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“युवाओ, तुम्हारे अंदर असीम शक्ति है। तुम्हें शक्तिशाली बनना है। अन्यथा तुम किसी भी वस्तु पर विजय कैसे प्राप्त करोगे? अपने अंदर झांको और उन गुणों को देखो, जो समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी हो सकते हैं, उन्हें और विकसित करना चाहिए। कोई दूसरा हमें नहीं सुधार सकता, हमें स्वयं ही अपने भीतर देखकर सही करना है।”

एक भिखारी जब मरा तो लोगों ने उसके घर की सफाई की। उसके बिस्तर के नीचे ही अकूत संपत्ति का खजाना गढ़ा हुआ मिला। कितनी विचित्र बात है कि हम अपने आप को अपूर्ण मानकर जीवन भर दुखी रहते हैं, सुख की तलाश करते रहते हैं। लेकिन सनातन वेदांत बताता है कि आप अपूर्ण नहीं पूर्ण हो, यह आभास होते ही आनंद ही आनंद।

बुद्ध से किसी शिष्य ने पूछा कि आप राजमहल छोड़ कर जंगल में पहुंच गए, क्या कुछ मिला?

बुद्ध ने कहा- मिला कुछ नहीं, जो था उसका पता चल गया।

इसी परिप्रेक्ष्य में भारत के युवाओं को जो संदेश स्वामी विवेकानंद ने उस गुलामी के कालखंड में दिया, वह आज भी समीचीन है। उन्होंने कहा था-

प्रफुल्ल चित्त तथा हंसमुख रहने से तुम ईश्वर के अधिक निकट पहुंच जाओगे। किसी भी प्रार्थना की अपेक्षा प्रसन्नता के द्वारा हम ईश्वर के अधिक निकट पहुंच सकते हैं। ग्लानिपूर्ण या उदास मन से प्रेम कैसे हो सकता है? अतः जो मनुष्य सदा अपने को दुखी मानता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। हरेक को अपना बोझा खुद ढोना है, यदि तुम दुखी हो तो अपने दुखों पर विजय प्राप्त करो।

बलहीन को ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। अतः दुर्बल कदापि न बनो। तुम्हारे अंदर असीम शक्ति है। तुम्हें शक्तिशाली बनना है। अन्यथा तुम किसी भी वस्तु पर विजय कैसे प्राप्त करोगे? शक्तिशाली हुए बिना तुम ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकोगे? पर साथ ही अतिशय हर्ष, अर्थात उद्धर्ष से भी बचो। अत्यंत हर्ष की अवस्था में भी मन शांत नहीं रह पाता, मन में चंचलता आ जाती है। अति हर्ष के बाद सदा दुःख ही आता है। हंसी और आंसू का घनिष्ठ सम्बन्ध है। मनुष्य बहुधा एक अति से दूसरी अति की ओर भागता है। चित्त प्रसन्न रहे पर शांत हो।

वेश्यापुत्र वशिष्ठ (महाभारत आदिपर्व) और नारद (श्रीमद्भागवत), दासीपुत्र सत्यकाम जाबाल (छान्दोग्योपनिषद), धीवर व्यास (महाभारत आदिपर्व), कृप, द्रोण और कर्ण आदि सबने अपनी विद्या या वीरता के प्रभाव से ब्राम्हणत्व या क्षत्रियत्व पाया।

गर्व से बोलो कि मैं भारतवासी हूं और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। बोलो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी, सब मेरे भाई हैं। भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरी शिशु सज्जा, मेरे यौवन का उपवन और वार्धक्य की वाराणसी है। भाई बोलो कि भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में मेरा कल्याण है। और रात दिन कहते रहो- हे गौरीनाथ! हे जगदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो, मां मेरी दुर्बलता और कापुरुषता दूर कर दो, मुझे मनुष्य बनाओ।

हमारा देश स्वतंत्र हो गया है; परन्तु जब तक हम अपनी राष्ट्रीय प्रणाली और निजी जीवन का, एकत्व के वैदिक सिद्धांतों और वैदिक दृष्टिकोण के आधार पर पुनर्निर्माण नहीं करते, असली राष्ट्र-निर्माण नहीं होगा। ऐतिहासिक मजबूरियों ने हमें कुछ प्रथाओं को अपनाने के लिए विवश किया, किन्तु वे हमारी मूल परंपरा या हमारी जड़ नहीं है और समय के परिवर्तन के साथ हमें उचित रुख और प्रथाओं के जरिये हमारी जड़ों से जुड़ने की आवश्यकता है।

वयम सुपुत्रा अमृतस्य नूनम – हम अमृत के पुत्र हैं, अतः आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर हमारे अंदर के सर्वश्रेष्ठ की अभिव्यक्ति के लिए, अथक प्रयास करो। जब कोई चुनौतीपूर्ण कार्य सामने होता है, तब ही हमारे अंदर का सर्वश्रेष्ठ प्रकट होता है। इससे ही हमें आवश्यक गुण, और इसके लिए आवश्यक टीम वर्क को विकसित करने में सहायता मिलती है।

हमारे काम का प्रमुख आधार अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के प्रति एकात्मता या आत्मीयता ही है। आत्मीयता की अनुभूति के लिए व्यक्ति को सबसे पहले मैं को छोड़ना पड़ता है; ’मैं और मेरा’, यह ’मैं’ एक बड़ी बाधा है। कई बार कोई कार्यकर्ता बहुत सक्रिय और सक्षम हो सकता है, किन्तु अगर उसका ’मैं’ हर कार्य में काम कर रहा है, तो वह कार्यकर्ताओं का समूह नहीं बना सकता और ना ही काम का विस्तार कर सकता है।

अपने अंदर झांको और उन गुणों को देखो, जो समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी हो सकते हैं, उन्हें और विकसित करना चाहिए। कोई दूसरा हमें नहीं सुधार सकता, हमें स्वयं ही अपने भीतर देखकर सही करना है।

स्वामी विवेकानंद का सबसे अधिक जोर शिक्षा पर था। उन्होंने कहा- मैं प्रत्यक्ष देखता हूं कि जिस जाति की जनता में विद्या बुद्धि का जितना अधिक प्रचार है, वह जाति उतनी ही अधिक उन्नत है। भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या बुद्धि, राजशासन मुट्ठीभर लोगों के एकाधिकार में रखी गई है। यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमें जनता में विद्या का प्रसार करना होगा।

यहां मुसलमान कितने सिपाही लाये थे? यहां अंग्रेज कितने हैं? चांदी के छः सिक्कों के लिए अपने बाप और भाई के गले पर चाकू फेरने वाले लाखों आदमी सिवा भारत के और कहां मिल सकते हैं? सात सौ वर्षों के मुसलमान शासन में छः करोड़ मुसलमान, और सौ वर्षों के ईसाई राज्य में बीस लाख ईसाई क्यों बने? क्यों हमारे सुदक्ष शिल्पी यूरोप वालों के साथ बराबरी करने में असमर्थ होकर दिनोंदिन लोप होते जा रहे हैं? लेकिन वह कौन सी शक्ति थी जिससे जर्मन कारीगरों ने अंग्रेज कारीगरों के कई सदियों से जमे हुए दृढ़ आसन को हिला दिया।

केवल शिक्षा! शिक्षा!! शिक्षा!!!

हमारे लड़के जो शिक्षा पा रहे हैं, वह नकारात्मक है। स्कूल में लड़के कुछ नया नहीं सीखते, वरन जो खुद का है उसका भी सत्यानाश हो जाता है। और उसका परिणाम होता है- श्रद्धा का अभाव। जो श्रद्धा वेद वेदांत का मूल मंत्र है, जिस श्रद्धा ने नचिकेता को साहस दिया प्रत्यक्ष यम से प्रश्न करने का, जिस श्रद्धा के बल पर यह संसार चल रहा है, उसी श्रद्धा का लोप।

अतीत से ही भविष्य का निर्माण होता है। अतः जहां तक हो सके अतीत की ओर देखो, पीछे जो चिरंतन निर्झर बह रहा है, आकंठ उसका जल पियो, उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्ज्वलतर, महत्तर और पहले से भी ऊंचा उठाओ। हमारे पूर्वज महान थे, उस खून पर हमें विश्वास करना होगा और अतीत के उनके कृतित्व पर भी।

इस विश्वास और अतीत गौरव ज्ञान से हम अवश्य एक ऐसे भारत की नींव डालेंगे, जो पहले से श्रेष्ठ होगा। यहां बीच में दुर्दशा और अवनति के युग रहे हैं, पर मैं उनको अधिक महत्व नहीं देता। किसी विशाल वृक्ष से एक सुंदर पका हुआ फल पैदा हुआ, फल जमीन पर गिरा, मुरझाया और सड़ा, इस विनाश से जो अंकुर उगा, संभव है वह पहले के वृक्ष से भी बड़ा हो जाए। अवनति के बाद भविष्य का भारत अंकुरित हो रहा है, उसके नवपल्लव निकल चुके हैं, ऊर्ध्वमूल वृक्ष का निकलना प्रारम्भ हो चुका है।

देश वासियों के आदर्श गुरू गोविन्दसिंह होना चाहिए, जिन्होंने देश के शत्रुओं के विरुद्ध लोहा लिया, हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने ह्रदय का रक्त बहाया, अपने पुत्रों को अपनी आंखों के सामने मौत के घाट उतरते देखा- पर जिनके लिए उन्होंने अपना और अपने पुत्रों का खून बहाया, उन्हीं लोगों ने, सहायता करना तो दूर, उलटे उन्हें त्याग दिया। यहां तक कि उन्हें इस प्रदेश से भी हटना पड़ा। अंत में मर्मान्तक चोट खाए हुए सिंह की भांति यह नर केसरी शांतिपूर्वक अपने जन्मस्थान को छोड़ दक्षिण भारत में जाकर मृत्यु की राह देखने लगा, परन्तु अपने जीवन के अंतिम क्षण तक उसने अपने कृतघ्न देशवासियों के प्रति अभिशाप का एक शव्द भी मुंह से नहीं निकाला। यदि तुम देश की भलाई करना चाहते हो तो तुममें से प्रत्येक को गुरू गोविन्द सिंह बनना होगा। तुम्हें अपने देशवासियों में हजारों दोष दिखाई दें, भले ही वे तुम्हारी बुराई के लिए लाख चेष्टा करें, वे तुम पर अभिशाप और निंदा की लाख बौछार करें, तब भी तुम उनके प्रति प्रेम पूर्ण वाणी का ही प्रयोग करो। यदि वे तुम्हें त्याग दें, तुम्हें पैरों से ठुकराएं, तो तुम उसी वीर केसरी गोविन्दसिंह की भांति समाज से दूर जाकर नीरव भाव से मौत की राह देखो। हमें अपने सामने इसी प्रकार का आदर्श उपस्थित रखना होगा। पारस्परिक विरोध भाव को भूलकर चारों ओर प्रेम का प्रवाह बहाना होगा।

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