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चुनाव के लिए किसी राजनैतिक दल का नीति सम्बंधी प्रचार पत्र होता है।ये किसी राजनैतिक दल द्वारा प्रस्तुत किया गया एक ऐसा वक्तव्य विवरण होता है जिसके माध्यम से राजनैतिक दल अपने उद्देश्यों और नीतियों को जनमानस तक पहुँचाते है।अतः घोषणा पत्र राजनैतिक दल के चरित्र का भी वर्णन कर देता है।साथ ही साथ सत्ता प्राप्त कर लेने पर देश और नागरिकों के भविष्य के साथ वह राजनैतिक दल कैसा व्यवहार करेगा यह भी उजागर करता है।

भारत में लोक सभा के चुनाव होने जा रहे हैं।प्रथम चरण के पहले सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने अपने – अपने चुनावी घोषणा पत्रों को जनता के समक्ष रख दिया है।घोषणा पत्रों के आधार पर राजनैतिक दलों कि आलोचना और प्रशंसा का दौर भी शुरू हो गया है।भारतीय जनता पार्टी ने पुनः एक बार राम मंदिर का विषय अपने घोषणा पत्र में रखा है।इस विषय को लेकर सर्वाधिक संवेदनशील राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी ही रहा है। २०१४ में भाजपा के पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने के बाद से इस विषय को विरोधी दल कटाक्ष के रूप में उठाते रहे हैं।भारतीय जनता पार्टी ने संवैधानिक रूप से इसके समाधान पर बल दिया है लेकिन विरोधी दल, हिंदू भावनाओं को उद्वेलित कर इस मुद्दे को विभत्स स्वरूप देने का प्रयत्न करते रहे हैं।जम्मू कश्मीर से ३५ A हटाने और देशद्रोहियों को कड़ी सज़ा देने को भी भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कश्मीर के सभी क्षेत्रीय दलों ने इसका विरोध किया है। महबूबा मुफ़्ती ने तो देश के विभाजन तक की बात कह दी,जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के तथाकथित बुद्धिजीवी छात्र याद आ गए जिन्होंने भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे के साथ इंशाअल्ला इंशाअल्ला जोड़कर ख़ुद तो प्रसिद्ध हो गए लेकिन मुसलमानों को बदनाम कर दिया।ख़ैर,कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में ३५A को ना हटाने और देशद्रोहियों के लिए बने क़ानून को अधिक उदार बनाने की बात लिखी है।AFSPA को जम्मू कश्मीर से निरस्त करने की बात भी लिखी है।इन तीन विषयों से कांग्रेस का राजनैतिक संदेश, नियत और भारत के प्रति दूरगामी उद्देश्यों की स्पष्टता हो जाती है।

कांग्रेस इन नियमों के प्रति अपने विचारों को घोषणा पत्र में रखकर देश के प्रति अपने विरोधी स्वभाव को स्पष्ट कर चुकी है।कांग्रेस ने एक और बड़ा प्रस्ताव अपने घोषणा पत्र में रखा है। कांग्रेस से राजनैतिक समभाव रखनेवाले और पिछले पाँच वर्षों से देश को असहिष्णु सिद्ध करने में जुटे बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस के इस दाँव को मास्टर स्ट्रोक कहा है और वो दाँव है देश के ग़रीबों को ७२००० रुपए वार्षिक सीधे उनके बैंक खाते में देने का वादा। मज़ेदार बात ये है कि ये वही बैंक खाते है जिन्हें प्रयत्नपूर्वक मोदी सरकार ने खुलवाये हैं। कांग्रेस मोदी सरकार के इस क़दम का विरोध भी करती रही है।

अब प्रश्न ये उठता है कि ये ७२००० रुपए वार्षिक आएँगे कहा से ? इसके कारण देश की अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाला भार कौन वहन करेगा ? इस प्रश्न के उत्तर में एक कांग्रेसी मित्र ने कह दिया कि बोलने में क्या हर्ज है।तो क्या कांग्रेस ‘वाचनै: किम दरिद्रता’ के सिद्धांत पर चल रही है ? एक और प्रश्न, कांग्रेस मतदाताओं को उनके बैंक खाते में ७२००० रुपए वार्षिक देने का वादा कर मत माँग रही है। मत प्राप्त करने के लिए ये घूस नहीं तो और क्या है ?

इस अंतिम प्रश्न का उत्तर विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र में लोक सभा चुनावों को देश के महात्यौहार के रूप में मनाने वाले संगठन चुनाव आयोग से अपेक्षित है।

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