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अटलजी में राजनेता, लेखक, कवि, चिंतक का अनूठा और दुर्लभ मिश्रण था। वे जितने भावुक थे उतने ही ‘अटल’ और दृढ़निश्चयी थे। परमाणु विस्फोट और करगिल युद्ध इसकी मिसालें हैं। जनसाधारण में विश्वास और देशभक्ति का अलख जगानेवाले वे अग्रदूत थे। उनके व्यक्तित्व के बारे में केवल इतना कहना ही काफी है कि उनमें भारत की विराटता समाहित थी। अटलजी का जीवन एक अंतर्द्वंद्व और इसके बीच चली विकास यात्रा का स्वाभाविक परिणाम है। उनके इस अंतर्द्वंद को उनकी एक रचना में देखा जा सकता है, जो नवनीत के दिसम्बर 1963 के अंक में ‘राजनीति की रपटीली राह में’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी-
“मेरी सबसे बड़ी भूल है राजनीति में आना इच्छा थी कि कुछ पठन-पाठन करूंगा- उससे जुड़े व्यवसाय की पारिवारिक परंपरा को आगे बढाऊंगा अतीत से कुछ लूंगा और भविष्य को कुछ दे जाऊंगा। परंतु राजनीति की रपटीली राह पर कमाना तो दूर रहा, गांठ की पूंजी भी गंवा बैठा मन की शांति मर गई संतोष समाप्त हो गया एक विचित्र सा खोखलापन जीवन में भर गया। सत्ता का संघर्ष प्रतिपक्षियों से ही नहीं, स्वयं अपने दल वालों से हो रहा है। पद और प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए जोड़-तोड़, सांठ-गांठ आवश्यक है। निर्भीकता और स्पष्टवादिता खतरे से खाली नहीं है। आत्मा को कुचल कर आगे बढ़ा जा सकता है स्पष्ट है, सांप-छछूंदर जैसी स्थिति हो गई है, न निगलते बनता है, न उगलते बनता है।”
जिन्हें अटलजी के भीतर के मनुष्य की थोड़ी-बहुत पहचान है, वे अटलजी की इस त्रासदी को समझ सकते हैं। लेकिन यह अंतर्द्वंद्व ही उन्हें राजनीति में बनाए रखता है। उसीने उन्हें व्यापक मानवीय चेतना से जोड़े रखा है। असल में राजनेता अटलजी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनका कवि होना था। वे मन के इस द्वंद्व के कारण कवि हैं। वर्तमान राजनीति में एक कवि हृदय व्यक्ति का देश की उच्च सत्ता तक पहुंचना महत्वपूर्ण बात है। अटलजी के एक संघ स्वयंसेवक से लेकर प्रधानमंत्री तक का सफर, जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक का प्रवास, एकात्म मानवतावादी, आदर्शवाद के प्रति समर्पित अटलजी का विदेश मंत्री के रूप में विश्व राजनीति के मंच पर उपस्थित होना उनकी कर्मठता का द्योतक है। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय अपने उद्बोधन में यह कहकर उन्होंने कार्यकर्ताओं के मन में विश्वास जगाया था कि ‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा।’ उनका यह विश्वास पूरी तरह खरा उतरा और दो बार भाजपा की सरकार देश में गठित हुई और परिवर्तन की एक बयार चल पड़ी।
अटलजी के बीच मौजूद कवि ने ही उन्हें राजनेता के रूप में इस लम्बी यात्रा में ‘सत्यं, शिवं, सुंदरम्’ के मार्ग से कभी विचलित नहीं होने दिया। राजनेता अटलजी का चेतना से सराबोर व्यक्तित्व, काव्य की ओर से राजनीति को दिया गया एक उपहार ही है। राजनीति काजल की कोठरी होती है और वह इसमें आनेवाले को दागदार बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती। यह स्थिति किसी एक दल की नहीं है, वह तो पूरी दलदल है। लेकिन, आश्चर्य तब होता है जब किसी एकाध नेता की उसके विरोधी तक सराहना करते हैं। अटलजी इस तरह के तेजपुंज हैं।

1939 में अटलजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। 1946 में संघ प्रचारक बने। जब उनसे कहा जाता था कि “आप तो श्रेष्ठ हैं, आपकी मातृसंस्था में गड़ीबड़ी है”; तब उनका जवाब होता था, ‘पेड़ खराब है और फल अच्छा है, यह कभी नहीं हो सकता। मेरे मित्रो! मैं जो कुछ हूं, अपनी मातृसंस्था संघ के कारण हूं।’ इसी संघनिष्ठा के कारण ही उनके हृदय से कविता झंकृत हुई, ‘हिंदू तन मन, हिंदू जीवन; रग-रग हिंदू मेरा परिचय।’ अटलजी के ओजस्वी भाषण न केवल उनके अपने दल के कार्यकर्ताओं को प्रेरित करते थे; बल्कि आम जनमानस को भी प्रभावित करते थे। अटलजी के भाषणों में शालीनता और शब्दों की गरिमा का ऐसा अद्भुत मिश्रण होता था कि विरोधी भी उनके कायल हो जाते थे। उन्होंने सदन में कभी किसी गलत शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। जब अटलजी बोलते थे तब नेहरूजी भी उनके भाषण को बड़े ध्यान से सुनते थे। अपने भाषणों के बारे में अटलजी कहा करते थे कि “मेरे भाषण में मेरा लेखक, कवि मन बोलता है; लेकिन राजनेता भी चुप नहीं रहता। राजनेता लेखक और कवि के समक्ष विचार रखता है। और, मेरे अंदर का वक्ता उन विचारों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करता है। राजनेता और कवि-लेखक का परस्पर समन्वय ही मेरे भाषणों में दिखाई देता है। मेरे अंदर का कवि, राजनेता अटल को मर्यादा का उल्लंघन करने नहीं देता।” वाजपेयीजी की जिव्हा से साक्षात सरस्वती बोलती थी। इसे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी स्वीकार किया था। अत्यंत शालीनता से अपनी बात कहने के लिए, विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेने वाले विराट व्यक्तित्व के स्वामी अटलजी हमेशा जमीन से जुड़े रहे। वे आम जनता की नब्ज खूब जानते थे। वे ऐसी ऊंचाई नहीं चाहते थे जो उन्हें उनकी जड़ों से अलग कर दें। इसीलिए वे कहते थे-
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रूखाई कभी मत देना।
आपातकाल के दौरान लोकतंत्र बंदी बना लिया गया था। 1977 में आम चुनाव में मौका मिलते ही जनता ने इंदिरा गांधी के तानाशाही राजतंत्र को उखाड़ फेंका; लेकिन जनता पार्टी का प्रयोग विफल रहा। कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा और एक वर्ग के वैचारिक ढोंग ने सब चौपट कर दिया। तब अटलजी ही थे, जिन्होंने इसे खुलकर स्वीकार किया-
क्षमा करो बापू, तुम हमको
बचन भंग के हम अपराधी
राजघाट को किया अपावन
मंजिल भूले, यात्रा आधी
जयप्रकाशजी, रखो भरोसा
टूटे सपनों को जोड़ेंगे
चिताभस्म की चिंगारी से
अंधःकार के गढ़ तोड़ेंगे।
और, इतिहास गवाह है, अटलजी के नेतृत्व में बनी सरकार के शासनकाल में महाशक्तियों के दबाव को ठुकराते हुए भारत एक सशक्त परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बना और देश में स्वच्छ और सुशासन की राजनीति का उद्घोष हुआ। अटलजी का कुशल नेतृत्व भारतीय जनता कभी नहीं भूलेगी। मई 1998 में पोखरण में परमाणु विस्फोट और 1999 के मई-जून-जुलाई में करगिल युद्ध के समय अटलजी ने अपनी जबरदस्त इच्छाशक्ति का परिचय दिया। राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानकर महासत्ताओं को नजरअंदाज किया। परमाणु विस्फोट के बाद उठा तूफान देश की प्रभुता पर कोई आंच आए बिना शांत किया तब अटलजी की चमत्कारिक राजनीतिज्ञता से सभी भारतीय चकित रह गए। इसी प्रकार के परमाणु विस्फोट की इंदिरा शासन ने पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन अमेरिका के दबाव के आगे इंदिराजी उसे कर नहीं पाई। इसे अटलजी ने राष्ट्र के हित को सर्वोपरि मानकर कर दिखाया।
अटलजी पाकिस्तान के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्तें रखना चाहते थे; लेकिन पाकिस्तान ने पीठ में खंजर घोंप दिया और भारत पर युद्ध लाद दिया। अटलजी ने इस बार आरपार की लड़ाई लड़ने का निश्चय कर लिया था। करगिल युद्ध में पराजय होते देख पाकिस्तान ने अमेरिका के समक्ष घुटने टेककर बचाने की याचना की। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने अटलजी को चर्चा का निमंत्रण दिया; लेकिन अटलजी ने अमेरिकी राष्ट्रपति का निमंत्रण ठुकरा दिया। किसी समझौते के लिए अटलजी गए ही नहीं। तब अमेरिकी राष्ट्रपति को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री को समझाना पड़ा कि, ‘अब आपका सामना भारत के ऐसे प्रधानमंत्री से है, जो किसी के आगे सिर नहीं झुकाता।’ अंत में पाकिस्तान को करगिल से दुम दबाकर भागना पड़ा। वाशिंगटन में बैठे ‘विश्व के दरोगा’ को भी यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ गई कि सौम्य, मितभाषी, कवि अटलजी वास्तव में एक स्थिर पर्वत की तरह ‘अटल’ और दृढ़निश्चयी हैं।
राजनीतिक जीवन में विफलता से सफलता और शून्य से शिखर तक अनेक अनुभव अटलजी ने प्राप्त किए, लेकिन उन्होंने अपनी वाणी और व्यवहार से कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। कार्यकर्ताओं से वे कहा करते थे कि “हमारी पार्टी कार्यकर्ताओं की पार्टी है। जो नेता हैं वे भी कार्यकर्ता ही हैं। पार्टी के संगठन का कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए कार्य का विभाजन होता है। अलग-अलग दायित्व होते हैं। हम केवल जीत के लिए यहां नहीं हैं; क्योंकि हारजीत तो चलती रहती है, चलती रहेगी। हार हमारा रास्ता नहीं बदल सकती। जीत हमें भटका नहीं सकती। क्योंकि, हम राष्ट्रहित की भट्टी में पकी ईंटें हैं।”
1994 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान प्रदान किया गया। उस समय उन्होंने जो भाषण किया उसका एक-एक शब्द लोकतंत्र और संस्कृति प्रेमी भारतीयों के लिए मील का पत्थर है। उन्होंने कहा था, “मैं अपनी सीमाओं से परिचित हूं। मुझे अपनी कमियों का अहसास है। निर्णायक जनता और सहयोगियों ने अवश्य ही मेरी न्यूनताओं को नजरअंदाज करके मुझे निर्वाचित किया है। यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन करता है। लोकतंत्र कोई 19-20 का खेल नहीं है, लोकतंत्र मूल रूप से एक नैतिक व्यवस्था है। संविधान और कानून का अपना महत्व है; परंतु लोकतंत्र एक ढांचा बनकर रह जाए, एक कर्मकाण्ड में बदल जाए तो कठिनाइयां पैदा होती जाती हैं। लोकतंत्र की प्राणशक्ति घट जाती है। उस प्राणशक्ति को घटने न देना हम सब की जिम्मेदारी है।” यही कारण है कि अटलजी अपने जीवनकाल में एक आश्चर्य बन गए। हर नेता को उसके आचरण से तय हुए मापदण्ड की कसौटी पर तौला जाता है। अटलजी अपनी हर कृति से, कार्य से पूरे विश्व को अपनी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच का परिचय देते थे।
अटलजी राजनीति में आने को अपना अधूरापन मानते थे, लेकिन सच्चाई कुछ अलग ही है। सच्चाई यह है कि वे राजनेता थे, लेखक थे, कवि थे। लेकिन कुल मिलाकर वे स्वयं में अधूरापन अनुभव करते थे। यह सोच उनकी जिंदगी की सच्चाई थी। एक बड़ी पूंजी थी। लेकिन उनकी इसी सोच के कारण अपने को पूरा मानने वाले भी उनके सामने बौने साबित होते थे। अटलजी की यह सोच सिर्फ उनकी विनम्रता नहीं थी, एक ईमानदारी का अहसास थी। उनकी यह सोच देश को एक स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने में जनसाधारण में जो अधूरापन था, उसका संकेत था, चिंतन था। इसी चिंतन को ही वे अपने भाषणों में कवि हृदय की पीड़ा से प्रस्तुत करते थे। इसी कारण देश का आम नागरिक अटलजी की सांसों में अपनी धड़कनों की लय अनुभव करता था। अटलजी के भाषणों, लेखों और कविताओं में कभी क्लिष्टता नहीं थी। पूरी निष्ठा से जनसाधारण से उसकी ही भाषा में संवाद स्थापित करने की यह एक आराधना थी।
जब कभी भारत के पूर्व प्रधानमंत्रियों की सफलता-विफलताओं, उलब्धियों के संदर्भ में विश्लेषण होगा, तब इतिहास में अटलजी का कार्यकर्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक का कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। उन्होंने पं.नेहरू की समाजवादी अर्थव्यवस्था को नरसिंह राव के बाद अंतिम रूप से विदा कर दिया और उदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था के जरिए एक उदयोन्मुख सशक्त भारत की नींव रखी। कवि अटलजी ने अपने चिंतन से देश का चिंतन किया है, जिसके लिए देश अटलजी का सदैव ॠणी रहेगा और भारतामाता के सच्चे सपूत के रूप में उन्हें याद करता रहेगा।

This Post Has 5 Comments

  1. यह लेख वेहद सुंदर है और माननीय अटल जी की बहुआयामी व्यक्तित्व को सादर करता है । उन्हे सविनय श्रध्दांजलि! !

  2. आर्टिकल बेहतरीन है।
    अटल जी को चरणस्पर्श

  3. अमोलजी आप अच्छे व्यक्तिमत्व के लोगोंपर बहुतही अच्छा और सही आर्टिकल लिखते हो !
    अटलजींं केलिए भावपर्ण श्रध्दांजली

  4. बेहद सुंदर, सटीक सारगर्भित लेख,पढ़ने मिला।अमोलजी को बधाई।भविष्य मे इसी तरह के लेख पढ़ने की अपेक्षा ।धन्यवाद….

  5. भारत माता के सच्चे पुत्र को शत शत नमन

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