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हम सभी जानते हैं कि २१ वीं सदी सूचना एवं प्रसारण तंत्र की सदी है। मानव ने आज विज्ञान में बहुत प्रगति कर ली है। इस प्रगति के कारण जीवन निर्वाह सुलभ हो गया है। परिवहन के साधनों के कारण यात्रा करना और टेलीफोन व इंटरनेट के कारण संवाद साधना आसान हो गया है। दूरदर्शन के कारण दुनिया भर में घटित हो रही घटनाओं की जानकारी मिलती है। मायक्रोवेव, फूडप्रोसेसर, फ्रिज आदि से रसोईघर सजता है। ये सभी उपकरण हमारे जीवन का अविभाज्य घटक बन चुके हैं। सूचना तंत्रज्ञान आज के युग का महत्वपूर्ण शब्द बन चुका है। इनके बिना जीवन निर्वाह की कल्पना कठिन है। परंतु विज्ञान के जितने फायदे हैं उतने ही नुकसान भी हैं। ये वस्तुएं जितनी सुविधाजनक हैं उतना ही कचरा भी निर्माण करती हैं।

ई-कचरा
ई-कचरा नियम २०१६ के अनुसार जो उपकरण लगातार विद्युत से चलते है उन उपकरणों के कारण निर्माण होनेवाला कचरा ई-कचरा कहलाता है। कम्प्युटर, टीवी, टेलीफोन, फूडप्रोसेसर, फ्रिज, चार्जर, सिडी, मायक्रोवेव, एसी इत्यादी उपकरण ई-कचरा फैलाने वाले हैं।
ई-कचरा और हम
इलेक्ट्रीकल व इलेकट्रॉनिक्स उद्योग वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक फैलने वाला उद्योग है। उद्योगों में बढती प्रतिस्पर्धा तथा उपकरणों की कम आयु के कारण ई-कचरे की मात्रा में अत्याधिक बढोत्तरी हो रहंी है। कचरा निर्मूलन हेतु आवश्यक जगह की कमी होने के कारण विश्व के विकसित देशों ने इस समस्या का गंभीरता से विचार करना शुरु कर दिया है। तैयार होनेवाले कुल कचरे में से ७० प्रतिशत ई-कचरे का अवैज्ञानिक तरीके से निर्मूलन किये जाने के कारण यह समस्या अधिक गंभीर लगती है। भारत में पहली बार सन १९९० में हुए अर्थिक उदारीकरण के बाद ई-कचरे की समस्या सामने आई। क्योंकि उदारीकरण के बाद ही इलेक्ट्रीकल व इलेकट्रॉनिक्स उपकरणों की मांग बढी थी। इन सबका एकत्रित परिणाम यह हुआ कि सरकारी व बडे उद्योग, लघुव्यवसाय तथा घरों में अधिक पैमाने पर ई-कचरा निर्माण होने लगा।
केंद्र सरकार के वन तथा पर्यावरण मंत्रालय में सन २०१२ में प्रकाशित अपने एक विवरण में कहा था कि सन २००७ में घरों में तैयार होने वाले कचरे के मुकाबले २०१२ में ८ प्रतिशत अधिक ई-कचरा निर्माण हुआ है। राष्ट्रस्तर पर किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार देश भर में ८ से १० लाख टन ई- कचरे का निर्माण होता है। सरकारी स्तर पर भी ई-कचरा विशेष अध्ययन, चर्चा तथा कृति का विषय बन गया है।
ई-कचरा एक समस्या
ई-कचरे में सामान्यत: १००० प्रकार के अलग-अलग घातक पदार्थ पाये जाते है। आवर्त सारणी के लगभग ६० मूलद्रव्य ई-कचरे में होते है। उदा. के तौर पर कम्प्युटर के मॉनीटर में कॅथोड रे ट्यूब जैसे घाटक तथा कीमती पदार्थ पाये जाते है। इसमें से एक पदार्थ कॅडमियम अविघटनशील है। यह सीधे पर्यावरण में जाकर मनुष्य की किडनी तथा हड्डियों को नुकसान पहुंचाता है। युरोपीय देशों ने जिन ६ मूलद्रव्यों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है उनमे से कॅडमियम भी एक है। सीआरटी मॉनीटर के साथ प्लास्टिक सबसे अधिक उपयोग में लाया जानेवाला पदार्थ है। उसमे पॉलिव्हिनिल क्लोराइड का समावेश होता है। प्रिंटेट सर्किट बोर्ड, वायर तथा इनके आवरणों के लिये पॉलिव्हिनिल क्लोराइड का उपयोग किया जाता है। जब इन पदार्थो को जमीन में गाडा जाता है या जलाया जाता है तो इनमें से डायऑक्झाईन गैस वातावरण में फैलती है। जिससे मनुष्य की रोग प्रतिकारक शक्ति पर विपरित परिणाम होता है।
एलसीडी/एलइडी मॉनीटर में पारे का प्रयोग किया जाता है। यह धातु भी मनुष्य की किडनी व मस्तिष्क पर विपरित परिणाम डालती है। उपरोक्त धातुओं के साथ ही लिड, बॅरिलीयल, टीन, कोबार्ड, इनडीयम, सोना, चांदी तथा सर्वाधिक उपयोग में लाई जानेवाली धातु तांबा शामिल है। ई-कचरे का निर्मूलन अनौपचारिक तथा अनधिकृत संस्थाओं तथा व्यक्तिओं के द्वारा अवैज्ञानिक पद्धति से किया जाता है। झोपडपट्टियों या नदियों के किनारे इस कचरे को खुली हवा में जलाया जाता है। इसके कारण पानी तथा जमीन पर होने वाला प्रदूषण, मौसम परिवर्तन तथा ग्लोबल वॉमिर्ंग जैसी कई समस्यायें समाने आती हैं।
ई-कचरा व्यवस्थापन नियम २०१६
भारत सरकार के द्वारा मई २०११ में यह नियम लाया गया तथा मई २०१२ से इसे अमल में लाया गया। यह १ वर्ष की कालावधि सरकार के द्वारा इलेक्ट्रिक व इलेकट्रॉनिक्स उद्योगों से संबंधित लोगों को दी गई थी जिससे वे ई-कचरे के निमूलन हेतु उपयुक्त यंत्रों कीव्यवस्था कर सकें। इस नियम के अनुसार जमा किए गए ई-कचरे का वैज्ञानिक पद्धति से प्लास्टिक, कांच, धातु इत्यादी के अनुसार वर्गीकरण करना आवश्यक किया गया।
सन २०१६ में इस नियम में यथा योग्य परिवर्तन कर इसे फिर से अमल में लाया गया।
ई-कचरे का पुर्नप्रयोग क्यों?
१. हमें प्राकृतिक संसाधन एक निश्चित मात्रा में ही उपलब्ध हैं अत: उनका संवर्धन तथा प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।
२. ई-कचरे को घन कचरे के साथ डाला गया तो उससे अत्यंत घातक तथा विषैले पदार्थ वातावरण में फैलते है।
३. ई-कचरे को अगर सामान्य कचरे की तरह जमीन में गाडा गया तो उससे मिट्टी तथा पानी प्रदूषित होगा।
४. हम पृथ्वी को अपनी माता मानते हैं इस माता को हवा, पानी और मिट्टी के प्रदूषण से बचाने के लिये।
५. अगर वैज्ञानिक पद्धति से ई-कचरे का प्रयोग किया गया तो उसका कच्चे माल के स्रोत के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
६. रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लिये ।
ई-कचरे को कम करने के उपाय
* इलेक्ट्रिक व इलेकट्रॉनिक्स उपकरणों का कम अथवा उपयुक्त पद्धति से उपयोग करना।
* उपकरणों की सामान्यत: दस विषेशताओं का ही उपयोग किया जाता है। अत: नए तथा अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग कम करना।
* खराब हो चुके उपकरणों को फेंककर नए लेने की बजाय उन्हें ठीक करवाकर उनका पुनर्प्रयोग करें।
* ई कचरे के दुष्परिणामों के विषय में जनजागृति फैलाना।
* ई कचरा कम से कम मात्रा में तैयार हो, उसे उचित स्थान पर फेंका जाए, तथा गली,मोहल्ले, साोसायटी से निकला हुआ कचरा अधिकृत संस्थाओं तक पुनर्प्रयोग की प्रक्रिया तक पहुंचाने का प्रयास करना।
ई-कचरा व्यवस्थापन मेंअवसर
युवाओं को ई-कचरे के व्यस्थापन तथा पुर्नप्रयोग के क्षेत्र में कई अवसर उपलब्ध हैं। इनमें सरकारी संस्थाएं, निजी संस्थाएं, कम्पनियां आदि का भी समावेश है।
ई-कचरा संकलन व्यवस्था: निवास स्थान, घर, विद्यालय तथा संस्थाओं से तैयार होने वाले कचरे का निपटारा करने की व्यवस्था अभी तक भारत में नहीं है। अत: इस व्यवस्था को तैयार करने के अवसर भी युवाओं को हैं। अपने परिसर में इस प्रकार के केंद्र स्थापित करने, लोगों तक इसका प्रसार करने तथा लोगों की इस समस्या का निबटारा करने के अवसर युवाओं को प्राप्त हैं।
ई-कचरा प्रक्रिया: जमा किए हुए कचरे का वर्गीकरण करना और उसपर प्रक्रिया करके पुनर्प्रयोग करने के लिए उपयुक्त बनाना आदि का तंत्रज्ञान विकसित करने का अवसर प्रत्येक शहर में उपलब्ध है। युवा इस दिशा में भी प्रयास कर सकते हैं।

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