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यह सभी जानते हैं कि मानवता का अस्तित्व जल पर निर्भर है और आम इंसान के पीने-खेती-मवेशी के लिए अनिवार्य मीठे जल का सबसे बड़ा जरिया नदियां ही हैं. जहां-जहां से नदियां निकलीं, वहां-वहां बस्तियां बसती गईं और इस तरह विविध संस्कृतियों, भाषाओं, जाति-धर्मों का भारत बसता चला गया. तभी नदियां पवित्र मानी जाने लगीं-केवल इसलिए नहीं कि इनसे जीवनदायी जल मिल रहा था, इसलिए भी कि इन्हीं की छत्र-छाया में मानव सभ्यता पुष्पित-पल्लवित होती रही. गंगा और यमुना को भारत की अस्मिता का प्रतीक माना जाता रहा है. लेकिन विडंबना है कि विकास की बुलंदियों की ओर उछलते देश में अमृत बांटने वाली नदियां आज खुद जहर पीने को अभिशप्त हैं. इसके बावजूद देश की नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने की नीतियां महज नारों से आगे नहीं बढ़ पा रही हैं. सरकार में बैठे लोग खुद ही नदियों में गिरने वाले औद्योगिक प्रदूषण की सीमा में जब विस्तार करेंगे तो यह उम्मीद रखना बेमानी है कि देश की नदियां जल्द ही निर्मल होंगी. असल में हमारी नदियां इन दिनों कई दिशाओं से हमले झेल रही हैं, उनमें पानी कम हो रहा है, वे उथली हो रही हैं, उनसे रेत निकाल कर उनका मार्ग बदला जा रहा है, नदियों के किनारे पर हो रही खेती से बह कर आ रहे रासायनिक पदार्थ, कल-कारखानों और घरेलू गंदगी का नदी में सीधा मिलाना. सनद रहे, नदी केवल एक जलमार्ग नहीं होती, जल के साथ उसमें रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति, उसके किनारे की नमी, उसमें पलने वाले सूक्ष्म जीव, उसका इस्तेमाल करने वाले इंसान व पशु; सभी मिल कर एक नदी का चक्र संपूर्ण करते हैं. यदि इसमें एक भी कड़ी कमजोर या नैसर्गिक नियम के विरूद्ध जाती है तो नदी की तबियत खराब हो जाती है.
 
सन २००९ में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में कुल दूषित नदियों की संख्या १२१ पाई थी जो अब २७५ हो चुकी है. यही नहीं आठ साल पहले नदियों के कुल १५० हिस्सों में प्रदूषण पाया गया था जो अब ३०२ हो गया है. बोर्ड ने २९ राज्यों व छह केंद्र शासित प्रदेशों की कुल ४४५ नदियों पर अध्ययन किया, जिनमें से २२५ का जल बेहद खराब हालत में मिला. इन नदियों के किनारे बसे शहरों में ३०२ स्थानों पर सन २००९ में ३८ हाजर एमएलडी सीवर का गंदा पानी नदियों में गिरता था जो कि आज बढ़ कर ६२ हजार एमएलडी हो गया. चिंता की बात है कि कहीं भी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है. सरकारी अध्ययन में ३४ नदियों में बायो केमिकल आक्सीजन डिमांड यानि बीओडी की मात्रा ३० मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई और यह उन नदियों के अस्तित्व के लिए बड़े संकट की ओर इशारा करता है.
 
भारत में प्रदूषित नदियों के बहाव का इलाका १२,३६३ किलोमीटर मापा गया है. इनमें से १,१४५ किलोमीटर का क्षेत्र पहले स्तर यानि बेहद दूषित श्रेणी का है. दिल्ली में यमुना इस पर शीर्ष पर है, इसके बाद महाराष्ट्र का नंबर आता है जहां ४३ नदियां मरने की कगार पर हैं. असम में २८, मध्यप्रदेश में २१, गुजरात में १७, कर्नाटक में १५, केरल में १३, बंगाल में १७, उप्र में १३, मणिपुर और ओडिशा में १२-१२, मेघालय में दस और कश्मीर में नौ नदियां अपने अस्तित्व के लिए तड़प रही हैं. ऐसी नदियों के कोई ५० किलोमीटर इलाके के खेतों की उत्पादन क्षमता लगभग पूरी तरह समाप्त हो गई है. इलाके की अधिकांश आबादी चर्मरोग, सांस की बीमारी और पेट के रोगों से बेहाल है. भूजल विभाग का एक सर्वे गवाह है कि नदी के किनारे हैंडपंपों से निकल रहे पानी में क्षारीयता इतनी अधिक है कि यह ना तो इंसान के लायक है, ना ही खेती के. सरकार के ही पर्यावरण और प्रदूषण विभाग बीते २० सालों से चेताते रहते हैं लेकिन आधुनिकता का लोभ पूरे सिस्टम को लापरवाह बना रहा है.
 
नदियों के सामने खड़े हो रहे संकट ने मानवता के लिए भी चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं है. हमारी नदियों के सामने मूल रूप से तीन तरह के संकट हैं- पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण.
असल में इन नदियों को मरने की कगार पर पहुंचाने वाला यही समाज और सरकार की नीतियां हैं. सभी जानते हैं कि इस दौर में विकास का पैमाना निर्माण कार्य है -भवन, सड़क, पुल आदि-आदि. निर्माण में सीमेंट, लोहे के साथ दूसरी अनिवार्य वस्तु है रेत या बालू. यह एक ऐसा उत्पाद है जिसे किसी कारखाने में नहीं बनाया जा सकता. यह नदियोंके बहाव के साथ आती है और तट पर एकत्र होता है. प्रकृति का नियम यही है कि किनारे पर स्वत: आई इस रेत को समाज अपने काम में लाए, लेकिन गत एक दशक के दौरान हर छोटी-बड़ी नदी का सीना छेद कर मशीनों द्वारा रेत निकाली जा रही है. इसके लिए नदी के नैसर्गिक मार्ग को बदला जाता है, उसे बेतरतीब खोदा या गहरा किया जाता है. जान लें कि नदी के जल बहाव क्षेत्र में रेत की परत ना केवल बहते जल को शुद्ध रखती है, बल्कि वह उसमें मिट्टी के मिलान से दूषित होने और जल को भूगर्भ में जज्ब होने से भी बचाती है. जब नदी के बहाव पर पॉकलैंड व जेसीबी मशीनों से प्रहार होता है तो उसका पूरा पर्यावरण ही बदल जाता है. याद करें दिल्ली में यमुना के तट पर श्री श्री रविशंकर ने महोत्सव कर उसके पूरे इको-सिस्टम को नुकसान पहुंचाया था. नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में लगातार भारी मशीनें व ट्रक आने से मिट्टी खराब होती है और उस पर पलने वाले पर्यावरण मित्र सूक्ष्म जीवाणु सदा के लिए मर जाते हैं. नदियों के उथले होने का कारण भी यही है.
 
आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूषण से है. कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रही रायायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं. अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र २० प्रतिशत की ही खपत होती है, शेष ८० फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है. यही अपशिष्ट या मल-जल कहा जाता है, जो नदियों का दुश्मन है. भले ही हम कारखानों को दोषी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई हिस्सा घरेलू मल-जल ही है. हर घर में शौचालय, घरों में स्वच्छता के नाम पर बहुत से साबुन और केमिकल का इस्तेमाल, शहरों में मल-जल के शुद्धिकरण की लचर व्यवस्था और नदियों के किनारे हुए बेतरतीब अतिक्रमण नदियों के बड़े दुश्मन बन कर उभरे हैं. गौर से देखें तो ये सभी कारक हमने ही उपजाए हैं.

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