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महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट का महेन्द्र पर्वत वन क्षेत्र पौराणिक संदर्भों के अनुसार महर्षि परशुराम की  तपस्थली रहा था और उसके विकसित तथा संरक्षित करने का उन्होंने दीर्घकालीन कठिन कार्य किया था। इसको ही तत्कालीन समाज तपश्चर्या कहता था।

हाल ही में सम्पन्न एक अपराध-अन्वेषण में यह स्पष्ट हुआ है कि जहां पर पर्याप्त संख्या में वृक्ष हैं, वहां के निवासियों में अपराध-वृत्ति के व्यक्ति कम होते हैं। इस अन्वेषण में वृक्षों को बचाने की अपील की गई थी। वनों की कमी के कारण वातावरण में ऑक्सीजन की कमी आ जाती है, जिससे व्यक्ति चिड़चिड़े होकर हिंसक हो जाते हैं। इसी को लक्ष्य करके पश्चिमी देशों में महानगरों के यातायात नियंत्रक आरक्षियों को ऑक्सीजन मास्क प्रयोग करने की संस्तुति की गई है। सघन वृक्षावलियां ऑक्सीजन उगलती हैं और कार्बन डाईआक्साइड पीकर हरितिमा बनाने वाले एक अद्भुत संयंत्र के रूप में कार्य करती हैं।

भारतीय जीवन पद्धति की विशेषता 

प्राचीन भारतीय जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया था। तीसरे आश्रम का नाम है, वानप्रस्थ आश्रम अर्थात वन की ओर प्रस्थान। अत: वन और उनका संरक्षण हमारी जीवन पद्धति के अनिवार्य अंग थे। हमारे शास्त्रों और धर्मग्रंथों में जीवन दर्शन की चर्चा है। उन्हें आरण्यक (उपनिषद) कहते हैं। क्योंकि उनकी रचना अरण्यवासी (वनवासी) मनीषियों द्वारा की गई थी। हमारे पूर्वजों ने वृक्ष को प्रकृति का मूल माना है। वाल्मीकि रामायण में पंचवटी का उल्लेख है। इसमें वट-पीपल-अशोक-बेल-हरड़ के संयोजन को पंचवटी कहा गया है। पंचवटी यानि पांच प्रकार के गुण और कामकारी वृक्षों से निर्मित ऐसा देवस्थान जहां चिंतन और मनन भी फलप्रद हो सके।

बौद्ध दर्शन में जीवन का मर्म है आनंद और आभार। उन्हें वृक्ष की छाया में आनंद की उपलब्धि हुई, उसका उन्होंने आभार माना और उनके अनुयायिओं ने उस बोधिवृक्ष के संरक्षण की परम्परा को श्रद्धा सहित अंगीकार किया। गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण ने अश्वस्थ (पीपल) को ईश्वरीय विभूति कहा है। इस प्रकार सनातन धर्मी भारतीय समाज वृक्षों को पूजनीय मान कर सदियों से उनका संरक्षण करते हुए अनायास ही वनों और वन्य जीवों के प्रंबधन में अपना मूक योगदान कर रहा है। राजस्थान के खेचड़ी वृक्ष समूह का वन विलासी राजा-रजवाड़ों और वर्तमान में भी धन लोलुप व्यापारिक प्रतिष्ठानों के हाथ विनष्ट होने से इसलिए सुरक्षित रह पाया, क्योंकि बिश्नोई सम्प्रदाय के आदि गुरू द्वारा उन्हें संरक्षित करने का निर्देश था। काले हिरणों का शिकार वर्जित था। 

भारत के प्रथम पौराणिक पर्यावरणविद्

पौराणिक विवरण के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार महर्षि परशुराम ने अत्याचार और आतंक के विरूद्ध लम्बे समय तक जन संघर्ष का नेतृत्व किया था। महर्षि परशुराम का कार्यक्षेत्र गोमंतक (गोवा) कहा जाता है। उन्होंने जो राज्य जीते थे, उनकी सारी भूमि महर्षि कश्यप को दान का दी, ताकि वे उन प्रदेशों में वन- संरक्षण और भू-जलसंरक्षण तथा वितरण की व्यवस्था को सुचारू रूप से पुन: स्थापित कर सकें।

ऋषि धर्म के विपरीत शस्त्र प्रयोग का प्रायश्चित्त करने के लिए मर्यादा पुरूषोत्तम राम के अनुरोध पर महर्षि परशुराम ने देव भूमि हिमालय को अपना दूसरा तपस्या क्षेत्र बनाया। वाल्मीकि रामायण और परवर्ती आरण्यकों, रामकथाओं मे उल्लेख आता है कि सीता स्वयंवर के प्रसंग के पश्चात मिथिला से विदा होकर महर्षि परशुराम ने हिमालय के वन क्षेत्र की ओर प्रस्थान किया था और प्रायश्चित्त स्वरूप सैंकड़ों किस्म के फूल-पौधें और जड़ी-बूटियां लगाई थीं। फूलों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध इस वन क्षेत्र में 300  से अधिक तरह के  फूलों की प्रजातियां और वनौपधियां आज भी पर्यटकों का मन लुभा रही हैं। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित क्षेत्र भी घोषित किया है।

इस घाटी के बारे में पहला विवरण लिखने वाले पर्वतारोहीफ्रैंकस्मिथ ने लिखा है कि यह घाटी अनायास ही इस रूप में विकसित नहीं हुई है, बल्कि किसी सिद्धहस्त वनस्पति शास्त्री ने योजनापूर्वक यहां फूलों और वनौधियों को उगाया होगा। महर्षि परशुराम का जन्मदिन वैशाख शुक्ल की अक्षय तृतीया को मनाया जाता है। वन संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन के लिए किए गए उनके कार्यों का स्मरण और अनुगमन करने की दृष्टि से ही भारत की प्रबुद्ध श्रद्धालु पर्यावरण प्रेमी सनातन धर्मी जनता वर्तमान में भी अक्षय-तृतीया के दिन पीपल, आम, पाकड़, गूलर, बरगद, बेल जामुन अथवा अन्य प्रकार के छायादार और फलदार वृक्ष, इस भावना से लगाती है कि वे वृक्ष अक्षय रहेंगे और उससे प्राप्त पुण्य भी अक्षय रहेगा। क्योंकि पुण्यदायी अक्षय तृतीया तिथि को माता पार्वती ने अक्षय फल देने की सामर्थ्य का आशीर्वाद दिया था। इस दिन किया जाने वाला जप, तप, पूजा पाठ, दान-पुण्य समय के साथ कम नहीं होता, जैसा कि सामान्यता विधि का विधान है।

भारतीय पर्वों का वृक्षों से सम्बध

जीविका यात्रा पर निकले पुरुषों को जेठ की झुलसती गरमी में शीतल घनी छाया और प्राणवायु (ऑक्सीजन) प्रदान करके उनकी आयु में वृद्धि करने वालों छायादार वृक्षों में अग्रणी वट अथवा बरगद वृक्ष के महत्व के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए भारतवर्ष की नारियां ज्येष्ठ-अमावस्या को उसका अभिनंदन-वन्दन-पूजन करके निराहार व्रत रखती है। इस दिन को वट पौर्णिमा कहते हैं। अपने पति को यमराज के पाश से मुक्त कराने वाली सती सावित्री से प्रेरित उनका यह व्रत अपने पतियों की दीर्घायु की कामना से किया जाता है। अत: इसको वट सावित्री भी कहते हैं। इस तरह वट वृक्ष की रक्षा करके, भारतवर्ष की नारियां पर्यावरण एवं वन वृक्ष संरक्षण में सदियों से सहयोग कर रही हैं। पर्व मनाने और उन अवसरों पर विशेष पुण्य प्रयोजन रखने की परम्परा हमारे देश में बहुत प्राचीन काल से चली आ रही है। श्रावणी पर्व (रक्षाबंधन) पर वृक्षारोपण का एक निश्चित विधान आदिकाल से चला आ रहा है। अपने परिवार के किसी प्रियजन की याद में मृतक श्राद्ध के रूप में भी वृक्षारोपण की परम्परा रही है। भारतीय सभ्यता संस्कृति में वनश्री को अत्याधिक महत्वपूर्ण स्थान मिला है। हमारे यहां पीपल आदि वृक्षों की पूजा भी प्रचलित है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में चैत्र एकादशी तथा अन्य पर्वों पर इस प्रकार की पूजा की जाती है। आंवला- नवमी को आंवला वृक्ष की पूजा का विधान है। कई वृक्षों की लकड़ी नहीं जलाई जाती थी। उन्हें काटना पाप की श्रेणी में आता था। तुलसी पौधें को आज भी हमारे घरों में महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है। उसके समीप संध्या को दीपक जलाया जाता है। हम ऋषियों के आदेशों का पालन करते रहे हैं, भले ही उनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को न जान पाए हों। परंतु उन निर्देशों का पालन करने से लाभों से तो लाभान्वित होते रहे हैं, जो मानवीय जीवन की सुव्यवस्था के लिए उपयोगी होने के कारण आवश्यक थे। अब जब उन निर्देशों की उपेक्षा हो रही है, तो उसके सामयिक दुष्परिणाम भी हमारे सामने हैं। हमारे जीवन के हर क्षेत्र में मलीनता का प्रवेश हुआ है और वह कष्ट तथा कठिनाइयों से घिरा है। समय का तकाजा है कि हम वन और वन्य जीवन के संरक्षण को अपना पुनीत कर्तव्य समझें और राष्ट्र को सुखी एवं समृद्ध बनाने में भागीदार बनें।

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