उत्तर प्रदेश : साहित्यिक प्रदक्षिणा

Continue Reading उत्तर प्रदेश : साहित्यिक प्रदक्षिणा

  साहित्य और रक्षा दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर उत्तर प्रदेश निवासी गौरव कर सकते हैं। संस्कृत से लेकर हिंदी और उर्दू की यह भूमि कर्मस्थली रही है। इस भूमि ने ऐसे-ऐसे नामवर साहित्यकार दिए हैं जिनका डंका आज भी बजता है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘यहां

अप्प दीपो भव

Continue Reading अप्प दीपो भव

जीवन में प्रकाश की महत्ता निर्विवादित, सर्वविदित एवं सर्वस्वीकार्य है। जीवन में जो शुभ व कल्याणकारी है, वह सब प्रकाश का स्वरूप है तथा जो अशुभ व अकल्याणकारी है उसे अन्धकार की संज्ञा से अभिहीत किया जाता है। हमारे जीवन में सदैव शुभ ही शुभ घटित होता रहे, इस हेतु हमें निरंतर प्रकाश की साधना करनी पड़ती है।

उत्तर प्रदेश के वीर पुरुष

Continue Reading उत्तर प्रदेश के वीर पुरुष

इतिहास में उन्हीं व्यक्तियों का नाम अंकित होता है, जो मानव जाति के कल्याण के लिए अपना जीवन अर्पित कर देते हैं। स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों का दुःख दूर करने का कार्य वीरता की श्रेणी में आता है।

ताकि आलोक की साधना हमारा संस्कार बने

Continue Reading ताकि आलोक की साधना हमारा संस्कार बने

हमारी मान्यता है कि प्रभु श्रीराम लंका विजय के पश्चात् सीता, लक्ष्मण व वानर भालू योद्धाओं के साथ अयोध्या वापस लौटे तो अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सजाकर अपनी प्रसन्नता उजागर की. तभी से उस अवसर की स्मृति में प्रतिवर्ष दीप-

भाषा विहीन संस्कृति की ओर

Continue Reading भाषा विहीन संस्कृति की ओर

भाषा जातीय संस्कृति की संवाहिका होती है, इस विचार से सभी विद्वान सहमत हैं। अलग-अलग और समाजों की संस्कृति भिन्न-भिन्न होती है। जैसी इसी प्रकार, उस संस्कृति को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली भाषाएं भी भिन्न-भिन्न होती हैं। अत: किसी भाषा का क्षरण और मरण उससे संबंद्ध संस्कृति पर गहरे आघात का सूचक होता हैं।

तुलसी की सामाजिक समरसता

Continue Reading तुलसी की सामाजिक समरसता

तुलसीदास जिस समय अपने विश्वप्रसिद्ध प्रबंध ‘रामचरित मानस’ की रचना कर रहे थे, देश में मुस्लिम शासकों का साम्राज्य स्थापित हो चुका था। मुसलमान परम्पराये, रहन-सहन और संस्कृति भारतीय हिन्दू पराम्पराओं और सनातन संस्कृति से मेल नहीं खाती थीं।

अप्रतिम शौर्य की जनगाथा- आल्हा

Continue Reading अप्रतिम शौर्य की जनगाथा- आल्हा

‘आल्हा’ अथवा ‘आल्हखण्ड’ बारहवीं शताब्दी में रचित दो बनाफर राजपूत वीरों आल्हा और ऊदल की वीरता का महाकाव्य है। इस महाकाव्य के रचइता जगनायक या जगनिक महोबा के चंदेल राजा परमाल के दरबारी कवि एवं दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज के प्रसिद्ध दरबारी कवि चंदबरदाई के समकालीन थे।

भारतीय स्थापत्य कला का सुन्दर वर्णन करती पुस्तक

Continue Reading भारतीय स्थापत्य कला का सुन्दर वर्णन करती पुस्तक

सामान्यत : पहाड़ों में स्थित कन्दराओं को गुफा कहा जाता है। बहुधा इन गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक रूप से होता है। प्रागैतिहासिक काल में वर्षा, ताप व शीत से बचाव के लिए मनुष्य व अन्य जीव-जन्तु इन गुफाओं में शरण लेते थे।

बरखा की पहली सौगात ले आये

Continue Reading बरखा की पहली सौगात ले आये

पृथ्वी पर आने वाली छहों ऋतुओं में प्रकृति छह बार नूतन शृंगार करती हैं। यों तो ऋतु चक्र में प्रकृति के सभी रूप मनोहर होते हैं, किंतु झुलसते ग्रीष्म के बाद उमड़-घुमड़ कर आने वाले मेघों को देखकर मन विशेष आह्वाद व शीतलता का अनुभव करता है। वर्षा की फुहारें मनुष्य ही नहीं, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों और वनस्पितयों तक नवजीवन का संचार कर देती हैं।

उत्तरी भारत की संत-परंपरा

Continue Reading उत्तरी भारत की संत-परंपरा

शरीरी तौर पर मनुष्य और सृष्टि के अन्य जीवों में भेद नहीं है। लेकिन मनुष्य की चेतना में शेष प्रति जिज्ञासा भाव उसमें गुणात्मक अंतर उत्पन्न कर उसमें पृथ्वी के अन्य जीवों की तुलना में उर्ध्व स्थान पर प्रतिष्ठित कर देता है। आदि मानव से आधुनिक मनुष्य तक की विकास यात्रा का यही निष्कर्ष है कि अन्य जीवों की भांति मनुष्य नामक प्राणी की दिनचर्या जन्म से मृत्यु के बीच केवल खाने-सोने तक सीमित नहीं रही।

End of content

No more pages to load