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“संघ कार्य और विचार सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी बन रहा है, बढ़ रहा है। इसके पीछे मूल हिंदू चिंतन से प्रेरित युगानुकूल परिवर्तनशीलता और ‘लचीली कर्मठता’ ही शायद कारण है। हर चुनौती को अवसर समझ कर उसके अनुरूप प्रशिक्षण तथा संगठनात्मक रचना खड़ी करने की संघ की परम्परा भारत की उसी परम्परा का परिचायक है जो अपने मूल शाश्वत तत्व को बिना छोड़े बाह्य रचना एवं ढांचे में युगानुकूल परिवर्तन करता रहा है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। अपने शाश्वत मूल तत्व को छोड़े बिना कालानुरूप परिवर्तन करना भारत की कहें या हिंदुत्व की परम्परा रही है। इसीलिए हज़ारों वर्षों से, अनेक आक्रमण और आघात झेलने के बाद भी इस समाज के सांस्कृतिक विचार प्रवाह की धारा अविरल चलती रही है।

डॉ. राधाकृष्णन ने कहा है There has been no such thing as a uniform stationary unalterable Hinduism whether in point of belief or practice. Hinduism is a movement, not a position; a process, not a result; a growing tradition, not a fixed revelation. It’s past history encourages us to believe that it will be found equal to any emergency that the future may throw up, whether in the field of thought or of history.

इसी हिंदुत्व के वैचारिक अधिष्ठान पर आधारित होने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 90 से अधिक वर्षों की यात्रा में अपने मूल अधिष्ठान के आधार पर अपने ध्येय को साकार करने के लिए क्रमशः विकसित होते हुए समय के साथ कार्यानुकूल परिवर्तन करता रहा है।

संघ का कार्य राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत सम्पूर्ण समाज का सक्रिय संगठन करना है। सम्पूर्ण समाज की एकता, परस्पर आत्मीयता और निस्वार्थ भाव से समाज के हित में कार्य करने वाले अनुशासित स्वयंसेवकों के द्वारा यह कार्य साकार होता है। ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण करने के लिए नियमित संस्कार जरूरी है। इसके लिए शाखा और उससे जुड़ी कार्यपद्धति विकसित होती गई।

संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार अत्यंत आधुनिक विचार के थे। इसके चलते उन्होंने संघ की कार्य पद्धति में अनेक नई बातों का समावेश किया। हिंदू समाज का संगठन करना है यह स्पष्ट था। संगठन में एकत्व का भाव रहे इसलिए उन्हें गणवेष (Band)  आवश्यक लगा। गणवेष की कल्पना हिंदू समाज में नहीं थी। इसलिए गणवेष की कल्पना पश्चिम की होने के बावजूद उन्होंने संघ में उसे लागू किया। धोती, कुर्ता, टोपी, तिलक, माला, चोटी  ऐसा गणवेष स्वीकारने के स्थान पर कुछ ब्रिटिश सेना सरीखा, उस समय का अत्याधुनिक, गणवेष संघ में स्वीकार हुआ। हिंदू समाज में परेड या क़वायद की परम्परा नहीं थी। किन्तु ब्रिटिश सेना यह करती थी। अनुशासन के लिए यह अच्छा है यह देखकर संघ में यह क़वायद लाई गई, जिसे आज संघ में समता कहते हैं। पहले 15 वर्षों तक इसके लिए सारी आज्ञाएं अंग्रेजी ही हुआ करता थीं, जो 1940 से संस्कृत में आईं। यही बात घोष (Band) और घोष की ताल पर संचलन की है। संघ की कार्यपद्धति में पहला परिवर्तन 1939 के सिंदी की ऐतिहासिक बैठक में आया जो 1940 के शिक्षा वर्ग से लागू किया गया। इसमें हिंदी और मराठी में चली आ रही प्रार्थना संस्कृत में हुई, गणवेष की शर्ट (ख़ाकी से) स़फेद  हुई और समता की आज्ञाएं भी अंग्रेजी से संस्कृत में हुईं।

प्रारम्भ में संघ की प्रतिज्ञा में कहा जाता था-‘हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं।’ भारत के स्वतंत्र होने के बाद प्रतिज्ञा में परिवर्तन करते हुए- ‘हिंदू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं’ कहा जाने लगा।

आरम्भ के 25 वर्षों तक केवल संगठन के लिए संगठन, संगठन के सिवा और कुछ नहीं इसका आग्रह रहता था। परंतु समाज का स्वरूप बहुत व्यामिश्र (मिला-जुला) होता है। उसमें छात्र, किसान, मजदूर, कलाकार, वैज्ञानिक, डॉक्टर, अधिवक्ता, शिक्षविद, सुरक्षा कर्मी, व्यापारी, अन्य कर्मचारी ऐसी अनेक श्रेणियां होती हैं। इसलिए संघ कार्य के लिए आवश्यक नींव निर्माण होने के साथ-साथ 1950 से संघ की योजना से स्वयंसेवक विविध क्षेत्रों में जाकर समाज जीवन के विशिष्ट क्षेत्र में राष्ट्रीय विचारों के आधार पर संगठन खड़ा करने जाने लगे। संघ के क्रमशः विकसित (progressive unfoldment) होने का यह पहला चरण था। विविध क्षेत्र में सक्रिय होने वाले इन स्वयंसेवकों को श्री गुरुजी ने उन क्षेत्रों में- संघ के गटनायक, राजदूत एवं सेनापति- कहा। आज 35 से अधिक संगठनों के माध्यम से स्वयंसेवक शिक्षा, खेती-किसानी, विद्यार्थी वर्ग, श्रम -मज़दूरी, इतिहास, कला, आर्थिक, क्रीड़ा जगत, सहकारिता, आरोग्य, अधिवक्ता, विज्ञान, दिव्यांग, सेवा, सीमा सुरक्षा, सुरक्षा, बौद्धिक आदि अनेक क्षेत्रों में सक्रिय ही नहीं अग्रणी हैं। ये सारे संगठन एक ही राष्ट्रीय विचार से प्रेरित परंतु साथ ही स्वतंत्र और स्वायत्त हैं। ये संगठन संघ का हिस्सा या विंग्स नहीं हैं।

सम्पूर्ण समाज के बारे में असीम आत्मीयता का संस्कार होने के कारण ही हर प्रकार की नैसर्गिक या मानव निर्मित आपदा के समय स्वयंसेवक तत्परता से सेवा कार्य में जुटते रहे हैं। इसीलिए RSS ‘माने Ready for Selfless Service ऐसा संघ के वैचारिक विरोधक भी कहते हैं।

अपने ही समाज का एक बड़ा उपेक्षित, वंचित वर्ग अनेक प्रकार के अभावों से ग्रस्त था। उनके पास जा कर आत्मीयता पूर्वक उसके कष्ट को दूर करने हेतु, डॉक्टर हेडगेवार जन्म शताब्दी के पश्चात (1990 से) ‘सेवा विभाग’ की रचना हुई। संघ कार्य की विकास यात्रा का यह दूसरा चरण था। झुग्गियों में रहने वाले वंचित वर्ग के बंधुओं के बीच स्वयंसेवकों का नियमित सम्पर्क सेवा विभाग के गठन के बाद व्यापक स्तर पर शुरू हुआ। आज स्वयंसेवक अनेक ट्रस्टों के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन, सुरक्षा और संस्कार के क्षेत्र में एक लाख सत्तर हजार से अधिक सेवा प्रकल्प चला रहे हैं।

सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है पर सारा समाज संघस्थान पर, यानि शाखा पर तो नहीं आएगा, उन तक संघ का राष्ट्र निर्माण का विचार और कार्य की जानकारी पहुंचाना और समाज के प्रमुख, प्रभावी सज्जन शक्ति तक संघ के नाते स्वयं पहुंचना आवश्यक था। इस हेतु से, 1994 में प्रचार और सम्पर्क विभाग की रचना हुई॥

प्रारम्भ से ही समाचार पत्रों में संघ की बात कोई देता नहीं था। संघ के प्रति समाचार पत्रों का रुख कुछ भेदभावपूर्ण था (और कह सकते हैं कि इस भेदभाव को राजकीय प्रश्रय भी था)। इसलिए लोगों को और स्वयंसेवकों को भी विभिन्न विषयों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण क्या हो सकता है यह बताने के  लिए 1946 से 1950 के कालखंड में अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, उड़िया, बंगला आदि भाषाओं में साप्ताहिक पत्रिकाएं स्वयंसेवकों ने शुरू कीं। संघ की बात अन्य कोई माध्यम देते नहीं थे, केवल  इन साप्ताहिकों में ही आती थीं। इसलिए लोग इनको संघ का मुखपत्र मानने लगे। वास्तव में संघ का कोई मुखपत्र नहीं है। परंतु 1994 में प्रसार माध्यम का स्वरूप ही बदल गया। उसमें जनसंवाद (Mass communication) यह नया आयाम जुड़ा। तब ‘प्रचार विभाग’ का प्रारम्भ हुआ।

संघ का कार्य लगातार बढ़ रहा था। पर समाज के सभी सज्जन और प्रभावी लोगों तक संघ की सही जानकारी भी नहीं पहुंची थी। वे भी समाज के लिए अनेक अच्छे, रचनात्मक कार्य में लगे थे किन्तु इसके बावजूद संघ का उनसे सम्पर्क नहीं था।(There was no connect)। संघ का लक्ष्य राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करना यह है। यह कार्य स्वयंसेवक ही तो नहीं करेंगे। समाज की सज्जन और सक्रिय शक्ति का साथ लेकर ही यह सम्भव है। इसलिए समाज के हित में सक्रिय ऐसी इस सज्जन शक्ति का संघ से और संघ का इस  सज्जन शक्ति से परिचय बढ़ाने की दृष्टि से ‘सम्पर्क विभाग’ की शुरुआत भी इसी वर्ष हुई।

संघ की बढ़ती शक्ति और स्वयंसेवक संख्या को ध्यान में रखकर कुछ विशेष कार्यों में समाज की सहायता से स्वयंसेवकों की विशेष सक्रियता हो यह आवश्यक लगा। इस दृष्टि से स्वयंसेवक कुछ चुने हुए सामाजिक कार्यों में सघनतापूर्वक (1995 से) सक्रिय हुए।  इन कार्यों को ‘गतिविधि’ कहा गया।

ध्यान आया कि किसी कारण अनिच्छा से सामूहिक कन्वर्जन  का शिकार हुए अनेक लोगों में अपनी मूल परम्परा के विषय में आस्था भी है और वे फिर अपने ’घर’ वापस भी आना चाहते हैं।  इसलिए हिंदू समाज के जिस वर्ग से वे कन्वर्ट हुए थे उस समाज का भी इन्हें स्वीकारने के लिए मानस बने और ‘घर’ वापस आने के बाद उनकी ठीक सामाजिक व्यवस्था करना इस दृष्टि से ‘धर्मजगारण’  गतिविधि का आरम्भ हुआ।

राज्य पर आश्रित ना रहकर अपने ही संकल्प और परिश्रम से अपने गांव का विकास हम कर सकते हैं ऐसा विश्वास जगाकर संकल्प, योजना, प्रयास और परिणाम तक यात्रा आरम्भ करने हेतु ‘ग्रामीण विकास’ की गतिविधि शुरू हुई। आज 550 ग्रामों में विकास के प्रत्यक्ष परिणाम दिख रहे हैं। आसपास के गांव के लोग यहां  आकर यह परिवर्तन प्रत्यक्ष देख आते हैं और अपने गांव में भी वैसा करने का प्रयास करते दिखते हैं। इसके अलावा क़रीब 1000 ग्रामों में भी स्वयंसेवक इस दिशा में सक्रिय हुए हैं और इसका परिणाम भी दिख रहा है।

अस्पृश्यता जैसे कलंक के कारण जातिभेद का व्यवहार समाज में दिखता है यह अत्यंत वेदनादायक है। इस भेदभाव को दूर करना अत्यंत आवश्यक है। इस भेदभाव का लाभ लेने हेतु कुछ राजनैतिक शक्तियां समाज में विद्वेष फैलाने का कार्य करती दिखती हैं जिससे समाज का सामंजस्य बिगड़ता है। इन कुरीतियों को दूर कर समाज की मूलभूत एकता को जागृत करने के लिए ‘सामाजिक समरसता’ की गतिविधि शुरू हुई है।

देशी नस्ल की गाय का वैज्ञानिक और औषधीय महत्व समझाते हुए भारतीय कृषि को गौ आधारित बनाने से किसानों के अनेक प्रश्न हल हो सकते हैं। ऐसे अनेक प्रयोग सफल हुए हैं। इस हेतु गौ संवर्धन, जागरण, प्रशिक्षण और प्रयोग करने के लिए ‘गौ संवर्धन’ यह गतिविधि चल रही है। भारत में 1000 से अधिक नई गौ शालाएं और गौ अनुसंधान के साथ अनेक प्रयोग शालाएं शुरू हुई हैं।

तंत्रज्ञान और विज्ञान की प्रगति के साथ जीने के साधन और सुविधाएं तो बढ़ रही हैं पर परिवारों में आपसी संवाद कम हो रहा है, तनाव बढ़ रहा है, मनुष्यों के बीच सम्बंधों का क्षरण हो रहा है, परिवार व्यवस्था की आधारशिला आत्मीयता का अनुभव कम हो रहा है और परिवारों के सामाजिक दायित्व का विस्मरण होता दिख रहा है। भौतिकतावाद का प्रभाव बढ़ने से मानवीय मूल्यों का ह्रास होता दिख रहा है। इसलिए ‘कुटुम्ब प्रबोधन’ यह गतिविधि भी समाज की सहायता से स्वयंसेवक चला रहे हैं।

समाज परिवर्तन के किसी ना किसी कार्य में स्वयंसेवक सक्रिय होकर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति का वाहक (Carrier) स्वयंसेवक बने यह संघ का आग्रह रहा है। सतत विकसनशील (progressively unfolding) ऐसा संघ कार्य करने के लिए सबसे आवश्यक कार्य यानी शाखा के माध्यम से व्यक्ति निर्माण का कार्य अविरत चलते रहना। इसलिए भी संघ में कुछ वर्षों से जागरण और संगठन श्रेणी की रचना हुई है। समाज जागरण और परिवर्तन के कार्य में समाज का साथ लेकर अधिकाधिक स्वयंसेवक सक्रिय हों इस हेतु जागरण श्रेणी (सेवा, सम्पर्क और प्रचार विभाग) और व्यक्ति निर्माण के कार्य को अधिक सघन बनाने हेतु संगठन श्रेणी (शारीरिक, बौद्धिक और व्यवस्था विभाग) ऐसा कार्य विभाजन है।

व्यक्ति निर्माण में दैनिक शाखा का विशेष महत्व है। इसलिए दैनिक शाखा का आग्रह भी है। सम्पूर्ण भारत में 58000 दैनिक शाखाएं हैं। परंतु संघ कार्य का दायरा अधिक व्यापक करने की दृष्टि से साप्ताहिक मिलन और विशेषता ग्रामीण क्षेत्र में मासिक मिलन (संघ मंडली) के माध्यम से संघ का विस्तार बढ़ाने का प्रयास चल रहा है। नई पीढ़ी टेक्नॉलजी का अधिक उपयोग करती है इस कारण वह वैश्विक संदर्भ में भी अपने बारे में, अपनी सांस्कृतिक पहचान के बारे में अधिक जागृत और जिज्ञासु हो रही है। वह अपनी सांस्कृतिक, राष्ट्रीय पहचान के बारे में अधिक जानना चाहती है, उसके बारे में गौरव अनुभव करना चाहती है, इस हेतु टेक्नॉलोजी का सुयोग्य उपयोग करते हुए अधिकाधिक युवकों से सम्पर्क और संवाद रखने हेतु वेबसाइट (www.rss.org http://www.rss.org/ – 80K followers per month) ़फेसबुक (rssorg – 55 L likes), ट्विटर (Twitter rssorg – 10 L followers) आदि माध्यमों का उपयोग भी समुचित मात्रा में हो रहा है। नए बदलते परिप्रेक्ष्य में, समाज में संघ की बढ़ती स्वीकृति, अपेक्षा और कार्य करने की अनुकूलता को ध्यान में रखकर, मूल तत्व को क़ायम रखते हुए, नए-नए प्रयोग करने की प्रयोगशीलता बढ़ाने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए संघ शिक्षा वर्गों द्वारा होने वाले नियमित प्रशिक्षण के बावजूद ज़िला तथा विभाग स्तर के कार्यकर्ताओं के क्षमता विकास हेतु ‘कार्यकर्ता विकास वर्ग’ और प्रांत तथा क्षेत्र स्तर के कार्यकर्ता के लिए पांच दिवसीय ‘योजक वर्गों’ की भी रचना हुई है।

हर चुनौती को अवसर समझ कर उसके अनुरूप प्रशिक्षण तथा संगठनात्मक रचना खड़ी करने की संघ की परम्परा भारत की उसी परम्परा का परिचायक है जो अपने मूल शाश्वत तत्व को बिना छोड़े बाह्य रचना एवं ढांचे में युगानुकूल परिवर्तन करता रहा है। हिंदू जीवन मूल विचार और मूल्यों को क़ायम रखते हुए जिस तरह कालानुरूप आविष्कृत होता रहा है, वैसे ही संघ संघकार्य का है। संघ की 92 वर्ष की यात्रा में अनेक चढ़ाव उतार आए। विरोध, दुष्प्रचार, कुठाराघात के अनेक प्रयास हुए। इन सबके बावजूद संघ कार्य और विचार सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी बन रहा है, बढ़ रहा है। इसके पीछे मूल हिंदू चिंतन से प्रेरित युगानुकूल परिवर्तनशीलता और ‘लचीली कर्मठता’ ही शायद कारण है।

 

This Post Has 2 Comments

  1. अच्छा है। संघ का राजनीतिक दृष्टिकोण का भी समावेश हो सकता था क्या। अच्छी विस्तृत जानकारी है। अभिनन्दन।

  2. बहोत ही ऊत्साह वर्धक.

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