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ग्राम विकास’ शब्द आजकल सभी ओर छाया हुआ है। भारत गांवों का देश होने के कारण यदि गांवों का विकास होगा तो देश का विकास अपने आप होगा ऐसी संकल्पना महात्मा गांधी ने पिछली सदी में रखी थी। ग्राम विकास की संकल्पना पर उनकी ‘ग्रामस्वराज’ यह पुस्तक प्रसिद्ध है।
महात्मा गांधी ने केवल ग्रामोदय का विचार ही नहीं किया वरन् उन्होंने कुछ प्रयोग भी किए। ‘गांव की ओर चलें’ यह महात्मा गांधी का मंत्र था। महात्मा गांधी के समान ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज ने ग्राम विकास का विचार अपनी अपनी दृष्टि से रखा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज के विचारों से महात्मा गांधी के विचार आगे अधिक विकसित होते हुए दिखते हैं। ‘ग्रामगीता’ के माध्यम से तुकडोजी महाराज ने उसे तत्वज्ञान एवं अध्यात्म से जोड़ा।
इस पार्श्वभूमि में डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ‘शहर की ओर चलो’ संदेश देते हैं। ऐसा नही है कि ‘गांव की ओर चलें’ एवं ‘शहर की ओर चले’ इन दो परस्पर विरोधी विचारों के कारण महात्मा गांधी एवं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर में मतभेद हैं। वरन् इन दो महापुरुषों की समाज की ओर देखने की दृष्टि अलग-अलग है। यही उनका फर्क है और इसीसे दो अलग- अलग घोषणाओं का जन्म हुआ। दोनों को ही अंत में ‘व्यक्ति’ का कल्याण करना था। अंतर केवल इतना था कि महात्मा गांधी अपनी कृति, अपने विचारों के लिए धर्म का आधार खोज रहे थे तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर तत्कालीन समाज व्यवस्था का विचार कर एवं उस समाज व्यवस्था में परिवर्तन लाने हेतु ‘व्यक्ति’ के रूप में सम्मान प्राप्त हो इस उद्देश्य से ‘शहर की ओर चलो’ का मंत्र दे रहे थे।
‘शहर की ओर चलो’ इस संदेश के पीछे समाज जीवन की वास्तविकता क्या है? गांव में अस्पृश्य बंधु कैसे जीवन व्यतीत करते हैं? सवर्ण हिंदू अपने ही बंधुओं से कैसा व्यवहार करते हैं? इसकी एक सूची ही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने बनाई है। वह कुछ इस प्रकार है-
१) सवर्ण बस्ती से दूर अलग बस्ती में अस्पृश्यों को रहना चाहिए।
२) सवर्ण हिंदुओं से अस्पृश्यों को एक निश्चित अंतर रखना चाहिए, जिससे उनका स्पर्श या छाया सवर्णों पर न पड़े।
३) किसी भी प्रकार की संपत्ति अस्पृश्य धारण न करें।
४) अस्पृश्यों को पक्के छत के घर नहीं बनाने चाहिए।
५) अस्पृश्य साफ कपड़े एवं मूल्यवान गहने न पहनें।
६) अस्पृश्यों को अपने बच्चों के नाम ऐसे रखने चाहिए कि उन नामों के लेते समय ‘तिरस्कार’ प्रकट होता हो।
७) सवर्ण हिंदुओं के सामने कुर्सी पर ना बैठे।
८) अस्पृष्य न घोड़े पर बैठे न ही पालकी में बैठे।
९) किसी प्रकार की शोकयात्रा अस्पृश्य गांव मेंं ना निकालें।
१०) सवर्णों को अस्पृश्यों ने नमन करना ही चाहिए।
११) अस्पृश्य संस्कृत भाषा ना बोलें।
१२) सवर्णों द्वारा घोषित ‘पवित्र’ दिन अस्पृश्य गांव में प्रवेश ना करें।
१३) सवर्ण हिंदुओं को अस्पृश्यों का नीच स्थान पहचान में आए ऐसी ही उनकी जीवन पद्धति हो।
इसके अलावा अस्पृश्यों को सवर्णों के लिए कुछ काम करना अनिवार्य थे। ये कुछ इस प्रकार हैं-
१) सवर्ण हिंदू के घर में यदि कोई मृत्यु होती है या कोई शादी-ब्याह है तो उसकी सूचना सवर्ण हिंदुओं के रिश्तेदारों को दूसरे गांवों में जाकर देना- भले वे गांव कितने भी दूर हो।
२) सवर्ण लड़की यदि अपने पिता के घर से पति के घर जा रही है तो अस्पृश्य का उसके साथ जाना आवश्यक है।
३) शादी-ब्याह के समय सवर्णों के घर में उनके द्वारा दिया गया या कहा गया काम अस्पृश्यों को करना ही है।
४) होली, दशहरा एवं इसी प्रकार के अन्य त्योहार जब सवर्ण मनाएंगे तो उनमें बेगारी अस्पृश्यों को करनी होगी।
५) सवर्ण हिंदुओं के विशेष समारोह में अश्लील कार्यक्रमों हेतु अस्पृश्यों के घर की महिलाएं अस्पृश्य समाज भेजें।
ये सारे काम अस्पृश्यों को बिना किसी परिश्रमिक से करने होते थे।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने ऐसी समाज व्यवस्था का अध्ययन कर कहा, ‘‘हिंदू समाज व्यवस्था में अस्पृश्यों के अधिकारों का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। सवर्ण हिंन्दुओं की याचना कर उनसे जो कुछ मिले उसी पर अपना जीवन चलाना होता था। हिन्दू समाज व्यवस्था में स्पृश्य यह स्पृश्य तो अस्पृश्य यह अस्पृश्य ही रहेगा। गुलामी की अपेक्षा अस्पृश्यता अधिक खराब तो है ही परंतु गुलामी से तुलना करते समय वह अधिक क्रूर है।
इस सारी वास्तविकता का एक वाक्य में सारांश याने अस्पृश्य को व्यक्ति के रूप में जीने का कोई भी अधिकार, कोई भी स्वतंत्रता ग्राम व्यवस्था में नहीं थी। अस्पृश्य ये हमारे गुलाम हैं, उन्हें मन, मत या स्वाभिमान नहीं है। अत: उनका जैसा चाहे शोषण कर सकते हैं यह मानसिकता समाज में निर्माण हो गई थी। इस परिस्थिति को बदलने के लिए किसी ठोस मार्ग का अवंलब आवश्यक था। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने अलग-अलग प्रकार से ये मार्ग बताए। उसमें पहला मार्ग था, ‘शहर की ओर चलो’। शहर की ओर ही क्यों? यह प्रश्न अनेकों कें मन में उठ सकता है। उसके कई कारण हैं। पहली बात याने शहर में जीवनयापन के कई अवसर मिलते हैं। पुरानी बातें भूल कर नवीन जीवन आरंभ किया जा सकता है। छोटे गांव में जाति, धर्म, कर्म के आधार पर पहचान प्रस्थापित हो जाती है। इसके विपरीत शहर की स्थिति होती है। शहर में इस प्रकार की कोई भी व्यवस्था नहीं होती है। इसके कारण गांव में अपनी दीनता, दु:ख छोड़ कर शहर में नए सिरे से अपना जीवन प्रारंभ करने की संभावना अधिक रहती है। पारंपारिक परंतु गये-गुजरे समझे जाने वाले अपने उद्योग बंद कर शहर में नए कला-कौशल को आत्मसात कर उसके आधार पर नवीन जीवन की रचना की जा सकती है, सम्मान, संपत्ति की प्राप्ति की जा सकती है।
गांव की समाज व्यवस्था अन्यायकारक है और उसे बदलने का डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने दूसरा मार्ग दिया वह याने ‘पढो, संगठित हो एवं सघर्ष करो’। शिक्षा व्यक्तिगत एवं सामाजिक उन्नति का मार्ग है। इसके कारण शिक्षा ग्रहण करनी ही चाहिए। यह डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का आग्रह था। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जिस स्वतंत्रता, बंधुता एवं समता का आग्रह रखते थे, वह व्यवहार में भी प्रगट हो इसका खास ध्यान रखते थे। महिलाओं का सम्मान एवं उनकी उन्नति बाबासाहब की आस्था का विषय था। सन १९१६ में कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत उनके शोध प्रबंध ‘भारतीय जाति वास्तव एवं महिलाओं पर बंधन’ विषय पर उन्होंने गहराई से प्रकाश डाला था। उन्होंने सिद्ध किया कि बाल विवाह, विधवा विवाह बंदी, सती, केशवपन ये सारे बंधन जाति व्यवस्था से उत्पन्न हुए हैं। उनका कहना था कि जाति निर्मूलन ही स्त्री-पुरुष भेद मिटाने का, समता निर्माण करने का राजमार्ग है।
महाड में सपंन्न हुई परिषद में महिलाओं के समक्ष बोलते हुए डॉ. बाबासाहब ने कहा था,‘‘घरबार की समस्याएं जिस प्रकार स्त्री-पुरुष मिल कर सुलझाते हैं, उसी प्रकार समाज की समस्याएं भी मिलजुल कर सुलझाएं। आप सभी को पुराने रीति-रिवाज व कुप्रथाएं छोड़ देना चाहिए। सवर्णों की महिलाएं जिस प्रकार नौगजी साड़ियां पहनती हैं उस तरीके से आपने भी पहनने का रिवाज चलाना चाहिए। गहना पहनना है तो सोने का ही पहनें अन्यथा न पहनें। इसी प्रकार अपने बर्ताव में भी सतर्कता बरतें, आप घर की गृहलक्ष्मी हैं। घर में कोई भी अमंगल बात न हो इसकी चिंता आपको करना है। आने वाली पीढ़ी को यदि सुधारना है तो लड़कियों को शिक्षा अवश्य दें।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए एक नियम ही रखा था कि उनके कार्यक्रम में यदि आना है तो घर की महिला को लेकर ही आना होगा। उसके सिवाय कार्यक्रम में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का दृढविश्वास था कि स्त्रियों की सहभागिता के बिना समाज परिवर्तन का आंदोलन सफल नहीं हो सकता। समाज परिवर्तन करना है तो पहले घर में परिवर्तन करना होगा। घर में सब की मानसिकता एक जैसी होनी चाहिए। २० जुलाई १९४२ को बाबासाहब ने एक भाषण में कहा था, ‘‘आप अपने बच्चों को पढाएं। उनके मन में महत्वाकांक्षा उत्पन्न करें। वे सामाजिक रूप से बड़े होने वाले हैं ऐसा उनके मन पर संस्कार करें। उनके मन से हीनता की भावना निकालें। शादी की जल्दी न करें। शादी याने जिम्मेदारी है। शादी के कारण उत्पन्न होने वाली आर्थिक जबाबदारी निबाहने लायक आर्थिक दृष्टि से सक्षम हुए बिना बच्चों पर शादी न लादें। जो शादी करें उसे यह ध्यान रखना है कि ज्यादा बच्चे पैदा करना अपराध है। अपने बचपन में जो हमें नहीं मिला उससे अधिक अपने बच्चों को देना यह मां-बाप का कर्तव्य है। सबसे महत्वपूर्ण याने शादीशुदा प्रत्येक स्त्री पति की मित्र बन कर उनके कार्य में सहयोग करें। पत्नी का दर्जा पति के बराबर है। वह गुलाम नहीं है। ’’
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के उपरोक्त वाक्यों को पढ़ने के बाद आप पूछेंगे कि ‘शहर की ओर चलो’ इस संदेश और उपरोक्त वाक्यों का क्या संबंध? बहुत निकट का संबंध है और वह एक शब्द में यदि बताना है तो उसे ‘आधुनिकता’यह भी कह सकते हैं। आधुनिक विचार, आधुनिक आचार इन्हें स्वीकार कर, जीवन में उतार कर जीवन का दु:ख एवं गरीबी दूर हो सकती है। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को यही बताना था। ‘शहर की ओर चलो’ कहते हुए उन्होंने आधुनिकता पर जोर दिया। शिक्षा, उद्योग एवं आर्थिक दृष्टि से प्रगति के सारे मार्गों का अनुसरण करने का सुझाव देते हुए उस मार्ग पर आगे बढ़ने को कहा। आधुनिक जीवन में विश्व भर में जिन बातों को मान्यता मिली वे याने समता, स्वतंत्रता एवं बंधुभाव ये अपने आचरण में आन चाहिए। ऐसा आचरण करना याने ही आधुनिक होना है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने ‘शहर की ओर चलो’ इस संदेश के माध्यम से केवल ग्रामीण जीवन की वास्तविकता को ही अधोरेखित नहीं किया है वरन् उसे बदलने का मार्ग भी बताया है। अंधश्रद्धा, कर्मकांड, कुप्रथाएं, पुरातन परंपराएं इन्हें दूर कर आधुनिक मूल्यों के आधार पर जीवनयापन करना याने शहर की ओर जाना है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा प्रतिपादित वास्तविक परिस्थिति में मनुष्य के रूप में जीवनयापन नहीं कर सकता था। उस परिस्थिति में मनुष्य यह मूल्य ही मान्य नही था। गुलाम से भी नीचे के दर्जे का बर्ताव करने वाले गांव की अपेक्षा आधुनिक मूल्यों के माध्यम से मानवता को प्रस्थापित करने वाले शहरी विचार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को अधिक प्रिय थे और इसलिए उन्होंने ‘शहर की ओर चलो’ यह
संदेश दिया। गांव में उपेक्षित जीवन जीने की अपेक्षा महानगर में आकर स्वत: की नई पहचान निर्माण की जा सकती है। स्वत: की क्षमता सिद्ध की जा सकती है। उसमें से विकास का मार्ग भी निकल सकता है। यह आज हम अनुभव कर रहे हैं। गांव और शहर में विकास का अंतर भले ही कम हो रहा हो फिर भी गांव छोड़ कर शहर में आने वालों की संख्या आज भी बहुत है। इसीसे डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की दूरदृष्टि हमारे ध्यान में आती है।

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