पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का संकट

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पेट्रोल-डीजल के दामों में लगातार वृद्धि और उससे बढ़ती महंगाई की मार से लोग परेशान दिखाई देते हैं। यदि राज्य सरकारें जनहित को देखते हुए केंद्र की ही तर्ज पर वैट की दर कुछ घटा दें तो राज्यों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 15 रुपये तक कम हो जाएंगी, जो बहुत बड़ी राहत होगी; क्योंकि जनता 75 से 80 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल को अब सामान्य मानने लगी है।

७० साल में २० गुना वृद्धि

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1991 के बाद से देश आर्थिक सुधार की जिस राह पर आगे बढ़ा, उस पर संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के अलावा उसकी दौड़ तेज ही रही। यही वजह है कि देश की आर्थिक विकास दर 1947 की तुलना में 20 गुना से भी अधिक हो गई है। इससे भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

जीएसटी आम आदमी के लिए बहुत अच्छा

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विरोध करने वाले भले बदलावों को जीएसटी की अधूरी तैयारी का नाम देते रहें, लेकिन कर का पूरा ढांचा ही बदल देने वाली प्रणाली को सुचारु होने में कुछ महीने तो लगेंगे ही। दीर्घावधि में जीएसटी सब के लिए लाभप्रद ही होगा। पिछले करीब आठ महीने से देश भर में जो भी नाम सुर्खियों में रहे हैं, उनमें जीएसटी काफी आगे है। जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर आजादी के बाद का सब से बड़ा कर सुधार है, जिसे लागू करने के लिए सरकारों को बहुत मशक्कत भी करनी पड़ी है। वास्तव में यह क्रांतिकारी कदम है, इसलिए इसका जम कर समर्थन भी किया जा रहा

चीनी माल का खुद बहिष्कार करें

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जहां तक संभव हो, आप स्वयं ही चीनी माल का बहिष्कार करें। खास तौर पर ऐसे सामान का बहिष्कार तो करना ही चाहिए, जिसे देसी कारीगर भी तैयार करते हैं। यह तात्कालिक तरीका हो सकता है। इसका स्थायी हल है देश में युवा उद्यमियों एवं विनिर्माण को बढ़ाना देना ताकि वे देश

वस्तु एवं सेवा कर

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वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली १ जुलाई से क्रांतिकारी परिवर्तन है और पूरे देश को एक बाजार बना रही है। लेकिन इसके लागू होने से पहले तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे थे और अब भी इसमें दरों तथा कीमतों को लेकर जबरदस्त संशय बरकरार है। तमाम वस्तुओं और सेवाओं के लिए कर क

जीएसटी से कायाकल्प

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आखिरकार वह घड़ी आ ही गई, जिसका इंतजार करीब एक दशक से किया जा रहा था| इस जुलाई में भारत कर प्रणाली में सुधार के लिहाज से बहुत बड़ी छलांग लगाने जा रहा है क्योंकि अप्रत्यक्ष कर की नईॠषभ  वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली लागू होने जा रही है|

नोटबंदी से आया नया युग

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जब नोट गिने बगैर ही खरीदारी की जा सकती है, सारा काम पूरा हो सकता है तो गड्डियां साथ में लेकर क्यों चलना और आफत को न्योता क्यों देना? जब इतनी सहूलियत मिल रही है तो इसका फायदा नहीं उठाना बचपना ही कहा जाएगा। वैसे भी समय के साथ चलने में ही समझदारी होती है।

नोटों की किल्लत और छपाई

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देश में ५०० और १,००० रुपये के पुराने नोट बंद हुए डेढ़ महीने से ज्यादा वक्त बीत चुका है। हालांकि बैंकों की शाखाओं में और एटीएम के बाहर पहले जैसी लंबी कतारें तो नहीं दिख रही हैं और गांव-देहात में भी जरूरत भर की रकम मिल जाने की खबर आ रही है, लेकिन नोटों की

काले धन का कुचला फन

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ८ नवम्बर की रात को ५०० और १,००० रुपये के नोट बंद करने का जो ऐलान किया, वह पी. वी. नरसिंह राव के समय भारत की अर्थव्यवस्था को खोलने के निर्णय के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक निर्णय था। जिस देश में आधी से अधिक अर्थव्यवस्था अब भी नकदी

 ग्रामीण रोजगार

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 अगर ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण, पूंजी और बाजार के सवालों को सरकार ने हल कर दिया तो गांवों में रोजगार की तस्वीर ही बदल जाएगी| इससे शहरों की ओर पलायन थमेगा और किसानों को जान भी नहीं गंवानी पड़ेगी|

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