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चीनी संविधान में हाल में हुए परिवर्तन से सत्ता का गुरूत्व केंद्र वर्तमान राष्ट्रपति शी चिनफिंग के आसपास बना रहेगा। वे अब मर्जी के मुताबिक जब तक चाहें राष्ट्रपति पद पर बने रह सकते हैं। इससे पूरी दुनिया, विशेष रूप से पड़ोसी देश काफी चिंता में पड़ गए हैं। भारत के लिए शी का आजीवन राष्ट्रपति बने रहना निश्चित तौर से सिरदर्द साबित होने वाला है।

ची न की संसद ने राष्ट्रपति पद के लिए महज दो कार्यकाल की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। इस तरह चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनफिंग के आजीवन शीर्ष पर बने रहने का रास्ता साफ कर दिया गया है। शी ने इसी वर्ष मार्च में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत की है। हालिया दशकों में वे चीन के सब से मजबूत नेता हैं जो कि सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) और सेना के प्रमुख भी हैं।

चीन की संसद ने दो तिहाई बहुमत से संविधान में ऐतिहासिक संशोधन कर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए अधिकतम दो कार्यकाल की अनिवार्यता की दशकों पुरानी परंपरा को खत्म कर दिया। 11 मार्च को संसद में कराए गए मतदान के दौरान 2,958 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में तथा दो ने विरोध में मत डाला जबकि तीन सांसद अनुपस्थित रहे।

शी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष माओत्से तुंग के बाद सब से उल्लेखनीय व्यक्ति बने हैं। माओ, जीनी क्रांतिकारी, राजनीतिक विचारक और साम्यवादी दल के सब से ब़ड़े नेता हैं। उन्हीं के नेतृत्व में 1949 में चीन की क्रांति सफल हुई थी। वे 1949 से 1973 अपनी मृत्यु तक चीन का नेतृत्व करते रहे। मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को सैनिक रणनीति से जोड़ कर उन्होंने जिस सिद्धांत को जन्म दिया उसे दुनिया माओवाद के नाम से जानती है। माओ के अलावा किसी भी चीनी कम्युनिस्ट नेता के विचार को पार्टी संविधान में थॉट के रूप में जगह नहीं दी गई थी। शी के विचारों को पार्टी संविधान में शामिल कर दिया गया है। इस तरह चीन के स्कूल- कॉलेज के विद्यार्थी, सरकारी कर्मचारी तथा नौ करोड़ कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य अब अनिवार्य रुप से शी जिनफिंग के थॉट पढ़ेंगे।

64 वर्षीय शी को पहली बार वर्ष 2013 में देश का राष्ट्रपति चुने जाने के साथ ही पार्टी के मुखिया की जिम्मेदारी दी गई थी। सन 2016 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने आधिकारिक तौर पर शी को ‘कोर लीडर’ का टाइटल दिया था। मार्च 2018 में आजीवन देश पर शासन करने का अधिकार हासिल कर शी व्यावहारिक तौर पर चीन के सम्राट बन गए हैं। चीनी संविधान में हुए इस परिवर्तन को पूरी दुनिया में गंभीरता से लिया जा रहा है। एक तरफ चीन का सरकारी मीडिया इसे एक अच्छे और जरूरी कदम के रूप में पेश कर रहा है, वही दूसरी ओर पश्चिमी देश इसे एक व्यक्ति की तानाशाही लागू होने की पूर्व पीठिका बता रहे हैं।

यहां एक जरूरी सवाल यह उठता है कि शी ने अपना दूसरा कार्यकाल तो अभी शुरू ही किया है। उनके दूसरे कार्यकाल की अवधि 2022 तक है। ऐसे में संविधान संशोधन कर शी के लिए महज दो कार्यकाल की अनिवार्यता खत्म करने की जरूरत अभी क्यों आ पड़ी? इसका जवाब कुछ हद तक उत्तराधिकार की प्रक्रिया से मिलता है, जिसका प्रावधान 1982 के संविधान में किया गया था। इस प्रक्रिया के मुताबिक करीब डेढ़ दशक पहले से ही यह स्पष्ट होने लगता है कि किसे आगे चल कर राष्ट्रपति बनना है। पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी में और दबदबा रखने वाले सदस्य होते हैं। लेकिन सब को पता होता है कि उगने वाला सूर्य कौन सा है। ऐसे मे दूसरे कार्यकाल में चल रहे, राष्ट्रपति को राष्ट्रप्रमुख की कानूनी हैसियत भले ही मिली रहे, नौकरशाही का रूझान उस दूसरे नेता की तरफ होने लगता है, जो कुछ समय बाद सत्ता संभालने वाले होता है।

चीनी संविधान में हुए परिवर्तन से इस दूसरे कार्यकाल में सत्ता का गुरूत्व केंद्र शी के आसपास बना रहेगा। शी जिनफिंग अब अपनी मर्जी के मुताबिक जब तक चाहें राष्ट्रपति पद पर बने रह सकते हैं। इससे पूरी दुनिया, विशेष रूप से पड़ोसी देश काफी चिंता में पड़ गए हैं। भारत के लिए शी का आजीवन राष्ट्रपति बने रहना निश्चित तौर से सिरदर्द साबित होने वाला है। डोकलाम विवाद मुद्दे पर शी ने अत्यंत आक्रामक रवैया अख्तियार किया था। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गालियारा, चीन-नेपाल में बढ़ती नजदीकी और श्रीलंका तथा मालदीव को अपने जाल में लेने का चीनी प्रयास भारत के लिए घोर चिंता के विषय है।

पिछले दो दशकों से चीन भारत व्यापारिक रिश्तों में बहुत बदलाव हुआ है। फिलहाल चीन भारत का सब से बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन चुका है। वह भारत से व्यापार कर भारी मुनाफा कमा रहा है। इसके बावजूद वह भारत की मुश्किलें बढ़ाने की नई-नई चालें चलता रहता है। चीन रूस और पाकिस्तान की नई धुरी का उभरना भारत के लिए चिंता का सबब है। अब रूस चीन का एक प्रमुख शस्त्र आपूर्तिकर्ता देश बन गया है। रूस की ऊर्जा से ही चीन के कल-कारखाने चल रहे हैं। दोनों देशों के बीच तीन वर्षीय गैस आपूर्ति समझौता हुआ है जो अरबों डॉलर का है। इस तरह रूस चीन का एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन चुका है।

चीन की राह पर ही पाकिस्तान भारत को तंग करने की कोशिश में लगा रहता है। इन दोनों देशों के बीच बन रहा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा सामरिक दृष्टि से भारत के लिए खतरे की घंटी है। भारत को घेरने की कोशिश में बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका के साथ सात आसियान देशों में चीन अपने आर्थिक ताने-बाने को मजबूती देने में लगा हुआ है। शी के आजीवन राष्ट्रपति बनने से इस पूरी प्रक्रिया में और तेजी आने की संभावना है।

दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में जिस तरह चीन अपना दबदबा बढ़ाने में लगा हुआ है वह भारत ही नहीं फिलीप्पींस, इंडोनेशिया, मलेशेया आदि आसियान देशों जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका के लिए भी भारी चिंता का विषय है। भारत के लिए यह भी परेशान करने वाली बात है कि नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान चीन को सार्क की सदस्यता दिलवाना चाहते हैं। भूटान के अतिरिक्त सभी सार्क देशों से चीन के आर्थिक तथा राजनीतिक संबंध काफी मजबूत बन चुके हैं। सार्क पर चीन के इस मंडराते साये का दूरगामी असर पड़ने वाला है। सार्क देशों के इलाके में पिछले एक दशक से चीन अपना प्रभाव बनाने की जी-तोड़ कोशिश में लगा हुआ है। दक्षिण एशिया के देश चीन की आर्थिक ताकत से भलीभांति परिचित हैं। इस इलाके में चीन 30 अरब डॉलर से भी ज्यादा निवेश कर चुका है। वह सार्क देशों को 25 अरब डॉलर का ऋण रियासती दर पर दे चुका है। नेपाल, श्रीलंका और मालदीव को चीन की आर्थिक मदद से काफी फायदा हुआ है।

फिलहाल नेपाल में चीन का निवेश भारत से ज्यादा है। के.पी.शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार का रूख चीन की ओर झुका हुआ है। हाल ही में पाकिस्तानी प्रधान मंत्री ने नेपाल का दौरा किया। ओली के प्रधान मंत्री बनने के बाद नेपाल की यात्रा करने वाले वे पहले प्रधान मंत्री हैं। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री ने नेपाल के साथ रिश्ते प्रगाढ़ करने के लिए क्या दांव खेला है यह अभी रहस्य के गर्भ में है। लेकिन चीन के वरदहस्त से पाक और नेपाल की बढ़ती दोस्ती भारत के लिए एक अशुभ संकेत जरूर है।

भूटान और भारत के रिश्तों में भी सेंध लगाने की कोशिश चीन वर्षों से कर रहा है। लगभग चार पांच साल पहले भूटान ने बीजिंग में अपना दूतावास खोलने तथा थिम्फू में चीनी राजदूत को अपना निवास स्थान लेने की अनुमति देने का प्रयास किया था। उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व वादी भारत सरकार ने भूटान के इस रवैये के प्रति अपनी गहरी नाराजगी जाहिर की थी। बाद में चीन के साथ इस नजदीकी की पहल करने वाली सत्तारूढ़ पार्टी भूटानी चुनाव में पराजित हो गई। वर्तमान भूटानी सरकार की नीति भारत के अनुकूल है। दोनों देशों के रिश्तें बहुत मजबूत हैं। लेकिन ऐसी खबरें गर्म हैं कि चीन और भूटान के बीच बातचीत चल रही है। इस बातचीत के नतीजे के बारे में अटकलें लगाना गलत और अनैतिक भी होगा। डोकलाम को लेकर चीन और भूटान के बीच विवाद है। दोनों देश इस पठार पर अपना दावा ठोंकते हैं। एक आशंका जरूर उठती है कि यदि भविष्य में कभी चीन और भूटान के बीच कोई समझौता हो गया तो इसका सामरिक दृष्टि से भारत पर क्या असर पड़ेगा।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से चीन मालदीव में अपना प्रभाव बढ़ाने में जुटा है। वह पाकिस्तान के ग्वादर और जिबूती (अफ्रीका) में खड़े हो रहे अपने सैनिक ठिकानों के बीच अपनी कड़ी बनाना चाहता है। मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन एशिया भर में और उससे बाहर भी चीनी दबदबे वाला एक परिवहन नेटवर्क बनाने की पहल ‘वन बेल्ट वन रोड’ पर अपनी मंजूरी दे चुके हैं। स्वाभाविक है कि वहां भारत के पारंपारिक प्रभाव को चीन अपनी राह का रोड़ा मानता रहा है। एक समय भारत ने मालदीव में भारी आर्थिक निवेश किया था। लेकिन अब वहां भारत के मुकाबले चीनी निवेश ज्यादा हो चुका है। मालदीव में जारी मौजूदा संवैधानिक संकट में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन का समर्थन कर चीन ने वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार से अपने संबंध सुदृढ़ कर लिए हैं। दूसरी तरफ मालदीव के मुख्य विरोधी दल के नेता नशीद देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए भारत से मदद की मांग कर रहे हैं। हाल ही में चीनी मीडिया के हवाले से आई खबरों के मुताबिक 11 चीनी युद्ध पोतों का एक बेड़ा पूर्वी हिंद महासागर क्षेत्र में पंहुच गया है। रिपोर्ट में इसकी कोई वजह नहीं बताई है, न ही यह कहा गया है कि युद्ध पोत कितने समय के लिए इस तरफ से भेजे गए हैं। लेकिन मालदीव संकट को देखते हुए इस गतिविधि का निहितार्थ समझना कत्तई मुश्किल नहीं है।

इस बीच अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत एक संयुक्त क्षेत्रीय बुनियादी ढांचा बना रहे हैं। यह चीन के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट ओबोर (वन बेल्ट वन रोड) के विरोध में न होकर इसका एक विकल्प है। भारत ने चीन के ओबोर प्रोजेक्ट से अपनी सुरक्षा प्रभावित होने की बात शुरू में ही उठाई थी। चीन भले ही कहे कि उसकी इस परियोजना से भारत समेत क्षेत्र के सारे मुल्क लाभ उठा सकते हैं, पर चीन के इरादे अब दुनिया में संदेह से ही देखे जाते हैं। ऐसे में एक ऐसी परियोजना का आकार लेना जरूरी है जो एशिया के तेल और गैस के भंडारों और पूर्वी यूरोप के बाजारों तक भारत की आसान पहुंच सुनिश्चित करे। एक पाकिस्तान होकर और दूसरा ईरान होकर यह रास्ता हो सकता है। पाकिस्तान का रास्ता चीन के कब्जे में है। बचा ईरान का रास्ता तोे इस शिया मुल्क से अमेरिका के रिश्तों में भारी कड़वाहट है। सवाल यह है कि अमेरिका किसी एैसी योजना पर सहमत होगा, जिसमें ईरान की भागीदारी हो।

हाल ही में भारत यात्रा पर आए ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से दोनों देशों के तेल, गैस और बैंकिंग क्षेत्र में संबधों को व्यापक बनाने के लिए सार्थक बातचीत हुई। दोनों पक्षों ने नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसमें भारत को डेढ़ साल के लिए चाबहार बंदरगाह का एक हिस्सा लीज पर दिए जाने का समझौता भी शामिल है। चाबहार बंदरगाह को लेकर हुआ समझौता काफी अहम है। इसके जरिये तैयार माल-दुलाई गलियारा इस भौगोलिक, आर्थिक, सामरिक स्थिति को बदल कर रख देगा। इसमें भारत को मध्य एशियाई देशों तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी।

ईरान के साथ नजदिकी का खुला इजहार कर भारत ने दुनिया को जता दिया है कि उसकी विदेश नीति को अमेरिका के साथ नत्थी करके न देखा जाए। भारत किसी दबाव में नहीं बल्कि अपने हितों से जुड़े व्यवहारिक पहलुओं को ध्यान में रख कर फैसला लेता है। ईरान की पहचान अमेरिका इजराइल के घोर विरोधी देश की है। लेकिन इन दोनों से भारत की गहरी दोस्ती के बावजूद ईरान हमारे लिए कम महत्वपूर्ण नहीं है। अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा के मद्देनजरे एक समर्थ राष्ट्र की तरह भारत अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी अंध समर्थन या विरोध का झूला झूलने के बजाय अपने दीर्घकालिक हितों का अनुसरण करते हुए बेबाक विदेश नीति पर ही चलना चाहेगा। विश्व राजनीति में अपना प्रभुत्व स्थापित करने का सपना संजोए शी जिनफिंग को भारत की यह विदेश नीति शायद ही रास आए।

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