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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का महापर्व अपने तृतीय चरण को पूर्ण कर चुका है | इस चरण में सर्वाधिक बैठकों का समावेश हुआ | इसीलिए इसे सबसे बड़ा चरण भी कहा जा रहा है | लोकसभा की 543 बैठकों में से 302  बैठकों पर मतदान पूर्ण हुए | 302  बैठकों में से सर्वाधिक 116 बैठकों पर तृतीय चरण में मतदान हुए |
अनेक क्षेत्रों में मतदाताओं का उत्साह देखने योग्य था किन्तु अनेक स्थानों पर उदासीनता रही |

असम में लोकसभा की 14 बैठकें हैं और गुजरात में 26, इस दृष्टिकोण से गुजरात का प्रभाव भारतीय राजनीति में असम से अधिक माना जाता है |

पिछड़े प्रदेश के रूप में जाने जानेवाले असम में 80% मतदान हुआ और औद्योगिक, आर्थिक और रोजगार के मामले में सबसे आगे रहने वाले प्रदेशों में से एक गुजरात में 64% मतदान हुआ | अनेक राजनैतिक विशेषज्ञ इसे साक्षरता, शिक्षा और जागरूकता की दृष्टि से देखते हैं | सही भी है, मतदान, राजनैतिक जागरूकता का पहला पैमाना होना चाहिए | किस क्षेत्र में कितने प्रतिशत मतदान हुआ इससे उस क्षेत्र की राजनैतिक जागरूकता का अनुमान लगाया जा सकता है |इसे इस प्रकार से भी देखा जा सकता है कि देश समाज और देशवासियों के भविष्य के प्रति कोई क्षेत्र कितना उत्साही या उदासीन है |

तो क्या असम उत्साही और गुजरात उदासीन है ? तर्क तो इस ओर ही इशारा कर रहा है | देखा जाय तो देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री देनेवाला और देश में राजनैतिक उथल – पुथल करने की क्षमता रखनेवाला प्रदेश उत्तर प्रदेश भी 80% मतदान तो नही कर पाया है |

गुजरात पिछले 10-12 सालों में राजनीति को लेकर काफी उत्साही हुआ है | जहां का युवा पैसे कमाने के प्रति अधिक रुचि रखता था आज अनेक क्षेत्रों में काम कर रहा है | अनेक सामाजिक कार्य गुजरात में हो रहे है | इस बदलाव में राजनीति के प्रति बदलते नज़रिये का बड़ा योगदान है | लोग राजनैतिक चर्चाओं में भाग लेते हैं | पहले भाग लेते थे अर्थात पलायित हो जाते थे | राजनैतिक जागरूकता और मतदान के प्रति रुचि बढ़ी है |

मतदान का प्रतिशत कम होने के अनेक कारण हैं | 23 अप्रैल 2019  को गुजरातवासियों ने 43 डिग्री सेल्सियस में मतदान किया | एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यानाकर्षण करना चाहता हूँ |
बड़े शहरों में अनेक छोटे – छोटे शहरों, आस – पास के गावों से लोग नौकरी रोजगार के लिए आते हैं | यहां बस जाते हैं | अनेक जीवनोपयोगी दस्तावेजों में से एक मतदाता पहचान पत्र भी बनवाते हैं, अर्थात अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लेते हैं |

अनेक नौकरी पेशा लोग जो स्थानांतरित होकर यहां आते हैं वो भी इस प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं | किन्तु जब ये किसी अन्य शहर चले जाते हैं तो अधिकांश लोग अपना नाम मतदाता सूची में से कम कराने की प्रक्रिया नहीं कराते | शायद भूल जाते हैं |

इस कारण भी मतदान प्रतिशत का गणित बिगड़ जाता है | आइये समझते हैं…
मान लीजिये किसी मतदान केंद्र पर 100 मतदाता हैं | इनमें से 10 ऐसे हैं जिनका नाम मतदाता सूची में है किन्तु अब वो वहां नहीं रहते | किसी अन्य स्थान पर चले गए हैं | अब इस मतदान केंद्र पर मान लीजिये 60 लोगों ने मतदान किया | मतदाता सूची के हिसाब से इस केंद्र पर 60% मतदान हुआ जबकि वास्तविक रूप से देखा जाय तो मतदान का प्रतिशत हुआ 67% क्योंकि 10 लोगों ने अपना नाम मतदाता सूची से कम ही नहीं करवाया था |
ऐसा भी नहीं है कि शत-प्रतिशत नागरिक जागरूक हैं और ऊपर बताया गया गणित ही कम मतदान का एक मात्रा कारण है | अनेक मतदाता उदासीन भी हैं जिसका कारण चुनावों के प्रति उनकी नीरसता है | अनेक स्थानों पर मतदान का बहिष्कार भी हुआ, जिसके राजनैतिक कारण है मतदान के प्रति उदासीनता नहीं |

गुजरात में मतदान का प्रतिशत कम अवश्य दिखाई दे रहा है लेकिन गुजरात ने मतदान का 52 साल पुराना कीर्तिमान तोड़ा है |

चुनाव आयोग चुनावों के आयोजन में अत्यंत परिश्रम करता है | गुजरात के जूनागढ़ के गीर में एक ऐसा केंद्र है जहां एक ही मतदाता है | चुनाव आयोग इस एक मतदाता के लिए मतदान केंद्र पर सारी सुविधाएं उपलब्ध करता है | शायद यह ही एक मात्र केंद्र होगा जहां 100% मतदान हुआ हो | हमें चाहिए कि चुनाव आयोग के प्रयासों को सम्मान देते हुए हम स्वयं अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाने और काम करवाने के प्रति जागरूक रहें |

तभी हम उत्सव प्रेमी देश के उत्सव प्रेमी नागरिक देश के महात्यौहार का उत्सव सही मायने में मना सकेंगें।

 

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