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पछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है। एक नये आभासी समाज और समुदाय का निरंतर निर्माण भी हो रहा है। हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और सम्बंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर और इंटरनेट ही बहुत हद तक जिम्मेदार है।
 
वर्तमान में विकास से सम्बन्धित अनेक पद प्रचलित हैं। इनमें समावेशी विकास, संतुलित विकास, संवहनीय विकास और सतत विकास आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि विकास एक बहुआयामी शब्द या पद है। विकास गुणात्मक और मात्रात्मक या संख्यात्मक दोनों है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विकास की अवधारणा एक नहीं, अनेक हैं। भिन्न-भिन्न समाजों, परंपराओं, दर्शनों और सभ्यताओं में विकास को अलग-अलग प्रकार से धारण किया गया है। विकास की धारणा विभिन्न कालखंडों में परिवर्तित होती रही है।
सोशल मीडिया संचार का अत्याधुनिक माध्यम
मानव सभ्यता के विकास में संचार की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। संचार सार्वकालिक और सार्वभौमिक है। मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल से ही संचार के विभिन्न रूपों और माध्यमों की जानकारी मिलती है। मानव विकास के साथ-साथ संचार के रूपों, प्रारुपों, साधनों, उपकरणों, माध्यमों, तरीकों आदि का भी विकास होता आया है। डिजिटल मीडिया और इसके ही एक प्रारूप सोशल मीडिया को संचार के अत्याधुनिक माध्यम के तौर पर जाना जाता है। अत्याधुनिक संचार माध्यम अर्थात नया मीडिया का मूलभूत कारक इंटरनेट है। यह अनेक कम्प्यूटरों को आपस में बिना तार के जोड़नेवाला नेटवर्क है। सामान्यत: सोशल मीडिया से आशय वेबसाइट और एप्लिकेशन आधारित एक ऐसी तकनीकी व्यवस्था से है जिसमें एक जैसे विचार के लोगों को आपस में साझेदारी, संदेशों के आदान-प्रदान का अवसर व क्षमता प्रदान करता है। सोशल मीडिया सिर्फ संचार नहीं है, यह संवादात्मक संचार है। इसमें उपयोगकर्ता को कई प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। उपयोगकर्ता न सिर्फ सूचनाएं, विचार व अभिरुचियां ही, वरन अपनी प्रतिक्रियाएं, टिप्पणियां आदि भी फोटो, वीडियो और संकेत-चिह्नों के माध्यम से प्रेषित कर सकता है। इसमें सबसे खास बात यह है कि कोई भी उपयोगकर्ता अपनी पसंद, रुचि और अनुकूलता के आधार पर व्यक्ति की पहचान कर उससे सम्पर्क कर मित्र बन या बना सकता है।
निश्चित ही संचार तकनीक ने एक नई दुनिया को जन्म दिया है। इस नई दुनिया का नाम है आभासी दुनिया अर्थात वर्चुअल वर्ल्ड। यह ऐसी दुनिया है जहां अत्यंत निकट का अथवा कोसों दूर बैठा व्यक्ति आपसे जुड़ सकता है, अपनी बात कह सकता है, आपकी बात पढ़-सुन सकता है। एक ऐसी व्यवस्था जहां दूरी और समय बहुत कम प्रासंगिक रह गये हैं। यह एक ऐसी संचार-संवाद की व्यवस्था है जहां तकनीक पर निर्भरता के अलावा आप बहुत स्वतंत्र और स्वावलंबी होते हैं। इसके द्वारा उपयोगकर्ता अपने विचारों, भावनाओं, सूचनाओं आदि को विभिन्न प्रारूपों में साझा करता है। तीव्रता, स्वतंत्रता और तकनीक पर निर्भरता सोशल मीडिया की प्रमुख विशेषता प्रतीत होती है।
सोशल मीडिया पूर्णत: तकनीक आधारित माध्यम
सोशल मीडिया पूर्णत: डिजिटल माध्यम है। यह तकनीक आधारित साझेदारी है। बिना तकनीक और उपकरण के यहां सम्प्रेषण की कल्पना भी बेमानी है। इसीलिये कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के लिये कम्प्यूटर या मोबाइल उपकरण अनिवार्य है। दरअसल सोशल मीडिया का उपयोगकर्ता यहां अपने-अपने उपकरणों की साझेदारी करता है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है।
सोशल मीडिया मुद्रित या इलेक्ट्रानिक माध्यमों (मीडिया) से गुणवत्ता, पहुंच, आवृत्ति, उपयोगिता, तात्कालिकता और स्थायित्व की दृष्टि से बहुत भिन्न है। इसमें अनेक सूचना प्रदाता और अनेक सूचना ग्राहक या प्रापक होते हैं। अधिकांशत: ये एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जबकि मुद्रित एवं इलेक़्ट्रानिक माध्यम सामान्यत: एकालापी (मोनोलोगिक) होते हैं, जिसमें एक सूचनादाता और अनेक ग्राहक/प्रापक होते हैं।
आज अनेक सोशल मीडिया के वेबसाइट प्रचलन में हैं। इनके उपयोगकर्ताओं की संख्या करोड़ों में है। विश्लेषकों ने इसके नाकारात्मक व सकारात्मक प्रभावों के बारे में विस्तार से बताया है। सोशल मीडिया समान रुचि, विचार के व्यक्तियों को जोड़ने व अपना समुदाय विकसित करने की सहूलियत देता है। यह वाणिज्य व व्यापारिक गतिविधियों के लिये भी काफी उपयोगी है। वर्तमान समय में राजनीतिक दल भी बढ़-चढ़कर उपयोग कर रहे हैं। किंतु सोशल मीडिया का उपयोग नकारात्मक और असामाजिक गतिविधियों के लिये भी खूब हो रहा है। यह नकारात्मक उपयोग और नकारात्मक प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किया जा रहा है। अध्ययन के अनुसार, इंटरनेट उपयोगकर्ता अन्य वेबसाइट की तुलना में सोशल नेटवर्किंग साइट पर कई गुणा अधिक समय व्यतीत करते हैं। १३ से १७ वर्ष आयु के ६० प्रतिशत से अधिक किशोरों ने अपना खाता सोशल नेटवर्किंग साइट पर बना रखा है। सोशल मीडिया का उपयोग वाणिज्य, व्यापार और प्रबंधन के लिये भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इसके द्वारा ग्राहकों की पहचान, उनसे सम्पर्क और इस सम्बंध को निरंतर बनाये रखने तथा विज्ञापन आदि कार्य किया जा रहा है। जन सामान्य तक पहुंच होने के कारण सामाजिक मीडिया को लोगों तक विज्ञापन पहुंचाने का सबसे अच्छा जरिया समझा जाता है।
सोशल मीडिया का तकनीकी पक्ष
अब थोड़ा सोशल मीडिया की तकनीक को समझने का प्रयास किया जाए। यहां एक बात स्पष्ट है कि डिजिटल मीडिया कंप्यूटर या मोबाइल फोन नेटवर्क स्वतंत्र और स्वायत्त उपकरणों (कंप्यूटरों या मोबाइल) का संकलन है। इन्हें कई तरीकों से आपस में जोड़ा जा सकता है। एक बहुत छोटे सीमित क्षेत्र के कंप्यूटरों को आपस में जोड़ने के नेटवर्क को लोकल एरिया नेटवर्क (ङ-छ) कहा जाता है। वहीं १ से २ किमी की परिधि में विभिन्न कंप्यूटरों को परस्पर जोड़ने के नेटवर्क को मेट्रोपोलिटिन एरिया नेटवर्क (च-छ) कहा जाता है। लगभग ४० से ५० किमी से अधिक की परिधि में फैले कंप्यूटर नेटवर्क को व्हाइड एरिया नेटवर्क (थ-छ) कहा जाता है। इंटरनेट के लिये प्रयुक्त कंप्यूटर को ’होस्ट‘ (Host) कहा जाता है। प्रत्येक कंप्यूटर या मोबाइल फोन वस्तुतः एक-दूसरे उपकरण को विशिष्ट अंकों से पहचानता है।
सूचना प्रौद्योगिकी से सम्बंधित विभिन्न विषयों के जानकार और लेखक बालेन्दु शर्मा दधिचि के अनुसार १९६६ में डारपा (D¬RP¬Defence advanced Research Projects agency) ने आरपानेट (¬RP¬NET-The advanced Research Projects Agency Network) के रूप में कंप्यूटर जाल बनाया, जो कि चार स्थानों से जुड़ा था। १९६९ में अमेरिकी रक्षा विभाग के द्वारा स्टैनफोर्ड अनुसंधान संस्थान के कंप्यूटरों की नेटवर्किंग करके इंटरनेट की संरचना की गई। १९७१ में संचिका अंतरण नियमावली (FTP) विकसित हुआ, जिससे संचिका अंतरण करना आसान हो गया। बाद में इसमें भी कई परिवर्तन हुए और १९७२ में बॉब कॉहन ने अंतरराष्ट्रीय कंप्यूटर संचार सम्मेलन में इसका पहला सजीव प्रदर्शन किया। अमेरिकी सेना की सूचना और अनुसंधान सम्बंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए १९७३ में “यूएस एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी” ने कंप्यूटरों के द्वारा विभिन्न प्रकार की तकनीकी और प्रौद्योगिकी को एक-दूसरे से जोड़कर एक “नेटवर्क” बनाने तथा संचार सम्बंधी मूल बातों (कम्यूनिकेशन प्रोटोकॉल) को एकसाथ एक ही समय में अनेक कंप्यूटरों पर नेटवर्क के माध्यम से देखे और पढ़े जाने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम की शुरुआत की। इसे “इंटरनेटिंग प्रोजेक्ट” नाम दिया गया जो आगे चलकर “इंटरनेट” के नाम से जाना जाने लगा। १९८० के दशक के अंत तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेटवर्क सेवाओं व इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और इसका इस्तेमाल व्यापारिक गतिविधियों के लिये भी किया जाने लगा। इसी वर्ष बिल गेट्स का आईबीएम के साथ कंप्यूटरों पर एक माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम लगाने के लिए सौदा हुआ। आगे १ जनवरी १९८३ को आरपानेट (¬RP¬NET) एक बार पुनः पुर्नस्थापित हुआ, और इसी वर्ष इंटरनेट समुदाय के सही मार्गदर्शन और टीसीपी/आईपी के समुचित विकास के लिये अमेरिका में इंटरनेट एक्टीविटी बोर्ड (I¬B) का गठन किया गया। इंटरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्स तथा इंटरनेट रिसर्च टास्क फोर्स इसके दो महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इंजीनियरिंग टास्क फोर्स का काम टीसीपी/आईपी प्रोटोकोल के विकास के साथ-साथ अन्य प्रोटोकोल आदि का इंटरनेट में समावेश करना है। जबकि विभिन्न सरकारी एजेंसियों के सहयोग के द्वारा इंटरनेट एक्टीविटीज बोर्ड के मार्गदर्शन में नेटवर्किंग की नई उन्नतिशील परिकल्पनाओं के विकास की जिम्मेदारी रिसर्च टास्क फोर्स की है जिसमें वह लगातार प्रयत्नशील रहता है। इस बोर्ड व टास्कफोर्स के दो और महत्त्वपूर्ण कार्य हैं-इंटरनेट संबंधी दस्तावेजों का प्रकाशन और प्रोटोकोल संचालन के लिये आवश्यक विभिन्न आइडेंटिफायर्स कीरिकार्डिंग। आईडेंटिफायर्स की रिकार्डिग ’इंटरनेट एसाइन्ड नम्बर्स अथॉरिटी’उपलब्ध कराती है जिसने यह जिम्मेदारी एक संस्था ’इंटरनेट रजिस्ट्री’ (आई.आर.) को दे रखी है, जो ’डोमेन नेम सिस्टम’ यानी ’डीएनएस रूट डाटाबेस’ का भी केन्द्रीय स्तर पर रखरखाव करती है, जिसके द्वारा डाटा अन्य सहायक ’डीएनएस सर्वर्स’को वितरित किया जाता है। इस प्रकार वितरित डाटाबेस का इस्तेमाल ’होस्ट’ तथा ’नेटवर्क’ नामों को उनके यूआरएल पतों से कनेक्ट करने में किया जाता है। उच्चस्तरीय टीसीपी/आईपी प्रोटोकोल के संचालन में यह एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है, जिसमें ई-मेल भी शामिल है। उपभोक्ताओं को दस्तावेजों, मार्गदर्शन व सलाह-सहायता उपलब्ध कराने के लिये समूचे इंटरनेट पर ’नेटवर्क इन्फोरमेशन सेन्टर्स’(सूचना केन्द्र) स्थित हैं। इसी वर्ष नवम्बर १९८३ में पहली क्षेत्रीय नाम सेवा पॉल मोकपेट्रीज द्वारा सुझाई गई तथा इंटरनेट सैनिक और असैनिक भागों में बांटा गया। १९८४ में एप्पल ने पहली बार फाइलों और फोल्डरों, ड्रॉप डाउन मेनू, माउस, ग्राफिक्स आदि युक्त ’आधुनिक सफल कंप्यूटर’ लांच किया। १९८६ में अमेरिका की ’नेशनल सांइस फांउडेशन’ने एक सेकेंड में ४५ मेगाबाइट संचार सुविधा वाली ’एनएसएफनेट’सेवा का विकास किया जो आज इंटरनेट पर संचार सेवाओं की रीढ़ है। इस प्रौद्योगिकी के कारण ’एनएसएफनेट’ बारह अरब सूचना पैकेट्स को एक महीने में अपने नेटवर्क पर आदान-प्रदान करने में सक्षम हो गया। इस प्रौद्योगिकी को और अधिक तेज गति देने के लिए अमेरिका के ’नासाफ और ऊर्जा विभाग ने अनुसंधान किया और ’एनएसआईनेट’और ’ईएसनेट’जैसी सुविधाओं को इसका आधार बनाया। आखिर १९८९-९० मे टिम बर्नर्स ली ने इंटरनेट पर संचार को सरल बनाने के लिए ब्राउजरों, पन्नों और लिंक का उपयोग कर के विश्वव्यापी वेब-(WWW (वर्ल्ड वाइडवेब-डब्लूडब्लूडब्लू) से परिचित कराया। १९९१ के अंत तक इंटरनेट इस कदर विकसित हुआ कि इसमें तीन दर्जन देशों के पांच हजार नेटवर्क शामिल हो गए, जिनकी पहुंच सात लाख कंप्यूटरों तक हो गई। इस प्रकार चार करोड़ उपभोक्ताओं ने इससे लाभ उठाना शुरू किया। इंटरनेट समुदाय को अमेरिकी फेडरल सरकार की सहायता लगातार उपलब्ध होती रही क्योंकि मूल रूप से इंटरनेट अमेरिका के अनुसंधान कार्य का ही एक हिस्सा था, और आज भी यह न केवल अमेरिकी अनुसंधान कार्यशाला का महत्त्वपूर्ण अंग है, वरन आज की इंटरनेट प्रणाली का बहुत बड़ा हिस्सा भी शिक्षा व अनुसंधान संस्थानों एवं विश्वस्तरीय निजी व सरकारी व्यापार संगठनों की निजी नेटवर्क सेवाओं से ही बना है। १९९६ में गूगल ने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में एक अनुसंधान परियोजना शुरू की जो कि दो साल बाद औपचारिक रूप से काम करने लगी। २००९ में डॉ स्टीफन वोल्फरैम ने ’वोल्फरैम अल्फा’ की शुरुआत की।
भारत में इंटरनेट १९८० के दशक में आया, जब एर्नेट (Educational Research Network) को भारत सरकार के इलेक्ट्रानिक्स विभाग और संयुक्त राष्ट्र उन्नति कार्यक्रम (UNDP) की ओर से प्रोत्साहन मिला। सामान्य उपयोग के लिये इंटरनेट १५ अगस्त १९९५ से उपलब्ध हुआ, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) ने गेटवे सर्विस शुरू की। भारत मे इंटरनेट प्रयोग करनेवालों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, और वर्तमान ४०० मिलियन यानी ४० करोड़ से अधिक लोगों तक इंटरनेट की पहुंच हो चुकी है, जो कि देश की कुल जनसंख्या का करीब ३३ फीसदी और दुनिया के सभी इंटरनेट प्रयोक्ता देशों के हिसाब से महज १० फीसदी है। मौजूदा समय में इंटरनेट का प्रयोग जीवन के सभी क्षेत्रों-सोशल मीडिया, ईमेल, बैंकिंग, शिक्षा, ट्रेन इंफॉर्मेशन-रिजर्वेशन, ऑनलाइन शॉपिंग, अंतरिक्ष प्रोद्योगिकी, बीमा, विभिन्न बिल घर बैठे जमा करने और अन्य सेवाओं के लिए भी किया जा रहा है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार टेलीफोन उपभोक्ताओं की संख्या के मामले में भारत ने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या के मामले में भी भारत दिसम्बर २०१५ में अमेरिका से आगे निकल चुका है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और आईएमआरबी के आंकड़ों के अनुसार दिसम्बर २०१५ तक भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या ४० करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। भारत में पिछले एक साल में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या में ४९ फीसदी की भारी-भरकम वृद्धि हुई है। यह नया मीडिया भारतवर्ष में देर से प्रचलित हुआ लेकिन धीरे-धीरे इसने समाज के हर वर्ग में अपनी जगह बना ली है।
प्रमुख नेटवर्किंग साइट
सामाजिक या सामुदायिक मीडिया डिजिटल मीडिया का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप है। यह लोगों को पारस्परिक मंच के रूप में उपलब्ध है। सामाजिक मीडिया के कई रूप हैं जिनमें कि इंटरनेट फोरम, वेबलॉग, सामाजिक ब्लॉग, माइक्रोब्लागिंग, विकीज, सोशल नेटवर्क, पॉडकास्ट, फोटोग्राफ, चित्र, चलचित्र आदि सभी आते हैं। वर्तमान समय में प्रमुख सामाजिक नेटवर्क मीडिया इन नामों से विख्यात हैं- फेसबुक, ट्विटर, लिंक्ड-इन, फ्लिकर, गूगल प्लस, टू, माईस्पेस, वे एन, इंस्टाग्राम, विण्डोज़ लाइव मैसेंजर, ऑर्कुट, गूगल प्लस, व्हाट्सएप्प व नेट लॉग के साथ ही यू ट्यूब भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स में गिने जाते हैं। इनके अलावा भी बाडू, बिग अड्डा, ब्लेक प्लेनेट, ब्लांक, बजनेट, क्लासमेट्स डॉट काम, कोजी कॉट, फोटो लॉग, फ्रेंडिका, हॉटलिस्ट, आईबीबो, इंडिया टाइम्स, निंग, चीन केटॅन्सॅण्ट क्यूक्यू, टॅन्सॅण्ट वेइबो, क्यूजोन व नॅटईज, ़फ्रांस के हाब्बो, स्काइप, बीबो, वीकोण्टैक्ट सहित १०० से अधिक सोशियल नेटवर्किंग साइट भी देश-दुनिया में प्रचलित हैं।
इंटरनेट और सोशल मीडिया का प्रभाव
सूचना तकनीक के तीव्र विकास ने सूचना क्रांति को जन्म दिया है। इस सूचना क्रांति के महत्त्वपूर्ण अंग इंटरनेट और इंटरनेट आधारित सूचना उपकरणों ने मनुष्य पर गहरा प्रभाव डाला है। पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर और इंटरनेट ही बहुत हद तक जिम्मेदार है। स्पष्टत: मीडिया क्रांति ने मानव संस्कार को एक नया रूप दिया है। मानव व्यवहार मीडिया निर्भर हो रहा है। समाज संस्थागत तौर पर भले ही कमजोर हो, लेकिन एक नये आभासी समाज और समुदाय का निरंतर निर्माण भी हो रहा है। एक जमाने में संचार की कमी थी, या बहुत ही कम उपस्थिति। लेकिन आज संचार, माध्यम और संदेशों की अधिकता है। प्रत्येक समाज अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संचार व्यवस्था विकसित करता है। लेकिन आज स्थिति उलट गई दिखती है। अब संचार व्यवस्था ही समाज और समुदाय का निर्माण कर रही हैं। मीडिया का प्रभाव स्पष्ट है। वर्तमान मीडिया मानव स्वभाव, दृष्टि, विवेक, ज्ञान, संवेदना, स्मरण, सहनशीलता और व्यवहार आदि पर गहरा प्रभाव उत्पन्न कर रहा है। यह प्रभाव सकारात्मक कम, नकारात्मक ज्यादा है। हिंसा, घृणा, उत्तेजना, उग्रता, अनैतिकता आदि की वृद्धि में जन माध्यमों विशेषकर सोशल मीडिया का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। अनेक अध्ययनों में मनुष्य के नैसर्गिक गुणों पर नये संचार माध्यमों के नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख मिलता है।
यह कहना ठीक ही होगा कि सोशल मीडिया ने देश और दुनिया में कई आंदोलनों को जन्म दिया, उसे गति और परिणति दी है। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जा रहे, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में भी उपयोग हो रहा है। मिस्र के तहरीर चौक और ट्यूनीशिया के जैस्मिन रिवोल्यूशन में इस सामाजिक मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका को कैसे नकारा जा सकता है। २०११ में अरब में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने अहम भूमिका निभाई। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल रहा। भारत में भी सोशल मीडिया को कई आंदोलनों का जनक माना जाता है।
विश्वसनीयता का अभाव, अवांछित सूचनाओं की भरमार, धन-समय की बर्बादी, लत, तलब और मानसिक बीमारी का कारण, मानव निष्क्रियता को प्रोत्साहन, भेड़चाल, अश्लीलता को मिल रहा बढ़ावा, रिश्तों में विश्वास का अभाव, निजता को खतरा आदि सोशल मीडिया के नकारात्मक पहलू हैं।
शहरी युवाओं का ेइंटरनेट व सोशल मीडिया की लत-सी लग गई है। सोशल मीडिया अपने प्रयोगकर्ताओं को मानसिक रूप से बीमार भी कर रहा है। एसोसिएट चैंबर ऑफ कॉमर्स (एसोचेम) द्वारा देश के कई मेट्रो शहरों में कराये गये एक सर्वे (वर्ष २०१४) की एक रिपोर्ट के अनुसार ८ से १३ वर्ष की उम्र के ७३ फीसदी बच्चे फेसबुक जैसी सोशल साइटों से जुड़े हुए हैं, जबकि उन्हें इसकी इजाजत नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार इन बच्चों के ८२ फीसदी माता-पिताओं ने बच्चों को खुद का समय देने के बजाय उन्हें व्यस्त रखने के लिए खुद ही बच्चों के नाम से फेसबुक अकाउंट्स बनाए थे। वहीं अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया में मनोविज्ञान के प्रोफेसर टिमोथी विल्सन की ’साइंस मैगजीन’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार ६७ फीसदी पुरुष और २५ फीसदी महिलाएं मोबाइल, टैब, कंप्यूटर, टीवी, म्यूजिक व बुक आदि इलेक्ट्रानिक गजट के बिना १५ मिनट भी सुकून से नहीं रह पाए और विचलित हो गए, तथा उन्होंने इसकी जगह इलेक्ट्रिक शॉक लेना मंजूर कर लिया। टिमोथी के अनुसार हमारा दिमाग ’मल्टी टास्किंग’ का अभ्यस्त हो गया है, तथा हम ’हाइपर कनेक्टेड’ दुनिया में रह रहे हैं, तथा इसके बिना जीना हमें बेहद मुश्किल और कष्टदायी लगता है। आज लोग आमने-सामने की मुलाकात की जगह ’वर्चुअल संवाद’ करना अधिक पसंद कर रहे हैं। विशेषज्ञों द्वारा सलाह दी जा रही है कि अधिकतम दिन में दो-तीन बार १५-२० मिनट का समय ही इनके निश्चित करना चाहिए।
सोशल नेटवर्किंग साइटें नई पीढ़ी के लोगों को जोड़ने का अच्छा जरिया भले ही हों, मगर इसके कई नुकसान भी झेलने पड़ रहे हैं। इंडस्ट्री चैंबर एसोचौम ने दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, इंदौर, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़ और कानपुर में करीब ४,००० कार्पोरेट कर्मचारियों द्वारा दिए गए जवाब पर आधारित अपनी एक नई स्टडी के आधार पर बताया है कि कार्पोरेट सेक्टर के कर्मचारी दफ्तरों में हर रोज औसतन एक घंटा वक्त ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर बरबाद कर रहे हैं, जिससे उनकी करीब साढ़े १२ फीसदी प्रोडक्टिविटी यानी उत्पादकता पर खासा असर पड़ रहा है। इसी कारण कई आईटी कंपनियों ने इन साइटों का इस्तेमाल बंद करने के लिए अपने सिस्टम्स में साफ्टवेयर लगा दिए हैं। अक्सर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्ती के साथ ही खासकर लड़के-लड़कियों में मित्रता के रिश्ते बनते हैं। सोशल साइट्स के जरिये शादी के नाम पर धोखाधड़ी के अनेक प्रकरण दर्ज किये गये हैं। यह माध्यम बड़े पैमाने पर अश्लीलता को बढ़ावा दे रहा है। सोशल मीडिया के कारण व्यक्ति की निजता भी खतरे में है।
सोशल मीडिया और विकास के अंतर्सम्बंध
इस तरह सोशल मीडिया और विकास का अंतर्सम्बंध है। इससे स्पष्ट है कि वर्तमान मीडिया पाश्चात्य (यूरोपीय) विकास के प्रारूप को समर्थन करने वाला ही सिद्ध हुआ है। मीडिया के कारण व्यक्तिवाद, बाजारवाद, पूंजीवाद आदि को प्रश्रय मिला है। वाणिज्य, व्यापार, प्रबंधन और लोकतंत्र को मीडिया (सोशल) से सहयोग मिला है। किंतु अगर विकास की भारतीय दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में कहा जाए तो वर्तमान मीडिया नकारात्मक ही सिद्ध हुआ है। एकात्म किंतु बहु आयामी विकास – व्यक्ति, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठि की दृष्टि से मीडिया की भूमिका का विचार करें तो निष्कर्ष निराशाजनक प्रतीत होते हैं। मीडिया सूचना, शिक्षा और मनोरंजन प्रदाता की अपनी निर्दिष्ट भूमिका से विमुख होता हुआ प्रतीत हो रहा है। वर्तमान मीडिया का अधिकांश स्थान और समय मनोरंजन युक्त है। उपयोगकर्ताओं को मिलने वाली सूचनाएं भी या तो अवांछित हैं या फिर अनुपयोगी। शिक्षात्मक मीडिया तो जैसे नदारद है। मनुष्य के नैसर्गिक गुणों के विकास में सोशल मीडिया की भूमिका नगण्य सिद्ध हो रही है। सोशल मीडिया से वांछित तत्त्वों की कमी और अवांछित तत्त्वों में वृद्धि देखी जा रही है। वर्तमान मीडिया (सोशल) विश्वास, आस्था, मूल्यों, नैतिकता, सत्य, प्रमाण, संवेदना आदि से निरपेक्ष हो गई लगती है। प्रारंभिक मीडिया में मानवीय तत्त्वों की प्रधानता थी, जबकि वर्तमान मीडिया में तकनीक की प्रधानता है। तकनीक प्रधान मीडिया बाजार, व्यावसायिक लाभ, व्यक्ति और पूंजी सापेक्ष है। वर्तमान मीडिया व्यक्ति और समष्टि की बात तो करता है, लेकिन प्रकृति (सृष्टि) और परमेष्ठी की बात नहीं करता। पाश्चात्य मीडिया पाश्चात्य विकास अवधारणा को तो सहयोग देता है, लेकिन यह भारतीय विकास की अवधारणा के अनुकूल प्रतीत नहीं होता। जब कभी भी विकास की धारणा में परिवर्तन होगा तो निश्चित ही मीडिया के स्वरूप और प्रारूप भी उसी के अनुकूल होगा।

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