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देश के मुट्ठीभर लोगों का सामाजिक स्वास्थ्य ठीक हो और ढेर सारे लोगों का सामाजिक स्वास्थ्य यदि बिगड़ा हो तो इस देश के सामाजिक स्वास्थ्य की चिकित्सा करने की अत्यंत आवश्यकता है। इसी से नया संस्कारित भारत निर्माण हो सकेगा।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन (1809-1882) क्रम-विकास सिद्धांत के जनक हैं। उनके इस वैज्ञानिक कार्य और अर्थशास्त्र का वैसे सीधे कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन सामाजिक व्यवस्था व अर्थव्यवस्था जैसे मानव-निर्मित विचार-व्यूह से उसका सम्बंध होता है। इसलिए मनुष्य के विचारों का उस समाज के विकास में बड़ा योगदान होता है। डार्विन के अनुसार, मनुष्य को उसके क्रमागत विकास में, जीने के संघर्ष में, बने रहने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ा है। वैसे भी जीने के संघर्ष में अपने आपको निरंतर बदलते रहना पड़ता है। जो इसमें टिक गए वे जिंदा रह गए।

मनुष्य का विकास और समाज के बीच परस्पर सम्बंध होता है, यह सर्वविदित है। जिन्होंने सांस्कृतिक, भौगोलिक व सामाजिक बदलाव स्वीकार किए और इन परिवर्तनों के साथ आधुनिकता की दिशा में मार्गक्रमण जारी रखा, वे ज्ञान के नए-नए क्षेत्रों में प्रवेश करते गए। लेकिन यह भी है कि आधुनिक मूल्यों को स्वीकार करने का आभास निर्माण करने वाला समाज में एक बड़ा समूह होता है। फिलहाल हम सब भारतीय नए भारत के निर्माण का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। भारत का रोबोटिक मिशन चंद्रयान-2 चंद्रमा की ओर कूच कर गया है। चंद्रमा पर उपलब्ध हीलियम-3 खनिज को धरती पर लाया जा सका तो वर्तमान ऊर्जा जरूरतों की बड़े पैमाने पर पूर्ति हो सकेगी। विदेश नीति, रक्षा-प्रतिरक्षा क्षेत्रों में भारत की वैश्विक ऊंचाई बढ़ चुकी है। पाकिस्तान जैसे देश को सीधा करने के लिए जरूरी सामर्थ्य का प्रयोग भारत ने किया है। इसलिए सारा विश्व भारत की ओर शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देख रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 ट्रिलियन की भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। उनके नेतृत्व में अनेक ताकतवर देशों के साथ भारत के रिश्तें मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक शक्ति के रूप में भारत अपना स्थान कायम कर रहा है। नए भारत की दिशा में चलते समय इन सारे शक्ति-स्थानों से हम रूबरू हो रहे हैं। और, राष्ट्र के रूप में भारत सभी स्तरों पर स्वस्थ होता दिखाई दे रहा है। फिर भी देश में, गाहे-बगाहे ही क्यों न हो पर जो घटनाएं हो रही हो रही हैं, उन पर गौर करें तो मन कुछ शंकित हो जाता है। यश के बारे में शंका नहीं है, संदेह है प्राप्त यश को कायम रखने के बारे में। इसका कारण है भारतीय समाज का सामाजिक दृष्टिकोण!

चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाले सभी लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्वास्थ्य की परिभाषा जानते हैं। यह परिभाषा क्या है? मनुष्य को महज इसलिए स्वस्थ नहीं कहा जा सकता कि उसे कोई बीमारी नहीं है। स्वस्थ तो वह है जो मानसिक, शारीरिक व सामाजिक दृष्टि से पूरी तरह सक्षम हो। स्वास्थ्य की यही  परिभाषा है। भारतीय समाज मन का विचार करें तो मानसिक व शारीरिक इन पहले दो बिंदुओं का तो ठीक से आकलन हो जाता है, लेकिन सामाजिक स्वास्थ्य के बारे में ऐसा नहीं है। हम कह सकते हैं कि व्यक्ति के रूप में हमारा मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य कुछ ठीक है। लेकिन क्या भारत का सामाजिक स्वास्थ्य ऐसा है? क्या व्यक्ति के रूप में सामाजिक दृष्टि से हम स्वयं को सशक्त कह सकते हैं? यह सोचने की बात है।

देश का हर व्यक्ति समाज का एक घटक होता है। व्यक्ति-व्यक्ति से मिलकर समाज निर्माण होता है। और, ऐसे समाज से देश बनता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व से समाज का स्वास्थ्य बनता है और उस समाज के स्वास्थ्य से देश का व्यक्तित्व उभरता है। भारतीय व्यक्ति के विचार, विकार, मत्सर, ऊंच-नीच, अंधश्रद्धा, भावना में बहकर होने वाले आंदोलन, गलत रूढ़ियां-परम्पराएं इन सारी बातों से समाज का व्यक्तित्व बनता है और उसके देश में सुखद-दुखद परिणाम होते हैं। इस सामाजिक स्वास्थ्य के देश के लोगों के मन पर, शरीर पर, उनके व्यक्तिगत जीवन व पारिवारिक जीवन पर याने कुल मिलाकर देश की सम्पूर्ण मनुष्यता पर गहरे परिणाम होते हैं।

आज हमारे जीवन की कक्षा बढ़ गई है। गांव से शहर और शहर से गांव की सीमा लांघकर जीवन अब ग्लोबल हो गया है। आधुनिकता ने केवल जीना ही सुखकर नहीं किया है, विलासी भी कर दिया है। आधुनिक सुख-सुविधाएं लेने में आदमी का आंचल कम पड़ता दिखाई दे रहा है। इतने सुख और ऐश्वर्य का उपभोग करने के बावजूद ‘मैं सुखी हूं’ ऐसा कोई नहीं कह सकता। हर व्यक्ति का कोई न कोई रोना होता ही है। सार यह कि आज का मनुष्य अत्यंत बेचैनी, अतृप्तता का अनुभव कर रहा है।

भारत के बारे में कहना हो तो वह फिलहाल परिवर्तन के एक नाजुक दौर से गुजर रहा है। पिछले अनेक दशकों में भारतीय नागरिकों ने सत्ता परिवर्तन का अनुभव नहीं किया था। छह वर्षों पूर्व भारत ने सत्ता परिवर्तन का अनुभव किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय समाज को सत्ता परिवर्तन का अनुभव कराया- चाहे फिर वह विश्व में भारतीय के रूप में अपना सिर ऊंचा उठाने का हो, पाकिस्तान को उसकी जगह दिखाने का हो या फिर भारत के विभिन्न राज्यों में नागरिकों के दैनंदिन जीवन में सुख का झरना प्रवाहित करने के लिए एक बड़ा संजाल खड़ा करना हो। इसलिए भारतीय नागरिक अब बड़ी अपेक्षा से सरकार की ओर देखता है।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता के बाद देश में रामराज्य की स्थापना की कल्पना की थी। लेकिन रामराज्य तो दूर, भारतीय समाज पिछले साठ वर्षों में कभी न सुलझने वाली समस्याओं में उलझता चला गया। आज वह भारत के क्षितिज पर नव भारत की निर्मिति के सुनहरे किरण देख रहा है।

आज यातायात, सोशल नेटवर्किंग, परिवहन के अत्याधुनिक साधनों से प्रादेशिक अंतर घट गया है। शिक्षा के कारण जागरूकता बढ़ी है। इसी कारण हर अच्छी-बुरी घटना पर प्रतिक्रियाएं आती हैं। व्हाट्सएप व फेसबुक के कारण सूचनाएं तेजी से फैलती हैं। सोशल मीडिया ने आम आदमी के व्यक्तिगत जीवन में भी घुसपैठ कर ली है। अफवाहों के जरिए विध्वंस फैलाने के लिए भी सोशल मीडिया बड़े पैमाने पर जिम्मेदार है। विभिन्न एप डाउनलोड करने से व्यक्तिगत जानकारी बाहर आ रही है। मनुष्य के रूप में हमारा व्यक्तिगत जीवन निजी नहीं रह गया है।

आधुनिक विचारधारा व्यक्ति को अधिक महत्व देती है। हर व्यक्ति स्वयं को अधिकाधिक उन्नत करने का प्रयास कर रहा है। और, आज के स्पर्धा के युग में यह जरूरी भी है। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद खत्म होता जा रहा है। महंगाई कालातीत लग रही है। कल भी वह बढ़ रही थी और आज भी बढ़ रही है। फिर भी  आधुनिक प्रौद्योगिक प्रगति के कारण सुविधाएं भी बहुत उपलब्ध हो रही हैं। कुछ विशेष लोगों का जीवनस्तर ऊंचा उठा है। देहात शहर बनते जा रहे हैं। भूमि-आंगन जैसी बातें देहातों से भी नदारद होती जा रही हैं। एक बड़ी सांस्कृतिक विरासत नष्ट होती जा रही है। गांव न गांव रह गए हैं और न ठीक से शहर बन पा रहे हैं। इस तरह की विचित्र अवस्था में जीने के लिए हम मजबूर हैं।

अनाज पैदा करने वाली खेती उपेक्षा की शिकार है। खेती लाभ का नहीं, घाटे का सौदा बन चुकी है। बेभरोसे की बारिश के कारण किसानों का जीवन उलटपुलट हो गया है। इसलिए मौसम-दर-मौसम किसान पर कर्ज बढ़ता ही जाता है। नतीजा है, देहातों से शहरों की ओर पलायन। आदमी पेट की खातिर अपना गांव छोड़कर दर-दर भटक रहा है। शहरों में भी नौकरी करने वालों की हालत कहां ठीक है? भीड़-भड़क्के में किसी तरह वे अपना जीवन ठेल रहा हैं। शहर तो बेतरतीब बढ़ गए हैं। सारी नागरी सुविधाएं अधूरी हैं, अपर्याप्त हैं। सड़क हो या ट्रेन का सफर- हमेशा परेशानी का सबब है। दुर्घटनाएं नित्य की बात हो गई हैं। इस तरह की स्थितियां भारत में बन गई हैं।

भारतीय व्यक्ति, भारतीय समाज को इस आपाधापी से मुक्त कर स्वस्थ जीवन देने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी नए भारत के नेतृत्व पर है। जनसाधारण का जीवन सुखकर बनाने के लिए उनके रोजमर्रे के जीवन की नरक यातनाओं को कम करने की ओर बारीकी से ध्यान देना होगा। नरेंद्र मोदी ने नए भारत की संकल्पना भारतीय नागरिकों के मन में पैदा की है। इस संकल्पना से क्या भारतीय नागरिक रामराज्य की अनुभूति पा सकेगा? यह अनुभूति भारतीय नागरिकों के जीवन में आ जाए तो स्वातंत्र्योत्तर भारत में रामराज होगा यह महात्मा गांधी की कल्पना प्रत्यक्ष में लाने का श्रेय नरेंद्र मोदी सरकार को मिलेगा।

साथ में यह सोचना भी आवश्यक है कि समाज के रूप में हम क्या वाकई संस्कारित हैं? आज समाज में सार्वजनिक स्थानों में, कार्यालयों में, रास्तों पर या अन्यत्र हम किस तरह बर्ताव करें यह बताना पड़े तो जान लें कि हम पर सामाजिक संस्कार ठीक से नहीं हुए हैं। वाहनों का हार्न कितनी क्षमता का हो इसके आरटीओ ने नियम बनाए हैं। लेकिन अभी तो भीड़भरी सड़क में राह पाने के लिए दो पहिया वाहन वाले भी उच्च क्षमता के कर्कश हार्न बजाते तेजी से दौड़ते दिखाई देते हैं। भारतीय समाजमन दिन-ब-दिन चिड़चिड़ा होता जा रहा है। इसमें ध्वनि प्रदूषण का बड़ा योगदान है। यातायात के नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालक भी समाज को इस अवस्था में ला रहे हैं। अपना घर, अपना परिसर साफ रखना चाहिए। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? हम अपना घर साफ करते हैं और कचरा सामने की खुली जगह पर या नालियों में छोड़ देते हैं। परिणाम क्या होता है? इस बारिश में भारत के अधिकांश हिस्सों में बाढ़ की स्थिति बन गई है। इस स्थिति के लिए स्वच्छता के बारे में हमारी दृष्टि ही दोषी है। असामाजिक दृष्टिकोण के कारण हमने यह सामाजिक संकट पैदा किया है।

इस तरह अनेक मामलों में हमने अपनी असंवेदनशीलता दिखाकर समाज में समस्याओं के बड़े-बड़े पहाड़ खड़े कर दिए हैैं। एक व्यक्ति नियम तोड़े कि दूसरा नियम तोड़ने का साहस दिखाता है। इससे सामाजिक अव्यवस्था निर्माण होती है। पैसे ऐंठने में लगी प्रशासन व्यवस्था में जब तक कार्यक्षम, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार किस्म के अधिकारियों को सर्वाधिकार नहीं दिए जाते तब तक नए भारत के निर्माण का सुखकर चित्र प्रत्यक्ष में अनुभव नहीं किया जा सकेगा।

भारतीय समाज में सामाजिकता के दो सिरें हैं। एक ओर नियमों को धत्ता बताने वाले लोग हैं, तो दूसरी ओर नियमों पर कड़ाई से अमल करने वाले लोग भी हैं। नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों से, फुटपाथ पर बैठने वाले फेरीवालों से बेखौफ हफ्ता वसूल करने वाले लोग भी दिखाई पड़ते हैं। यह मानसिकता हमें सार्वजनिक स्थानों पर अधिक दिखाई देती है। वही धीरे-धीरे बढ़कर देश में बड़े भ्रष्टाचार तक जा पहुंचती है। इस सामाजिक बर्ताव में सामाजिक संस्कारों की खाई बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। इस खाई में इस समय भारत देश हिचकोले ले रहा है।

हाल में देश में सामाजिक दृष्टि से असंतोष की कई समस्याएं उभरी हैं। इनमें जातिगत आधार पर आरक्षण का प्रश्न, उसके लिए निकले मोर्चे, महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में दंगे, इसके बाद मुंबई जैसे शहर में हुई आगजनी, जाति-जातियों के बीच उत्पन्न टकराव आदि का समावेश होता है। इन सभी प्रश्नों पर आंदोलनों के दौरान सामाजिक विस्फोट का जो काला पक्ष सामने आया वह देश के सामाजिक स्तर के बारे में बेचैनी निर्माण करने वाला है।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में बलात्कार एवं बाद की घटनाओं ने तो सामाजिक संवेदनाओं को चुनौती ही दी है। अमानवीयता की सीमा पार करने वाली ऐसी घटनाएं स्थान और नाम बदलकर पूरे देश में घट रही हैं। बलात्कार जैसी घटना हो जाने पर उसका पाशवी मानसिकता के रूप में वर्णन किया जाता है। बलात्कार, हत्या की यह पाशवी मानसिकता तो अपने ही समाज की होती है ना! नए भारत में वर्तमान में उपस्थित और भविष्य में आने वाले ये पिशाच समय पर ही दूर रखने का सामर्थ्य क्या हममें आने वाला है? 2022 में हमारी स्वतंत्रता को 75 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर अभावों और समृद्धि में मौजूद खाई कम करने की क्या कोशिश होगी?

भारतीय जनसाधारण के सामाजिक स्वास्थ्य पर भाष्य करने वाले ये कुछ उदाहरण हैं। हमारे आसपास देखें और प्रत्यक्ष अनुभव किए ऐसे और कई उदाहरण दिए जा सकेंगे। आदमी का सामाजिक स्वास्थ्य वर्तमान में सुधर रहा है या बिगड़ रहा है, इसकी हमें जाने-अनजाने अनुभूति होने की आज अत्यंत आवश्यकता है। जिस समाज में हम रहते हैं उस समाज के लोगों से अपना देश बनता है। इसलिए देश के मुट्ठीभर लोगों का सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक हो और ढेर सारे लोगों का सामाजिक स्वास्थ्य यदि बिगड़ा हो तो इस देश के सामाजिक स्वास्थ्य की चिकित्सा करने की अत्यंत आवश्यकता है। क्योंकि देश का सामाजिक स्वास्थ्य उस समाज के लोगों की मानसिकता पर निर्भर होता है। इस नए भारत में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच की आर्थिक खाई क्या कम की जा सकेगी? व्यक्ति-व्यक्ति के बीच की सामाजिक खाई क्या कम की जा सकेगी? क्या हर घटक को हम राष्ट्रीय स्तर पर ला सकेंगे? देश के तमाम वंचितों को क्या यह अवसर हम उपलब्ध करा पाएंगे? देश के सभी नागरिकों में सार्वजनिक नियमों का पालन करने की कर्तव्य-बुद्धि क्या हम निर्माण कर पाएंगे? देश में उन्नाव जैसी घटनाएं न हो क्या ऐसा वातावरण निर्माण किया जा सकेगा? यदि ऐसा हो तो ही देश का सामाजिक स्वास्थ्य मजबूत हुआ है, यह हम कह सकेंगे। नए भारत का निर्माण होकर विश्व में वह महाशक्ति बने यह यदि आपको ईमानदारी से लगता है तो हमें कहीं से आरंभ करना ही होगा। और, इस बारे में स्वयं से ही कुछ प्रश्न अवश्य पूछने होंगे। क्या मेरा अपने परिवार के सदस्यों के साथ संवाद है? मेरे परिवार का पड़ोस के परिवार से संवाद है? समाज के सभी का एक-दूसरे से संवाद है? गांवों का गांवों से, शहरों का शहरों से संवाद है? क्या हर जाति का दूसरी जाति से संवाद है? और राज्यों का राज्यों से संवाद है? राज्यों का देश से संवाद है? संस्कृति का अर्थ क्या है? संस्कृति याने मके की टिक्कड़… बैंगन का भरता… गणपति बाप्पा मोरया की खुलकर उद्घोषणा… नवरात्री का गरबा… दीपों का उत्सव… मंदिर की आरती… बड़े लोगों और माता-पिता के सामने सिर नवाना… अपनी मातृभाषा में अपनों से संवाद स्थापित करना… इन और ऐसी बातों को मिलाकर जो बनता है उसे ही हम संस्कृति कहते हैं। विचारधारा, व्यवहार, परम्परा, भाषा और सामाजिक अनुशासन से अंत में हमें केंद्रस्थान तक पहुंचना है। उन्हें समझ लेना है। यह सब ध्यान में रखकर बर्ताव करना, याने हम नए भारत का निर्माण कर रहे हैं ऐसा मुझे लगता है।

मनुष्य के क्रमागत विकास के सिद्धांत के जनक डार्विन ने विकास का अर्थशास्त्र विशद करते हुए कहा है कि सामाजिक व्यवस्था व आर्थिक विकास मानव निर्मित विचार-व्यूह पर अवधारित होते हैं। नए भारत की निर्मिति करते समय सुरक्षा, प्रतिरक्षा, विदेशी मामलों, आर्थिक विकास करते समय भारतीय जन-मन की सामाजिक संरचना संस्कारक्षम पद्धति से करवाना अत्यंत आवश्यक है। इस संस्कारक्षम भारतीय समाज मन के आधार पर नए भारत का यह भवन खड़ा रहने वाला है। वैश्विक स्तर पर भारत का मजबूत स्थान निर्माण करने की दृष्टि से हमने कदम उठाए हैं और भारत के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी इसमें सफल हो रहे हैं। अब भारत के अंतर्गत समाजमन में संस्कारक्षमता निर्माण करना यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

 

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विगत 6 वर्षों से देश में हो रहे आमूलाग्र और सशक्त परिवर्तनों के साक्षी होने का भाग्य हमें प्राप्त हुआ है। भ्रष्ट प्रशासन, दुर्लक्षित जनता और असुरक्षित राष्ट्र के रूप में निर्मित देश की प्रतिमा को सिर्फ 6 सालों में एक सामर्थ्यशाली राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करने में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अभूतपूर्ण भूमिका रही है।

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