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नायडू के हाथ से गई आंध्र की सत्ता, बंगाल में ममता को धक्का

लोकसभा चुनाव के निरंतर आ रहे रूझानों से सिद्ध हो रहा है कि मोदी का मैजिक लोगों के सिर चढ़ कर बोला है। एक मजबूत, दृढ़ संकल्प वाली केंद्र सरकार के पक्ष में राज्यों की समूची हिन्दी पट्टी से राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी का न केवल सूपड़ा साफ हो गया है अपितु जाति-धर्म की दीवारें एक बार फिर दरक गईं हैं। राहुल गांधी समेत दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मल्लिकार्जुन खड़गे, कन्हैया कुमार समेत अनेक दिग्गज नेता बुरी तरह पिछड़ते दिख रहे हैं। ये पंक्तियां लिखे जाने तक कुल 542 सीटों में एनडीए की कुल बढ़त 354 (भाजपा 299) सीटों तक पहुंच चुकी है, जबकि यूपीए 91, महागठबंधन 21 और अन्य 78 पर सिमटते दिख रहे हैं। उधर, केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने की कवायद करने वाले चंद्रा बाबू नायडू स्वयं आंध्र प्रदेश में अपनी सरकार गंवाने की ओर हैं। लोकसभा सीटों के नतीजों से कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार लड़खड़ा गई है, राजस्थान और मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकारों पर भी खतरे के बादल मड़राने लगे हैं।

आंध्र प्रदेश में विधानसभा के लिए हुए चुनाव में टीडीपी का सूपड़ा साफ हो गया है। चंद्रबाबू नायडू राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने की तैयारी में हैं। यहां जगन मोहन रेड्डी की पार्टी मतगणना की शुरुआत से ही काफी आगे चल रही है। पश्चिम बंगाल में जबर्दस्त हिंसा के बावजूद मतदाताओं ने लोकतंत्र की ताकत का एहसास ममता बनर्जी को करा दिया है। राज्य की लगभग आधी सीटें भाजपा के खाते में जाती दिख रही हैं। यहां तृणमूल का झंडा थामने वाले, नारा लगाने वाले बहुतेरे मतदाताओं ने खामोशी से इवीएम पर कमल का बटन दबा दिया। अमेठी से हारने का डर न होता तो राहुल गांधी वायनाड क्यों भागते। मतों की गिनती में स्मृति इरानी का धीमी किंतु निरंतर बढ़त की ओर अग्रसर होना एक और भूंकप की ओर संकेत ही तो दे रहा। भोपाल में साध्वी प्रज्ञा की विजय के संकेत भगवा आतंकवाद के खिलाफ जनता का फैसला ही तो है। उधर, बेगूसराय में कन्हैया कुमार की पराजय भी सोशल इंजीनियरिंग की विपक्ष की कोशिशों पर एक तमाचा ही है। पंजाब, केरल आदि को छोड़ दें तो समूचे देश में जैसे मोदी की सूनामी चल रही है।

दरअसल, न तो चौकीदार चोर है का नारा चला, न ही जाति के आधार पर किया गया महागठबंधन। धर्म के आधार पर भी देश को खंडित करने के प्रयास असफल होते दिख रहे। कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष ने संवैधानिक संस्थाओं को समाप्त करने की कोशिश करने का आरोप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगाया था। कथित भगवा आतंक के खिलाफ नारा दिया था। यही नहीं इस बार समूची चुनावी प्रक्रिया के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के लिए जितने अपशब्द कहे गए, पश्चिम बंगाल में जिस तरह तृणमूल सरकार के संरक्षण में अभूतपूर्व हिंसा हुई, मतदाताओं ने जैसे इन सबका बदला चुकाया इवीएम का बटन मोदी के पक्ष में दबा कर। उसी इवीएम का, जिसे लेकर विपक्ष कल तक हायतौबा मचाए हुए था और संभवतः एक बार फिर फोड़ने वाला है। विपक्ष की नकारात्मकता की राजनीति को जनता ने मजबूती से खारिज कर दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन का यह कहना सही है कि 2014 में जनता ने बड़ी उम्मीद से नरेन्द्र मोदी को जीत का सेहरा पहनाया था और अब 2019 में जनता ने मोदी के पांच साल के कामकाज और दृढ़ व्यक्तित्व में भरोसा जताते हुए उस पर मुहर लगा दी है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह जीत सत्य और न्याय की जीत है।

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