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“कुछेक गज की साड़ी में कितना कुछ समाया  होता है! बचपन में मां का आंचल, बड़े होने पर मां की साड़ियां पहनकर एक सौंदर्य रमणा स्त्री दिखने की इच्छा, और वक्त के बीतते, किसी के नाम की साड़ी पहनना, सजना- संवरना, और फिर जीवन का सबसे खूबसूरत पल- किसी नन्हीं सी जान को अपनी इसी साड़ी के आंचल से सुरक्षित रखना, बिल्कुल जैसे मां किया करती थीं…”

मां मुझे आंचल में छुपा ले, सीने से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं…, एक ऐसा गीत जिसने भारतीय सिने जगत को कलात्मकता का एक अनमोल उपहार तो प्रदान किया ही साथ ही दर्शाया भारतीय संस्कृति में पूजनीय स्थान पर विराजमान एक मां के आंचल के उस प्रभाव को जिसकी छांव मात्र से ही व्यक्ति के सभी दुःख स्वत: ही विलीन हो जाते हैं।

छायावादी कवियों की कल्पना हो या किसी शायर की शायरी, किसी प्रेमी के स्वप्न हों या रमणीयता की बात हो- स्त्री का सौंदर्य सदा साड़ी के साथ ही निखर कर आया है। कहते हैं कि इस छह गज के कपड़े ने जिस भी स्त्री का तन ढांका है वह केवल सौंदर्य रमणा ही हो कर उभरी है।

बिना किसी भेदभाव के हर कद- काठी, हर रंग-रूप, हर नैन- नक्श की स्त्री को शिष्टता का मधुर आवरण देती है साड़ी। सादगी भी है इसमें और कमनीयता भी। और मासूमियत? मासूमियत कैसे भूल सकते हैं। छोटी- छोटी बेटियां जब जीवन में पहली बार श्रृंगार की ओर झुकती हैं तो सर्वप्रथम साड़ी को ही अपने तन पर लपेटने का प्रयास करती हैं। फिर चाहे वो कोई दुपट्टा ही क्यों न हो जिसे साड़ी के समान लपेट कर फिर वे अपने  माता-पिता के समक्ष इठला के चलती हैं।

शायद यही कारण है कि साड़ी को भारतीय स्त्री का प्रथम आभूषण जैसा गुरुत्व प्राप्त है।

भारत में साड़ियों का महत्व केवल स्त्रियों के पसंदीदा परिधान के रूप में ही नहीं है; वरन हमारे धर्म और संस्कृति को परिलक्षित करते परिधान के रूप में भी इसे सहेजा और संवारा जाता रहा है।

मर्यादा सूचक के रूप में भी इसका विशेष महत्व है।

पौराणिक ग्रंथ महाभारत में भी साड़ी का उल्लेख इसी संबंध में किया गया है। कथानुसार, जब धर्मराज युधिष्ठिर अपनी  पत्नी को जुए में हार गए तब दुःशासन ने पांडवों को अपमानित करने के लिए उनकी पत्नी द्रौपदी के चीरहरण की ठानी और इन्द्रप्रस्थ की भरी सभा में उनकी साड़ी खींचने लगा, शायद यही सोचकर कि छह गज के एक साधारण कपड़े का थान कब तक एक स्त्री के सम्मान को बचा पाएगा लेकिन द्रौपदी के शरीर से वह साड़ी तब तक लिपटी रही जब तक दुःशासन ने हार नहीं मान ली। पांडव पत्नी द्रौपदी के चीरहरण प्रसंग में साड़ी के माध्यम से ही उनकी मान और मर्यादा को श्रीकृष्ण ने सुरक्षित किया।

एक हिल स्टेशन में लगभग एक माह पूर्व, कुछ फिरंगी स्त्रियों से मुलाकात हुई। रूसी महिलाएं थीं और क्षेत्र के प्रतिष्ठित मठ को देखने के लिए विशेष रूप से वहां पधारी थीं। गेरुए रंग की साड़ियों में इतना फब रहीं थीं कि प्रशंसा किए बिना मैं रह न सकी। और साथ ही उनको ये भी बताया मैंने कि इस मठ में परिधानों पर कोई ऐसी पाबंदी नहीं है कि उन्हें विवशतावश भारतीय साड़ी पहननी पड़े। पूछने पर कि यही परिधान क्यों चुना उन्होंने यहां भजन संध्या में सम्मिलित होने के लिए, तो उन्होंने कुछ इतना सुंदर तर्क दिया कि साड़ी जैसे परिधान के विषय में उनकी जानकारी पर अवाक रह गई मैं। उनमें से लरीसा नाम की  महिला ने  बताया कि साड़ी का उल्लेख पहले भारतीय वेदों में हुआ। और सबसे पहले इस शब्द का उल्लेख यजुर्वेद में पाया गया है। अन्य स्थानों पर यह भी कहा गया कि किसी पूजा या धार्मिक क्रिया में स्त्री की उपस्थिति इस परिधान में होनी चाहिए। तभी से स्त्री का साड़ी पहनना भारत देश की परंपरा बन गई। आज एक भारतीय मठ में सम्मिलित होने आए तो सोचा साड़ी ही पहन कर जाना सही होगा।

ऐसा नहीं था कि मैं इस जानकारी से अनभिज्ञ थी, बात सिर्फ इतनी थी कि किसी ग़ैर भारतीय मूल की महिला का इस परिधान साड़ी के प्रति आकर्षण देखते ही बन रहा था।

भारत की यह एक विशेष बात है कि एक देश में जहां हर प्रांत में भाषाएं रस्मों-रिवाज, खानपान, हर चीज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर बदल जाती है, वहीं, हज़ारों मील की दूरी तय करने पर भी स्त्री के लिए साड़ी का महत्व नहीं बदलता और न ही बदलता है साड़ियों के प्रति उसका आकर्षण और बहुत सी साड़ियां अपनी अलमारी में एकत्रित करने का उसका लालच।

जन्म से लेकर मृत्यु तक एक वस्त्र में लिपटा मानव भले ही साड़ी पहनने के अलग- अलग तरीके ढूंढ लेता है, लेकिन उसे बुनने वाला एक ही तरह से बुनता है- स्नेह और कल्पनाओं के मिश्रण से-  चटकीले- सादे रंग; फूल- पत्ती; बादल- पक्षी; पंछी- चेहरे; जीवन दर्शन – प्रभु सानिध्य और ऐसा बहुत कुछ- बस सजावट अलग हो जाती है, वही, राज्यों की स्थितियों, परंपराओ और मूल्यों के अनुकूल।

भिन्न भौगोलिक स्थितियों और पारंपरिक मूल्यों के चलते साड़ी पहनने के तरीके भी प्रांत-प्रांत में भिन्न हो जाते हैं। कई बार तो साड़ी पहनने के तरीकों में भिन्नता व्यक्तिगत रुचि के अनुसार भी बदलती रहती है। और फिर निकल आती हैं ये लुभावनी शैलियां या कहें ’स्टाइल्स’ – बंगाली स्टाइल, महाराष्ट्रीयन् स्टाइल, सीधा पल्लू स्टाइल, उल्टा पल्लू स्टाइल, फ्री पल्लू स्टाइल, बटरफ्लाई स्टाइल, लहंगा स्टाइल और ऐसीे अनगिनत शैलियां जिन्होंने स्त्री के सौंदर्य और शालीनता को ऐसे परिभाषित किया है कि केवल भारत ही नहीं विदेशों में भी एक गरिमामय, आकर्षक और लोकप्रिय परिधान के रूप में साड़ी की एक अपनी सशक्त पहचान बन गई है।और यह भारतीय परंपरा का प्रतिनिधित्व भी करने लगी है।

दीपिका पादुकोण जैसी प्रख्यात भारतीय अभिनेत्री का ’कॉन फिल्म फेस्टिवल’ में साड़ी पहनकर रेड कारपेट पर चलना इस बात का सजीव उदाहरण है।

फ़िल्म अभिनेत्रियों का साड़ी से विशेष लगाव अन्य माध्यमों से भी खूब खिलकर झलका है, विशेष, उनके विवाह चित्रों से। जहां अक्सर लड़कियां अपने विवाह समारोह में लहंगा ओढ़नी में नजर आती हैं वहीं ऐश्वर्या राय बच्चन, शिल्पा शेट्टी कुन्द्रा जैसी दिग्गज अभिनेत्रियां अपनी शादी में नजर आईं बेहद क़ीमती साड़ियों में।

प्रसिद्ध उद्योगपति घराने की नीता अंबानी ने तो एक विवाह समारोह में चालीस लाख रुपये की साड़ी विशेष डिज़ाइन करवा के पहनी। चेन्नई के कांचीपुरम की 36 महिला कारीगरों ने यह साड़ी बनाई। आठ किलो की इस साड़ी को  बनाने में पूरा एक साल लगा था। यह साड़ी हाथों से बनायी गई थी और इसमें बिल्कुल भी मशीन का इस्तेमाल नहीं हुआ। यह भारत के मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा की पेटिंग से प्रेरित थी, साड़ी की कढ़ाई के लिए सोने के तारों, हीरा, एमराल्ड, रूबी, पुखराज, टोपाज, पर्ल, कैट आईज और कोरल का भी प्रयोग किया गया।  हीरे, पन्ने, मोतियों इत्यादि से की गई इसकी बेहतरीन कारीगरी ने इस साड़ी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करवाया और इसे एक ख़ास नाम भी दिया गया ’विवाह-पातु’।

कुछ अन्य अभिनेत्रियों एवं महिला राजनीतिज्ञों ने तो साड़ी को ही अपना सिग्नेचर स्टाइल बना लिया है। जिसमें हर दिल अज़ीज़ अभिनेत्री रेखा और नए दौर की अदाकारा विद्या बालन, सोनिया गांधी का नाम टॉप पर है।

यहां तक कि भारतीय सिने जगत की मशहूर अदाकारा मुमताज़ के एक प्रसिद्ध गीत में उनके द्वारा एक अदभुत शैली में पहनी गई साड़ी तो ’मुमताज़ स्टाइल’ के नाम से ही चर्चित हो गई।

विभिन्न शैलियों की बात हो रही है तो फिर भारतीय स्त्री की सबसे पसंदीदा साड़ियों में कांजीवरम का नाम शीर्ष पर ही रहता है। बनारसी, पटोला और हकोबा साड़ी भी कमतर नहीं। इनके अतिरिक्त मध्यप्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, उड़ीसा की बोमकई, महाराष्ट्र की पैठणी, पश्चिम बंगाल की बालूछरी एवं कांथा टंगैल, सर, रेशमी साड़ियां, राजस्थानी बंधेज, दिल्ली की रेशमी साड़ियां, आदि प्रसिद्ध साड़ियां हैं जो विभिन्न राज्यों की पहचान हैं।

भारतीय महिलाओं की पसंदीदा साड़ियों में तमिलनाडु की कांजीवरम, गुजरात की पटोला और उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी मुख्य हैं। और इनकी खास मौकों के अनुसार खास पहचान भी है।

जैसे, बनारसी साड़ी को विवाह आदि शुभ अवसरों पर हिन्दू स्त्रियों द्वारा पहना जाता है। रेशम की साड़ियों पर बुनाई के संग जरी के डिज़ाइन मिलाकर तैयार रेशमी साड़ी भी बनारसी रेशमी साड़ी के नाम से प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के चंदौली, बनारस, जौनपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर में बनारसी साड़ियां बनाई जाती हैं।

मुख्य रूप से महाराष्ट्र राज्य में पहनी जाने वाली साड़ी को महाराष्ट्रियन पैठणी साड़ी कहा जाता है। महाराष्ट्र का पैठण शहर इसे बुनने के लिए प्रसिद्ध है। मध्य प्रदेश के महेश्वर में स्त्रियों द्वारा प्रमुख रूप से पहनी जाने वाली साड़ी है महेश्वरी साड़ी। ये दोनों ही  सूती और रेशमी बनाई जाती हैं।

हथकरघे से बनी गुजरात की पटोला साड़ी में बहुत ही महीन काम किया जाता है। रेशम से बनी इस साड़ी को वेजिटेबल डाई या कलर डाई किया जाता है। हालांकि यह कला अब लुप्त होती जा रही है।

पटोला की तरह लुभावनी चन्देरी साड़ी भी हथकरघे पर ही बुनी जाती हैं। इन साड़ियों का अलग ही एक इतिहास है। क्योंकि पहले सिर्फ राजघरानों की महिलाएं ही ये साड़ियां पहना करती थीं, हालांकि आज स्थिति बदल गई है और साधारण घरों की महिलाएं भी इसे पहन रही हैं।

प्रारम्भ से ही बहुत ही समृद्ध रहा है भारतीय साड़ियों का खजाना। भारतीय साड़ियां, फिर भले ही वे किसी भी क्षेत्र या राज्य का प्रतिनिधित्व क्यों न करती हों, अपने कलात्मक पक्ष और गुणवत्ता के कारण मानव आविष्कार का सबसे अदभुत उपहार मानी जाती हैं।

कैसा  मधुर विरोधाभास है, साड़ी सबसे अधिक पुरानी पोशाक है और सबसे अधिक ़फैशन में है। घर में पूजा हो या बाहर किसी मंदिर जाना हो, बर्थडे पार्टी हो या शादी, हर ख़ास मौके पर साड़ी ही याद आती है। कभी- कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि किसी पोशाक का क्रेज़ सालों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी समान रूप से कैसे बरकरार रह सकता है। लेकिन ऐसा हुआ है। साड़ी जितनी प्यारी दादी को है उतनी ही प्यारी मेरी बहन की बेटी को भी।

प्राचीन भारत में साड़ी की लंबाई करीबन नौ गज की हुआ करती थी, आधुनिक दौर में ये लंबाई घट कर पांच से छह गज की हो गईं हैं लेकिन इनके प्रति क्रेज़ उस दौर से अब तक समान रूप से बना हुआ है। वैसे हैरानगी भी है साड़ी की लोकप्रियता पर, क्योंकि आजकल के दौर में जहां भोजन भी ’इन्सटेन्ट कुकिंग पैकेट्स’ में मिल रहा है, वहीं पांच से छह गज की साड़ी पहनने के लिए हर स्त्री लालायित रहती है और मौका जितना खास हो, उतना ही दृढ़ होकर बढ़ती है हर स्त्री की साड़ी पहनने की चाहत।

साड़ी पहनना अपने आप में एक जटिल कार्य भी है। बड़े अभ्यास की ज़रूरत होती है इसे सलीके से पहनने के लिए। इसलिए जो महिलाएं केवल कुछ खास मौकों पर ही साड़ी पहनती हैं उन्हें तैयार होने में समय भी अधिक लगता है। शायद इसलिए बहुत से जोक्स के माध्यम से पुरूषों के व्यंग्य का शिकार होती रही हैं महिलाएं। लेकिन फिर भी देखिए, साड़ी से ये अद्भुत जुड़ाव, ये लगाव हर व्यंग्य सहकर भी पूर्ण उत्साह संग जीवित है, केवल साड़ी के लिए समर्पित प्रेम की बुनियाद पर। और इसी प्रेम के मद्देनज़र, आजकल, स्त्री और  साड़ी के इस बंधन को कष्टमुक्त करने के लिए, अब साड़ी डिज़ाइनर्स ने भांति-भांति की रेडीमेड साड़ियां भी बना डाली हैं, जिनको बिना किसी परेशानी के मिनटों में पहना जा सकता है ।

साड़ी पहनना ही क्यों! साड़ी की ख़रीददारी भी किसी त्यौहार की तैयारी से कम नहीं होती। आज भी सबसे ज़्यादा समय बाजार में साड़ी चुनने में ही लगता है। सबसे अधिक वैरायटी में उपलब्ध एक यही परिधान है।

बिन सिया ये कपड़े का थान एक कैनवास की तरह ही होता है जिस पर हर बुनने वाला जीवन का एक नया चित्र बना देता है। साड़ी पर सजी हर तस्वीर के माध्यम से, जैसे नारी स्वप्न से नारी मन तक की सभी संवेदनाओं को उकेर कर रख देते हैं साड़ी बुनने वाले। तभी तो साड़ियों को बदल- बदल कर पहनने की तलब पैदा कर पाते हैं ये महिलाओं के हृदय में। और तभी बढ़ती जाती है अपने व्यक्तिगत कलेक्शन में विभिन्न प्रकार की डिजाइन और टेक्सचर की साड़ियां जमा करने की स्त्री की अविरल इच्छा।

यूं तो आधुनिक समाज में ऐसे बहुत से एक्टिविस्ट हैं जो साड़ी को एक परंपरागत असहजता और कामुकता से भरा परिधान मानते हैं। उनकी दलीलों में असहजता और कामुकता जैसे शब्दों का प्रयोग बार- बार होता है, केवल ये दर्शाने के लिए कि साड़ी पूर्ण रूप से एक स्त्री के शरीर को ढांकने में असमर्थ है। स्वाभाविक है कि आजकल की तेज़ दौड़ती जीवनशैली में शायद कभी असहजता का सामना भी करना पड़ा हो, लेकिन, स्वाभाविक यह भी है कि नारी का सौंदर्य एक मां, एक बहन, एक बेटी,एक पत्नी और एक स्वप्नसुंदरी के रूप में सर्वाधिक साड़ी में ही प्रस्तुत भी हुआ है और सफल भी। ऐसी अभूतपूर्व सुन्दरता कि मानो कल्पनाओं से निकलती स्त्री के अभिन्न नामों की कोई मूरत सजीव हो उठे।

यदि बाजार सर्वे किया जाए तो निश्चित ही यह बात साफ हो जाएगी कि बच्चों और पुरूषों को भी महिलाएं साड़ियों में अधिक आकर्षक लगती हैं। साड़ी की एक भारतीय परिधान के रूप में अपनी एक अलग ही अदा है और जो ग्लैमर साड़ी एक स्त्री को देती है वह कोई और पोशाक नहीं दे सकती। बल्कि साड़ी से उपजी इसी अदा के लिए ही ’देसी गर्ल’ जैसा ख़िताब भारतीय महिलाओं के लिए आज विश्वस्तर पर प्रयुक्त हो रहा है।

साड़ी भले ही मनुष्य के अनगिनत परिधानों में से मात्र एक पोशाक ही है, लेकिन इसके अस्तित्व से भारतीय महिलाओं का, भारत की बेटियों का एक अटूट नाता है, जो समय- समय पर लोगों के समक्ष आ ही जाता है।

बचपन में साड़ियां ढूंढ़ कर उससे  टेन्ट हॉउस बनाना, उसमें सोना बेहद सुख देता है। ऐसे जैसे उससे सुरक्षित, उससे ख़ूबसूरत घर पूरे ब्रह्मांड में कहीं न हो। कभी सभी सहेलियों का साड़ी को दोनों छोर से पकड़ कर, कस के तान कर ज़ोर- ज़ोर से हिला कर  कहना – ’अपनी- अपनी नाव बचाओ समुंदर में लहरें तेज़ हैं’। कभी साड़ी को घर की चौखट पर बांधकर उसका झूला बनाकर झूलना और कभी साड़ी पहनकर टीचर-टीचर खेलना।

कभी कुछ गलती करने के बाद, पिताजी की फटकार के डर से मां के पल्लू के पीछे छिप जाना। कभी बार- बार डांट खाकर भी न सुधरना, भोजन से पहले मां के उसी सुरक्षा कवच जैसे पल्लू से, अपनी वह तांबे की थाली साफ करना और भोजन के बाद फिर उसी पल्लू से मुंह पोंछ कर भागते हुए मां से दूर निकल जाना।

फिर जब अपने बड़े होने का प्रथम एहसास हो तो मां की साड़ियां पहनकर एक सौंदर्य रमणा स्त्री दिखने की इच्छा, और वक्त के बीतते, किसी के नाम की साड़ी पहनना, सजना- संवरना, और फिर जीवन का सबसे खूबसूरत पल- किसी नन्हीं सी जान को अपनी इसी साड़ी के आंचल से सुरक्षित रखना, बिल्कुल जैसे मां किया करती थीं…कुछेक गज की साड़ी में कितना कुछ समाया  होता है।

साड़ी शब्द में तो जैसे सारा का सारा जीवन सुख ही सिमट आता है मेरा और शायद आपका भी!

This Post Has One Comment

  1. भारतीय परंपराओं को रूढ़ि का नाम देकर विद्रुपित कर दिया गया जबकि वैदिक काल से ऋषि मनीषियों ने अनुभव, आवश्यकता व विज्ञान के आधार पर समस्त रचना की थी जो सदैव प्रासांगिक है।
    सुंदर आलेख, साधौ साधौ

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