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साहित्य और रक्षा दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर उत्तर प्रदेश निवासी गौरव कर सकते हैं। संस्कृत से लेकर हिंदी और उर्दू की यह भूमि कर्मस्थली रही है। इस भूमि ने ऐसे-ऐसे नामवर साहित्यकार दिए हैं जिनका डंका आज भी बजता है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘यहां साहित्य की खेती होती है।’

उत्तर प्रदेश को, विश्व में साहित्य की यात्रा का प्रस्थानक होने का गौरव प्राप्त है। उत्तर प्रदेश में अयोध्या के निकट बहने वाली तमसा नदी के तट पर ही निषाद द्वारा मार दिए गए क्रौंच को देखकर करुणा विगलित ऋषि वाल्मीकि के मुख से ‘मा प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वती समाः…’ श्लोक फूट निकला था। जिससे वाल्मीकि को प्रथम कवि की संज्ञा मिली और विश्व के सब से अनुपम, रामायण नामक महाकाव्य का सूत्रपात हुआ।

साहित्य और रक्षा दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर उत्तर प्रदेश निवासी गौरव कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश अश्वघोष, बाण, मयूर भंज, दिवाकर, वाक्पति, भवभूति, राजशेखर, लक्ष्मीधर, श्रीहर्ष, कृष्णा मिश्रा जैसे संस्कृत के कालजयी साहित्यकारों की भूमि है। गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास से लेकर भारतेंदु हरिश्चन्द्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत, मैथिलीशरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी, हरिवंशराय बच्चन, महादेवी वर्मा, राही मासूम रजा, अमृतलाल नागर, अज्ञेय, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती जैसे हिंदी के महान कवि और लेखकों ने साहित्य को समृद्ध किया है। उत्तर प्रदेश का उर्दू साहित्य में भी बहुत योगदान रहा है। फ़िराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, नजीर अकराबादी, वसीम बरेलवी, चकबस्त आदि सैकड़ों शायर उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की शान रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में साहित्य की भाषा के जो स्वरूप प्रचलित हैं उनमें अवधी, ब्रज, बुंदेली और खड़ी बोली हिंदी प्रमुख हैं। अवधी को तुलसी कृत राम चरित मानस और जायसी कृत पद्मावत से, ब्रज को सूर कृत सूरसागर और रहीम, रसखान, केशव, घनानंद और बिहारी के साहित्य से तथा बुंदेली को जगनिक रचित आल्हखंड से सर्वाधिक प्रतिष्ठा मिली। खड़ी बोली हिंदी, मूलतः उत्तर प्रदेश के रामपुर, बिजनौर, मेरठ तथा अलीगढ़ क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा है, जिसके संवर्धित और परिष्कृत स्वरूप को कालांतर में मानक हिंदी की मान्यता मिली। आज यही खड़ी बोली हिंदी साहित्य की मुख्य भाषा, संविधान में भारत की राजभाषा और जनमानस के ह्रदय में देश की राष्ट्रभाषा बन गई है। अवधी, ब्रज और बुंदेली आदि क्षेत्रीय भाषाएं हिंदी की बोलियों के रूप में जानी जाती हैं।

आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रारंभ सन १८५० ईस्वी से माना जाता है। सन १८५० से १९०० का काल खंड हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग के नाम से दर्ज है। वस्तुतः, काशी में भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र के आविर्भाव तक काव्य की भाषा ब्रज ही थी । उनके प्रयास से कविता में खड़ी- बोली या हिंदी का प्रयोग प्रारंभ हुआ। हिंदी गद्य का उद्भव भी अभी व्यवस्थित रूप में नहीं हुआ था। भारतेंदु जी ने अपनी पत्रिका ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ के माध्यम से कविता में खड़ी-बोली हिंदी के प्रयोग तथा हिंदी गद्य लेखन को प्रोत्साहन दिया। भारतेंदु के बाद काशी के साहित्यिक परिवेश में प्रसाद, प्रेमचंद और रामचन्द्र शुक्ल का चमत्कारिक पदार्पण हुआ। मोटे तौर पर प्रसाद कवि और नाटककार, प्रेमचंद कथाकार और रामचन्द्र शुक्ल आलोचक थे। प्रसाद और प्रेमचंद आज भी अपने-अपने क्षेत्र में अप्रतिम हैं।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी गद्य का व्याकरण सम्मत परिमार्जन कर, गद्य की विभिन्न विधाओं के विकास में अतुलनीय योगदान दिया। इलाहाबाद से उनके संपादन में निकलने वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका ने प्रतिष्ठित साहित्यकारों की लम्बी श्रृंखला तैयार की। पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रेमचंद और प्रसाद ने भी किया था। प्रेमचंद की ‘हंस’ तथा प्रसाद की ‘इंदु’ नामक पत्रिकाएं अपने स्वनामधन्य साहित्यकार संपादकों के प्रभामंडल तक सीमित थीं। पर, ‘सरस्वती’ पत्रिका की धाक विषयों के वैविध्य और सम्पादकेतर लेखकों को स्थान मिलने के लिए भी थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य में भाषा और भावों की शुद्धता के प्रति इतने सजग थे कि वे उनकी कसौटी पर खरी न उतरने वाली, बड़े-बड़े कवियों- लेखकों की रचनाओं को लौटा देते थे। निराला की ‘जुही की कली’ कविता जो बाद में युगांतरकारी रचना मानी गई, सरस्वती में स्थान न पा सकी थी। द्विवेदी जी के साहित्यिक अवदान का स्मरण करने हेतु हिंदी साहित्य के सन १९०० से १९२० के कालखंड को द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है। राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त इसी द्विवेदी युग की उपलब्धि हैं।

छायावाद आधुनिक हिंदी काव्य का स्वर्णयुग कहा जाता है। छायावाद के चारों स्तंभों जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की साधना स्थली भी उत्तर प्रदेश थी। भाषा, भाव, शैली, छंद, अलंकार सभी दृष्टियों से हिंदी कविता की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि छायावाद में मिलती है। छायावादी कविता का सौंदर्य, प्रेम और वेदना के भावों को वहन करने योग्य भाषा संस्कार, लाक्षणिकता, चित्रमयता, नूतन प्रतीक विधान, मधुरता, सरसता, व्यंग्यात्मकता, दार्शनिकता आदि गुणों ने लम्बे समय तक परवर्ती कविता पर अपना प्रभाव अक्षुण्ण रखा। राम कुमार वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन जैसे समर्थ कवियों को भी स्वयं को छायावादी प्रभाव से मुक्त करने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। उत्तर प्रदेश के बाहर के प्रसिद्ध कवियों जैसे- बिहार के रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और मध्य प्रदेश के माखनलाल चतुर्वेदी ने भी छायावाद की छाया में काव्य साधना प्रारंभ की।

मार्क्सवादी विचारधारा का साहित्य में प्रगतिवाद के रूप में उदय हुआ। प्रगतिवाद का आरंभ सन १९३६ से माना जाता है। इसे मात्र संयोग नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की साहित्यिक माटी का प्रभाव कहना होगा कि सज्जाद जहीर विदेशी धरती से मार्क्सवाद की जो पौध लाकर भारत में रोपना चाहते थे उसके आग़ाज के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश का लखनऊ शहर सब से उपयुक्त लगा। सन १९३६ में मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला सम्मलेन हुआ। यह अलग बात है कि ‘साहित्यकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है’ कह कर इस सम्मलेन के अध्यक्ष ने ही साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की हवा निकाल दी। तथापि, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल जैसे साहित्यकार संभवतः इसलिए अपाहिज पैदा हुए प्रगतिवादी बच्चे को अपनी साहित्यिक प्रतिभा की पौष्टिक खुराक से मोटा ताजा बनाने का असफल प्रयास करते रहे कि इस बच्चे ने उनके प्रदेश में जन्म लिया था।

काशी नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग ने भारतीय साहित्य परंपरा को प्रोत्साहन देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। वाराणसी और इलाहाबाद सदैव से साहित्य के गढ़ रहे हैं। १९३६ के बाद प्रगतिशील आंदोलन प्रगतिशील लेखक संघ के नाम से प्रमुख शहरों में अपने पैर पसारने लगा। आयातित और अभारतीय संस्कारों से अनुप्राणित होने के कारण प्रगतिशील धारा साहित्य जगत को सहज स्वीकार्य कभी नहीं रही। अतः, साहित्य में खेमेबाजी की शुरुआत हुई। इलाहाबाद में परिमल संस्था और प्रगतिशील लेखक संघ की खेमेबाजी के किस्से पूरे देश में मशहूर हुए।

‘परिमल’ तत्कालीन नवोदित लेखकों की संस्था थी जिसके सारे सदस्य मित्र-परिवार जैसे थे। जबकि प्रगतिशील लेखक संघ वामपंथी राजनीति का साहित्यिक मंच और आंदोलन दोनों ही था। दोनों की गतिविधियां एक दूसरे के जबाब में होती थीं। ‘परिमल’ में साहित्य सम्बंधी वैचारिक तथा सैद्धांतिक खुलापन था। तत्कालीन नवोदित अधिकांश लेखक ‘परिमल’ से जुड़े थे। प्रगतिशील लेखक संघ में राजनीतिक बापतिस्मा लेने पर ही लेखक माना जाता था। दोनों ही खेमों में लेखकों की कोई कमी नहीं थी। ऐसे में केवल रथियों और महारथियों की ही चर्चा संभव हो सकती है। प्रगतिशील खेमें में आलोचक प्रकाशचंद गुप्त, अमृतराय, उपेन्द्रनाथ अश्क, शमशेर, भैरवप्रसाद गुप्त, मार्कण्डेय, अमरकांत, शेखर जोशी आदि थे तो ‘परिमल’ में धर्मवीर भारती, रघुवंश, केशवचन्द्र शर्मा, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेवनारायण साही, अज्ञेय, रामस्वरूप चतुर्वेदी, जगदीश गुप्त, नरेश मेहता, दुष्यंत कुमार आदि थे। कहना न होगा कि ये सभी लेखक हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले साहित्यकारों में परिगणित किए जाते हैं।

राजनीति में मार्क्सवाद के पराभव के उपरांत आज मार्क्सवादी विचारधारा का साहित्य अप्रासंगिक हो गया है। अखिल भारतीय साहित्य परिषद जैसी राष्ट्रवादी साहित्यिक संस्था ने उत्तर प्रदेश के साहित्यिक वातावरण में राष्ट्रीय चेतना और देश प्रेम का ज्वार ला दिया है। मंच से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक राष्ट्रवादी साहित्य की धूम है। नए कवियों-लेखकों की फौज तथा आधुनिक संचार माध्यमों की जुगलबंदी में भूषण, श्यामनारायण पांडे, सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त की शौर्य परंपरा वाले साहित्य के नए तेवर सामने आ रहे हैं। देश भर के कवि सम्मेलनों में उत्तर प्रदेश के ओज के कवियों – बुलंदशहर के डॉ. हरिओम पावर, इटावा के गौरव चौहान, झांसी के रवींद्र शुक्ल, फिरोजाबाद के डॉ. ओमपाल सिंह ‘निडर’ को सब से अधिक सुना और सराहा जाता है।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश की साहित्यिक प्रदक्षिणा करते समय डॉ. विद्याबिंदु सिंह, नीरजा माधव, राजनाथ सिंह सूर्य, आनंद मिश्र अभय, गिरिशवर मिश्र, सूर्य प्रसाद दीक्षित, यतीन्द्र मोहन मिश्र, यश मालवीय, गुलाब सिंह, डॉ. कन्हैया सिंह, डॉ. उदय प्रताप सिंह, नरेश सक्सेना, करुणा पांडे, अंजलि चौहान, किरण कुमार थपलियाल, डॉ. नीतू सिंह, निवेदिता, डॉ. नेत्रपाल सिंह, उषा चौधरी, सुभद्रा राठौर, डॉ. दिनेश पाठक ‘शशि‘ जैसे प्रसिद्ध नामों की बड़ी फेहरिश्त सामने आती है जिनकी रचनाधर्मिता उपन्यास, कहानी, कविता, निबंध, आलोचना, गीत से लेकर लोक साहित्य तक को समृद्ध कर रही है।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित का कथन कि, ‘यहां साहित्य की खेती होती है’,अत्यंत समीचीन है।

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