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परम्परागत युद्ध का जमाना अब लद चुका है। अब युद्ध अधिक तकनीकी व आधुनिक हथियारों से लड़े जाएंगे। इसी तरह अनियंत्रित सीमाहीन छापामार युद्ध भी हैं, जो अशांति, साम्प्रदायिकता फैलाकर व मीडिया को हाईजैक कर महज आतंक व भय फैलाने के लिए लड़े जाते हैं। इन दोनों से मुकाबले के लिए नए भारत को तैयारी करनी होगीे।

हर साल प्रौद्योगिकी ऊंची छलांगें भर रही हैं और उसे हथियारों और रक्षा प्रणाली में शामिल किया जा रहा है। मार्गनिर्देशित प्रक्षेपास्त्रों से लेकर रासायनिक हथियारों तक नई शस्त्रास्त्र प्रणालियों से आकाश, भूमि और समुद्र के युद्ध में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। यही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार एवं सेंसरों जैसे वैज्ञानिक उपकरण युद्ध के अंग बन गए हैं। नए-नए हथियारों का विकास हो रहा है या नए-नए युद्ध प्रकार सामने आ रहे हैं। पहले और अब के युद्ध का स्वरूप बदल गया है। पहले तलवारों, पशुओं आदि का उपयोग कर युद्ध लड़ा जाता था। बाद में बंदूकों, टैंकों, जहाजों और पनडुब्बियों का उपयोग होने लगा। अब भविष्य का युद्ध दिमागी युद्ध होगा जैसे कि बाजार की शक्तियों का इस्तेमाल कर आर्थिक युद्ध अथवा गेमिंग, मॉडलिंग या सिमुलेशन प्रणालियों का उपयोग कर किया जाने वाला युद्ध। हमें इन खतरों से जूझने के लिए आत्मनिर्भर होना होगा।

हमारे महान वैज्ञानिक एवं इसरो के संस्थापक अध्यक्ष श्री विक्रम साराभाई ने साफ कहा है, “हमारे समक्ष उत्पन्न वास्तविक समस्याओं का सामना करने के लिए हमें अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल में किसी तरह पीछे नहीं रहना चाहिए।”आइए, आने वाले खतरों और इन अत्याधुनिक खतरनाक हथियारों से जूझने के लिए आधुनिक अनुसंधान एवं विकास रणनीतियों के जरिए किस तरह अपनी क्षमताओं में वृद्धि करें इस पर संक्षेप में क्रमवार चर्चा करें।

इलेक्ट्रानिक युद्धः

कंप्यूटरों व इंटीग्रेटेड सर्किटों के जरिए मैदानी रडारों की विश्वसनीयता व अचूकता को बढ़ाना संभव हुआ है। आईसीबीएम से उत्पन्न खतरे के कारण वृहद् श्रेणीबद्ध इलेक्ट्रानिक-स्कैन रडारों के विकास में तेजी आई है। यह रडार लक्ष्य पर ध्यान रखने और उसे पकड़ने के लिए विभिन्न तरीकों के प्रकाश-संकेत देता है। अग्रिम हवाई निगरानी प्रणाली (Airborne Surveillance Systems) के क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन परिचालित लक्ष्य संकेतों, मिल मेट्रिक रडार, सामरिक प्रक्षेपास्त्रों रडार निर्देशन, इन्फ्रा-रेड सिस्टम, टर्मिनल गाइडेड हथियारों, इनर्शियल गाइडेंस सिस्टम आदि क्षेत्रों में महारत विकसित करनी होगी। हमें लेसर सीकर्स, एनसीडब्लू टेक्नोलॉजी, एक्टिव फेज ऐरी रडार, उच्च ताप सामग्री तथा स्टील्थ सामग्री के विकास में आगे कदम बढ़ाने होंगे।

परमाणु, जैविक, रासायनिक युद्धः

परमाणु अस्त्रों से सज्जित हमारे पड़ोसी पाकिस्तान व चीन से हमें सर्वाधिक खतरा है। भारत की नीति स्पष्ट हैं कि हम अपनी ओर से पहले किसी भी परमाणु, जैविक, रासायनिक हथियार का उपयोग नहीं करेंगे, न किसी गैर-परमाणु देश के खिलाफ इसका इस्तेमाल करेंगे। इस नीति पर चलने के लिए भारत को मजबूत प्रक्षेपास्त्र रक्षा प्रणाली की आवश्यकता है।

प्रक्षेपास्त्र-स्ट्रैटजिक, हाइपरसोनिक, क्रूजः

दुश्मन के प्रक्षेपास्त्रों के हमलों से बचने के लिए प्रमुख देशों ने प्रक्षेपास्त्र रक्षा प्रणाली विकसित की है। अंतरिक्ष की रक्षा एक मुख्य चुनौती है। इसलिए अंतरिक्ष के उपयोग में जिम्मेदारी निभाना आवश्यक है। बाह्य अंतरिक्ष सभी देशों व अनुसंधान के लिए मुक्त होना चाहिए। अंतरिक्ष की रक्षा में सबसे बड़ा खतरा उपग्रहों का भटकता मलबा है। वह अभी प्रमुख कक्षाओं में भटक रहा है। अतः अंतरिक्ष में किसी भी हथियार के उपयोग से अंतरिक्ष का पर्यावरण बिगड़ जाएगा। भारत ने अंतरिक्ष रक्षा के क्षेत्र में उपलब्धि हासिल की है। उसने हाल में कायनेटिक एनर्जी एंटी-सैटलाइट मिसाइल (KEASAT) के क्षेत्र में तकनीक हासिल की है तथा इसका प्रमाण है निम्न कक्षा में घूमते उपग्रह को अचूक रूप से मार गिराना। फिर भी भविष्य के युद्ध और सुरक्षा की दृष्टि से निम्न क्षेत्रों में निकट भविष्य में अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा- 1. शार्ट-रेंज अटैक मिसाइल (SRAM), 2. मिनिएचर होमिंग व्हेईकल (MHV), 3. पृथ्वी की निम्न कक्षा में घूमते उपग्रह को ध्वस्त करने के लिए प्रक्षेपण विमानन मंच। इसी तरह एलसीए, यूएवी, सबमरीन, इंटरसेप्टर, अत्याधुनिक टैंक की भी आवश्यकता है; ताकि हमारी संचलन क्षमता में तेजी आए।

नेट-संचालित युद्धः

21वीं सदी का नया आयाम है नेट-संचालित परिचालन और युद्ध। इसके जरिए सूचनाओं का विश्लेषण, नियोजन एवं निर्णय किए जाते हैं। इसके लिए कमान, नियंत्रण और संचार तथा संस्थापना प्रणालियों के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी प्रगति आवश्यक है। कार्बन नैनो ट्यूब जैसे साधनों का उपयोग कर अत्याधुनिक सेंसरों के विकास की आवश्यकता है ताकि खुफिया सूचनाओं, निगरानी और टोह की अचूक जानकारी प्राप्त हो सके। अतः नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर एवं नेट-वर्किंग सूचनाओं को उपलब्ध कर तीनों ग्रिडों को आपस को संलग्नित रखने वाली तकनीकी का भी विकास करना होगा, ताकि अत्याधुनिक या नई पीढ़ी के हथियारों के उपयोग में फौज को आसानी हो।

कम प्रकर्ष युद्धः

इसे अंग्रेजी में एलआईसी (Low Intensity Conflicts) कहते हैं। एलआईसी फौजी और नागरी संकल्पनाओं का मिलाजुला रुप है। इसकी बेहतर परिभाषा नहीं है। संक्षेप में इसे कह सकते हैं, “सीमित राजनीतिक-फौजी युद्ध। इसका उद्देश्य राजनीतिक, फौजी, सामाजिक, आर्थिक या मनोवैज्ञानिक लक्ष्य प्राप्त करना होता है। इसे राजनीतिक-फौजी संघर्ष भी कहा जाता है। ये युद्ध दो प्रकार के होते हैं- परम्परागत एवं अनियमित। परम्परागत युद्ध संगठित, आधुनिक प्रौद्योिेगक संसाधनों से सुसज्जित होते हैं। उसका संचालन राष्ट्रीय नीति के अंतर्गत (सुसंगत) तरीके से होता है। इसमें फौजी व मित्र सेनाएं निर्णायक युद्ध लड़ती हैं। यह जिनेवा समझौता 1949 के तहत आता है। इसी तरह अनियमित युद्ध अनौपचारिक होता है। यह प्रौद्योगिकियों, परिचालन स्वतंत्रता, स्थानीय दिशानिर्देशों, तदर्थ नीतियों, छापेमारी/झगड़ों, विश्वासघाती तरीकों, दोस्तों की सहायता से लड़ा जाता है। जिनेवा समझौता 1949 के अधीन यह नहीं होता। कम गहनता वाले संघर्षों की प्रमुख विशेषताएं हैंः- वे अत्याधुनिक हथियारों की अपेक्षा कम विकसित हथियारों से लड़े जाते हैं। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। ऐसे अधिकांश युद्ध अब देशों के बीच अशांति फैलाने के लिए किए जाते हैं। ये युद्ध सरकार के विफल होने और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में सामाजिक प्रतियोगिता तथा अवैध कारोबार के कारण होते हैं। छोटे आग्नेयास्त्रों, विस्फोटकों, रॉकेटों एवं हथगोलों का हमले में उपयोग किया जाता है। इस तरह के युद्ध का मुकाबला करने के लिए हल्के व बुलेटप्रूफ जैकेटों तथा जमीनी सुरंगों से वाहनों के बचाव के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास जरूरी है। इसी तरह सेंसरों के समन्वयन की स्थायी संस्थापना, कृत्रिम प्रकाश साधनों और तेजी से संवहित किए जाने वाले चल बुलेट प्रूफ पैनलों को विकसित करना जरूरी है।

सायबर युद्धः

सायबर युद्ध एवं आतंकवाद, अनियंत्रित युद्ध (Unrestricted Warfare) है, जिसे सीमाहीन युद्ध (Asymmetric Warfare) भी कहा जाता है। फौजी ठिकानों, रक्षा दूरसंचार संजाल, वैश्विक कमान, नियंत्रण और दूरसंचार संजाल, सामरिक नेटवर्क (शस्त्रादि), परिवहन नेटवर्क, वैश्विक स्थितिक प्रणाली संजाल/ नेविगेशन नेटवर्क, फौजी समन्वय एवं हवाई नियंत्रण नेटवर्क, कानून लागू करने वाली व्यवस्था, आपदा रिस्पांस एवं रिकवरी नेटवर्क, सार्वजनिक व निजी दोनों रक्षा एजेंसियां, राजनीतिक नेताओं और सरकार की छवि बिगाड़ने और भय व आतंक फैलाने के लिए मीडिया हाइजैकिंग और इस तरह देश के अंतर्गत (हमले करवाकर) संघर्ष की स्थिति पैदा करना तथा विद्वेष फैलाकर साम्प्रदायिक दंगे करवाकर कानून व व्यवस्था की समस्या पैदा करना और मानवीय संकट उपस्थित करना, जनसुविधाओं की आधारभूत सुविधाओं, हवाई यातायात नियंत्रण, मोबाइल/उपग्रह संचार प्रणाली, व्यावसायिक परिचालन नेटवर्क, स्वास्थ्य सूचनाओं के नेटवर्क, वाणिज्यिक नेटवर्क व सेवाएं, शेयर बाजार, बैंकिंग नेटवर्क, व्यापारिक प्रतिष्ठान, आपदा रिस्पांस नेटवर्क, मीडिया व सार्वजनिक सूचना नेटवर्क आदि को चोट पहुंचाना शामिल होता है।

नौसेनाः

नौसेना को भविष्य की युद्ध की दृष्टि से विशेष किस्म के अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है। निम्न क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है- 1. पानी के भीतर प्रणोदन प्रौद्योगिकियां जैसे कि पम्प जेट प्रणोदन, उच्च स्तर के औष्णिक इंजन तथा क्लोज साइकल थर्मल सिस्टम (CCTS), 2. पानी की सतह पर चलने वाले जहाजों एवं पनडुब्बियों के लिए प्रणोदन प्रौद्योगिकियां, ताकि हवामुक्त प्रणोदन प्रणाली (Fuel Cell) एवं पम्प जेट प्रणोदन, 3. ध्वनिरोधी प्रणाली, 4.उच्च क्षमता की बैटरियां (AI-Ago, SMgCucl2 & amp, Li-lon), 5. हल्की घिरनियां, 6. सेंसर नेटवर्किंग, 7. उच्च क्षमता के सोनार यंत्र एवं 8. आईईडी की खोज करने के लिए उच्च क्षमता के आणविक अनुलेख पोलीमर (MIP)।

जैव विज्ञानः

हर समस्या का समाधान है, लेकिन एनबीसी दो तरह से जटिल समस्या है। पहली बात है समस्या का पता लगाना और दूसरी बात है उससे रक्षा करना। इस समस्या से निपटने में जैव विज्ञान से बड़ी सहायता मिलती है। इससे रणमैदान में बने रहने की हमारी क्षमता में वृद्धि होती है। जिन क्षेत्रों में हमें अनुसंधान करने हैं वे हैं- 1. एनबीसी रक्षा के लिए जैव-प्रौद्योगिकी व नैनो प्रौद्योगिकी, 2. सी एवं एएमपी को रोकने के लिए दवाओं, एन/आर एजेंटों व कीलेट प्रौद्योगिकी का विकास, 3. रेडियो विकिरणों का पता लगाने के लिए पूरे शरीर का निरीक्षण करने वाली चल प्रौद्योगिकी, 4. सक्षमता वृद्धि के लिए जेनोमिक व प्रोटोमिक प्रयास, 5. व्यवहार नियंत्रण करने वाली प्रौद्योगिकी, 6. सुरक्षित ऊर्जा पाने के लिए जैव-ईंधन प्रोद्योगिकी, 7. क्षमता बढ़ाने, ऊर्जा से प्रतिपूरित डिजाइन-खाद्यान्न के लिए प्रौद्योगिकी तथा 8. ऊंचाई पर ठण्ड को सहने की क्षमता बढ़ाने के लिए ट्रांसजेनिक प्लांट टेक्नोलॉजी।

विश्व की बदलती परिस्थितियों, वैज्ञानिक व प्रौद्योगिक प्रगति को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी भविष्य की नीतियां व दिशा तय करनी होगी। कम से कम अगले तीस वर्षों के लिए हम अभी से तैयारी करनी होगी।

                                                                                                                                                          लेखक डीआरडीओ में अधिकारी

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