मुंबई के उपनगर अँधेरी में रा.स्व.संघ का कार्य खड़ा करने में महती भूमिका निभाने वाले सुरेश देवरुखकर जी का देहावसान हो गया. हिंदी विवेक मासिक पत्रिका की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि
हिंदी विवेक मासिक पत्रिका के द्वारा अँधेरी संघ कार्य पर चरैवेति -चरैवेति ग्रन्थ प्रकाशित किया गया है. इस ग्रन्थ में सुरेश देवरुखकर जी पर आलेख प्रकाशित है, जिसमें उनके संघ कार्य पर प्रकाश डाला गया है.
| साहसी स्वयंसेवक : सुरेश देवरुखकर
लगभग 1979 के आसपास बिमल केडिया जी के मार्गदर्शन में वैकुंठ पार्क में शाखा प्रारम्भ की गई थी। शुरू के कुछ दिनों में सभी मिलकर खूब खेलते थे। एक दिन शाखा में खेल शुरू थे तब एक मोहम्मद नाम का युवक वहां आया और धमकी देने लगा- उसने कहा, यहां खेलना बंद करो। कल से यहां शाखा नहीं चलनी चाहिए, वरना जो भी यहां दिखेगा, उसका हाथ-पैर तोड़ दूंगा। उस समय वहां उपस्थित स्वयंसेवक कॉलेज के विद्यार्थी थे। वह सब सीधे सुरेश देवरुखकर जी के पास पहुंचे, जो मूनलाइट शॉपिंग सेंटर के पास रहते थे। उन्होंने स्वयंसेवकों की बात सुनकर कहा- चिंता मत करो। अगले दिन लगभग 70-80 स्वयंसेवकों के साथ शाखा में पहुंचे। सुरेश जी अपने साथ लगभग 20 हिंदू युवकों को लेकर आए थे, जो गुंदवली और आसपास के परिसर में मारामारी करने में प्रसिद्ध थे। यह देखकर मोहम्मद डर गया और फिर कभी सामने आने का साहस नहीं कर पाया। इस प्रकार वहां की शाखा निर्बाध रूप से चलने लगी। जहां भी संघर्ष या टकराव की स्थिति आती, सुरेश देवरुखकर हमेशा सबसे आगे खड़े रहते थे। वे स्वयंसेवकों की सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहते थे। एक बार नित्यानंद नगर में गरबा का भव्य आयोजन हुआ। बड़ी संख्या में लोग आए थे, तब शिवसेना के कुछ कार्यकर्ताओं ने धमकी दी कि वे कार्यक्रम होने नहीं देंगे। यह सूचना मिलते ही सुरेश देवरुखकर रोज कार्यक्रम स्थल पर आकर बैठने लगे। उनके रहते हुए 9 दिनों का गरबा उत्सव बिना किसी व्यवधान के सफलतापूर्वक और आनंदपूर्वक सम्पन्न हुआ। उस समय अंधेरी-कुर्ला रोड क्षेत्र में सुरेश का इतना प्रभाव था कि कोई उनसे उलझने की हिम्मत नहीं करता था। पूर्व विधायक रमेश मोरे जैसे कई कार्यकर्ता भी कभी-कभी सुरेश के घर पर रहते थे। उस समय उन्हें क्षेत्र का सबसे साहसी और शौर्यवान स्वयंसेवक माना जाता था। वे रोज शाखा में आएं या न आएं, लेकिन उनका हृदय हमेशा संघ के लिए ही धड़कता था। संघ का नाम या कोई भी संघ कार्य सामने आते ही वे पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े हो जाते थे। सुरेश देवरुखकर के घर में संघ के स्वयंसेवकों का नित्य सम्पर्क रहता था। संघ की अनेक बैठकें सुरेश देवरुखकर के घर में होती थी। रमेश पतंगे अपने बाल अवस्था में उनके घर में जाकर पढ़ाई करते थे। रमेश मोरे जो भविष्य में शिवसेना के विधायक हो गए थे वे भी सुरेश देवरुखकर के कारण संघ से जुड़ गए थे। आयु के 75 वर्ष पूर्ण करने के बाद भी सुरेश देवरुखकर पिछले वर्ष सम्पन्न हुए पथ संचलन में पूर्ण गणवेश में उपस्थित थे। |
