-आप को इस्लाम का झंडाबरदार समझते थे/हैं। वे अपने आप को हज़रत मोहम्मद के नवासों की वंश परम्परा में मानते हैं। हज़रत अली के पुत्रों हसन और हुसैन से सैयदों की वंश परम्परा जुड़ती है। इस कारण इस्लामी जगत में सैयदों का स्थान सर्वोच्च माना जाता है।

भारत की जाति व्यवस्था की पृष्ठभूमि में यदि, इस्लामी जगत में सैयदों की स्थिति को जानना हो तो उन्हें इस्लाम के ब्राह्मण कहा जा सकता है। या कम से कम वे अपने-आप को ऐसा ही मानते हैं। इसलिए इस्लाम में मतांतरित मध्य एशिया के लोग एक प्रकार की पराजित जातियां हैं जिन्हें सैयदों के चरणों में सिजदा करना चाहिए और उनका मज़हबी नेतृत्व स्वीकार करना चाहिए।

कश्मीरियों का दुर्भाग्य यह रहा है कि उनके अपने ही लोग उनको धोखा देते रहे हैं। फिर चाहे वे पन्द्रहवीं शताब्दी के सूहा भट्ट हों, या उन्नीसवीं शताब्दी के मोहम्मद इक़बाल हों या फिर बीसवीं शताब्दी के पंडित जवाहर लाल नेहरू – शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला हों। ये सभी क़समें कश्मीरी अवाम की खाते रहे और कश्मीर घाटी में तुष्टीकरण सैयदों का करते रहे। सैयद कश्मीरियों की इस लड़ाई का लाभ उठा कर सत्ता पर क़ब्ज़ा किए रहे। किसी काल में यह क़ब्ज़ा प्रत्यक्ष था और किसी काल में अप्रत्यक्ष।

एक बार कश्मीरियों और पंजाबियों ने मिल कर कश्मीर घाटी को अफगानों के क़ब्ज़े से मुक्त करवा लिया था लेकिन 1947 के बाद नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला की ग़लत रणनीति के चलते वह फिर सैयदों के क़ब्ज़े में चला गया। 1931 में पूरे कश्मीर में सैयदों की संख्या बारह-तेरह हज़ार थी। 1950 में बढ़ कर मानो बीस हज़ार भी हो गई हो, तब भी 1952 में जम्मू-कश्मीर विधान सभा के लिए हुए चुनावों में कश्मीर घाटी की 45 सीटों में से एक तिहाई सीटों पर सैयदों ने क़ब्ज़ा कर लिया था। आज भी कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के लिए लड़ रही हुर्रियत कान्फ्रेंस पर सैयदों का ही क़ब्ज़ा है।

अब इन सैयदों को वरास्ता पाकिस्तान बाहर से अरबों और तुर्कों की सहायता प्राप्त हो रही है और ये अरब/तुर्क/मुग़ल मिल कर बल से कश्मीरियों को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। आम कश्मीरी चाहे वह हिन्दू-सिख है या मुसलमान है, चाहे वह शिया समाज का है या गुज्जर हैं, सैयदों की इस रणनीति के ख़िलाफ़ है। लेकिन उसका दुर्भाग्य है कि केन्द्र की सरकारें भी कश्मीरियों से बात करने की बजाए कश्मीर में आए हुए सैयदों से बात करती है। वह कश्मीर में बसे तुर्कों और मुग़लों से बात करती है। वह कश्मीरी से, गुज्जर से, पहाड़ी से बात करने को ही तैयार नहीं है।

मोदी सरकार ने यह नीति बदली है। मोदी सरकार को दाद देनी होगी कि कश्मीर में शांति स्थापित करने के लिए उसने तो सैयदों से भी बात की। इस विश्वास के साथ कि इतनी शताब्दियों तक कश्मीरियों के साथ रहते-रहते वे कश्मीर की मिट्टी से जुड़ गए होंगे। केवल इतना ही नहीं कि बल्कि सैयद मुफ़्ती मोहम्मद को मुख्यमंत्री भी बना दिया। उनकी बेटी सैयद महबूबा को भी मुख्यमंत्री बना दिया। सोच यही थी कि शायद सैयद/तुर्क/मुग़ल अंततः कश्मीरियों के हित के लिए सोचेंगे। वे सीमा पार के सैयदों/तुर्कों/मुग़लों के व्यापक अंतरराष्ट्रीय हितों की चिंता नहीं करेंगे। लेकिन वह प्रयोग भी अंततः असफल हो गया। गिलानी गिलान को नहीं छोड़ रहा, हमदानी हमदान को नहीं छोड़ रहा, करमानी करमान को नहीं छोड़ रहा, खुरासानी खुरासान को नहीं छोड़ रहा। बुखारी बुखारा को नहीं छोड़ रहा। अन्द्राबी अन्द्राब को नहीं छोड़ रहा। इतने वर्ष हो गए कश्मीर घाटी में रहते हुए लेकिन कम्बख़्त कोई कश्मीर को नहीं पकड़ रहा। इन गिलानियों अन्द्राबियों ने कश्मीरियों के हिस्से का, कश्मीर घाटी के विकास के लिए लगने वाला करोड़ों रूपया डकार लिया लेकिन डकार तक नहीं लिया। जो कश्मीरी हैं, चाहे वे हिन्दू सिख हैं या मुसलमान कश्मीर में बहुमत में हैं। लेकिन वह मौन बहुमत है। कश्मीरी शांति चाहते हैं। वे मौन बहुमत के प्रतीक हैं। सैयद सक्रिय और हिंसक अल्पमत का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोदी सरकार कश्मीरियों के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। शायद यही कारण है कि आम कश्मीरी कहीं-कहीं साहस के साथ आतंकवादियों के ख़िलाफ़ बोलता दिखाई दे रहा है। आने वाले कुछ सालों में निश्चित ही इसके अच्छे परिणाम दिखाई देंगे।

 

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