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भारत के बाहर अन्य देशों में भी हिंदू धर्म तथा भारतीय सभ्यता के प्रमाण मिलते रहे हैं। बाली द्वीप इंडोनेशिया का हिस्सा है। वैसे वह मुस्लिम देश है, लेकिन बाली द्वीप पूर्णता हिन्दू है। इस विविधता को वे अपनी संस्कृति मानते हैं। बाली के मंदिर, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, कला, नृत्य, संगीत आदि में हिन्दू धर्म का लुभावना रूप दर्शनीय है।
 
मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे अपने परिवार के साथ इंडोनेशिया के खूबसूरत द्वीप बाली के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ। बाली की राजधानी डेनपसार पहुंचते ही वहां के रास्तों में निर्मित मूर्तियों और कुछ हिन्दी शब्दों ने मुझे अपनी ओर आकर्षित कर लिया। हिन्दू धर्म की पहली झलक मुझे यहीं मिल गई थी। बाली के धर्म, संस्कृति, सभ्यता, और सौन्दर्य को देखने, समझने एवं महसूस करने की मेरी इच्छा बढ़ती ही जा रही थी।
जब मैंने बाली के इतिहास को जानना चाहा तो मुझे पता चला कि हिन्दू धर्म की जड़ें बाली में प्राचीन काल से ही फैली हुई हैं। ईसा पूर्व २०० के ब्राह्मी लेख वहां उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में वहां पूर्णतया हिन्दू वैदिक संस्कृति विद्यमान थी। बाली द्वीप के नाम के विषय में मान्यता है कि यह नाम पुराणों में वर्णित पाताल देश के राजा बलि के नाम पर रखा गया है।
वहां के निवासियों की बौद्ध धर्म के प्रति भी आस्था थी। बाली के मउबुडफ शहर में स्थित मगोवा गजाहफ मंदिर में भगवान गणेश की प्राचीन प्रतिमा, शिवलिंग और बुद्ध की प्रतिमा इसके साक्षी हैं।
बाली द्वीप के इतिहास के विषय में यह भी माना जाता है कि चौथी, पांचवीं शताब्दी में वहां हिन्दू राज्य स्थापित हुआ था। मध्य युग में मुसलामानों ने इंडोनेशिया पर आक्रमण किया, परन्तु ये बाली तक नहीं पहुंच सके। इस आक्रमण के बाद जावा आदि द्वीपों के निवासी भी बाली में आकर बस गए। इस तरह बाली में हिन्दू धर्म सुरक्षित रहा।
अठारहवीं सदी में बाली में डच लोगों की सत्ता आ गई। इससे बाली की राजनीति तो प्रभावित हुई, परन्तु धर्म और संस्कृति पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा। १७ अगस्त १९४५ को बाली के सेनानियों ने डच सत्ता से आजादी प्राप्त की। आज भी बाली द्वीप में प्राचीन हिन्दू धर्म और संस्कृति का सच्चा स्वरूप दिखाई पड़ता है।
५७८० वर्ग किलो मीटर में फैले हुए इंडोनेशिया के इस बाली द्वीप में समुद्र, पर्वत, झरने, वन आदि के सौन्दर्य को संजोये प्रकृति देवी अलौकिक छवि बिखेरती प्रतीत होती है। भारत से इतनी दूर स्थित मछली के आकार के बाली द्वीप में हिन्दू धर्म का विस्तार देख कर मेरा मन गद्गद् हो गया था। मैं यह जान कर अत्यधिक प्रसन्न हो गई कि बाली की लगभग ९० प्रतिशत जनता हिन्दू धर्म का पालन करती है।
धर्म के विषय में बाली के लोगों की अनेक मान्यताएं हैंं-
* हमारी ही तरह उनकी भी मान्यता है कि दुनिया में धर्म और अधर्म दोनों ही होते हैं और अधर्म पर धर्म की विजय होती है।
* बाली के लोग मानते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा बंधन से मुक्त हो जाती है, इसलिए वे मृत्यु को एक उत्सव के रूप में देखते हैं।
* बारम्बार जन्म मृत्यु के सिद्धांत और मोक्ष में भी बाली वासियों की आस्था है।
* वहां के लोग पूर्वज पूजा या पितृ पक्ष को भी महत्व देते हैं।
* बाली के लोग स्वर्ग, नर्क में यकीन करते हैं। स्वर्ग वह जगह है जहां भगवान रहते हैं। नर्क में दैत्य रहते हैं। और मनुष्य संसार में रहते हैं।
* बाली निवासी कर्म के सिद्धांत को मानते हैं। बुरे कर्मों का फल मनुष्य को धरती पर ही भोगना पड़ता है, ऐसी उनकी भी मान्यता है।
* रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों में उनकी गहरी आस्था है।
* यहां के लोग पूजा विधिविधान निष्ठा से करते हैं। ये परम्पराओं को मानते हैं और उन्हें आस्था से पूरा करते हैं।
बाली द्वीप की संस्कृति एवं सभ्यता में हिंदुत्व का प्रभाव पूर्णतया परिलक्षित होता है। यह मनोरम द्वीप हम भारतीयों को अपने धर्म और संस्कति के बहुत करीब महसूस होता है। रामायण, महाभारत आदि के विषय में यहां आम आदमी को जानकारी है। संभवतः महाभारत के विषय में हम से भी अधिक।
यहां के लोग सीधे सरल स्वभाव के हैं। विदेशी पर्यटकों की यहां बहुतायत रहती है, परन्तु बाली वासियों पर उनकी सभ्यता का प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता। वे अपनी संस्कृति के अनुकूल आचरण करते हैं।
यहां के निवासी ईश्वर के प्रति आस्थावान हैं। बाली में स्थित मंदिरों में जाते समय पूरे पैर ढके होने चाहिए, इसीलिए वहां सभी जनों को लुंगी जैसा वस्त्र दिया जाता है। उसे पहन कर ही सब मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं।
बहुत से मंदिरों में पवित्र जलकुंड हैं, जहां भक्त अत्यंत श्रद्धा के साथ स्नान करते हैं।
बाली निवासी केले के तने से बने द्रोणों में ईश्वर को प्रसाद अर्पित करते हैं। वहां घरों, दुकानों आदि के सामने जगह-जगह ऐसे दोने दिखाई देते हैं।
बाली में गंगा का बहुत महत्व है। वहां पर स्थित ‘पुरा तीरत गंगा’ में ऐसी मान्यता है कि वहां गंगा का जल आ रहा है। हमारे ड्राइवर ने जब यह कहा कि मैं गंगा के दर्शन करने भारत आना चाहता हूं तो मैं दंग रह गई। जिस गंगा का विदेशी भी इतना महत्व मानते हैं, वही गंगा हम भारतीयों ने इतनी मैली कर रखी है।
बाली मूर्तियों का देश है। यहां मूर्तियों को काले सफ़ेद चेक के लुंगी जैसे कपड़े पहनाए गए हैं। ये काला, सफ़ेद रंग पाप-पुण्य या गुण-अवगुण का प्रतीक है।
बाली में हमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सरस्वती, कृष्ण, राम, गणेश आदि सभी भगवान की मूर्तियों के दर्शन होते हैं। वहां के मंदिरों में संस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता रहता है। हमें भी रामायण पर आधारित ‘केकक नृत्य’ देखने का अवसर प्राप्त हुआ।
वहां मंदिर को पुरा कहते हैं। १५हवीं सदी में निर्मित, समुद्र में विशाल चट्टान पर बना हुआ भगवान विष्णु का मंदिर ‘तनह लोट’ अद्भुत है। इस मंदिर में एक स्रोत से जल बह रहा है। समुद्र में स्थित होने पर भी उसका जल मीठा है। उस पवित्र जल का आचमन सभी भक्त करते हैं।
वहां के प्रसिद्ध मंदिरों में माउंट अंगुग पर स्थित ‘पुरा बेसकिह’ मंदिर जिसका निर्माण १४हवीं शताब्दी में हुआ था, अत्यन्त प्रसिद्ध है। वहां अनेक देवी, देवताओं की मूर्तियां हैं। १९९५ में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया है।
‘पुरा तमन’ सरस्वती मंदिर ‘गोवा गजह’(११हवीं शताब्दी), ‘पुरा उलं दानु ब्रतान’ (१६६३ ई.), ‘तीर्थ एम्पुल’ मंदिर (ए .डी) आदि बाली द्वीप के प्राचीन मंदिर हिन्दू धर्म के प्रति बाली वासियों की आस्था के जीते जागते उदाहरण हैं।
बाली निवासी कलाप्रेमी हैं। ऐसा लगता है जैसे ईश्वर ने उन्हें कला का वरदान देकर धरती पर भेजा हो। नृत्य, संगीत, स्थापत्य, चित्रकला आदि में वहां के निवासी निपुण हैं। चांदी, सोने के आभूषण, मूर्तियां, चित्र, सीपियों, लकड़ी, कांच, क्ले और क्रोशिये आदि से बनी अनेक सुंदर वस्तुएं हमारा ध्यान अपनी और आकर्षित कर लेती हैं।
बाली उत्सवों का देश है। वहां का मुख्य त्यौहार ‘न्येपी’ है। वहां हिन्दू नव वर्ष ‘न्येपी’ को मौन दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पूर्ण शांति होती है। बालीवासी घर में रह कर पूजा अर्चना करते हैं। इस दिन सभी दुकानें, संस्थान, विद्यालय आदि सब बंद रहते हैं। यहां तक कि एअरपोर्ट भी बंद रहता है। यह पर्व आत्मावलोकन और आत्म शुद्धि का पर्व है। इस पर्व से पूर्व वहां के लोग सागर तट पर ‘मेलस्ती शुद्धिकरण’ यात्रा करते हैं।
इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से पर्व यहां मनाए जाते हैं।
बाली वासियों का मुख्य आहार चावल, मांस, मछली आदि है परन्तु हमारी तरह वहां भी गौमांस भक्षण वर्जित है।
बाली की प्राचीन भाषा ‘कवि’ संस्कृत से प्रभावित है। वहां संस्कृत में भी ग्रंथों की रचना हुई है। बाली भाषा की लिपि ‘ब्राह्मी लिपि’ से व्युत्पन्न है। इसे यहां ‘अक्षर बाली’ या ‘हनचरक’ कहते हैं।
बाली के मंदिर, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, कला, नृत्य, संगीत आदि में हिन्दू धर्म का लुभावना रूप दर्शनीय है। ‘पन्तईपाण्डवा’(पांडवा बीच) पर नव निर्मित देवी कुंती और पांचों पांडवों की विशालकाय प्रतिमाएं बाली वासियों की महाभारत के प्रति निष्ठा को दर्शाती है। स्वर्ग से सुंदर एवं मनमोहक बाली द्वीप के निवासी हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं। बाली द्वीप और बाली देशवासियों को शतशत नमन।

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