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बाजार की स्पर्धा ने मां-बाप और बच्चों के बीच दूरी पैदा कर दी है। बच्चे अकेले हो गए हैं। उनका अकेलापन मोबाइल, इलेक्ट्रानिक गेम और चैनल पूरा कर रहे हैं और हताशा में वे अनायास हिंसा को अपनाने लगे हैं। तितलियां अब भी गुनगुनाती हैं, आसपास मंडराती भी हैं, कागज भी है, कश्ती भी है, बारिश भी है; लेकिन बचपन खो गया है। कैसे लौटाये उस बचपन को?
 
अखबारों में हमेशा की तरह खबरें पढ़ रहा था। ज्यादातर बेचैनी अखबारों से भी आती है। सामने आनेवाली खबर किस प्रकार से आपको बेचैन कर दे, कह नहीं सकते। ब्लू व्हेल गेम से सम्मोहित होकर एक बच्चे ने सातवीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली। यह खबर मन में कुछ नये तरह की परेशानी और प्रश्न का निर्माण कर रही थी। यह कैसा खेल है जो बच्चों को जान देने तक की सीमा तक पहुंचा देता है? यह प्रश्न मेरे मन में बार- बार उठ रहा था। अखबार के बाद मैंने टी.वी. लगाया। टी.वी. के एक चैनल ने मेरा ध्यान आकर्षित किया और एक गीत मेरे कानों से टकराया और कानों के रास्ते मन में उतर गया। वह गीत वैसे भी मैंने अनेकों बार गुनगुनाया होगा। उस गीत का अर्थ जब-जब यह गीत सुनता तब-तब मुझे बहुत अच्छा लगता रहा है। आज अखबार में पढ़ी खबर ने मुझे एक बेचैनी सी दी है। उस माहौल में ‘ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो’ गीत के बोल कान तक पहुंचना बहुत बड़ी बात थी। उस गीत की कुछ पंक्तियां मुझे सोचने पर मजबूर कर रही थीं।
वो कागज की कश्ती,वो बारिश का पानी
कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
कभी रेत के ऊंचे टीलों पे जाना
घरौंदे बनाना, बनाके मिटाना
वो मासूम चाहत की तस्वीर अपनी
वो ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी
न दुनिया का गम था, न रिश्तों के बंधन
बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी
यह गीत सुनकर मन प्रसन्न हो गया था। वो बचपन की, घरोंदों, बारिश का पानी, कागज की कश्ती, बुलबुल, तितलियों की बातें सुनते ही मुझे लगा जैसे मेरा मन तितलियों से भर गया है, मन रंग-बिरंगा हो गया है। बहुत देर तक मेरे मन में बचपन के खेलों की यादें रंग बिखेरती रहीं। बहुत समय तक मन को बारिश के पानी में डुबाता रहा, तितलियों के साथ मन उछलता कूदता रहा। बहुत देर मैं सोच रहा था इंद्रधनुष के रंग अच्छे तो लगते हैं, पर बचपन के खेलों में जो रंग भरे पड़े हैं उनसे अच्छे क्यों नहीं लगते?
तब मैंने अपने आपसे कुछ सवाल पूछे, ‘अच्छा बताओ, पिछली बार पानी में कागज की कश्ती कब छोड़ी थी? पिछली बार तितलियों को कब देखा था? रेत का घरौंदा कब बनाया था?’ इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं था। तब मेरा मन भी वही धुन गुनगुना रहा था-
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी…
जब कभी भी सुदर्शन ‘फ़ाक़िर’ की यह गज़ल जगजीत सिंह की आवाज में कानों तक पहुंचती है तो वह कानों के रास्ते मन में घर कर जाती है। जब कागज की कश्ती और बारिश का पानी लौटाने वाली गज़ल सुनाई पड़ती है तो मन बचपन में लौट जाता है। जब बारिश के पानी में खेलते वक्त पानी की धार में कागज की कश्ती तैराकर हम खुश होते थे। और जब नौका डूबती थी तो हमारा मन भी डूब जाता था। क्या रिश्ता है कागज की कश्ती, बारिश के पानी और उड़ती तितलियों से हमारा? अहा! अपनी पढ़ाई के नोटबुक का पन्ना चर्ररर्र्र्र फाड़कर उस कागज की कश्ती जब हम पानी में छोड़ते थे ना, तब वह कश्ती पानी के जहाज से भी बड़ी लगती थी। जब हम तितली के पीछे भागते थे, तब फूल-पेड़-पौधें हमें अपने लगते थे। तब चिड़िया और बुलबुल हमारी दुनिया का हिस्सा होती थी, लेकिन आज हम बड़े हो गये हैं, लेकिन क्या बड़ा होने का मतलब उस सुनहरे बचपन का खोना है? क्यों नहीं हम बचपन को हमेशा महसूस कर सकते? वैसे ही जैसे बचपन में चवन्नी को हाथ में लेकर खुश होते थे। उस चवन्नी का मतलब एक प्लेट भजिया होता था, और बहुत कुछ होता था। बचपन में आदमी हंसता हुआ दिखता नहीं, सचमुच हंसता है। हम बच्चे आपस में लड़ते, पर जल्द ही भूल भी जाते ये कि, ‘लड़े क्यों थे!’ तब बांटकर खाना अच्छा लगता था। आज बड़े होने के बाद तो जैसे उल्टी होड़ लगी है, अपनों को गैर बनाने की होड़। दूसरों को नकारने की यह समझ पता नहीं कहां से आई है? पर हमारे अंदर जो बचपन था उसके जाने के बाद ये बातें आ गई हैं। उससे भी अहम सवाल है, क्यों होती है ऐसी समझ विकसित हममेंे? क्यों हम अपने-अपने किले में बंद हो जाना पसंद करने लगते हैं, बड़े हो जाने के बाद? ये सवाल कई बार, कई तरीकों से सामने आते रहते हैं, और हम हर बार उनके उत्तर टालते रहते हैं। टालते हैं या होते ही नहीं इस सवालों के उत्तर हमारे पास। हां, जब भी मैं तितली को मंडराते हुए मेरे पास उड़ते देखता हूं तो कोई जबाब भी मेरे आसपास मंडराने लगता है। उन जवाबों को पकड़ने की कोशिश करता हूं तो वे भी तितली की तरह फिसल जाते हैं। ना ही मैं मेरे बचपन के आनंद भाव को मेरी अगली नस्ल तक पहुंचा पाता हूं, ना उन्हें कागज की कश्ती, तितली, रेत का किला दे पाता हूं, ना इन खेलों से मिलने वाला वह बचपन का परमानंद।
जब भी मैं अखबारों में बाल-हिंसा से जुड़ी खबरें पढ़ता हूं तो परेशान हो उठता हूं। डरावनी फिल्मों के सनसनीपूर्ण दृश्यों जैसी बाल-हिंसा की घटनाएं हमारे समय की बर्बर वास्तविकताओं की कुछ भयंकर झलकियां हैं। जैसे क्लास टीचर को विद्यार्थियों द्वारा गोली मार देना। नकल न कर पाने से बौखलाये छात्र द्वारा अपने सहपाठी छात्रों को हिंसा की भेंट चढ़ा देना। आज नई घटना ने दस्तक दी है। ब्लू व्हेल गेम खेलते हुए १४ साल के बच्चे ने आत्महत्या की। एक के बाद एक, दूसरी, फिर तीसरी, ऐसी अनगिनत घटनाओं ने मीडिया को खासी खुराक दे रखी है, और हमें बेचैनी। गत कुछ सालों से बाल-हिंसा की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। इन घटनाओं में निचले तबके के बच्चों से लेकर शिक्षित और सुविधासंपन्न वर्ग के बच्चे भी शामिल हैं। मनोवैज्ञानिकों की मान्यता है कि बच्चा मूलत: हिंसक नहीं होता। बच्चों की कल्पना की दुनिया मोहक और सुंदर होती है। क्रोध, द्वेष, आक्रोश, हिंसा मानव के जन्मजात भाव हैं, पर बाल्यावस्था और किशोरावस्था में ये सुषुप्तावस्था में रहते हैं। आजकल यह भाव बच्चों में तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बात को लेकर समाजशात्री और मनोविज्ञानी सभी हैरान हैं। मुद्दा यह है कि बच्चों के मन पर हिंसा का काला साया क्यों गहराता जा रहा है? आखिर वे कौन से कारण हैं, जो पढ़ने-खेलने की उम्र के बच्चों के मन-मस्तिक में बढ़ती हिंसक वृत्ति के लिए उत्तरदायी हैं?
बच्चों के मन में गहराती हिंसा के पीछे पारिवारिक एवं सामाजिक कारण भी हैं। उपभोक्ता संस्कृति के चलते समाज को नियंत्रित करनेवाले नैतिक मूल्यों का कोई अर्थ नहीं रहा, और न ही संदर्भ। ढेर सारा पैसा कमाकर दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं जुटा लेने की अंधी दौड़ हर परिवार में जारी है। मां-बाप के पास बच्चों को देने के लिए समय नहीं है। बच्चे घर में रहते हुए भी अकेले हैं। स्नेह, प्रेम और मार्गदर्शन के अभाव में बच्चे बढ़ रहे हैं। परिणामस्वरूप नकारात्मक भाव जमकर विकसित हो रहा है। इसी का एक अंश है कि बच्चों के सुंदर, कोमल मन में हिंसा बढ़ रही है। टेलीविजन और मोबाइल बच्चों के एकांत के साथी हो गए हैं। टेलीविजन दिन-रात ऐशो आरामवाली, आभासी जीवनशैली परोसने में लगा है। अविकसित बच्चों के मन में यह टीवी भौतिक सुख-सुविधाओं की लालसा गलत ढंग से और गलत स्तर तक बढ़ा देता है। खेल के नाम पर बच्चों के हाथ में स्मार्ट फोन आ गया है। जो बच्चों की मोहमयी दुनिया बन गयी है। खुले मैदान में खेलने जाने वाले खेल कहीं खो गये हैं और बच्चे मोबाईल के राक्षसी खेलों मे जकड़ गये हैं।
अपनी जीवन यात्रा के दौरान जब कभी हम पीछे मुड़कर देखने की कोशिश करते हैं, तो सबसे पहले और सबसे ज्यादा मुझे अपना बचपन ही याद आता है। सोचो तो, कैसा था हमारा बचपन। बहुत संपन्न तो नहीं, लेकिन बहुत समृद्ध था। यह समृद्धि हमें महंगे देसी- विदेशी खिलौनों, बार्बी डॉल, इलेक्ट्रानिक खिलौने या स्मार्ट मोबाइल वाली नहीं थी। यह समृद्धि मिट्टी के खिलौने, कागज की नाव, बजती पिपिही, तुतारी की होती थी। यह समृद्धि मेलों में चलने वाले हिंडोला, चुरमुरों के लड्डू, झूलों में होती थी। ढेर सारे बच्चों के साथ उछलकूद और घमासान मचाने की होती थी। इन बच्चों में अपने भाई-बहन और आसपड़ोस के बच्चे होते थे। छुट्टियों में घर आये मामा, चाचा, बुआ और मौसियों के वे शरारती बच्चे भी हुआ करते थे जिनसे लड़ाई-झगड़ा, रोना-धोना और कट्टम-कुट्टी के साथ ही साथ बहुत सारे मैदानी और घर में खेलने लायक खेल होते थे। ऐेसा था हमारा समृद्ध बचपन। जिसमें घर की गरीबी का कोई शिकवा न था, बस बचपन हमारा संपन्न था।
ट्रक, टैम्पो या साइकिल के बेकार टायर की गाड़ी बनाकर, टायर को लकड़ी से धकेलते और हवा से बातें करते हुए दौड़ते रहते थे। ना थकान का गम, ना बारिश का। थकावट-आराम-चैन जैसे शब्द मानो थे ही नहीं। असल में सारी दुनिया हमारे लिए खेल ही होती थी। हमें उस बात की खबर ही नहीं थी कि आनेवाले भविष्य में बड़े होकर अनेक समस्याओें का सामना करना है। हमारे आसपास पड़ी हर वह चीज हमारे लिए खिलौना थी, जो हमें बच्चे होने का आनंद देती थी तथा हमारा बचपन समृद्ध कर रही थी। मां या पिताजी की छतरी के नीचे घर बनाकर घर-घर खेलना, आम की गुठलियों को लेकर खेलना, छोटे-छोटे पत्थरों से कंचे खेलना, कबड्डी, खो-खो, चील्हो, गिल्ली-डंडा, लोहे के सरिए के टुकड़े को गीली जमीन में घुस़ेडते हुए बड़े दूर तक निकल जाना, नाना-नानी या दादा-दादी से कहानी सुनते-सुनते सो जाना आदि में बचपन की दुनिया बसती थी। हमारे लिए उस समय संसार की वह हर चीज, हर वस्तु बड़ी थी, जो हमारे बाल मन को प्रसन्न रखती थी। उन हरेक वस्तुओं से हमारे बाल मन में इतनी ऊर्जा दौड़ती थी कि निराशा के भाव हमारे मन में नहीं आ पाते थे। इसी कारण हमारे लिए हर वस्तु अनादि और अनंत होती थी। आज कभी हम बचपन की उन स्मृतियों में गोता लगाते हैं और उस जी चुके बचपन को याद करते हैं तो उन लम्हों को फिर से जीने के लिए बेताब हो उठते हैं।
कोई व्यक्ति अपनी सुनहरी यादों को नष्ट होते नहीं देखना चाहता है। वे सुनहरी यादें खत्म हो गईं तो जीवन से कुतूहल और नवीनता ओझल हो जाएगी। हमारा वाला बचपन आज हम अपने बच्चों को सौपने में नाकाम हो रहे हैं। अपना बचपन तो हम स्मृतियों के जरिये साकार कर लेते हैं पर हमारे बच्चों का बचपन उन खुशियों से एकाकार नहीं हो पा रहा है, जो समृद्ध बचपन हमने सरलता से जी लिया है। आज का बचपन मोबाइल गेम जैसे आभासी और निराशा की तरफ सम्मोहित करने वाले खेलों की तरफ आकृष्ट हो रहा है। आखिर हमारे बचपन के सम्मुख इस पीढ़ी का बचपन क्यों बौना दिखाई देता है?
पलटकर देखें तो हमारे बचपन की जीवनशैली और वातावरण कुछ ऐसा होता था कि बिना सिखाए ही हमें खेल-खिलौने से लेकर चने-चुरमुरे तक बांटकर खाने की आदत पड़ जाती थी। बड़ों से पिटना या कान खिंचवाना हमारी दिनचर्या में अनिवार्य रूप से शामिल था। यह बड़े बुजुर्गों और बच्चों के बीच पलने-बढ़ने का सुकून भरा एहसास था। जो भावनात्मक सुरक्षा के साथ प्यार पाने का भी था। मिल-बांटकर खेलते-खाते हम एक दूसरे को बरदाश्त करना और माफ करना भी सीख जाया करते थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि बड़े-बूढ़ोंे से लेकर छोटों तक के सुख-दु:ख, तकलीफों से भी हमारा नजदीकी रिश्ता बन जाया करता था। हम उनके साथ रहते-रहते उनकी भावनाओं को महसूस करने लगते थे। उन दिनों यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि बच्चा मोटर बाइक या अपनी मंहगी बातों का शौक पूरा करने के लिए अपने माता-पिता, दादा-दादी की गला रेतकर हत्या भी कर सकता है। मां-बाप ने मुंहमांगी बातों का शौक पूरा ना करने पर आत्महत्या कर सकता है, या नकल करने में सहयोग न देने पर अपने दोस्त को जान से मार सकता है। ऐसी एक नहीं, मन को विचलित करने वाली, कितनी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं आज अखबारी सुर्खियों का हिस्सा बन हमें स्तब्ध कर रही हैं।
इसके लिए सिर्फ बच्चे ही जिम्मेदार नहीं हैं। पूरी सामाजिक व्यवस्था और बदल रही जीवनशैली जिम्मेदार है, जो देखते-देखते अपने आपको बाजार की अंधी स्पर्धा के हवाले करती चली जा रही है। साथ ही आज का बचपन भी अपने आप उस अंधी दौड़ में शामिल हो रहा है। अंधी दौड़ में फिसलन तो होनी ही है। ‘अर्थ’ के ‘अनर्थ’ का परिणाम इतना प्रबल है कि उसने हमारी समृद्ध विरासत के बीच पलते बचपन को पूर्णतया संवेदनहीन बना दिया है। विलासता, महंगे शौक और मनमौजी भाव ही सब कुछ हो गया है। यह प्रवृत्ति इतनी विकराल हो गई है कि बच्चों की दृष्टि में घर के बड़े-बूढ़े के जिंदा रहने से कहीं ज्यादा जरूरी मंहगा मोबाइल या मोटर बाइक हो गई है। संसार में जो चीज उपलब्ध है, वह पत्थर से लेकर मिट्टी, या लकड़ी से लेकर छाते तक उसे लेकर कभी हमने खेलों के साथ-साथ जीवन का आनंद पाया था, जीवन को समृद्ध करने का मार्ग चुना था- उस हमारे बचपन की तुलना में आज के बच्चों के कृत्य सुनकर हम दहल जाते हैं। चौबीस घंटे फिल्मों और टेलीविजन के पर्दे पर जिस निर्ममता से गोलियां चलते, नृशंस हत्याएं और मारकाट होते आजका बच्चा देखता है, उसके मन से हिंसा और मृत्यु की भयावहता पूरी तरह समाप्त हो गयी है। मोबाइल गेम में जो खेल होते हैं वे हत्या और मारकाट से भरे होते हैं। अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए जो रास्ते में आये उसे खतम कर अपने उद्देश्य तक पहुंचने का संदेश मोबाइल गेम देते हैं। और हमारे बच्चे वही गेम ज्यादातर खेलते हैं। एक दशक पहले तक बाल-हिंसा से जुड़ी खबरें यूरोप और अमेरिकी देशों से आती थीं और हम पूरब और पश्चिम की संस्कृति का भेद बतानेवाले आलेख अखबारों में लिखते थे। किंतु करीब एक दशक से यह वृत्ति अब तो भारत के लिए भी नई नहीं रह गयी है।
यह सब करने के मूल में उनके अंदर बैठी हताशा, असुरक्षा की भावना, भयंकर स्पर्धा के माहौल से उपजनेवाली अपेक्षाएं हैं। हमारे समाज कोे इन बातों पर सोचने की जरूरत ही गंभीरता से समझी नहीं है। वरना समाधान की दिशा में कुछ तो पहल होती। बचपन में जो संपन्नता हमारे खेलों ने हमें दी उन खेलों की दिशा में आज के बच्चों को ले जाने के बजाय हमने उल्टी राह पर चलना ही पसंद किया है। टैलेन्ट शो और रियालिटी शो के नाम पर बच्चों के द्वारा लाखों के ईनाम जीतने की होड़ में हम अपने बच्चों को खड़ा कर रहे हैं। ग्लैमर के बाजार में उतारते वक्त बच्चों की मासूमियत को निचोड़ रहे हैं। इस बाजारू अंधी दौड़ में बाजारू दृष्टिहीन टी.वी. चैनल से लेकर अति महत्वाकांक्षी और अदूरदर्शी माता-पिताओं की जमात जोर-शोर से शामिल है। अपनी महत्वाकांक्षा और इच्छाओं की पूर्ति के लिए बच्चों को हम अकेला छोड़ देते हैं और उनका अकेलापन दूर करने के लिए उनके हाथ में स्मार्ट मोबाइल थमा देते हैं। स्मार्ट मोबाइल पर हिंसा से भरे मोबाइल खेल दिन भर खेलकर बच्चों की पृष्ठभूमि भी उसी प्रकार की हो रही है। हिंसा ही उसके मनोरंजन का जरिया बनते जा रही है। हम स्वयं बच्चों से उनका बचपन छीन रहे हैं। उनकी संवेदनाओं का विध्वंस करने में लगे हैं।
हमने बचपन में कागज की कश्ती पानी में बहाकर या रेत के किले को बनाकर- बिगाड़कर, तितलियों को पकड़कर जीवन का आनंद लिया था। आज जब उन स्मृतियों के झरोखे खुलते हैं तो हमारे बचपन की खिलखिलाती, हंसती, दौड़ती, नाचती, बेसुध होकर खेलती वह डगर दिखाई देती है। यदि वह हमारे बीते जीवन का संपन्न पाथेय है तो उस पाथेय को अपने बच्चों में संस्कारित करने में नाकाम क्यों हुए हैं? उस पाथेय से हमने अपने बचपन के जीवन में आनंद पा लिया है पर शेष जीवन में उस पाथेय से आनंद का निर्माण क्यों नहीं कर पाये हैं? इस कालावधि में हमने ‘कितना पाया कितना खोया’, इसका हिसाब लगाना आसान नहीं है। लेकिन इस सारे गुणा-भाग के बीच बहुत कुछ हमसे छूट गया है। तितलियां अभी भी हैं, चिड़ियां अभी भी हैं, मिट्टी भी है। जब हम बड़े हो गये तो कुछ पल के लिये बच्चे होना भूल गये। इसी कारण हमारे और हमारे बच्चों के जीवन से वह जीवन को समृद्ध बनानेवाली तितलियों का गुनगुनाना, आस-पास मंडराना समाप्त हो गया।
आज हम स्वयं को दर्पण में देखकर ही पहचान नहीं पा रहे हैं। स्वयं का चेहरा ही पराया लग रहा है। पर कब होगी फुर्सत हमें अपने आप को देखने की पहचानने की? शायद हम फिर से कभी बच्चा बन सकेंगे? आज जो सवाल उठे हैं उन सवालों के जवाब हमारे पास शायद नहीं होंगे, पर मुझे लगता है जब हम तितली को उड़ते हुए देखेंगे तो शायद कोई जवाब हमारे पास मंडराने लगेगा….
फिर से हमें यह गीत गनगुनाकर अपने बचपन में झांकने की जरूरत है-
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा, दो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी…

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