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सुनने में आया है कि लखनऊ में शामे अवध की शान गोमती नदी को लंदन की टेम्स नदी की तरह संवारा जाएगा। महानगर में आठ किलो मीटर के बहाव मार्ग को घाघरा और शारदा नहर से जोड़ कर नदी को सदानीरा बनाया जाएगा। साथ ही इसके सभी घाट व तटों को चमकाया जाएगा। इस पर खर्च आएगा ‘महज ’ छह सौ करोड़। पूर्व में भी गोमती को पावन बनाने पर कोई ३०० करोड़ खर्च हुए थे, लेकिन इसकी निचली लहर में बीओडी की मात्रा तयशुदा मानक से चार गुणा ज्यादा जहरीली ही रही। इससे पहले कॉमनवेल्थ खेलों के पहले दिल्ली में यमुना तट को भी टेम्स की तरह सुदर बनाने का सपना दिया गया था, नदी तो और मैली हो गई। हां, जहां नदी का पानी बहना था, वहां कॉमनवेल्थ गेम विलेज, अक्षरधाम मंदिर और ऐसे ही कई निर्माण कर दिए गए। कैसी विडंबना है कि जिस देश का समाज, सभ्यता, संस्कृति, पर्व, जीवकोपार्जन, संस्कार, सभी कुछ नदियों के तट पर विकसित हुआ और उसी पर निर्भर रही है, वहां की हर छोटी-बड़ी नदी अब कूड़ा ढोने का वाहन बन कर रह गई है।
हमारे देश में १३ बड़े, ४५ मध्यम और ५५ लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है, जहां से पानी बह कर नदियों में आता है। इसमें हिमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र २० हजार वर्ग किलोमीटर से बड़ा होता है, उन्हें बड़ा नदी जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। २० हजार से दो हजार वर्ग किलोमीटर वाले को मध्यम, दो हजार से कम वाले को लघु जल ग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। इस मापदंड के अनुसार गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, पेन्नार, माही, ब्राह्मणी, महानदी, और साबरमती बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां- गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमालय के हिमखंडों के पिघलने से अवतरित होती हैं। इन सदानीरा नदियों को ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। शेष दस को पठारी नदी कहते हैं, जो मूलत: वर्षा पर निर्भर होती हैं।
यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल ३२.८० लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों का सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र ३०.५० लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल १६४५ घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का ४.४४५ प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सब से ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई ८५ फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।
हमारी नदियों के सामने मूल रूप से तीन तरह के संकट हैं- पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण। धरती के तापमान में हो रही बढ़ोतरी के चलते मौसम में बदलाव हो रहा है और इसी का परिणाम है कि या तो बारिश अनियमित हो रही है या फिर बेहद कम। मानसून के तीन महीनों में बमुश्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधुंध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। बड़ी नदियों में ब्रह्मपुत्र, गंगा, महानदी और ब्राह्मणी के रास्तों में पानी खूब बरसता है और इनमें न्यूनतम बहाव ४.७ लाख घनमीटर प्रति वर्गकिलोमीटर होता है। वहीं कृष्णा, सिंधु, तापी, नर्मदा और गोदावरी का पथ कम वर्षा वाला है सो इसमें जल बहाव २.६ लख घनमीटर प्रति वर्गकिमी ही रहता है। कावेरी, पेन्नार, माही और साबरमती में तो बहाव ०.६ लाख घनमीटर ही रह जाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल ४४५ नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत, प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत को खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। जून- २०१४ में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि राज्यवार प्रदूषित नदियों की सूची में पहले स्थान पर महाराष्ट्र है जहां २८ नदियां प्रदूषित हैं। दूसरे स्थान पर गुजरात है जहां ऐसी १९ नदियां हैं। सूची में १२ प्रदूषित नदियों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर हैं। कर्नाटक की ११ नदियां प्रदूषित नदियों की सूची में हैं, जबकि मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक में ९ नदियां ऐसी हैं। राजस्थान की पांच और झारखंड की तीन नदियां इस सूची में हैं। साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल की तीन तीन नदियां शामिल हैं। दिल्ली से गुजरने वाली एक ही नदी यमुना है और वह भी इस सूची में शामिल है।
एक अनुमान है कि आजादी के बाद से अभी तक गंगा की सफाई के नाम पर कोई २० हजार करोड़ रूप्ए खर्च हो चुके हैं। अप्रैल २०११ में गंगा सफाई की एक योजना सात हजार करोड़ की बनाई गई। विश्व बैंक से इसके लिए कोई एक अरब डॉलर का कर्जा भी लिया गया, लेकिन ना तो गंगा में पानी की मात्रा बढ़ी और ना ही उसका प्रदूषण घटा। नई सरकार ने गंगा सफाई के लिए अलग से महकमा बनाया है। गंगा सफाई अभियान की पहली बैठक का व्यय ही ४९ लाख रहा। बताया जाता है कि गंगा के पूरे २४०० किलोमीटर रास्ते को ठीक करने के लिए अब अस्सी हजार करोड़ की येाजना बनाई जा रही है। गंगा की समस्या केेवल प्रदूषण नहीं है, तटों का कटाव, बाढ़, रास्ता बदलना जैसे मसले भी इस पावन नदी के साथ जुड़े हैं।
यमुना की कहानी भी कुछ अलग नहीं है । हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने दिल्ली को खत लिख कर धमका दिया कि यदि यमुना में गंदगी घोलना बंद नहीं किया तो राजधानी का गंगा-जल रोक देंगे। हालांकि दिल्ली सरकार ने इस खत को कतई गंभीरता से नहीं लिया है।
दिल्ली मे यमुना को साफ-सुथरा बनाने की कागजी कवायद कोई ४० सालों से चल रही है। सन अस्सी में एक योजना नौ सौ करोड़ की बनाई गई थी। दिसंबर-१९९० में भारत सरकार ने यमुना को बचाने के लिए जापान सरकार के सामने हाथ फैलाए थे। जापानी संस्था ओवरसीज इकोनोमिक कारपोरेशन फंड ऑफ जापान का एक सर्वें दल जनवरी १९९२ में भारत आया था। जापान ने ४०३ करोड़ की मदद दे कर १९९७ तक कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन यमुना का मर्ज बढ़ता गया और कागजी लहरें उफनती रहीं। अभी तक कोई १८०० करोड़ रूपए यमुना की सफाई के नाम पर साफ हो चुके हैं।
यमुना की सफाई के दावों में उत्तर प्रदेश सरकार भी कभी पीछे नहीं रही। सन १९८३ में उ.प्र. सरकार ने यमुना सफाई की एक कार्ययोजना बनाई। २६ अक्टूबर १९८३ को मथुरा में उ.प्र. जल निगम
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के प्रमुख आर के भार्गव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इसमें मथुरा के १७ नालों का पानी परिशोधित कर यमुना में मिलाने की २७ लाख रूपए की योजना को इस विश्वास के साथ मंजूरी दी गई थी कि काम १९८५ तक पूरा हो जाएगा। ना तो उस योजना पर कोई काम हुआ, और ना ही अब उसका कोई रिकार्ड मिलता है। उसके बाद तो कई-कई करोड़ के खेल हुए, लेकिन यमुना दिन-दुगनी, रात चौगुनी मैली होती रही। आगरा में कहने को तीन सीवर शोधन संयंत्र काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी ११० एमएलडी सीवरयुक्त पानी हर रोज नदी में मिल रहा है। संयंत्रों की कार्यक्षमता और गुणवत्ता अलग ही बात है। तभी आगरा में यमुना के पानी को पीने के लायक बनाने के लिए ८० पीपीएम क्लोरीन देनी होती है। सनद रहे दिल्ली में यह मात्रा आठ-दस पीपीएम है।
सरकारी रिकार्ड से मिलने वाली जानकारी तो दर्शाती है कि देश की नदियों में पानी नहीं नोट बहते हैं, वह भी भ्रष्टाचार व अनियमितता के दलदल के साथ। बीते दस सालों ंके दौरान गंगा और यमुना की सफाई पर ११५० करोड़ व्यय हुए, लेकिन हालात बद से बदतर होते गए। सन २००० से २०१० के बीच देश के बीस राज्यों को नदी संरक्षण योजना के तहत २६०७ करोड़ रूप्ए जारी किए गए। इस योजना में कुल ३८ नदियां आती हैं। राष्ट्रीय नदी निदेशालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार सन २००१ से २००९-१० तक दिल्ली में यमुना की सफाई पर ३२२ करोड़, हरियाणा में ८५ करोड़ का खर्च कागजों पर दर्ज है। उ.प्र में गंगा, यमुना, गोमती की सफाई में ४६३ करोड़ की सफाई हो जाना, बिहार में गंगा के शुद्धिकरण के लिए ५० करोड़ का खर्च सरकारी दस्तावेज स्वीकार करते हैं। गुजरात में साबरमती के संरक्षण पर ५९ करोड़, कर्नाटक में भद्रा, तुंगभद्रा,, कावेरी, तुंपा नदी को साफ करने पर १०७ करोड़, मध्यप्रदेश में बेतवा, तापी, बाणगंगा, नर्मदा, कृष्णा, चंबल, मंदाकिनी को स्वच्छ बनाने के मद में ५७ करोड़ का खर्च किया गया। इस अवधि में पंजाब में अकेले सतलुज को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार ने १५४.२५ करोड़ रूपए खर्च किए, जबकि तमिलनाडु में कावेरी, अडियार, बैगी, वेन्नार नदियों की सफाई का बिल १५ करोड़ का रहा। गंगा की जन्म स्थली उत्तराखंड में गंगा को पावन रखने के मद में ४७ करोड़ खर्च हुए, जबकि पश्चिम बंगाल में गंगा, दामोदर, महानंदा के संरक्षण के लिए २६४ करोड़ का सरकारी धन लगाया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि अरबों पीने के बाद नदियों की सेहत कितनी सुधरी है व इस काम में लगी मशीनरी की कितनी।
यह जानना जरूरी है कि नदियों की सफाई, संरक्षण तो जरूरी है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि नदियों के नैसर्गिक मार्ग, बहाव से छेड़छाड़ ना हो, उसके तटों पर लगे वनों में पारंपरिक वनों का संरक्षण हो, नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र में आने वाले इलाकों के खेतों में रासायनिक खाद व दवा का कम से कम इस्तेमाल हो।
राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रपट बताती है कि गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित देश की १४ प्रमुख नदियों में देश का ८५ प्रतिशत पानी प्रवाहित होता है। ये नदियां इतनी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं कि देश की ६६ फीसदी बीमारियों का कारण इनका जहरीला जल है। इस कारण से हर साल ६०० करोड़ रूपए के बराबर सात करोड़ तीस लाख मानव दिवसों की हानि होती है।
जल ही जीवन का आधार है, लेकिन भारत की अधिकांश नदियां शहरों के करोड़ों लीटर जल-मल व कारखानों से निकले जहर को ढ़ोने वाले नाले का रूप ले चुकी हैं। नदियों में शव बहा देने, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने या उसकी दिशा बदलने से हमारे देश की असली ताकत, हमारे समृद्ध जल-संसाधन नदियों का अस्तित्व खतर आ गया है।

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