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.जो हो वृद्धों को अपनापन दें, उनके दुखों को समझे, उनके मन में समाज के प्रति यह विश्वास जगाए कि मानवता अभी भी जिंदा है। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए आनंदयात्री प्रतिष्ठान कार्य कर रहा है।

जैसे-जैसे समय बदलता जा रहा है वैसे-वैसे मनुष्य का जीवन भी आमूल बदल रहा है। सब जगह नैनो तथा मोबाइल टेक्नालॉजी का उपयोग होता हुआ दिख रहा है। परिवार के बारे में भी ऐसा ही हो रहा है। त्रिकोणी परिवार अर्थात मैं, पत्नी एवं बच्चा यह संकल्पना समाज में रूढ़ होती जा रही है और इसके कारण मुख्य रूप से परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की अनदेखी हो रही है।

संयुक्त परिवार प्रणाली में वरिष्ठों का जो मान-सम्मान व आदर था वह अब लुप्त होता जा रहा है। इसमें कुछ अपवाद भी है, परंतु पारिवारिक स्थिति एक अलग ही मार्गक्रमण करती प्रतीत होती है।

घर में रद्दी सामान जैसे वरिष्ठों की अवस्था होती जा रही है। उनकी उपस्थिति घर में अड़चन पैदा कर रही है। अत: उनकी रवानगी वृद्धाश्रम में होती जा रही है। भौतिक सुखों की चाह में दिनोंदिन आर्थिक आवश्यकता बढ़ रही है जिसे पूरी करने की चाहत में पूरा परिवार कमाने के लिए घर से बाहर निकल पड़ा है। परंतु इस प्रतिस्पर्धा में वृद्धों की मात्र बलि चढ़ रही है।

इन वृद्धों ने अपने सपने अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर कठोर मेहनत कर अपनी अगली पीढ़ी को बिना कोई तकलीफ हो यह ध्यान में रखकर बड़ा किया। वर्तमान पीढ़ी आज उसी पीढ़ी को नकार रही है। जिन हाथों ने वर्तमान पीढ़ी को भविष्य की उड़ान भरने में सहायता की उन कांपते हाथों को इस उम्र में केवल सहारे की आवश्यकता होती है और वह गलत भी नहीं है। इस प्रक्रिया में वृद्धों का कुछ हठ, चिड़चिड़ाहट, परेशानी होती ही है परंतु वर्तमान पीढ़ी इसे सहन करने को तैयार नहीं होती है। वैसे भी बुढ़ापा यह दूसरा बचपन ही कहलाता है। जैसा छोटा बच्चा वैसे वृद्ध भी होते हैं। परंतु हम अपने पुराने दिन भूल जाते हैं, और फिर परिवार में कलह निर्माण होता है। इस कलह को सुलझाने, इसमें से मार्ग निकालने के लिए कुछ सामाजिक संस्थाएं, लोग कार्य करते हैं जिसमें वृद्धाश्रम निर्माण करना भी एक कार्य है। इसमें भी कहीं सेवा यह धर्म माना जाता है; तो कहीं आर्थिक कमाई के साधन की वृत्ति भी शामिल रहती है। कुछ वृद्ध व्यक्ति अपनी व्यवस्था हेतु इन वृद्धाश्रमों का सहारा लेते हैं तो कुछ को यहां लाया जाता है। जिस उम्र में नाती-पोतों में रमने का समय होता है उस समय में ये वृद्ध निराशा से ग्रसित होकर, स्वत: की उम्र को कोसते हुए निराधार एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं।

प्रत्येक के जीवन में ऐसा अनाकलनीय अनुभव आता ही रहता है। जैसे कभी-कभी हम निराशा के गर्त में स्वत: को भूलकर किसी अंधेरी घाटी में स्वत: को झोंक रहे हैं। उस समय आजू-बाजू में क्या हो रहा है इसका हमें भान ही नहीं होता। ऐसे समय कहीं से आशा की एक किरण दिखाई देती है। कुछ लोगों की सोच, कि यदि हम अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं तो नई पीढ़ी को बनाने वाली इस पुरानी पीढ़ी को भी आनंद मिले, ने एक समूह का निर्माण किया। यहां आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक इ. सभी स्तरों को बाजू में रखकर केवल वृद्धों के मन का अंधेरा दूर करने हेतु, उन्हें निराशा की गर्त से निकालकर आशादायी जीवन जीने की प्रेरणा देने हेतु, अपना दु:ख भूलकर शेष जीवन आनंददायी जीवन व्यतीत करने हेतु, उनकी कला के माध्यम से उनके अंदर के सुप्त गुणों बाहर निकालकर उन्हें अपने-अपने कलाविष्कार प्रस्तुत करने हेतु प्रेरित करने के लिए आनंदयात्री प्रतिष्ठान नामक एक छोटे से पौधे का रोपण किया।

एक समान सामाजिक विचारों के माध्यम से एकत्रित आए ये आनंदयात्री बंधु अपना दिनक्रम संभालते हुए विविध वृद्धाश्रमों को भेंट देते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से वृद्धों के मनोरंजन का काम करने का विचार इन आनंदयात्रियों को आया और वे अपने खर्च से एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार विविध वृद्धाश्रमों में जमा होने लगे एवं विनामूल्य कार्यक्रम प्रस्तुत कर वृद्धों के जीवन में एक नवीन आशा का संचार कर रहे हैं। आज समाज में आर्थिक मदद की कोई कमी नहीं है। परंतु मुश्किल है समय दान करने की। आनंदयात्री वही समयदान इन वृद्धों के लिए करके समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त दिव्यांग व्यक्ति एवं अंध लोगों को भी अपने में समाहित कर उनके दुखों में सहभागी होने का काम ये आनंदयात्री करते हैं।

यह सब कार्य करते समय कई बाधाएं आती हैं परन्तु उन पर मात कर, जिन्हें समाज ने नकार दिया है, झटक दिया है, ऐसे लोगों को साथ देकर, उनके जख्मों को सहलाते हुए उनका दुःख कम करने का प्रयास यह आनंदयात्री प्रतिष्ठान कर रहा है। इसके अतिरिक्त दुर्गम व झोपड़पट्टी भागों में युवाओं को व्यसनों से मुक्ति हेतु तथा उन्हें सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यों की ओर प्रवृत्त करने के लिए कई उपक्रम संस्था द्वारा चलाए जा रहे हैं। समाज के सभी स्तरों के लोगों का समावेश इन कार्यक्रमों में होता है। इसके अलावा स्वयंस्फूर्ति से राजनीति, कला, व्यापार क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्ति इन उपक्रमों में शामिल होते हैं और सहायता करते हैं।

अंधेरे में चलते हुए परछाई का भी सहारा रहता है, वैसे ही उस परछाई का डर भी लगता है। अच्छे-अच्छे युवक-युवती भी निराशा के भंवर में फंस कर राह भटक जाते हैं, परन्तु आशा की एक चिंगारी दावानल भी भड़का सकती है या कभी-कभी महाप्रलय में से भी कुछ अच्छी चीज निकल सकती है। कभी-कभी एक ज्योति भी प्रमाणिकता से दिन-रात जलते हुए अपने चहुंओर का अंधेरा दूर करती है। इस ज्योति को यदि आनंदयात्री भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

सपनों को सच्चाई में उतारते समय

जिनके कारण आज हम हैं, उनके सपने पूर्ण करना भी हमारा काम है। इसके लिए जो हो उन्हें अपनापन दें, उनके दुखों को समझे, उनके मन में समाज के प्रति यह विश्वास जगाए कि मानवता अभी भी जिंदा है। इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए आनंदयात्री प्रतिष्ठान कार्य कर रहा है।

 

 

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