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दिल्ली की आबोहवा खराब करने में कचरों के ऐसे ठिकाने बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं, जिनसे लैंडफिल गैसें, हवा और जलस्रोतों को एकसाथ प्रदूषित करते हैं। अवैज्ञानिक तरीके से दिल्ली में कचरों के ठिकानों से फूटती लैंडफिल नामक इन शैतानी गैसों से दिल्ली की एक बड़ी आबादी का जीना मुश्किल हो गया है। इन ठिकानों को हटाने और कचरे का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण करने के लिए विभिन्न संस्थाएं राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ( एनजीटी ) और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा चुकी हैं, लेकिन नतीजा ढांक के तीन पात रहा। दिल्ली में गाजीपुर, भलस्वा तथा ओखला में लैंडफिल ठिकाने हैं। इनमें रोजाना १४, १०० टन कचरा डाला जाता है। इसके वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण के कोई तकनीकी इंतजाम नहीं हैं। एनजीटी ने पिछले साल एक समिति का गठन कर उससे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कचरे से बिजली पैदा करने की संभावना तलाशने को कहा था, लेकिन दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड किसी परिणाम तक नहीं पहुंच पाए। इसी साल अक्टूबर माह में गाजीपुर में कूड़े का पहाड़ अचानक ठह जाने से २ लोगों की मृत्यु हो गई थी। इन ढेरों में अचानक आग भी लग जाती है, इस कारण समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण जानलेवा साबित होने लगता है। पर्यावरणीय मामलों के प्रमुख वकील गौरव बंसल का कहना है कि ये लैंडफिल कचरों के ठिकाने नहीं हैं। क्योंकि ऐसे ठिकानों के लिए विशेष डिजाइन और कायदे – कानून का प्रावधान है। कचरा डालने से पहले इन मैदानों में मिट्टी, प्लास्टिक, जैव और जैव – चिकित्सा जैसे कचरे को अलग किया जाता है। जबकि इन ठिकानों पर ऐसा कुछ भी नहीं होता है। इसलिए ये ठिकाने वेस्ट डंपिंग ग्राउंड बनकर रह गए हैं।

दरअसल लैंडफिल गैसें उन स्थलों से उत्सर्जित होती हैं, जहां गड्ढों में शहरी कचरा भर दिया गया हो। इस कचरे में औद्योगिक कचरा भी शमिल हो तो इसमें प्रदूषण की भयानकता और बढ़ जाती है। हमारे देश की महानगर पालिकाएं और भवन – निर्माता गड्ढों वाली भूमि के समतलीकरण का बड़ा आसान उपाय इस कचरे से खोज लेते हैं। रोजाना घरों से निकलने वाले कचरे और इलेक्ट्रॉनिक कचरे से गड्ढों को पाटने का काम बिना किसी रासायनिक उपचार के कर दिया जाता है। इस मिश्रित कचरे में मौजूद विभिन्न रसायन परस्पर संपर्क में आकर जब पांच – छह साल बाद रासायनिक क्रियाएं करते हैं, तो इसमें से जहरीली लैंडफिल गैसें पैदा होने लगती हैं। इनमें हाइड्रोजन पैराऑक्साइड, नाइड्रोजन ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड वगैरह होती हैं।

कचरे के सड़ने से बनने वाली इन बदबूदार गैसों को वैज्ञानिकों ने लैंडफिल गैसों के दर्ज में रखकर एक अलग ही श्रेणी बना दी है। दफन कचरे में भीतर ही भीतर जहरीला तरल पदार्थ जमीन की दरारों में रिसता है। यह जमीन के भीतर रहने वाले जीवों के लिए प्राणघातक होता है। भूगर्भ में निरंतर बहते रहने वाले जल – स्रोतों में मिलकर यह शुद्ध पानी को जहरीला बना देता है। गंधक के अनेक जीवाणुनाशक यौगिक भूमि में फैलकर उसकी उर्वरा क्षमता को नष्ट कर देते हैं।

आधुनिक जीवन शैली बहुत अधिक कचरा पैदा करती है। इसलिए भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर विकसित और विकासशील देश कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहे हैं। लेकिन ज्यादातर विकसित देशों ने समझदारी बरतते हुए इस कचरे को अपने देशों में ही नष्ट कर देने की कार्यवाही पर रोक लगा दी है। दरअसल पहले इन देशों में भी इस कचरे को धरती में गड्ढे खोदकर दफना देने की छूट थी। लेकिन जिन – जिन क्षेत्रों में यह कचरा दफनाया गया, उन – उन क्षेत्रों में लैंडफिल गैसों के उत्सर्जन में पर्यावराण बुरी तरह प्रभावित होकर खतरनाक बीमारियों का जनक बन गया। जब ये रोग लाइजाज बीमारियों के रूप में पहचाने जाने लगे तो इन देशों का शासन – प्रशासन जागा और उसने कानून बनाकर औद्योगिक व घरेलू कूड़े – कचरे को अपने देश में दफन करने पर सख्त प्रतिबंध लगा दिया। तब इन देशों ने इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए लाचार देशों की तलाश की और आपको हैरानी होगी कि सबसे लाचार देश निकला भारत। दुनिया के १०५ से भी ज्यादा देश अपना औद्योगिक कचरा भारत के समुद्री तटवर्ती इलाकों में जहाजों से भेजते हैं। इन देशों में अमेरिका, चीन, ब्राजील, आस्ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन प्रमुख हैं।

नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियारिंग रिसर्च इंस्टीयूट के एक शोध पत्र के अनुसार वर्ष १९९७ से २००५ के बीच भारत में प्लास्टिक कचरे के आयात में ८२ फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। यह आयात देश में पुनर्शोधन व्यापार को बढ़ावा देने के बहाने किया जाता है। इस क्रम में विचारणीय पहलू यह है कि इस आयातित कचरे में खतरनाक माने जाने वाले ऑर्गेनो – मरक्यूरिक यौगिक निर्धारित मात्रा से १५०० गुना अधिक पाए गए हैं, जो कैंसर जैसी लाइजाज और भयानक बीमारी को जन्म देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की मूल्याकांन समिति के अनुसार देश में हर साल ४४ लाख टन कचरा पैदा होता है। आर्गेनाइजेशन फॉर कॉर्पोरेशन एंड डेवलपमेंट ने इस मात्रा को ५० लाख टन बताया है। इसमें से केवल ३८ . ३ प्रतिशत कचरे का ही पुर्नशोधन किया जा सकता है, जबकि ४ . ३ प्रतिशत कचरे को जलाकर नष्ट किया जा सकता है। लेकिन इस कचरे को औद्योगिक इकाइयों द्वारा ईमानदारी से पुनर्शोधित न किया जाकर ज्यादतार जल स्रोतों में धकेल दिया जाता है।

कचरा भण्डारों को नष्ट करने के ऐसे ही फौरी उपायों के चलते एक सर्वे में पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन ने पाया है कि हमारे देश के पेय जल में ७५० से १००० मिलिग्राम प्रति लीटर तक नाइट्रेट पानी में मिला हुआ है और अधिकांश आबादी को बिना किसी रासायनिक उपचार के पानी प्रदान किया जा रहा है, जो लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। एप्को के अनुसार नाइट्रेट बढ़ने का प्रमुख कारण औद्योगिक कचरा, मानव व पशु मल है।

अब इस औद्योगिक व घरेलू कचरे को नष्ट करने के प्राकृतिक उपाय भी सामने आ रहे हैं। हालांकि हमारे देश के ग्रामीण अंचलों में घरेलू कचरे व मानव एवं पशु मल – मूत्र को घर के बाहर ही घरों में प्रोसेस करके खाद बनाने की परंपरा रही है। इसके चलते कचरा महामारी का रूप धारण कर जानलेवा बीमारियों का पर्याय न बनते हुए खेत की जरूरत के लिए ऐसी खाद में परिवर्तित होता है, जो फसल की उत्पादकता व पौष्टिकता बढ़ाता है। अब एक ऐसा ही अद्वितीय व अनूठा प्रयोग औद्योगिक व घरेलू जहरीले कचरे को नष्ट करने में सामने आया है। अभी तक हम केंचुओं का इस्तेमाल खेतों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वर्मी कंपोस्ट खाद कें निर्माण में करते रहे हैं। हालांकि खेतों की उर्वरा क्षमता बढ़ाने में केंचुओं की उपयोगिता सर्वविदित है, पर अब औद्योगिक कचरे को केंचुओं से निर्मित वर्मी कल्चर से ठिकाने लगाने का सफल प्रयोग हुआ है। अहमदाबाद के निकट मुथिया गांव में एक पायलट परियोजना शुरू की गई है। इसके तहत जमा ६० हजार टन कचरे में ५० हजार केंचुए छोड़े गए थे। चमत्कारिक ढंग से केंचुओं ने इस कचरे का सफाया कर दिया। फलस्वरूप यह स्थल पूरी तरह प्राकृतिक ढंग से जहर के प्रदूषण से मुक्त हो गया। लैंडफिल गैसों से सुरक्षा के लिए कचरे को नष्ट करने के कुछ ऐसे ही प्राकृतिक उपाय अमल में लाने होंगे, जिससे कचरा मैदानों में बसी आबादी के लोग और इलेक्ट्रोनिक उपकरण सुरक्षित रहें।

मोबा . ९४२५४८८२२४

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