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2019 के चुनाव सामान्य व्यक्ति की असामान्य शक्ति के द्योतक हैं। यह एक अहिंसक लोकतांत्रिक क्रांति है। सामान्य व्यक्ति ने अब भारत का उत्थान करने का संकल्प लिया है। उसे परिवारवाद नहीं चाहिए। जात-पात की राजनीति नहीं चाहिए। अल्पसंख्यकों की राजनीति नहीं चाहिए। उसे अब राष्ट्रनीति चाहिए। 

सामान्य व्यक्ति की असामान्य शक्ति के कारण सन् 2019 के चुनावों में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत हुई। समाज में सामान्य व्यक्तियों की संख्या ही अधिक होती है। अंग्रेजी में इसे ‘कॉमन मैन’ कहते हैं।  इस कॉमन मैन को व्यंग्यचित्रकार आर.के.लक्ष्मण ने काफी लोकप्रिय किया था। तमिलनाडु के एक मतदान केन्द्र पर इस कॉमन मैन का कार्टून लगा था और उस पर लिखा था, ‘मेरा वोट बिकाऊ नहीं हैं।’ एक युवक इस कॉमन मैन के साथ अपनी सेल्फी ले रहा है।

जनसंख्या में सबसे अधिक संख्या का यह सामान्य व्यक्ति, सामान्य जीवन व्यतीत करने में ही आनंद का अनुभव करता है। भारत के बुद्धिजीवी ऐसा समझते हैं कि वे सामन्य व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। परंतु इससे बड़ा असत्य और कुछ नहीं हो सकता। कुछ बुद्धिजीवी आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ होते हैं। वे बताते हैं, ‘देश में कितने करोड़ युवक बेरोजगार हैं,’ ‘महंगाई किस दर से बढ़ रही हैं,’ ‘विकास दर किस तरह कम ज्यादा हो रही हैं’, ‘शेयर बाजार के आंकड़े क्या कह रहे हैं’, ‘गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले कितने हैं,’ इत्यादि। ऐसे लोग अपने तर्कों से सामान्य व्यक्ति को इन आंकड़ों के जाल में उलझाने का प्रयत्न करते हैं। परंतु यह सब आंकड़ेबाजी सामान्य व्यक्ति के सिर के ऊपर से निकल जाती है। गरीबी रेखा क्या है, यह गरीबी में जीवनयापन करने वाले को भी नहीं समझती।

दूसरे प्रकार के बुद्धिजीवी वैचारिक सिद्धांतों पर बोलते हैं, लिखते हैं, चर्चा करते हैं। वे सामान्य जन को बताते हैं कि लोकतंत्र की रक्षा होनी चाहिए, बोलने की स्वतंत्रता कायम रहनी चाहिए, उपासना पद्धति की स्वतंत्रता होनी चाहिए, सबके लिए एक जैसा विचार करना संभव नहीं है, एक सरीखा विचार किसी पर लादना सहन किया नहीं जा सकता। सामान्य व्यक्ति यह सब सुन लेता है। इसमें से कितना उसे समझ में आता है, कितना नहीं, यह बुद्धिजीवी नहीं जानते।

ऐसेे सामान्य व्यक्ति ने सन् 2019 के आम चुनावों के पूर्व ही यह निर्णय कर लिया था किसे देश का प्रधानमंत्री बनाना है? सत्ता किस दल को सौंपनी है। सामान्य व्यक्ति का निर्णय हो चुका है यह बुद्धिवाजीवियों की समझ में आया ही नहीं। ये बुद्धिजीवी भविष्यवाणी करने लगे कि मोदी सरकार नहीं बना पाएंगे। गठबंधन की सरकार बनेगी। राहुल गांधी, शरद पवार, मायावती, चंद्रबाबू नायडु में से कोई एक नया प्रधानमंत्री बनेगा। भाजपा गठबंधन को 150 से 200 के बीच सीटें मिलेंगी इत्यादि।

सामान्य व्यक्ति का निर्णय हो चुका था कि भाजपा को कितनी सीट देनी है। चुनाव परिणामों से उसका निर्णय सबको ज्ञात हो गया। इस सामान्य व्यक्ति की असामान्य निर्णय क्षमता, कार्यक्षमता के विषय में स्वामी विवेकानंद ने बहुत सुंदर शब्दों में बताया है कि “भारत गांवों में बसता है। इन गांवों में रहने वाला यह सामान्य जन असामान्य शक्तिवाला एवं सहनशील है। उसकी शक्ति का यदि जागरण हो गया तो वह असामान्य पराक्रम कर विश्व को हिला देगा।” सन् 2014 में उसने यही कर दिखाया था। 2019 के परिणामों ने उसने यह बता दिया कि 2014 का उसका पराक्रम केवल भावनावश होकर नहीं था या किसी एक व्यक्ति को लक्ष्य कर नहीं था वरन् वह विचारपूर्वक किया गया निर्णय था।

भारत के इस सामान्य व्यक्ति के मन, बुद्धि पर इस बात का कोई परिणाम नहीं होता कि ये बुद्धिजीवी, विचारवान, अर्थशास्त्री, संख्याशास्त्री क्या कहते हैं। इस सामान्य व्यक्ति ने अपनी असामान्य विचारशक्ति से निर्णय करते समय अनेक बातों पर विचार किया। उसने पहला विचार किया कि यदि भारत नामक देश रहेगा तो ही मेरा अस्तित्व रहेगा। भारत का विकास होगा तो ही मेरा विकास होगा। इसलिए मुझे सिर्फ भारत का विचार करना है। यह भारत भक्ति उसकी नस-नस में है। यह भक्ति हमारे पूर्वजों ने निर्माण की है। गंगा के कछार एवं काशी से दूर रहने वाले अपने मन में हमेशा विचार करते हैं कि मृत्यु पूर्व एक बार काशी दर्शन एवं गंगा स्नान हो जाए। 12 ज्योर्तिलिंगों एवं 52 शक्तिपीठों के दर्शन हो जाए।

सामान्य व्यक्ति के मन का भारत हमारे बुद्धिजीवी एवं अर्थशास्त्रियों की समझ में कभी नहीं आया, फिर चाहें वे अमर्त्य सेन हों या रघुराम राजन। कभी-कभी संदेह निर्माण होता है कि उनकी बातें एवं इशारे किन लोगों के लिए हैं, ये उन्हें भी ज्ञात है या नहीं?

इस सामान्य व्यक्ति ने दूसरा विचार किया कि चुनाव केन्द्र सरकार के लिए हो रहे हैं। दिल्ली की सरकार के महत्व से वह परिचित है। उसे यह समझ में आता है कि केन्द्र पर जिसका शासन उसी का देश पर शासन। केन्द्र मजबूत होना चाहिए। कमजोर शासन किसी काम का नहीं। मजबूत शासन एक दल का ही हो सकता है। कई दल एक साथ आकर मजबूत सरकार नहीं दे सकते। तीनतिगाड़ा काम बिगाड़ा। जब तीन लोग एकत्र आकर काम बिगाड़ सकते हैं तो यदि ज्यादा आ गए तो क्या होगा? यह बात भी सामान्य जन की समझ में आ जाती है। अंकशास्त्री राजधुरंधर मिलीजुली सरकार की रट लगाए हुए थे। सामान्य व्यक्ति की सोच थी कि कुछ भी हो मिलीजुली सरकार नहीं चाहिए, दोबारा मोदी ही चाहिए। बाकी सबको उन्होंने गर्त में फेंक दिया।

सामान्य व्यक्ति द्वारा 2014 और 2019 में जो किया गया उसका वर्णन “सामान्य व्यक्ति द्वारा की गई असामान्य क्रांति” के रूप में किया जा सकता है। 2014 में इस क्रांति की शुरूआत हुई एवं 2019 में इसका रूप और बड़ा हो गया। यह अहिंसक राजनीतिक क्रांति है, इसका भान कितने अंकशास्त्रियों, कितने बुद्धिजीवियों को, कितने समाजशास्त्रियों को है यह कहना मुश्किल है। भारत के ये सभी जानकार उनके द्वारा निर्मित आधुनिक घरों में रहते हैं जिनका पड़ोस से भी कोई संबध नहीं होता, तो फिर सामान्य व्यक्तियों से संपर्क तो असंभव ही है।

क्रांति कब होती है? विश्व के देशों में हुई क्रांतियों का इतिहास क्या बताता है? इंग्लैंड, आयरलैंड, अमेरिका, फ्रांस, रूस इ. देशों में हुई क्रांतियों का इतिहास क्या कहता है? पहली बात यह बताता है कि, क्रांति के कारण सत्ता परिवर्तन होता है। जो सत्तासीन हैं उन्हें सत्ता से बाहर किया जाता है। अधिकतर क्रांतियों में सत्ताधारियों को मार डाला जाता है। इतिहास दूसरी बात यह बताता है कि सत्ता परिवर्तन की क्रांति में प्रचंड़ हिंसाचार होता है। इन सब क्रांतियों में मरने वालों की संख्या लाखों में होती है। सत्ताधारियों के वंश को निर्मूल करने का काम किया जाता है।

फ्रांस की राज्यक्रांति में राजा और रानी दोनों को जान से मार दिया गया। इंग्लैण्ड की राज्यक्रांति में पहले चार्ल्स की गर्दन धड़ से अलग कर दी गई। जेम्स द्वितीय जान बचाने हेतु ब्रिटेन से भाग गया। जार-जरिना एवं उनके बच्चे सब मार दिए गए। बांग्लादेश की क्रांति में शेख मुजीब को सपरिवार मार दिया गया। माओ ने कहा था, सत्ता का मार्ग बंदुक की नली से जाता है। हमारे पूजनीय डॉ.बाबासाहब आंबेडकर जी ने बताया कि सत्ता परिवर्तन का मार्ग मतपेटी से होकर जाता है।

लोकतंत्र के माध्यम से क्रांतिकारी सत्तांतर संभव है क्या? विश्व में ऐसा कहां हुआ है? मेरे अल्पज्ञान के अनुसार यह केवल भारत में ही संभव हुआ है। परंतु किस अर्थ से यह क्रांतिकारी सत्तांतर है? यह इसलिए कहा जा सकता है कि इस देश पर दीर्घकाल तक एक ही विचारधारा के लोगों की सत्ता रही। इस विचारधारा का वर्णन नेहरू विचारधारा या सेक्युलर विचारधारा या समाजवादी विचारधारा के रूप में किया गया। विचारधारा के रूप में उसके कुछ निश्चित बलस्थान थे। जैसे सेक्युलर याने सभी धर्मों का सम्मान, समाजवाद याने संपत्ति का समान वितरण, लोकतंत्रीय व्यवस्था कायम रहनी चाहिए इ.।

नेहरू विचारधारा के इन उदात्त विचारों के साथ किसी के मतभेद होने का प्रश्न ही नहीं है। झगड़ा तब प्रारंभ होता है जब इन विचारों की आड़ लेकर भारत की आत्मा पर ही आक्रमण किया जाता है। हमारे जीवन मूल्यों को पैरों तले कुचला जाता है। अभारतीय विचार, अभारतीय जीवन-मूल्य, अभारतीय जीवन पद्धति हम पर थोपी जाती है। ऐसा प्रयत्न गत सत्तर सालों में बार-बार किया गया।

यह प्रयत्न करने वालों ने अलिखित नारे तैयार किए। “जो जो हिंदू (जीवन पद्धति) है उसकी निंदा करते हैं।” “हिंदू जीवन मूल्यों को नेस्तनाबूद किया जाएगा।” “जो हिंदुत्व की बात करेगा, उसको श्मशान घाट भेजा जाएगा।” उन्होंने वंदे मातरम् पर आक्षेप लेकर अपना एजेंडा प्रारंभ किया। शासकीय कार्यक्रमों में नारियल फोड़ने, सरस्वती पूजन करने, गीतापाठ करने पर आक्षेप लिया जाने लगा। सरस्वती को शालाओं से बाहर कर दिया गया। गीता, तुलसी रामायण ताले में बंद कर दिए गए। हिंदू मंदिरों पर बंधन लगाए जाने लगे। उनका पैसा सरकार ने लूट लिया। राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ की मांग देशद्रोह के रूप में गिनी जाने लगी। हम हमारे घर में ही पराए होने लगे, बाहर के होने लगे। हम हमारे घर को जमींदोज करने वाले हो गए। सत्तर साल याने करीब-करीब चार पीढ़ियों तक नेहरू विचारों के लत्ता-प्रहार हम खाते रहे।

परंतु सामान्य व्यक्ति अपनी जगह शांत रहा। वह लातें खाता रहा, परंतु उसने अपनी परंपरा नहीं छोड़ी। मंदिर जाना नहीं छोड़ा, न ही यात्राएं बंद कीं। मंदिर बनाने का संकल्प भी नहीं छोड़ा। राम-कृष्ण-शिव याने हिंदू। राम-कृष्ण-शिव नाम के इन आड़े-तिरछे धागों से ही हिंदू नाम का यह वस्त्र बुना गया है। इस वस्त्र की विशेषता यह है कि यह कभी जीर्ण नहीं होता, कभी फटता नहीं, और कभी मैला नहीं होता।

इस सामान्य मनुष्य को सन् 2014 में मौका मिला।  उसकी आशा-आकांक्षा, उसके जीवन मूल्य, उसकी जीवन परंपरा, उसकी संस्कृति के वाहक के रूप में एक नेता उसके सामने आया। जिसका नाम था नरेन्द्र मोदी। संघ प्रचारक, देश के लिए समर्पित, अंत:करण में भारत माता की मूर्ति। जीना है तो भारत माता के लिए, भारत मां के वैभव के लिए, भारत को पुन: विश्व गुरू बनाने के लिए। ऐसा दृढ़ संकल्प लिए यह नेता सामान्य व्यक्ति के सामने आया।

यह नेता सामान्य व्यक्ति के समान ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने वाला है। केदारनाथ जाने वाला है। विदेश दौरे के समय वहां के राष्ट्राध्यक्षों को भेंट में श्रीमद्भगवद्गीता देने वाला है। योगासन करने वाला है। सम्पूर्ण विश्व में योग दिवस के माध्यम से योग का संदेश देने वाला है। उसके इस रूप के कारण सामान्य व्यक्ति को यह महसूस होने लगा कि, उसके माध्यम से मैं ही इस देश पर शासन कर रहा हूं। मैं ही विश्वभर में घूम रहा हूं। और इसीलिए इस सामान्य व्यक्ति ने निर्णय किया कि बाकी के लोग चाहे जो कहें, आंकड़ों की बाजीगरी करें, हुकुम का इक्का तो मेरे पास ही है। मैं वोट के माध्यम से इस क्रांति को अमली जामा पहनाऊंगा।

वोट के माध्यम से उसने क्रांति घटित की। अभारतीय विचारों का ढ़ोल फाड़ दिया। इस प्रकार के विचारों को लेकर राजनीति करने वालों से इस सामान्य व्यक्ति ने मुंह मोड़ लिया, आंखें फेर लीं, फिर कभी उस ओर न देखने के लिए। एक संदेश उसने दिया है कि तुम्हारा कंस एवं रावण कार्य अब समाप्त हो चला है। पुन: कृष्ण एवं रामराज्य के दिन आ गए हैं। गांधीजी ने भी रामराज्य का स्वप्न देखा था। यह स्वप्न अब प्रत्यक्ष में उतारने का समय आ गया है। तुम्हारे अभारतीय विचारों की अब हमें आवश्यकता नहीं है। सामान्य व्यक्ति ने अपने सामान्य व्यवहार द्वारा और सामान्य भाषा के माध्यम से दिया गया एक संकेत है।

एक और तथ्य की ओर सामान्य व्यक्ति ने इंगित किया है कि यह क्रांति करते समय हमने कोई हिंसा नहीं की है। हिंसा हमारा स्वभाव नहीं है। सभी प्राणी ईश्वर की संतान हैं तो हम हिंसा कैसे करें? जब दूसरा कोई भी मार्ग नहीं बचता तब हिंसा अपरिहार्य हो जाती है। हमारे सामने मार्ग था। मतपेटी के माध्यम से परिवर्तन का मार्ग सामान्य व्यक्ति ने स्वीकार किया।

अब यहां से आगे सामान्य व्यक्ति के लिए शासन चलेगा। हमारे देश में सामान्य व्यक्ति का विचार जितना गांधीजी ने किया उतना किसी ने भी नहीं किया। कोई भी योजना बनाते समय सर्वप्रथम क्या विचार करना चाहिए इसके संदर्भ में उन्होंने बहुत सुंदर विचार रखा है। गांधीजी ने कहा-

“तुम्हें एक जन्तर देता हूं, जब भी तुम्हें सन्देह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे, तो यह कसौटी आजमाओ:

जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए वह कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है?

तब तुम देखोगे कि तुम्हारा सन्देह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है।”

सामान्य व्यक्ति ने अब भारत का उत्थान करने का संकल्प लिया है। उसे परिवारवाद नहीं चाहिए। जात-पात की राजनीति नहीं चाहिए। अल्पसंख्यकों की राजनीति नहीं चाहिए। उसे अब राष्ट्रनीति चाहिए। सबका साथ-सबका विकास, भेदभावरहित सबको न्याय, उपासना पद्धति की स्वतंत्रता इन सामान्य व्यक्तियों के विचारों के साथ शासन करने वालों को चलना है। विचारधारा वाले कार्यकर्ताओं को चलना है, आपको हमको सबको चलना है।

 

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