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भारतीय सेना चीन और पाकिस्तान की सेनाओं से एकसाथ लड़ने में सक्षम है। डोकलाम पर चीन भले युद्ध की धमकियां दे रहा हो, लेकिन ऐसा करना उसके लिए कम से कम ८-९ माह संभव नहीं होगा। यही नहीं, अधिकतर चीनी सेना मैदानी प्रदेशों में है जिसे पहाड़ी इलाकों में लड़ने का अनुभव नहीं है। वियतनाम युद्ध में चीन की हार का एक कारण यह भी है। दूसरी ओर नागरिकों को भी चीनी माल का बहिष्कार कर युद्ध में योगदान करना होगा।
 
पिछले कई दिनों से भारतीय और चीनी सेनाओं की एक-एक टुकड़ियां डोकलाम पठार क्षेत्र में एक दूसरे के सामने तैनात हैं। चीनी मीडिया में भी भारत के लिए धमकी भरे लेख लिखे जा रहे हैं। डोकलाम इलाके से भारत अपनी सेना हटा लें, अन्यथा उसका एक बार फिर १९६२ जैसा हाल कर दिया जाएगा, ऐसा कुछ कहने का प्रयास इन लेखों में किया जा रहा है। चीनी अखबारों में कुल मिला कर यही साबित करने की कोशिश की जा रही है कि भारतीय सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं है, चीन की आर्थिक ताकत बहुत ज्यादा है, भारत के लिए चीन से टक्कर लेना हितकर नहीं होगा और भारत के लिए आक्रामक रवैया अपनाना नुकसानदेह होगा, इत्यादि। इसके कारण देश में एक भय का वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है। हमारे अपने भारतीय मीडिया में से भी, कुछ समाचार पत्रों ने और चैनलों ने भी यही राग अलापा है। कुछ चैनलों के पैनल बहसों में यह बात भी कही गई कि भारत की सेना, पाकिस्तान और चीन दोनों से एक साथ लड़ने में सक्षम नहीं है।
रक्षा सचिव की सब से बड़ी भूल
इसमें सब से महत्वपूर्ण दस्तावेज है सी.ए.जी. की रिपोर्ट। सी.ए.जी. ने भी अपनी तरफ से आग में घी का काम किया, हमारे शस्त्रास्त्रों की जानकारी देकर। वैसे देखा जाए तो यह जानकारी सार्वजनिक होनी ही नहीं चाहिए थी। भारतीय सेना के पास पारंपरिक युद्ध करने के लिए कम से कम तीस से चालीस दिन का गोला बारूद होना आवश्यक है, जबकि वास्तव में केवल दस दिन का गोला-बारूद ही उपलब्ध है। पारंपरिक या बहुत भीषण युद्ध की स्थिति में भारत को गोला-बारूद की घोर कमी महसूस हो सकती है।
२०१४ से श्री शशिकांत शर्मा सी.ए.जी. प्रमुख हैं। यही महाशय इससे पहले रक्षा सचिव भी थे। अगर सचमुच गोला-बारूद की कमी है, तो इसके जिम्मेदार भी तत्कालीन रक्षा सचिव, यानि की स्वयं शशिकांत शर्मा हैं।
यह भी कहा जा रहा है कि, कश्मीर में जारी परोक्ष युद्ध हो, पूर्वोत्तर में जारी विद्रोह हो, या फिर मध्य भारत में चल रहा माओवादी उपद्रव हो, इन सब से लोहा लेने में भी हमें अडचनें आ सकती हैं। बताया जा रहा है कि हम पाक, चीन, माओवादी, आतंकवादियों से लड़ने में असमर्थ हैं। यही नहीं, यह बात भी फैलाई जा रही है कि कई स्थानों पर हमारी शस्त्रास्त्रों की तैयारियां कम हैं। इस सब की वजह से अकारण ही देशभक्त नागरिकों में संशय का वातावरण फैल सकता है। तो आइये इस बात का जायजा लें कि चीन और पाकिस्तान से एक साथ युद्ध छिड़ने की स्थिति में हम अपने देश की रक्षा करने में सक्षम हैं या नहीं। देखें, इन अफवाहों में कितना दम है।
गोला-बारूद की कमी
छोटी-मोटी मुठभेड़ के लिए हमारे पास पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद है। ८० हजार करोड़ से ज्यादा राशि का गोला-बारूद देश-विदेश के अलग-अलग शस्त्र कारखानों से खरीदा जा रहा है। इसके लिए आवश्यक पहले ही दी जा चुकी है। इसके कारण आने वाले दिनों में गोला-बारूद की स्थिति निश्चित रूप से सुधरने वाली है। लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दा यह है पारंपरिक या बड़े युद्ध तुरंत शुरू नहीं किए जाते। तिब्बत की सीमा पर तैनात चीनी सैनिक केवल चीन का संरक्षण करने में सक्षम हैं। यदि भारत पर आक्रमण करना हो तो, कम से कम ४-५ लाख का अतिरिक्त सैन्य बल चीन से बुला कर सीमा पर तैनात करना पड़ेगा। इस प्रकार की तैनाती में चार से छह महीने की समयावधि चाहिए। तिब्बत में लगभग ११ से १२ हजार फूट की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद युद्ध की तैयारियों के लिए और तीन-चार हफ्ते चाहिए। जिस समय चीन इस प्रकार की हरकतें करेगा और सैनिकों की टुकड़ियों को इधर से उधर करेगा तो इसके संकेत हमें मिलने शुरू हो जाएंगे। गौऱतलब है कि, फिलहाल की स्थिति में अक्टूबर से पहले चीन के लिए इस प्रकार की हलचल करना संभव नहीं है। नवम्बर के बाद तिब्बत और हिमालय के इलाकों में जोरदार बर्फबारी शुरू हो जाती है। इसके बाद हमारे इलाकों की कई घाटियां बर्फबारी के कारण बंद हो जाती हैं। यातायात पूरी तरह से ठप हो जाता है। इसीलिए नवम्बर के बाद के तीन-चार महीनों तक युद्ध शुरू नहीं किया जा सकता। भारत के विरुद्ध अचानक युद्ध की शुरुआत करना संभव नहीं है। किसी भी परिस्थिति में हमारे कारखानों के लिए और सेना के लिए आवश्यकता के अनुसार मित्र देशों से गोला-बारूद का इंतज़ाम करना कठिन नहीं है। जैसा कि कारगिल-युद्ध के समय हमने देखा। कारगिल में बोफोर्स तोपों के लिए गोला-बारूद की जब कमी महसूस होने लगी तो इजराइल और कई मित्र देशों ने हमें सहायता की थी। इसलिए गोला-बारूद की कमी के संदर्भ में बवाल करना उचित नहीं है।
गोला-बारूद के भंडार बढ़ाना आवश्यक
फिलहाल, हमारे पास गोला-बारूद की कमी है। इसलिए गोला-बारूद के भंडार बढ़ाना आवश्यक है। लगभग ७०% गोला-बारूद हमारे देश में ही तैयार किया जाता है। केवल ३०% विदेशों से आयात किया जाता है। गोला-बारूद की मौजूदा आवश्यकता को पूरा करने के लिए ९७ हजार करोड़ रुपये से भी अधिक खर्च करना पड़ेगा। गोला-बारूद के भंडारण (Stocking of Ammunition) को सेना की भाषा में वार वेस्टेज रिज़र्व कहा जाता है। ये वार वेस्टेज रिजर्व दो प्रकार का होता है। एक सामान्य लड़ाई के लिए इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद और दूसरा, लड़ाई अगर तीव्र होती है तो तीव्र युद्ध में इस्तेमाल होने वाला गोला-बारूद। तीव्र युद्ध के लिए, सामान्य युद्ध की तुलना में तीन गुना ज्यादा गोला-बारूद की आवश्यकता होती है। फिलहाल, गोला-बारूद की इस कमी को जल्द-से-जल्द पूरा करना बहुत आवश्यक है। देश में फिलहाल, गोला-बारूद बनाने वाले ३९ कारखाने हैं। उनकी क्षमता और निर्माण की गति बढ़ाना आवश्यक है। योग्य नियोजन किया जाए तो इस कमी को आसानी से पूरा किया जा सकता है। सरकार इस काम को अवश्य पूरा करेगी, इस बात का पूरा विश्वास है। युद्ध की स्थिति में गोला-बारूद का पर्याप्त भंडार उपलब्ध होगा। लेकिन, प्रभावी रूप से युद्ध करने के लिए केवल गोला-बारूद होना ही काफी नहीं होता। इसके अलावा भी कई बातें महत्वपूर्ण होती हैं।
युद्ध सैनिक, नेतृृत्व और शस्त्रास्त्रों की तैयारियां
युद्ध करने वाले सैनिक और उनका नेतृत्व, शस्त्रास्त्रों की तैयारियां, और भौगोलिक परिस्थितियों की पूरी-पूरी जानकारी, आदि बातों पर भी युद्ध का परिणाम निर्भर करता है। हमारा वर्त्तमान सेना नेतृत्त्व, चीन की तुलना में बहुत अधिक अनुभवी है। आतंकवाद से युद्ध के कारण हमारी सेना को युद्ध का अच्छा अनुभव है। इसके अलावा, हमारे युवा अधिकारियों को सभी सीमावर्ती इलाकों में लड़ने का अनुभव है, जबकि चीनी सेना अधिकतर शहरी है। उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं है। १९७८ में चीन की सेना ने वियतनाम से युद्ध किया था। उस युद्ध में उसकी हार हुई थी। उस समय युद्ध में भाग लेने वाले सैनिक अब चीनी सेना में नहीं है। कहना गलत न होगा कि, युद्ध के अनुभव और युद्ध में किए पराक्रमों के कारण भारत की सेना चीन सेना से बहुत आगे है।
अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भारत को कई फायदे हैं। चीन के तिब्बत स्थित वायु सेना के विमानों की क्षमता और उनकी प्रक्षेपण की क्षमता पचास-साठ प्रतिशत तक कम हो जाती है। क्योंकि ११ हजार फुट या उससे अधिक ऊंचाई पर विमान चलाने से उनकी क्षमता कम हो जाती है। वहीं भारत के सभी वायु सेना तल असम में, समुद्री सतह से सटे हुए होने के कारण १००% क्षमता से शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर उड़ान भर सकते हैं। इसी वजह से भारतीय वायु सेना चीन की वायु सेना की तुलना में बेहतर साबित होती है। यही नहीं, चीन के अधिकतर वायु-सेना तल मध्य चीन में हैं, जहां से तिब्बत तक आने में समय लगता है।
चीनी व्यापार की नस भारतीय नौसेना के हाथ
भारत के तीन ओर समुद्र होने के कारण भारत को आर्थिक रूप से घेरना संभव नहीं है। किन्तु चीन के केवल एक ओर ही समुद्र है। चीन की ओर जाने वाले व्यापारी जहाज़ भारत के पास से होते हुए गुजरते हैं। युद्ध होने की स्थिति में भारतीय नौसेना चीन का व्यापार रोक सकती है, जिससे चीन को बहुत नुकसान हो सकता है। शस्त्र तैयारियों के बारे में बात करें तो ये तैयारियां भले ही थोड़ी कम हों, लेकिन आने वाले समय वे निश्चित रूप से बढ़ने वाली हैं। इजराइल से हाल में हुई संधियां और अमेरिका से हुए समझौतों से हमारी शस्त्र तैयारियां जल्द बेहतर स्थिति में आ जाएंगी। इसका फायदा हमें आने वाले लंबे समय तक मिलता रहेगा। इसलिए सामान्य नागरिकों के मन में इस बात का भय बिलकुल बेबुनियाद है कि फिर १९६२ की स्थिति पैदा होगी।
भारत का उत्तर
चीन के दुश्मन हमारे मित्र हैं। इसलिए हमें जापान, वियतनाम, ताइवान, फिलिपींस, ऑस्ट्रेलिया और मंगोलिया से सामरिक संबंध और सैनिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। इसके कारण चीन को कई मोर्चों पर एकसाथ लड़ने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। जिस प्रकार चीन, पाकिस्तान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है, उसी प्रकार हमें भी वियतनाम का इस्तेमाल चीन के खिलाफ करना होगा। इन देशों से हमें सैनिक संबंध बढ़ाना होगा। भारत और वियतनाम एक ही प्रकार के रूसी शस्त्रास्त्र इस्तेमाल करते हैं। भारत को उन्हें नौसेना, वायुसेना को मजबूत करने के लिए सहयोग देना चाहिए। हमारी ब्रह्मोस मिसाइल भी उन्हें दी जा सकती है, ताकि उनकी चीन से लड़ने की क्षमता बढ़ सके। हमारे पहाड़ी इलाकों और जंगल से भरे इलाकों में युद्ध करने के अनुभव को उनके साथ साझा करना चाहिए। तब, चीन के साथ युद्ध की स्थिति में हम वियतनाम से सहयोग ले सकेंगे। हम भी वियतनाम और जापान से अपना सामरिक सहयोग बढ़ा सकते हैं।
भारतीय सेना चीन और पाक दोनों से एक साथ लड़ने में सक्षम
चीन से युद्ध की स्थिति में, पाकिस्तान भी भारत से युद्ध करेगा। साथ ही, देश के अंदर छुपे बैठे आतंकवादी/ माओवादी भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकेंगे। भारतीय सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया था कि भारतीय सेना चीन और पाकिस्तान से एक साथ लोहा लेने में सक्षम है, साथ ही आतंरिक सुरक्षा के मामलों से निपटने में भी सक्षम है। हमें चीनी धमकियों से दब जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
 
भूटान में चीन जिस प्रकार से उपद्रव कर रहा है, वह आगे भी जारी रहेगा। इसलिए भारत को चाहिए कि १९६२ की अपनी हार के इतिहास को भूल कर, सुनियोजित तरीके से भारतीय सेना की शस्त्र तैयारियों को आगे बढ़ाए। उसके लिए चीन सीमा पर सड़कों का निर्माण, मेक इन इंडिया के तहत शस्त्रास्त्रों का निर्माण करना आवश्यक है। नियोजित तरीके से तैयारियां करने से चीन की चुनौती का सामना करने के लिए हम निश्चित ही तैयार रह सकेंगे।
 
चीन ने भारत को धमकी दी है कि यदि भारत भूटान को बीच में लाएगा तो हम भी सिक्किम की स्वतंत्रता के लिए उसका समर्थन करेंगे। नियंत्रण रेखा पर तनाव की पार्श्वभूमि में, १९६२ के युद्ध से सबक सीखने की नसीहत देने वाले चीन को भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट शब्दों में चीन से कहा है कि वह किसी भुलावे में न रहे, आज का भारत १९६२ का भारत नहीं है।
बाजार पर चीनी आक्रमण रोकना जरूरी
चीनी पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद देसी पटाखों के व्यवसाय में १००० करोड़ का घाटा होने की जानकारी हाल ही में एसोचेम ने दी है। एसोचेम के अनुसार, सरकार ने पटाखों के गैरकानूनी उत्पादकों पर कार्रवाई की है और चीन से आने वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन इसके बावजूद चीन से पटाखों का आयात जारी रहा। इसलिए देसी पटाखा उद्योग को भारी घाटा हुआ। अनेक महानगरों में पटाखों के व्यापारी, चीनी पटाखों की गैरकानूनी जमाखोरी कर, उसकी बिक्री करते रहे। इनमें प्रमुख रूप से अहमदाबाद, दिल्ली, जयपुर, लखनऊ और मुंबई के व्यापारी शामिल थे। इसी वजह से देसी पटाखा उद्योग को १००० करोड़ का झटका लगा। भारत में चीनी पटाखे आने के कारण देसी पटाखों की मांग में कमी आई। उत्पादन मूल्य अधिक होने के कारण भारतीय पटाखे मंहगे थे।
इस साल भी चीनी वस्तुएं भारतीय त्यौहार बाजार पर कब्जा करने के लिए तैयार बैठी हैं। कई चीनी वस्तुएं, सजावट की चीजें बाजार में दाखिल हो चुकी हैं। उसमें आकाशदीप, मिट्टी के दीये, विद्युत् सौंदर्यीकरण की वस्तुएं और बाकी सजावट की चीजें शामिल हैं। कई नगर पालिकाओं की महिला एवं बाल कल्याण समिति के द्वारा कई महिला स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से इन बाजारों को भारतीय वस्तुओं से भरने की कोशिश की है। लेकिन उनके लिए चीनी वस्तुओं से स्पर्धा करना लगभग असंभव है।
अब चीन ने भारतीय बाजारों पर कब्जा करना आरंभ कर दिया है। त्यौहारों में पटाखों की मांग को देख कर चीनी पटाखे भारतीय बाज़ारों में बिक्री के लिए दाखिल हो चुके हैं। भारतीय पटाखों की तुलना में चीनी पटाखे सुरक्षा और पर्यावरण की दृष्टि से ज्यादा खतरनाक हैं। इसलिए हमें इन पटाखों का इस्तेमाल टालना आवश्यक है। समुद्र मार्ग से गैरकानूनी तरीके से आयात होने वाले पटाखों के कारण भी भारतीय पटाखा उद्योग खतरे में है। विदेश से आने वाले कंटेनर्स की जांच करने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन नहीं होने के बारे में कस्टम विभाग ने पहले ही अपना असंतोष जताया है। अधिकतर माल नेपाल मार्ग से या फिर समुद्र मार्ग से भारत में आता है। हमारे घरेलू पटाखे गुणवत्ता और सुरक्षा की दृष्टि से चीनी पटाखों की तुलना में निश्चित रूप से बेहतर हैं। अगर उनकी कीमत कम कर दी जाए तो भारतीय पटाखे भी दुनिया भर के उत्पादनों से स्पर्धा करने में सक्षम होंगे।
सभी वस्तुओं में चीनी घुसपैठ
भारत त्यौहारों का देश है। पिछले साल रक्षाबंधन के समय आई ७५% राखियां चीन निर्मित थीं। गणेश मूर्तियों का एक बहुत बड़ा बाजार है जहां चीन बहुत पहले प्रवेश कर चुका है। बहुत बड़े पैमाने पर मनाए जाने वाले त्यौहारों को भुनाने के लिए चीनी वस्तुएं, आकाशदीप, मिट्टी के दीये, सजावट का सामान, और चमकदार चीजों से भारत के बाज़ार पटे पड़े हैं। २०१५ की दीवाली में चीनी सामान के विक्रेताओं ने लगभग १८०० करोड़ का मुनाफा कमाया। एक खाने-पीने की वस्तुओं और मिठाइयों को छोड़ दें, तो दीवाली से संबंधित लगभग हर वस्तु में चीनी घुसपैठ हो चुकी है। सजावट के रंग-बिरंगी चीनी आकाशदीपों से बाज़ार भरे पड़े हैं। ये आकाशदीप भारतीय आकाशदीपों की तुलना में अत्यंत सस्ते होने के कारण ग्राहक बरबस ही इनकी ओर आकार्षित हो जाते हैं। चीनी बंदनवार, मालाएं और सजावट के बाकी साजो-सामान बाजार में बहुतायत में हैं। प्लास्टिक के दीये और मालाओं की भी बहुत मांग हैं जिन्हें पूरा करने के लिए चीनी माल तैयार है। इस दीवाली पर देशप्रेमी नागरिक, केवल देसी सामान ही खरीदें, ताकि चीन के मंसूबों को पूरा न होने दिया जाए।
घरेलू, छोटे, मध्यम उद्योग बर्बादी की कगार पर
चीन के मेड इन चाइना वस्तुओं से बाजार भरे पड़े हैं। चीनी वस्तुओं ने अब देसी बाज़ार का लगभग २०-२५% हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया है। कीमत कम होने के कारण भारतीय विक्रेता और ग्राहक दोनों ही इन्हें पसंद कर रहे हैं। भारतीय बाजार में मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, भगवान के फोटो, मूर्तियों से लेकर पूजा की सामग्री तक चीन की घुसपैठ हो चुकी है। हमारे बाजार चीन की वस्तुओं से लबालब भर कर बह रहे हैं। चीन ख़ास तौर से भारत के लिए वस्तुएं बना कर एक सुनियोजित तरीके से भारत के लघु और मध्यम उद्योग की कमर तोड़ने में लगा हुआ है। चीन ने रंगबिरंगे गुड्डे-गुड़ियां, प्लास्टिक के खिलौने, गेंद-बल्ले, चाबी के खिलौने, टेडी बियर जैसे खिलौनों के बाजार में भी अपनी घुसपैठ कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया है। इसके कारण घरेलू खिलौनों की मांग में तेज़ी से कमी आई है। खिलौनों का बाजार ८०% चीनी वस्तुओं से भरा पड़ा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी निर्माण के ५७% खिलौनों में हानिकारक रसायन और रंग पाए गए हैं। पालकों को चाहिए कि वे एकजुट होकर इस धोखाधड़ी का विरोध करें और सरकार पर दबाव बना कर इन खिलौनों पर प्रतिबन्ध लगवाएं।
स्वदेशी ही खरीदें
भारत ने अब तक ‘बाय चाइनीज’ की नीति अपनाई थी, जिसका चीनी कंपनियों ने भरपूर लाभ उठाया। चीनी कंपनियों के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाज़ार है। स्वदेशी की बात ही पूरी तरह से नष्ट हो गई है। मित्रों, केवल स्वदेशी माल ही खरीदें। चीनी तो बिलकुल नहीं। जो वस्तुएं हमारे देश में अच्छे से बन सकती हों, उसके लिए हमें विदेश से माल खरीदने की क्या आवश्यकता है? सरकार को चीन की ओर से आने वाली वस्तुओं जैसे राखियां, आकाशदीप, दीये, लाइटिंग की मालाएं, होली की पिचकारियां आदि पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
चीनी वस्तुएं लघु उद्योग द्वारा ही बनाई जाती हैं। चीनी महिलाएं, ये वस्तुएं अपने घरों में बनाती हैं। इसी कारण इनकी कीमतें कम होती हैं। हमारे घरेलू व्यापारियों की मानसिकता पूरी तरह से बदल गई है। खुद उत्पादन करने के स्थान पर, चीन से कंटेनर के कंटेनर भर के माल मंगवाते हैं, या फिर स्मगल करके लाते हैं, उस पर अपना लेबल चिपका देते हैं और बाजार में बेचते हैं। इसमें वे भरपूर लाभ कमाते हैं। लेकिन इस मानसिकता के कारण चीनी अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत होती जा रही है, और हमारे यहां बेरोजगारी बढ़ रही है। चीन से मुकाबला करने के लिए हमें भी उसकी तरह लघु उद्योग बड़े पैमाने पर खड़े करने होंगे। उसके लिए सस्ते में जमीन, निवेश, कच्चा माल उपलब्ध कराना होगा। करों में कमी लानी होगी। इसके कारण हम भी गुणवत्तापूर्ण वस्तुएं बना सकेंगे और बेच सकेंगे। पिछली सरकारें इस मामले में पूरी तरह उदासीन थीं। इस सरकार से उम्मीद है कि वह इस संदर्भ कुछ कड़े कदम उठाएगी और, भारतीय लघु उद्योग और उत्पादन में तेजी लाने का प्रयास करेगी।
आज चीन बहुत बड़ी आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। इसी वजह से चीन ने अपनी मुद्रा की कीमत ३०% घटा दी है। विश्वभर के अर्थशास्त्रियों का मत है कि चीन अपने उत्पादनों की कीमतें कम कर आर्थिक मंदी से उबरने की कोशिश करेगा। इसके कारण चीनी वस्तुएं भारत और बाकी देशों के बाजार में अत्यंत ही कम कीमतों पर उपलब्ध होंगी। चीन को आर्थिक रूप से परास्त करने का यही मौका है। भारत दुनिया का सब से बड़ा बाजार है। इसलिए सभी से निवेदन है कि किसी भी चीन निर्मित वस्तु को न खरीदें। साथ ही व्यापारी मित्रों से भी निवेदन है कि चीनी माल न खरीदें, न बेचें। क्योंकि हमारे पास चीन और उसके बल पर पाकिस्तान को नेस्तनाबूत करने का बहुत बड़ा मौका अपने पास है।
चीन निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार करें
चीन को सबक सिखाने का अब वक्त आ चुका है। सारे देश में चीन के विरुद्ध वातावरण निर्माण करने की आवश्यकता है। चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करना आवश्यक है। यही नहीं, ऐसी वस्तुओं को बेचने वाले को देशद्रोही करार दिया जाय।
भारत को अब चीन के सामने सीमा विवाद पर चुनौती खड़ी करनी होगी। सीमा पर सैनिक कार्रवाइयों में तेज़ी लाना, चीन के विरोध को नजरअंदाज करते हुए दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश में आने का न्यौता देना, चीनी मजदूरों और कर्मचारियों को वीजा देने से इनकार करना, चीनी सामान पर एंटी-डंपिंग कानून लगाना, या फिर बच्चों के स्वास्थ्य का हवाला देकर चीनी खिलौनों पर प्रतिबंध लगाना, इन जैसे अनेक कदमों के द्वारा चीन पर नकेल कसी जा सकती है।
यह एक बहुत ही मूर्खतापूर्ण सोच है कि चीन का भारत में व्यापार बढ़ने से उसकी आक्रामकता कम होगी। आने वाले पांच वर्षों में सीमा विवाद के मामले में राजनैतिक समाधान निकालने के लिए चीन को बाध्य करना, इसके पीछे का मूल उद्देश्य है। इन पांच वर्षों का उपयोग जहां एक ओर चीन पर राजनैतिक-आर्थिक दबाव बनाने के लिए करना चाहिए वहीं दूसरी ओर सीमावर्ती इलाकों में सैनिक शक्ति बढ़ाने के लिए भी करना चाहिए। ऐसा करने से सीमा विवाद का हल निकालना भारत के लिए मुश्किल नहीं होगा।
चीन के पूर्व की ओर बढ़ते कदमों को रोकने के लिए पश्चिम की ओर से दबाव बढ़ाना होगा। कज़ाकिस्तान, ताजिकिस्तान में अपने गहरी पैठ बनानी होगी। जिस प्रकार चीन भारत को पाकिस्तान से लड़ाते रहता है उसी प्रकार हमें भी चीन को उसके पश्चिमी इलाकों में लड़वाते रहना पड़ेगा। अगर चीन पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ, विद्रोह और माओवाद को बढ़ावा देता है तो हमें भी तिब्बत की स्वतंत्रता के संघर्ष में और जिनयांग में स्वतंत्रता आंदोलन को मदद करनी होगी।
सीमा की रक्षा करने में भारतीय सेना सक्षम
क्या आज भारतीय सेना चीन से युद्ध कर सकती है? देश को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं। हमारी सीमा का संरक्षण करने में हमारी सेनाएं सक्षम हैं। भारत को एकात्मिक सुरक्षा की ओर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। सेना की तैयारियां, संरक्षण सामग्री की तैयारियां, और रणनीति के मोर्चे के प्रयत्नों को अगर दबंग राजनैतिक नेतृत्व की मदद मिल जाए, तो चीन की चुनौती पर विजय प्राप्त करना भारत के लिए बिलकुल कठिन नहीं है। कम से कम सुरक्षा के विषय में तो सभी राजनैतिक दलों को एक साथ आना आवश्यक है। युद्ध को टालने के लिए ही युद्ध-सक्षम रहना और युद्ध-सज्ज रहना आवश्यक है।
भारतीय सेना देश रक्षा में सक्षम है। चीन को सबक सिखाने के लिए चीनी माल का संपूर्ण बहिष्कार किया जाना चाहिए, ताकि चीन जब भी आक्रामक भूमिका रखे तो उसे आर्थिक मोर्चे पर नुक्सान पहुंचाया जा सके। सभी नागरिकों को चीन की चुनौती का सामना करने के लिए बहिष्कार के अस्त्र का प्रभावी रूप से इस्तेमाल करना आवश्यक है।
सेना हमेशा ही अपनी जिम्मेदारी पूरी क्षमता से पूरी करती है। बहिष्कार के कारण सेना का भी मनोबल बढ़ेगा। देश के आम नागरिक हमेशा ही सेना का साथ देते हैं। लेकिन आज सभी राजनैतिक दलों को एक होकर देश की सुरक्षा के लिए साथ आना आवश्यक है। इसी के कारण हम चीन की चुनौती का सामना करने में सक्षम होंगे ।

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