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क ई आये कई गये, पर इनके जैसे ये ही’ यह वाक्यांशडॉ. रविराज अहिरराव पर बिलकुल सटीक बैठता है। भारतीय पारंपरिक शास्त्रों और विविध सामाजिक उपक्रमों के माध्यम से मानव जीवन को सुखी बनाने के साथ ही वास्तुशास्त्र को भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलवाने और लोकप्रिय करने का कार्य डॉ. रविराज अहिरराव ने किया। इसके लिये उन्होंने विविध सृजनशील कल्पनाओं और नवीन योजनाओं के माध्यम से उन्होंने ठोस कदम उठाये। भारतीय पारंपरिक शास्त्रों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के हेतु से लगभग दो दशकों पूर्व उन्होंने ‘वास्तुरविराज’ नामक संस्था की शुरुआत की।

‘वास्तुरविराज’ वास्तुशास्त्र का मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देनेवाली भारत की सबसे बडी संस्था है। इस संस्था के माध्यम से वास्तुशास्त्र का संपूर्ण एवं सर्वाधिक काल तक दिया जानेवाले प्रशिक्षण अभ्यास क्रम चलाया जाता है। अबतक लगभग ६००० से अधिक विद्यार्थी इस संस्था से वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ही शास्त्रशुद्ध प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। इनमें लगभग २५०० से अधिक लोग वास्तुशास्त्रज्ञ के रूप में कार्य कर रहे हैं। डॉ. रविराज अहिरराव ने बडी संख्या में लोगों के रोजगार के अवसर प्रदान किये हैं।
डॉ. रविराज अहिरराव ने यह पहचान लिया कि बदलते समय के साथ ही पारंपरिक शास्त्रों में संशोधनों की आवश्यकता होती है। ‘वास्तुरविराज’ भारत की एकमेव ऐसी संस्था है जिसका वास्तुशास्त्र विषय पर स्वतंत्र संशोधन केन्द्र है। विद्यार्थियों और संस्था के वास्तुशास्त्रज्ञों के द्वारा काम किये गये कई केसेस का डाटाबेस संस्था के पास है। ४८ वर्ग फीट से लेकर ४०लाख वर्ग फीट के आयटी पार्क, इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, बडे-बडे उद्योग आदि की सफलता के लिये रचनात्मक स्तर पर बिना अंतर्ग तोडफोड किये बिना दोष निवारण और सफलता में वृद्धि के उदाहरण इस डाटाबेस में हैं। इसके आधार पर नियमित रूप से शोधपत्र लिखे जाते हैं।
मानवजीवन की १६ अलग-अलग ज्वलंत समस्याओं से संबंधित केसेस का संकलन ‘वास्तुरविराज’ के पास है। उन समस्याओं का वर्गीकरण और विश्लेषण कर मानवी जीवन को सुखमय बनाने के लिये यहां सतत प्रयत्न होते रहते हैं।
विद्यार्थियों की अनेक समस्याओं के संबंध में विद्यार्थियों, पालकों और शिक्षकों के बीच वास्तुशास्त्र के माध्यम से समन्वय साधने का प्रयास किया जाता है। साथ ही व्यावसायिक क्षेत्र में व्यक्ति, समूह और संस्था के स्तर पर उत्पादकता में वृद्धि, कार्यक्षमता में वृद्धिकर्मचारी और अधिकारियों के बीच सुसंवाद आदि के लिये वास्तुशास्त्र के माध्यम से रचनात्मक कदम उठाये जाते हैं।
‘वास्तुरविराज’ में अभी निम्न विषयों के पाठ्यक्रमों का समावेश किया जा रहा है।
* इमारतों की उर्जा तरंगोम का मानवी जीवन पर होनेवाला प्रभाव।
* व्यक्तियों तथा इमारतों के जैवउर्जा विश्लेषण, आभाचक्र विश्लेषण और उनका परिणाम।
* अगर किसी इमारत में कोई दोष है तो ऊर्जा तरंगों और तथा उन दोषों का उपाय करतने के बाद होनेवाला सकारात्मक परिणाम.
* मोबाइल टॉवर्स का उगम और उसका मानवी जीवन पर होनेवाला परिणाम
* धरती के गर्भ में उत्पन्न होनेवाली ऊर्जा तरंगों का मानवीय जीवन पर होनेवाला परिणाम।
* विविध पिरामिड्स, यंत्र और स्फटिक के प्रभावपूर्ण उपयोग से वास्तुदोष निवारण, विविध उपकरणों की निर्माण, प्रयोग
* प्रत्येक उपकरण से किसी सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है। इसका पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण और संशोधनात्मक विश्लेषण।
* वास्तु शास्त्र और आध्यात्मिक प्रगति पर गहन अध्ययन, संशोधन, मनुष्यों के लिये उपयुक्त संकल्पनायें।
* वास्तुशास्त्र और ग्रीनबिल्डंग जैसी दो समांतर विषयों में तालमेल बैठाकर पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन।
* आरोग्य क्षेत्र से संबंधित उद्योगों में वास्तुशास्त्र का प्रभावी उपयोग व जनकल्याण।
‘वास्तुरविराज’ ने विविध गृहनिर्माण प्रकल्पों के लिये वास्तुशास्त्र के अनुसार आर्किटेक्चर प्लान बनाये हैं। साथ ही ‘सुंदरता के साथ पवित्रता’ इस आधार पर इंटिरियर डिजायनिंग की भी शुरुआत की है। आज ‘वास्तुरवरिज’ के साथ २८ हजार से अधिक संतुष्ट ग्राहक जुडे हैं। इनमें भारत के साथ ही अन्य २० देशों के ग्राहकों का समावेश है। ठाणे और पुणे साथ ही सिंगापुर और सिडनी में इनके स्वयं के कार्यालय हैं।
वास्तुरविराज परिवार पिछले बारह वर्षों से भारतीय वास्तुशास्त्र विद्यापीठ की स्थापना करने के लिये प्रयासरत है। आनेवाले समय में भारत की सभी इमारतों की प्लानिंग और डिजायनिंग वास्तुशास्त्र के अनुसार हो इस हेतु से प्रयत्न किये जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी १०० स्मार्ट सिटीज की प्लानिंग और डिजायनिंग वास्तुशास्त्र के अनुसार हो इसके लिये भी अथक प्रयत्न किये जा रहे हैं तथा वे इस कार्य में अपना पूर्ण योगदान देने के लिये भी तैयार हैं।
वास्तुशास्त्र के वैज्ञानिक पहलू और पार्श्वभूमि को ध्यान में रखते हुए तथा लोगों को इस संदर्भ मेम जानकारी देने के उद्देश्य से डॉ. रविराज अहिरराव ने ‘वास्तुरविराज’ नामक पुस्तक लिखी है। ‘वास्तुरविराज’ नाम से उन्होंने एक नाटक भी तैयार किया है जिसका लगभग ३०० से अधिक बार मंचन हो चुका है। ‘वास्तुरविराज’ की ओर से वास्तु+संस्कृति नामक मासिक पत्रिका भी प्रकाशित की जाती है।
डॉ. रविराज अहिरराव ने ७५० से अधिक टीवी शो के द्वारा कई लोगों की समस्या का समाधान किया है। कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी उन्होंने लोगों की समस्याओं का समाधान किया है। डॉ. रविराज अहिरराव स्थापत्यशास्त्र, इंटिरियर डेकोरेशन, साथ ही भारत के प्राचनि शास्त्र सिखानेवाले महाविद्यालय की, विश्व के दुर्लभ ग्रंथों का समावेश करनेवाले ग्रंथालय की तथा आनेवाले १५ सालोम में ५० हजार व्यावसायिक वास्तुशास्त्रज्ञों को तैयार करने की मनीषा रखते हैं।

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