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हमारे देश में स्वच्छता को लेकर आम लोगों के बीच काफी ढुलमुल रवैया ही रहा है जबकि समय – समय पर तमाम बड़े समाज सेवियों ने इस दिशा में सार्थक प्रयत्न किए हैं। महात्मा गांधी ने तो इस विषय को लेकर राष्ट्रव्यापी स्तर पर प्रयास किए थे। वे लगातार झुग्गी झोपड़ियों में ठहरते थे तथा खुद अपने हाथों के शौचालय साफ करते थे। समय के साथ देश में स्वच्छता की बात केवल नारों तक ही सिमट कर रह गई है। पर बहुत सारी स्वयंसेवी संस्थाओं ने अलग – अलग स्थानों पर तथा अपने स्तर पर इस अलख को जगाए रखने की कोशिश की है। इन्हीं में से एक है ‘ निर्मल ग्राम निर्माण केंद्र ’ संस्था, जिसने पिछले तीन दशकों में महाराष्ट्र के नाशिक जिले तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में आम जनों के बीच काफी बड़े पैमाने पर कार्य किया है।

संस्था की स्थापना गांधीवादी विचारधारा के आग्रही स्व . एम . वी . नावरेकर ने की थी तथा १९८३ से संस्था ने अपने आपको पूरी तरह स्वच्छता के नाम झोंक दिया है। अब तक कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार पा चुकी ‘ निर्मल ग्राम निर्माण केंद्र ’ संस्था देश ही नहीं बल्कि वैश् ‍ विक स्तर पर भी स्वच्छता के क्षेत्र में एक इंस्टीट्यूट के तौर पर सम्मान पा रही है। संस्था का प्रमुखतम एवं एकमात्र उद्देश्य लोगों को जागरूक बनाना है ताकि वे मलमूत्र, पेशाब, अपशिष्ट जल, ठोस कचरा, स्वच्छ एवं सुरक्षित पेयजल एवं व्यक्तिगत स्वच्छता एवं स्वच्छता की आदतों के प्रति स्वस्थ एवं स्वच्छ नजरिया अपना कर देश की प्रगति में महती योगदान दे सकें।

मानव अपशिष्ट के प्रति संस्था का दृष्टिकोण पूरी तरह साफ है। उनका पूरा प्रयास है कि मानव अपशिष्ट को वैज्ञानिक तरीके से स्वच्छ करने का प्रयास कर उसे ‘ अपशिष्ट निष्कासन कार्यक्रम ’ की बजाय ‘ अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रम ’ में बदला जाए ताकि मानव जीवन में रसायनों के बढ़ते प्रभाव पर भी अंकुश लगाया जा सके।

इन तमाम प्रयोगों को क्रियांवित करने के लिए संस्था द्वारा तमाम प्रकल्प चलाए जाते हैं, जैसे कि प्रशिक्षण, प्रयोग, तकनीकी ज्ञान, साहित्य का प्रकाशन, विशेष परियोजनाएं इत्यादि।

यदि ऊपर दिए गए प्रकल्पों के बाबत बात करें तो संस्था द्वारा अब तक ६०० से ज्यादा प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा चुके हैं जिनमें ३० हजार से भी अधिक इंजीनियर, विस्तार अधिकारी, अध्यापक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, एनजीओ प्रतिनिधि, महिलाएं, जमीनी स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। इतना ही नहीं, १९९६ से १९९९ के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से संस्था को २० जिलों में स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित करवाने हेतु क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र के तौर पर नियुक्त किया था तथा वर्तमान समय में महाराष्ट्र सरकार के ‘ स्वच्छ भारत मिशन ’ के लिए ‘ प्रधान राज्य स्तर प्रमुख संसाधन केंद्र ’ के तौर पर भी कार्य कर रहा है।

संस्था तमाम प्रयोग कार्यशालाएं भी चलाती रहती है। अनुपयोगी कागज को टिकाऊ सुरुचिपूर्ण और घरेलू उपयोग तथा सजावट के सामान बनाने के प्रयोगों का प्रशिक्षण दिया जाता है तथा घरेलू कचरे, पेशाब, गाय के गोबर, कचरे इत्यादि को वर्मीबॉक्स तथा वर्मीटैंक द्वारा अच्छी क्वालिटी का खाद बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। इस खाद का खेतों में प्रयोग भी किया जाता है। एक ऐसा मूत्रालय बनाया गया है जो दुर्गंधविहीन होने के साथ ही साथ मानव मूत्र को काफी उच्च स्तर के खाद में तब्दील कर देता है। साथ ही गोवर्धन गांव तथा नाशिक जिले के गावों को कम लागत के स्वच्छ शौचालय बनाने, बेकार पानी के लिए सोख्ता बनाने, घरेलू वर्मीटैंक बनाने, घरेलू वर्मीबॉक्स बनाने, बेकार पानी के पुनर्प्रयोग की इकाई बनाने, वर्मी कम्पोस्ट खाद की इकाई बनाने, घरों तथा अपार्टमेंट में शून्य कचरा विकल्प बनाने के लिए तकनीकी ज्ञान भी उपलब्ध कराते हैं।

निर्मल ग्राम निर्माण केंद्र ने जिला परिषदों तथा आम जन की सहूलियत के लिए तमाम किताबों, खेल, चित्र आलेखों तथा साहित्य का प्रकाशन भी किया है। इन पुस्तकों में सफाई तथा उससे संबंधित तकनीकी ज्ञान को आम जन तक सुलभ तरीके से पहुंचाने की कोशिश की गई है। यूनिसेफ ने भी महाराष्ट्र तथा गोवा में स्वच्छता से संबंधित साहित्य बांटने हेतु इनकी ही सामग्री का उपयोग किया था। अगर प्रकाशित पुस्तकों की बात करें तो सात चित्र आलेखों द्वारा स्वच्छता के महत्व को समझाती पुस्तिका ‘ सफाई माहिती संच ’ है, स्वच्छता आधारित गीतों का संग्रह ‘ सफाई गीते ’, कम लागत में शौचालय बंधवाने की तकनीक पर आधारित ‘ सोपा संडास असा बांधा ’, जैविक प्रकृति पर आधारित ‘ आपली माती : आपलीच खते ’, स्कूली विद्यार्थियों को ‘ सांप और सीढ़ी ’ खेल के आधार पर स्वच्छता को समझाने के लिए ‘ सफाई सांप सीढ़ी ’, शौचालय निर्माण की सभी जानकारियों को समेटे डीवीडी का प्रकाशन संस्था द्वारा किया गया है।

संस्था के कर्ताधर्ता श्रीकांत नावेरीकर बताते हैं कि संस्था ने हमेशा ही विभिन्न सरकारों के स्वच्छता कार्यक्रमों में भरपूर सहयोग दिया है ताकि लोगों तक सरकारों के स्वच्छता कार्यक्रमों की आसान पहुंच हो सके। उनमें से कुछ प्रमुख कार्यक्रम निम्न हैंः –

१ . सरकार के जलापूर्ति एवं स्वचछता विभाग के तहत सरकारी अधिकारियों, एनजीओ और लगभग २० जिलों के कारीगरों को प्रशिक्षण दिया गया। पूरे रायगड जिले का सर्वे किया ताकि पता लगाया जा सके कि वहां किस प्रकार के शौचालय बनाए जाएं।

२ . महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण के सहयोग से इंजीनियरों, विस्तार अधिकारियों, एनजीओ और ग्रामीणों की ट्रेनिंग के लिए प्रशिक्षण शिविर लगाए।

३ . आदिवासी विकास विभाग के साथ मिल कर आदिवासियों का प्रशिक्षण, आदिवासी विद्यालयों में स्वच्छता कार्यक्रम और आदिवासी इलाके के विद्यालयों में स्वच्छता के मानकों को लेकर सर्वे का कार्य किया।

४ . स्वास्थ्य विभाग के साथ स्वास्थ्य कर्मियों, चिकित्सा अधिकारियों, सहायक नर्सों और मिडवाइफ तथा जिले के स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए अध्ययन भ्रमण किए।

५ . आइसीडीएस विभाग और संस्था संयुक्त तत्वावधान में पुणे, धुले और रत्नागिरी जिलों में स्वच्छता कार्यक्रमों का मुल्यांकन किया।

६ . शहरी विकास विभाग के साथ मिल कर यूबीएसपी पदाधिकारियों को प्रशिक्षण दिया।

७ . पुणे विश् ‍ वविद्यालय के सहयोग से विद्यार्थियों को ‘ जनसंख्या शिक्षा ’ के तहत प्रशिक्षण दिया।

इतना ही नहीं संस्था ने यूनिसेफ के साथ मिल कर गोवा व महाराष्ट्र राज्य में तमाम समाज कल्याणकारी कार्य किए। नेहरू युवा पुरस्कार १९९३, कोंकण गांधी अप्पा पटवर्धन पुरस्कार १९९६, देशस्नेही पुरस्कार १९९८, इंडियन मर्चेंट्स चैम्बर्स, प्लेटिनम जुबिली एनडाउमेंट ट्रस्ट अवार्ड २००३, पूर्व राष्ट्रपति डॉ . ए . पी . जे . अब्दुल कलाम के हाथों विशेष निर्मल ग्राम पुरस्कार २००६, जीवन गौरव पुरस्कार २००७, वसुंधरा मित्र पुरस्कार २००९, पुणे विश् ‍ वविद्यालय का जीवन साधना पुरस्कार २०१३, नीलवसंत फाउंडेशन योगदान पुरस्कार २०१४, नाशिक भूषण पुरस्कार २०१५ जैसे ख्यातिनाम पुरस्कार संस्था के व्यापक तथा जनोपयोगी कार्यों पर समाज तथा राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थानों की मुहर लगाते हैं। आज देश को ऐसे कार्य कर रही संस्थाओं के प्रोत्साहन तथा इस तरह की नवीन समाजसेवी संस्थाओं को बना कर समाज तथा राष्ट्र की सतत सेवा किए जाने की आवश्यकता है..

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