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जहां तक संभव हो, आप स्वयं ही चीनी माल का बहिष्कार करें। खास तौर पर ऐसे सामान का बहिष्कार तो करना ही चाहिए, जिसे देसी कारीगर भी तैयार करते हैं। यह तात्कालिक तरीका हो सकता है। इसका स्थायी हल है देश में युवा उद्यमियों एवं विनिर्माण को बढ़ाना देना ताकि वे देश में ही बड़े पैमाने पर चीन को टक्क्र देने वाला किफायती माल बना सके।

जब से डोकलाम पर भारत और चीन के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई है तभी से सोशल मीडिया पर और नुक्कड़-चौराहों की बातचीत में एक मांग जोर पकड़ती दिख रही है – चीन से आने वाले सामान के बहिष्कार की। लोगों को लगता है कि भारत अगर चीन के माल पर प्रतिबंध लगा देता है तो आक्रामक रुख अपनाए चीन पर भारी आर्थिक दबाव पड़ेगा। यह धारणा इसलिए है क्योंकि भारत चीन से भारी मात्रा में सामान आयात करता है। पिछले वित्त वर्ष में ही आयात का आंकड़ा ६० अरब डॉलर को पार कर गया था। इस आंकड़े को देखते हुए चीन पर दबाव डालने की बात सही भी लग सकती है। शायद यही वजह है कि ब्रह्म चेलानी जैसे सामरिक मामलों के विशेषज्ञ भी चीन से आने वाले सामान पर रोक लगाने की बात करते दिख रहे हैं। लेकिन वैश्विक व्यापार की बदलती दुनिया में क्या वाकई ऐसा संभव है? क्या भारत सरकार चीन से आने वाले सामान पर वाकई रोक लगा सकती है?

घनिष्ठ साझेदार है चीन
ऊपर लिखे सवालों के जवाब जानने के लिए हमें यह समझना बहुत जरूरी है कि भारत और चीन के बीच कितने घनिष्ठ व्यापारिक संबंध हैं। सीमा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों के बीच चाहे कितने भी टकराव होते रहें, दोनों के बीच अरबों डॉलर का आपसी व्यापार हर वर्ष होता है। इसमें भी चीन से भारत को होने वाले आयात की सब से बड़ी हिस्सेदारी है। दूरसंचार के उपकरण हों या कंप्यूटर हार्डवेयर और उपकरण, उर्वरक हों या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, भारी उपकरण हों या दवाओं में काम आने वाले रसायन और यौगिक, ट्रांसफॉर्मर जैसे बिजली के भारी उपकरण हों या रोजमर्रा के इस्तेमाल के स्विच और सेलफोन ही क्यों न हों, हम इन सभी के लिए काफी हद तक चीन पर ही निर्भर हैं। इसकी सब से बड़ी वजह तो यही है कि चीन से आने वाला माल सस्ता होता है और अक्सर वह भारत में बने माल से भी सस्ता होता है। भारत भी चीन को माल भेजता है, लेकिन वह कच्चा माल होता है मसलन लौह अयस्क, चावल, कपड़ा, हीरे, जेवरात, धागा, जेनेरिक दवाएं और पेट्रो रसायन। समस्या यह है कि दुनिया भर में भारत जो भी कच्चा माल भेजता है, उसकी कुल निर्यात राजस्व में ७५ प्रतिशत हिस्सेदारी है।

इस लिहाज से चीन भारत के लिए बहुत अहम हो जाता है और लगातार कई वर्ष की गिरावट के बाद इस वर्ष के पहले चार महीनों में तो भारत से चीन को निर्यात में २० प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस रफ्तार को सरकार भी थामना नहीं चाहेगी और कारोबारी भी। यह अलग बात है कि चीन से होने वाले आयात की तुलना में वहां होने वाला निर्यात बहुत कम है। जनवरी से अप्रैल २०१७ के बीच चीन को होने वाला निर्यात केवल ५.५७ अरब डॉलर रहा था, लेकिन वहां से भारत में २०.४५ अरब डॉलर का सामान आया। इस तरह १४.८८ अरब डॉलर का व्यापार घाटा रहा, जो पिछले वर्ष ५२ अरब डॉलर था।

एफडीआई का भी स्रोत
लेकिन चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत यात्रा के बाद से दोनों देशों के बीच पारस्परिक निवेश तेजी से बढ़ा है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद एक-डेढ़ वर्ष में ही चीन से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) ६ गुना हो गया। २०१४ में जो आंकड़ा १ अरब डॉलर था, वह २०१५ में ६ अरब डॉलर हो गया। इस निवेश में और भी तेजी आना तय है क्योंकि चीन विनिर्माण यानी कारखानों का गढ़ है और वहां बने माल के लिए बढ़ते बाजार की जरूरत होती है। अगर चीन के मीडिया और वहां के विश्लेषकों की बातों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारत इस समय चीन के लिए सब से बड़ा बाजार बन कर उभरा है। ऐसे में प्रतिबंध लगाने की गुंजाइश ही कहां पैदा होती है।

डब्ल्यूटीओ की तलवार
सरकारी प्रतिबंध की मांग करने वालों को शायद पता नहीं है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के तहत भारत के हाथ बंधे हैं और वह चीन से आयात को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं कर सकता। प्रतिबंध की बात करना या मांग करना बहुत आसान है, लेकिन विश्व व्यापार की बदली हुई तस्वीर में किसी भी देश के लिए ऐसा करना लगभग असंभव है। भारत डब्ल्यूटीओ का सदस्य है और कुछ खास परिस्थितियों में ही एक दूसरे के साथ व्यापार पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। लेकिन वह प्रतिबंध भी कुछ खास वस्तुओं पर ही लग सकता है, पूरी तरह प्रतिबंध की कोई गुंजाइश ही इसमें नहीं है। प्रतिबंध आम तौर पर उन खाद्य या कृषि उत्पादों पर लगता है, जिनमें किसी तरह की खराबी होती है। रासायनिक पदार्थों में भी गुणवत्ता खराब होने पर ऐसा होता है। चीनी उत्पादों के साथ भारत ऐसा कर भी चुका है। मौजूदा केंद्र सरकार ने चीन से आने वाले दूध और उससे बने उत्पादों को घटिया बता कर उन पर प्रतिबंध लगाया था। पिछले वर्ष अप्रैल से ही खिलौनों, कुछ खास मोबाइल फोन और इस्पात के कुछ उत्पादों पर प्रतिबंध लगा हुआ है क्योंकि वे भी गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे थे।

प्रतिबंध लगा तो..
लेकिन अगर सरकार डब्ल्यूटीओ को अनदेखा करती है और चीन से आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देती है तो क्या होगा? उस सूरत में हमें कई गुना तगड़े प्रतिबंध झेलने पड़ेंगे और नुकसान कई मोर्चों पर होगा। सब से पहले तो जो माल हम चीन को निर्यात करते हैं, उस पर प्रतिबंध लग जाएगा। इनमें कपड़ा, लौह अयस्क, हीरे-जवाहरात आदि शामिल हैं, जिनका भारत से चीन को भारी मात्रा में निर्यात होता है। चीन इन पर प्रतिबंध लगा देगा तो यहां के कारोबारियों को अच्छी खासी चोट लगेगी। चीन ही नहीं, उसके सहयोगी देश भी भारत पर इसी तरह का प्रतिबंध लगा सकते हैं, जिससे भारतीय निर्यात को और भी झटका लगेगा। चीन की ताकत को देखते हुए इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि अपनी धौंस दिखाकर चीन ऐसे कई छोटे देशों के व्यापारिक रिश्ते भारत से तुड़वा सकता है, जिनकी भारत से होने वाले निर्यात की खपत में बहुत बड़ी हिस्सेदारी है।

ऐसे में उन छोटे कारोबारियों को भी दिक्कत हो सकती है, जिनका माल चीन और पड़ोसी बाजारों में जाता है। इसलिए एक बात साफ समझ लीजिए कि चीन के सामान पर प्रतिबंध लगाना सरकार के वश की बात नहीं है और न ही वह ऐसा करने जा रही है।

चीन बिना चैन कहां
फिर क्या किया जाए? असल में आपके पास करने के लिए बहुत कुछ है भी नहीं क्योंकि आप पूरी तरह चीन के सामान से घिरे हुए हैं। एक बार गौर करें तो पता चलेगा कि सुबह से लेकर रात तक हम सैकड़ों चीनी उत्पादों से घिरे रहते हैं। सुबह आपको वक्त बताने वाली घड़ी हो या समाचार दिखाने वाला टेलीविजन; आपको ठंडा पानी देने वाला फ्रिज हो या कमरा ठंडा रखने वाला एयरकंडीशनर; माइक्रोवेव ओवन हो या आपके दफ्तर में काम आने वाला कंप्यूटर हो; ये सभी चीन में बनते हैं या चीन में बने पुर्जे इनमें इस्तेमाल होते हैं। इतना ही नहीं, आप घरों में इस्पात यानी स्टील के जो बर्तन इस्तेमाल करते हैं, वे भी अक्सर चीन से आए इस्पात या इस्पात के कबाड़ से ही बने होते हैं। आपके बच्चे जिन खिलौनों का इस्तेमाल करते हैं और आप प्लास्टिक के जिस सामान का इस्तेमाल करते हैं, अक्सर वह भी चीन से ही आता है। चीन का बना फर्नीचर आपको तमाम दुकानों पर मिल जाएगा। और तो और आपकी दीवारों पर लगी कीलें और दरवाजों के हैंडल भी अक्सर चीन से ही आते हैं।

इन सब से बड़ा उदाहरण आपका सेलफोन है। अगर आप वन प्लस, श्याओमी, लेनोवो, जियोनी, हायर, हुआवेई, ओप्पो, कूलपैड, लेइको, मेजू, वीवो या जोपो का फोन इस्तेमाल कर रहे हैं तो आप पूरी तरह चीन पर ही निर्भर हैं। अगर आप माइक्रोमैक्स और लावा जैसी देसी कंपनी का फोन इस्तेमाल कर रहे हैं तो इस बात की पूरी संभावना है कि उसमें लगा हुआ सेमीकंडक्टर चिप चीन से ही आयात हुआ हो। अगर आप आईफोन इस्तेमाल कर रहे हैं तो मुस्कराइए मत क्योंकि उसे भी चीन की कंपनी फॉक्सकॉन ही ठेके पर बनाती है।

फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। नोटबंदी के दौरान जिस पेटीएम वॉलेट को आपने भारतीय मान कर जम कर इस्तेमाल किया था, उसकी असली मालिक वन९७ कम्युनिकेशंस नाम की कंपनी है, जिसमें सब से बड़ी हिस्सेदारी चीन की नामी कंपनी अलीबाबा के पास है। देसी ई-कॉमर्स फ्लिपकार्ट में भी चीन का अच्छा खासा निवेश है। इसके अलावा भी दर्जनों नामी कंपनियों में चीनी कंपनियों ने निवेश कर रखा है। ये नाम अब आपकी रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से बन चुके हैं, इसलिए सरकार तो दूर आप खुद ही इन पर प्रतिबंध नहीं लगा सकते यानी इनका इस्तेमाल बंद नहीं कर सकते।

खुद कीजिए बहिष्कार
ऐसे में क्या करना चाहिए? जवाब है बहिष्कार। जहां तक संभव हो, आप स्वयं ही चीनी माल का बहिष्कार करें। खास तौर पर ऐसे सामान का बहिष्कार तो करना ही चाहिए, जिसे देसी कारीगर भी तैयार करते हैं। इस बार रक्षाबंधन पर कई शहरों से चीनी राखियों की बिल्कुल भी मांग नहीं होने की खबरें आईं। थोक कारोबारियों ने भी चीन से माल नहीं मंगाया। जल्द ही दीवाली आने वाली है। यदि हम तय कर लें कि उस समय भी देश में बने हुए बिजली के सामान, झालर, मिट्टी की मूर्तियां, पटाखे ही इस्तेमाल करेंगे तो चीन को झटका लग सकता है क्योंकि आपको पता भी नहीं चलता और अरबों रुपये का माल इस त्योहार पर चीन से आ जाता है।

हालांकि ये भी अस्थायी तरीके ही हैं। वास्तव में सरकार पर ऐसी नीतियां बनाने के लिए दबाव डाला जाना चाहिए, जिनसे देश में ही विनिर्माण को बढ़ावा मिल सके और युवाओं के लिए अपने उद्यम शुरू करना आसान हो सके। यदि ऐसा होता है और उद्यमियों को सरकारी रियायतें मिलती हैं तो देश में ही बड़े पैमाने पर किफायती माल बनाना आसान हो जाएगा और तब चीन के माल की जरूरत भी कम हो जाएगी।

हमारी जिंदगी में चीन की घुसपैठ – बिजली के उपकरण
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